फणीश्वर नाथ रेणु

गोआनीज लेडी के भीतर की दुनिया (लफड़ा)

 

  • अमित मनोज

फणीश्वरनाथ रेणु लोक की आंचलिकता के सबसे सजग और संवेदनशील कथाकार हैं। उनका सृजनपाठक को निरन्तर स्पंदित करता है। वे किस्सा सुनने और पढ़ने वाले को अपने पात्रों के जन-जीवन में इतना रमा देते हैं कि फिर उसका अन्यत्र डूबने का मन नहीं करता। रेणु की किस्सा कहने और बुनने की कला के हम सब मुरीद हैं भी इसलिए कि वे भाषा और जीवन का अद्भुत सामंजस्य हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। लोक की गहरी पकड़ रखने वाले रेणु लोक भाषा और लोक संवेदना को अपने अनूठे शिल्प से इस कदर गूंथते हैं कि एक जीवन्त बिम्ब पाठक के सामने आ उसे अपने में बाँध लेता है।

रेणु ने क्या नहीं लिखा? उपन्यास, कहानी, रिपोर्ताज, नाटक, कविताएँ, निबंध, रेखाचित्र, गद्यगीत, संस्मरण सब तो लिखा है। सब में ऐसा कौन-सा तत्त्व है जो हमें अपनी ओर खींचता है। उनके पात्रों को ही देख लीजिए। प्रेमचंद ने जिस तरह से गाँव के साधारण से व्यक्तियों को अपनी तूलिका से असाधारण बनाया, रेणु ने उन्हीं पात्रों के भीतर के सौंदर्य और सांस्कृतिक अभिरुचि व समृद्धि को पकड़ा और उसे गहरे से चित्रित किया। उनके पात्र अपनी विशिष्टता के साथ जिन रचनाओं में मौजूद होते हैं, वे देर तक याद रहते हैं। कितने ही पात्र ऐसे हैं जो हमें हमारे आस-पास के से लगते हैं। रेणु मानो अपने पात्रों का हृदय पूरी तरह से खोलकर रख देते हैं। मानो कि वे उनके तमाम भावों को पकड़ ठहरा-सा देते हों कि देखिए, क्या है कल्पना से गढ़े इन पात्रों के भीतर!

अपनी रचनाओं में रेणु वातावरण को बहुत बारीकी से बुनते हैं। कितनी कहानियाँ ऐसी हैं जब वातावरण उनमें आ अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज़ कराता है। एक-एक क्षण को वे बहुत तन्मयता से रचते हैं। उनकी कहानियों को पढ़ते वक़्त अनेक बिम्ब सिनेमास्कोप की तरह एहसास देते हैं। पात्रों के भीतर की दुनिया एक गति में होती है। ध्वनियाँ उनके यहाँ शब्दों में इस तरह घुली होती हैं कि पढ़ते वक़्त वे हमें अपना अनुभव कराती हैं।

रेणु की अक्सर कुछ ही कहानियों की चर्चा अधिक होती है। जैसे ‘रसप्रिया’, ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम’, ‘संवदिया’, ‘एक आदिम रात्रि की महक’, ‘अगिनखोर’, ‘लाल पान की बेगम’, ‘पंचलाईट’ आदि। रेणु ने स्वयं भी ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ में उक्त में से ‘पंचलाईट’ को छोड़कर ‘जलवा’, ‘आत्म-साक्षी’, ‘रेखाएं : वृत्तचक्र’ को अन्य कहानियों की अपेक्षाकृत महत्त्व अधिक दिया है। ‘नैना जोगिन’जैसी कहानी का नाम भी खूब सुनने-सुनाने में आ जाता है। तब उनकी बाकी कहानियाँ कहती हुई सी लगती हैं-हमारा क्या! हम क्यों! हम भी तो उसी रेणु की कलम से उपजी हैं!

रेणु यहीं आकर एक विशिष्ट कथाकार हो जाते हैं। उनकी बाकी कहानियों में भी कुछ ऐसा है जो वे अपने लिए उचित ‘स्पेस’ की मांग करती हैं। वे केवल गाँव-गिरांव के चरित्रों को ही सामने नहीं लाते, शहरी और महानगरीय चकाचौंध के भीतर के चरित्रों की कहानी भी उतने ही शिद्दत से कहते हैं। ‘लफड़ा’को ही ले लीजिए। यह एक ऐसी ही कहानी है। इस कहानी में बैलों की घंटियों की टन-टन और धान के खेतों की गंध भले ही मौजूद नहीं है, पर उनके सृजन की ‘गंध’ तो है जो कहानी को विशिष्ट बनाती है। हीराबाई, रमपतिया, बिरजू की माँ, बड़ी बहुरिया, फ़ातिमादि, नैना जोगिन की तरह ‘लफड़ा’ की गोआनीज लेडी भी रेणु के स्त्री-पात्रों में अपनी प्रासंगिकता के साथ हमारे सामने मौजूद होती है।

‘लफड़ा’ फ़िल्मी दुनिया के उन लोगों के जीवन-संघर्ष की कहानी है जो अपने सपनों को साकार करने के लिए घर से भागते हैं। चकाचौंध की दुनिया में उनके जीवन का अँधेरा अलग-अलग रूपों में विद्यमान रहता है जिसे रेणु जैसे कथाकार सूक्ष्मता से पकड़ते हैं। इस कहानी के पात्रों में कहानीकार के अलावा गफूर, रामदास, दासगुप्ता और यदुवीर हैं। ये वे लोग हैं जो सिनेमा के सहायक के रूप में काम करते हैं। एक जगह आए संवाद ‘…सभी साले ‘चाइल्ड हीरो’ बनने के लिए घर से भागे थे…’ से लगता है कि इन लोगों ने अपने कुछ सपनों के साथ फ़िल्मी दुनिया में प्रवेश किया था। निस्संदेह ये वो लोग हैं जो परदे पर अपनी उपस्थिति चाहते थे और अब उन्हें परदे के पीछे रहकर अलग-अलग भूमिकाओं में काम करना पड़ रहा है। इससे वे खुश नहीं हैं। अपने सपनों को पूरा करने में कहीं न कहीं वे असफल रहते हैं। यही एक टीस है जो उनके जीवन को इस तरह प्रभावित करती है कि उसमें स्थायित्व जैसी कोई चीज नहीं है। होटल में रहकर ही अपने लिए काम ढूंढना और अपने को दूसरी-दूसरी चीजों में संलग्न करना कहीं न कहीं उनकी मनोदशा और मजबूरी को ही दर्शाता है। ऐसा लगता है जैसे ये लोग हमेशा एक नाटकीय जीवन को जीते हैं। उनकी जीवन-शैली में कितनी तरह की अवांछित चीजें आ गई हैं, जिनसे वे शायद बच ही न पा रहे हों। देखने में ऐसा लग सकता है कि कहीं भी वे गंभीर नहीं हैं, लेकिन इस उथलेपन के नीचे उनकी गहरी उदासी, निराशा और अनिश्चितता छुपी हुई है। उन्हें लगता है कि अपने जीवन को मजा लेते हुए गुजारना है। मानो उनके लिए कोई मूल्यमायने न रखते हों। हर फिक्र को जैसे वे बेफिक्र होकर उड़ा देना चाहते हों। जो बाहर से बहुत खुश नज़र आते हों और अपनी उदासियों को मानो सफाई से छुपा लेना जानते हों।

गोआनीज़ लेडी जो ‘दि डायना गेस्ट हॉउस’ की मालकिन है, वह विधवा है। उसका जीवन अब होटल के कारण ही चलता है। देखने में भले ही वह काली और स्थूलकाय है, लेकिन मन से वह उतनी ही खूबसूरत है। मन की वह बहुत भली महिला है। अपने होटल में रहने वालों का पूरा ख्याल रखती है। होटल को चलाने के लिए भले ही वह कुछ नियमों को बार-बार दोहराती है। मसलन शराब और लड़की के लिए वह बराबर मना करती है। बावजूद उसके यदुवीर के ‘तुम यहाँ लाने ही नहीं देती मैडम!’ कहने पर वह उसे पलटकर जवाब देती है- ‘हम तुमको कब मना किया? बोलो? मना किया कबी? कसम खाकर बोल-तुमको कबी बोला…?’ वह अंतर्मुखी नहीं है और सबसे खुलकर बात करती है। वह बड़ी उम्र की महिला के रूप में ही बात और बर्ताव करती है। अनेक बातों पर वह नाराज़ होती दिखती है, लेकिन उसकी नाराजगी स्थायी नहीं रहती। इसी का फायदा दूसरे लोग उठाते हैं। वे वही करते हैं जो उन्हें करना है। होटल होते हुए भी इसमें रहने वालों को ऐसा महसूस होता है जैसे वह उनका कोई घर है।

कहानी में जिस लफड़े की बात की जाती है और जो शीर्षक के रूप में है, वह दरअसल अवैध सम्बन्धों की तरफ इशारा करता है। लफड़ा का एक अर्थ यहाँ यह भी है कि दि डायना की मालकिन ऐसे शारीरिक सम्बन्धों के लिए पूरी छूट नहीं देती, उसकी नज़र में क्योंकि यह सब कृत्य कहीं न कहीं उसे पुलिस आदि के संकट में डाल सकते हैं। ऐसे सम्बन्धों के चलते दूसरी तरह के लड़ाई-झगड़ों के होने का खतरा है जिससे उसके होटल की छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही, इस तरह के लफड़ों से होटल के संचालन में आई परेशानियों से उसे स्वयं की आजीविका भी खतरे में जान पड़ती है।

यह उस महिला के व्यक्तित्व का एक संवेदनशील पक्ष ही है कि कई-कई महीनों का किराया बकाया होने के बावजूद वह मौखिक रूप से हमेशा कहते रहने के बावजूद होटल से किसी को निकालती नहीं है। और तो और जो यदुवीर उसे होटल के नए अतिथि बने कहानीकार के सामने असभ्यता से बोलता है, उसके दिवंगत पति के बारे में कुछ कहता है, लड़की के मामले में फंसने के कारण उसी महिला से दौ सो रुपये की मांग करता है, ताकि ‘छोकरी’ के मवाली से बचा जा सके। गोआनीज़ लेडी इसके लिए डांटती भले ही है, पर मना नहीं करती। वह सही में एक माँ की तरह उनकी चिंता करती है। वह नाराज़ होती है, फिर भी किसी को परेशानी में नहीं देख सकती। यही वजह है कि सौ साल पुराने उस होटल के पुराने और गंदा होने के बावजूद फिल्म इंडस्ट्री के लोगों से हमेशा भरा रहता है। होटल की यह गहमा-गहमी फ़िल्मी दुनिया के संघर्ष की एक झलक हमारे सामने प्रस्तुत करती है।

रेणु इस गोआनीज़ लेडी के भीतर को बुनते हैं। कहानी में एक लेडी वह है जो सबको दिखाई देती है। उसका रंग-रूप हमारे सामने तुरन्त उपस्थित हो जाता है। एक वह है जो किसी को दिखाई नहीं देती। रेणु का कहानीकार ही उसी को देखता है। वे एक स्थूलकाय और काली औरत को नहीं, बल्कि उसके मन की कोमलता को चित्रित करते हैं। वे दिखाते हैं कि सब उसके शरीर और जीवन के बाहरी पक्ष में रुचि लेते हैं, जबकि वह उससे बहुत परे है। कहने वाले उसे ‘साली कुतिया’, ‘चुड़ैल’, ‘तंदुरी चिकन’ तक कह देते हैं। तब भी वह अपने मूल स्वभाव को नहीं छोड़ती। जिनके लिए वह इतना कुछ करती है, वे भी सिर्फ़ उसका इस्तेमाल करते हैं। इन सबके बीच गोआनीज लेडी अपनी दुनिया को बचाना चाहती है। वह एक ऐसे व्यक्ति की तलाश करती है जो उसके अनुसार हो, जो उसकी भावनाओं को समझ सके, जिसके साथ वह प्रेम से अपना बाकी जीवन सुखपूर्वक बिता सके। इसीलिए वह किसी व्यक्ति के साथ सम्बन्ध में है। यह सम्बन्ध भले ही उसका स्थायी नहीं है। उसी स्थायित्व की तलाश में वह लोगों के व्यक्तित्व को देखती-परखती है। कहानीकार का रामपाल के द्वारा ‘आप हैं हमारे दादा। स्टोरी और डायलॉग लिखते हैं। खुदा कसम, ए फर्स्ट क्लास जैंटलमैन…’ परिचय कराने पर उसके दिए गए जवाब ‘रखो तुम्हारा कसम। अरे, जब आता है, तो सभी फर्स्ट क्लास जैंटलमैन होता है…मगर, तुम लोग सबको बिगाड़कर छुट्टी कर देता है। एकदम ‘थर्ड क्लास’ कर देता है’ में एक पीड़ा और अनुभव छुपा हुआ है।

यदुवीर सप्ताहांत (वीकेंड) में शनिवार के दिन होटल में जिन जोड़ों के बारे में चर्चा करता है, उसके साथ वह गोआनीज़ लेडी के लिए भी कहते हुए नहीं चूकता,‘और साली मदर का साला फादर भी तो आज ही आएगा। ’तब भी गोआनीज लेडी अपने होटल में ठहरे हर मुसाफिर की अपने किसी प्रियजन की तरह चिंता करती है। होटल में बंगाली दासगुप्ता का एक लड़की के साथसम्बन्ध बनाते समय अन्य की तरह दरवाजे के छेद से चोरी-छुपे देखकर होटल के नियमों के टूटने की चिंता की बजाय अपने होटल में रहने वाले दासगुप्ता की चिंता करती है। वह जब इस तरह के कृत्य पर नाराज होकर दासगुप्ता के लिए। तकियाकलाम की तरह ‘अब्बी निकालेंगा उसकू…’ कहती है तो उसके निश्छल और कोमल व्यक्तित्व के चलते ही यदुवीर और रामपाल ‘‘शो’ बर्बाद मत करो…मरने दो साले को…तुम्हारा क्या, हमारा क्या…डार्लिंग…तुम कितनी अच्छी हो!’ कहने की हिम्मत कर पाते हैं।

अमित मनोज

जन्म : 05 नवम्बर, 1982। कठिन समय में, दुख कोई चिड़िया तो नहीं (दोनों कविता संग्रह); लोक साहित्यकार राजकिशन नैन : विवेचन और मूल्यांकन (आलोचना); प्रेमचंद की किसानी कहानियां (सम्पादन); कथा में किसान (भाग एक, भाग दो, दोनों सम्पादन); विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ,कहानियां, लेख, छायाचित्र,पेंटिंग एवं रेखांकन प्रकाशित। संप्रति: हरियाणा केंद्रीय विश्वद्यालय, महेंद्रगढ़ के हिंदी विभाग में अध्यापन. ‘रेत पथ’ पत्रिका का सम्पादन एवं प्रकाशन।

सम्पर्क : mailto:amitmanoj2018@gmail.com, 9992885959, 9416907290

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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