कहानी

तीसरी कसम : पोर-पोर में प्रेम

 

कहना तो ये चाहता हूँ कि ‘तीसरी कसम’ न होती, तो फिल्मों में प्रेम की चर्चा न हो पाती… ! क्योंकि प्रेम के इतने फेसेज़ कहीं न मिलेंगे… पर फिलहाल यही कहके सन्तोष कर ले रहा हूँ कि प्रेम न होता, तो ‘तीसरी कसम’ न होती… !!

‘तीसरी कसम’ फिल्म और कहानी दोनो के पोर-पोर में प्रेम समाया हुआ है और किसी पोर में कोई गाँठ भी नहीं कि ‘जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं’ की नौबत आती…। जिस नौटंकी वाली हीराबाई के प्रेम में आकुल हीरामन उसके चले जाने के बाद औरत की लदनी न करने की ‘तीसरी कसम’ खाता है, वह मिल जाती, तो जिन्दगी भर उसी की लदनी करता…। छोड़कर जा नहीं पा रहा था, तो अपने मन के बदले बैलों को डाँटता है – उधर मुड़-मुड़ कर क्या देखते हो? डण्डा मारना ही चाहता है कि हीराबाई की बात याद आ जाती है – अँ… मारो मत। फिल्म में दोनो के बीच यही पहला संवाद बोला गया है, जिससे दोनो एक दूसरे के जीवन में आते हैं… और यही आख़िरी भी – याद के रूप में जीवन में उसके रह जाने का पता देते हुए… और हीरामन का उठा हुआ डण्डा रुक जाता है…।

जीवन भर यह डण्डा रुका ही रहेगा, इसमें क्या किसी को शक़ होगा?

क्या जीवन भर हीराबाई निकल पाएगी हीरामन के मन से? क्या जीवन भर निकाल पाएगी ख़ुद को अपने हीरामन के मन से?

विश्रुत है कि फिल्म के निर्देशक बासु भट्टाचार्य दोनो को मिलाना चाहते थे। उनकी शेष सारी फिल्मों में नायक-नायिका मिल ही जाते हैं, पर यहाँ स्वयं लेखक तो मौजूद थे ही, फिल्म के निर्माता-संकल्पक शैलेन्द्र जी भी कहानी की प्रतिबद्धता के कायल थे। वरना यदि दोनो मिल जाते (पति-पत्नी हो जाते), तो प्रेम की यह हूक व मन की यह टीस न होती…जो ‘तीसरी कसम’ को चिरस्मरणीय बनाती है!!   

नाम की एकता के चलते हीरामन को मीता कहती है हीराबाई और अन्तिम विदाई के समय बोलती है – ‘जी छोटा मत करो मीता…’। पर क्या अपने को जी छोटा करने से रोक पाती है? हीरामन की दी हुई रुपयों की थैली व अपनी तरफ से देने के लिए शॉल लिये हुए खड़ी थी स्टेशन पर…। और हीरामन न आता, तो रेलगाड़ी छोड़ देने के लिए तैयार थी। चली तो गयी कहके कि ‘बिक गयी महुआ…। मगर उस लोक कथा की महुआ भी बेची ज़रूर गयी, बिककर गयी कहाँ?? नदी में कूद गयी…। हीराबाई भी अपने मीता की यादों की नदी में तिरती ही रहेगी, इसमें क्या किसी को शक़ होगा?

यही प्रेम भाव है, जो हीरा और उसके मीता को सनातन प्रेमी बनाता है तथा ‘तीसरी कसम’ को  कालजयी फिल्म और कहानी को ‘अमर कथा’।             

यह मादन भाव, ‘तीसरी कसम’ के जिस अंश को छू दो, प्रेम बनकर बह निकलता है| पर कहानी में पढ़ी जाने वाली जो घटनाएँ, बातें व गीत…आदि अपनी विधागत मूकता में अरूप-अमूर्त्त रह जाते हैं, उन्हें फिल्म-विधा अपनी फितरत में स्वर-सुर देकर रूपाकार में मूर्त्त कर देती है।

फिर भी दोनो मीताओं के बीच प्रेम मूक ही रह जाता है, पर यह मूक प्रेम-कथा नहीं है, प्रेम की मूक कथा है। इतनी-इतनी बातें करने वाले हीरामन व हीराबाई अपनी इच्छाओं को एक दूसरे से कदापि नहीं कहते। मौके तो बहुत आते हैं – कहानी में कुछ कम, फिल्म में बहुतेरे… सबसे अधिक, मुखर होने की कग़ार पर तब आ गया, जब मन्दिर में जाने के पहले हीराबाई पूछ देती है – क्या माँगोगे? पता दोनो को है, पर कहना तो बडा गाढ है – ‘ये कहने में उनको ज़माने लगे हैं’… हीरामन का उत्तर – ‘सो तो भगवानजी से ही माँगेंगे’।

और इस तरह दोनो मौन ही साधे रह जाते हैं…। मुझे बार-बार शक़ होता रहा कि आज के ‘ईलू ईलू’ (आई लव यू) चिल्लाने के युग वाले लोग क्या इस मूक प्रेम को समझ पाएँगे, पर इसी कहानी व फिल्म पर एक एम.फिल. कराने तथा पिछले तीन सालों से ‘साहित्य और सिनेमा’ के एम.ए. कोर्स में पढ़ाते हुए पाया कि आज के बच्चे भी किसी अन्य फिल्म से ज्यादा इसे ही पसन्द करते हैं। क्यों न करें, फिल्म का हर दृश्य, हर संवाद, हर फ्रेम, हर अदा इसी प्रेम से ही लबरेज़ है…प्रेमोन्मुख है। प्रेम-प्रेम पुकार रही है। वह चाहे याद के लिए हो या भुलाने के लिए, मिलन के लिए हो या जुदाई के लिए, रूठने का सबब हो या मनाने का या मान जाने का…!! तो फिर हीरामन व हीराबाई को बोलने की ज़रूरत क्या है!! ग़ालिब साहब से क्षमा-याचना के साथ कहूँ, तो ‘जो दिल ही दिल हो सीने में, तो फिर मुँह में ज़ुबाँ क्यों हो??’

तो आइये देखें कि ‘तीसरी कसम’ के पोर-पोर में कैसे समाया है प्रेम, कैसे बोलता है प्रेम, कैसे सालता है प्रेम…जो  इसकी कलात्मक उत्कृष्टता का अहम पहलू भी है…  ‘तीसरी कसम’ का आधा भाग हीराबाई की यात्रा है – हीरामन की बैलगाड़ी में। पर वस्तुत: यह एक बडी गहन-गुह्य प्रेम-यात्रा है, जिसमें ‘दोनो ओर प्रेम पलता है’। और अन्तत: तो फिल्म की प्रेम-यात्रा सिद्ध होता है, जो रसे-रसे सराबोर करते हुए दर्शक की मंज़िल बन जाता है।

परन्तु यूँ देखा जाए, तो हीरामन व हीराबाई दो ध्रुवों पर स्थित हैं। कहाँ एक अनपढ, देहाती गाड़ीवान, जिसे कानपुर-नागपुर का नाम तक पता नहीं और कहाँ एक उच्चवर्गीय सोसाइटी में सक्रिय कलानेत्री !! इनमें तो प्रेम की सम्भावना भी सिरे से अकल्पनीय। पर यही तो मर्म है कि विपरीतता के प्रति आकर्षण की सहज डोर पकड़ाई रेणुदा ने और रच डाला – विरुद्धों का सामंजस्य या कहें कि ‘कंट्रास्ट’ का ‘मैच’, जो प्रेम की विरल ख़ासियत है। देहाती हीरामन को लोकमन का व्यक्तित्त्व अता किया, जो यात्रा की शुरुआत में हीराबाई को परी से डाकिनी-पिशाचिनी और देवी तक के विविध रूपों में देखता है, तो अभिजात हीराबाई में मानुष-मर्म समझने की वह संवेदना भर दी, जिससे ‘हीराबाई ने परख लिया, हीरामन सचमुच हीरा है’। और समानान्तरता की यह संगति ‘तीसरी कसम’ की प्रेम-माला को अर्गला की तरह पिरोये हुए है।   

कहानी में हीरामन की शुरुआत गन्ध से होती है – ‘ऐसे में कोई क्या गाड़ी हाँके, जब रह-रह कर गाड़ी में चम्पा का फूल खिल जाता है’। फिर जिज्ञासा व कुतूहल आता है, जिसमें हीरामन बार-बार पर्दे के ऊपर से गाड़ी के भीतर की तरफ निहारता है। जब चाँदनी गाड़ी में झाँकती है, तो ‘सवारी की नाक में जुगनू जगमगा उठता है’ ये सब संकेत मोहकता के हैं, जो प्यार की बडी उर्वर ज़मीन है। इसके बाद उसे ‘सब अजगुत-अजगुत (नया व अद्भुत) लगता है’। निरी अरथ-आखर की कला में व्यक्त इस मादन भाव के समक्ष फिल्म की साधन-समृद्ध कला के हाथ-पाँव फूल जाते हैं। उसे मन्दिर का सहारा लेना पड़ता है।  हीरामन की शुरुआत डर के भाव से करनी पड़ती है। आता है चम्पा (फूल), पर महकता नहीं। कहानी में मह-मह करता उसका मारक प्यार-संकेत फिल्म में मुँह ताकता रह जाता है।

फिर परिचय का दौर शुरू होता है, तो हीरामन के दुबारा अविवाहित रहने और शादी न करने की मंशा पर ख़ास ज़ोर दिया जाता है। इस दौरान हीरामन की मस्ती – ‘जा रे ज़माना’ व ‘हिस्स’ तथा नटुआ-नाच वाले गीत की सुरीली धुन पर परवान चढ़ती हीराबाई की तुष्टि भरी आँखों को हीरामन नहीं, पर दर्शक देख चुका होता है। यानी ज़मीन तैयार है और परिचय की सहज गति में अब ‘कौन जिल्ला घर है’ के बाद  हीरामन पूछता है – ‘आपके घर में कौन-कौन हैं?’

और उत्तर की दशा व दिशा क़ाबिलेगौर है। यही है वो जंक्चर, जहाँ पड़ता है प्रेम का बीज  पूरे परिवार के बीच अपने जिस एकाकीपन को हीरामन ने लोकमस्ती की अदा में लपेट कर कहा था, उसी को शहराती हीराबाई ने पूरी दुनिया का वास्ता देते हुए संजीदग़ी से कहा – ‘पूरा ज़माना, पर जिसका पूरा ज़माना होता है, उसका कोई नहीं होता’… अब दोनो के अभाव अचानक आमने-सामने… और अपने-अपने में खो गये दोनो…। हीराबाई अपना पार्ट याद करने में – ‘मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगी गुलफ़ाम… कहीं भी कोई भी अपना नहीं ज़माने में ; न आशियानी के बाहर, न आशियानी में’… इसी त्वरा में हीरामन का उद्वेग फूट पड़ता है – ‘सजनवाँ बैरी हो गये हमार…’। प्रेम के हर प्रमुख आयाम को कथामयता के साथ समानान्तर रूप से गीतों में व्यक्त करने का यह गुर प्रेम के साथ ही फिल्म की भी अनुपमेय कलामयता का सबब बन पड़ा है। इस गीत में हीरामन हो जाता है गुलफाम एवं गीत में व्यक्त उसकी मनोव्यथा बन जाती है हीराबाई की पीड़ा  –‘सूनी सेज, गोद मोरी सूनी, मरम न जाने कोय… चिठिया होय, तो सब कोई बाँचे, भाग न बाँचे कोय… करमवा बैरी हो गये हमार। ना कोई इस पार हमारा, ना कोई उस पार।

सो, असल बात यह कि जिज्ञासा, कुतूहल, गन्ध, सुर…आदि सब तो अनुषंग हैं। दोनो (के मन) को मिलाया तो है मन के इसी अभाव ने परन्तु इसमें हीरामन की गायन-कला के साथ हीराबाई के कला-मन की संगति न होती, तो दोनो के अभाव का यूँ भाव बनना सन्देहास्पद ही होता। इस तरह प्रेम भाव के इस बीज-वपन में कला-संगति का योगदान प्रेरक भी है और पूरक भी। बहरहाल, यही बीज बाकी यात्रा में पनपता-विकसित होता है। गाड़ी में बैठी जिस जनानी सवारी को देखने के लिए इतना उत्सुक व हैरान था हीरामन, अब उसी हीराबाई को सारी दुनिया की नज़रों से बचाने लगता है – पर्दा गिरा देता है – ‘पलकों की चिक डारि कै पिय को लिया रिझाय’। आम आवा-जाही वाला रास्ता बदल देता है – ‘ना मैं देखूँ और को, ना तोहिं देखन देउँ’ के एकान्तिक प्रेमभाव का साक्षी। और यह सब पूछ-पूछ कर समझती चलती है हीराबाई …गोकि ऐसा सब करने के कुछ दुनियावी कारण बताकर प्रेम की गोपन-वृत्ति को भी नुमायाँ करता रहता है हीरामन, पर क्या वह छिपता है हीराबाई से!! बल्कि अनजाने (या जाने में?) हीरामन की ज़ुबान पर आ जाती है बात – सामने से गाड़ीवान के पूछने पर ‘बिदागी की सवारी’। दुनिया के लिए बहाना, पर अपने  अचेतन का सच। हीराबाई को सही मतलब भी बताना पड़ता है – ससुराल जाती स्त्री। प्रति-प्रश्न में हीराबाई की तरफ से ताईद भी – ‘तो मैं ससुराल जा रही हूँ’…? फिर ना-इनकारी भी। ग़रज़ यह  कि इसी तरह ‘छिपाते-छिपाते बयाँ करती’ फिल्म-कला में ‘यह लीला जिसकी विकस चली, वह एक शक्ति है प्रेम-कला’।

तिगछिया पहुँचती है गाड़ी, जहाँ हीरामन ने विश्राम व खान-पान का पड़ाव बदा है। विकास के बाद यहीं से मेले तक में इस प्रेम-यात्रा का परिपाक होता है। ज़मीन तैयार होने के पड़ाव पर हीरामन का विवाहित होकर भी अकेले होना सामने आया था। अब तेगछिया घाट पर हीरामन से यह सुनकर कि यहाँ कुँवारी लड़कियाँ नहीं नहातीं, हीराबाई दूसरी तरफ नहाने चली जाती है…और इससे निहाल हुआ हीरामन हुलस कर बाल्टी का पानी लिए दौड़ जाता है अपने भय्यन (बैलों) के पास। उनकी गरदन सहलाते हुए बडी हसरत भरी सान्त्वना से कहता है –  ‘देखा, कुँवारी भी है’। और हीरामन की इस अदा व सृजन-रूपायन की इस कला पर तो बस, ‘सदके जावाँ’…।

अब मन का उछाह स्पर्श चाहने लगता है – चम्पा की गन्ध (वाले बिस्तर) का स्पर्श। बाहर छूकर मन नहीं मानता, तो भीतर जाकर बैठ व लेट जाता है…उस गन्ध को महसूस करता है। गन्ध से ही तृप्त हो जाता है उसका हीरा-मन। इससे आगे नहीं बढ़ता कभी।

क्या यही है देवोपम प्रेम? आख़िर वह देवी भी तो मानता है उसे और यह भी तो प्यार ही है – ‘बन्दे को भी ख़ुदा करता है इश्क़’। तभी तो जब सोती हीराबाई के सुघर-गोरे पैरों पर एक किरौना रेंग रहा होता है, तो हाथ से कैसे हटाये हीरामन? गमछे से हौंकना चाहता है, पर गमछे से भी न छू जाए, का बराव रखता है उसका देवोपम प्यार। और आख़िर वह मुँह से फूँककर उड़ाता है। लेकिन तेगछिया से चलते ही गाड़ी जब हिचकोले लेकर पानी में उतरती है, तो सँभलने के लिए हीरामन के कन्धे का जो सहारा लेती है हीराबाई, वो पानी भर की यात्रा में छोड़ती नहीं, जिसे हीरामन भी विस्मय व ललक से निहारता है। इस तरह ‘तन का दुख मन पर भारी है’ …वगैरह से, सच ही, परे है यह प्रेम; किन्तु नितान्त शरीरेतर और प्रतीक-संकेत भर होने का मोहताज़ भी नहीं।  

परिपाक के इस मुक़ाम पर ऐसी साझेदारी बन चुकी है कि नहाकर आयी हीरा, तो गाड़ी की रखवाली उसे सौंपकर हीरामन नहाने जाता है। बगल के गाँव का मशहूर दही-चिउडा लेकर पहुँचता है, तो प्रेम में समानता का वह भाव भी बनता है, जो आधुनिक प्यार की थाती है – हीराबाई अपने साथ ही बिठाकर, अपने हाथ से परोसकर खिलाती है। कहानी में यहीं प्रेम को पा लेने का सांकेतिक वाक्य आता है – ‘हीरामन की गुदगुदी मिल गयी’। यह गुदगुदी हीराबाई के गाड़ी में बैठने से आगामी संकेत के रूप में शुरू हुई थी और एक प्रतीक रूप में समानान्तर बढती हुई चौथी बार में इस परिपाक के मुक़ाम पर पहुँचती है। फिल्म में इसका न होना खलता है… क्या पुन: यह विधागत सीमा है या फिल्मकार की नज़रअन्दाजी अथवा इरादतन छोड़ने की कोई कला-चेतना…, कौन जाने??

मन के स्तर पर सबकुछ पूर्ण हो जाने के बाद महुआ घटवारिन-कथा के मिस ‘दुनिया बनाने वाले काहे को दुनिया बनायी’ वाला प्रसिद्ध गीत आता है – ‘प्रीति जगाके तूने जीना सिखाया…जीवन के पथ पर मीत मिला रे…मीत मिला के तूने सपने जगाये…’। यह पूरी प्रेम-यात्रा का निचोड़ है। दोनो की यात्रा की आत्म-कथा – पूरी फिल्म की कथा भी, जिसमें छिपा है अन्त भी – ‘सपने जगाके तूने काहे को दे दी जुदाई रे…’? इसे आप चाहें, तो मौन प्रेम की मुखरता कह सकते हैं, जो हर गीत में सटीक भावों को सही शब्दों में सधी लय-धुन के साथ जस का तस प्रतीकित करते हैं।    

यहीं जुडता है एक और भाव – भक्ति का, जब मीता को हीराबाई अपना सांगीतिक गुरु मानती है और स्वयं भी मीता से योग्य शिष्या के प्रमाण स्वरूप उसी जैसा गाकर दिखा देती है। लेकिन उसका गाना सुनने के बाद ‘इससे अच्छा कोई क्या गा सकेगा’ कहते हुए हीरामन उसकी कला का कायल होकर पुन: मीता से समानता स्थापित करता है। इस प्रकार दोनो की तरफ से अनेक भावों का एक संकुल बनता है, क्या यही प्रेम है?  पानी से निकलते ही तेज रोशनियाँ दिखती हैं और गाड़ी मेले में पहुँचती है… यानी गन्ध से शुरू होकर स्पर्श तक के परिपाक की प्रेम-यात्रा अथ प्रेम-कथा का उत्तरार्ध…. जैसे परिचय शुरू होते ही ‘सजनवां बैरी..’ वाला गीत मानक बना था, उसी तरह मेले में आते ही हीरामन के दोस्तों का समूह-गीत उसके प्रेम-परिपाक का इस्तक़बाल करता है – ‘चलत मुसाफिर मोहि लियो रे पिंजरे वाली मुनिया…’ भाव व अवसर के मुताबिक ही गीत में गति व उल्लास है। खजड़ी  बजा-बजा के मस्त हीरामन में ‘मोहे मुसाफिर’ के ‘फील’ का उन्माद लहक रहा है, तो गाड़ी में से यह पूरा दृश्य देखती ‘पिंजरे वाली मुनिया’ का ‘फूली न समाने’ वाला मुग्धा भाव महक रहा है…प्रेम की ऐसी सम्पूर्णता, ऐसा संयोजन, ऐसा आह्लाद अन्यत्र दुर्लभ।

इस सांकेतिक प्रेम-स्वागत के बाद हीरामन ने सबको अपना कन्धा सुँघाया – ‘तनिक हाथ रख  दिया था’ – गन्ध से स्पर्श तक का स्फुरण इकबारगी। प्रेम होता है, तो भाव और भाषा ऐसे ही बदल जाते हैं

उधर मेले में पहुँचते ही ना-ना कहने के बावजूद चाय लाना तो हीरामन के प्रेम के अधिकार भाव का प्रमाण है। शहर वालों के चाय पीने की आदत की पहचान में हीराबाई, उसके अभिजात-जीवन व कला- प्रवृत्ति की समझ है, जो प्रेम भाव का ही परिणाम है, पर ‘लोटा भर चाह’ लाना, ख़ुद चाय न पीना, नौटंकी न देखना उसकी लोकमयता का परमान है – कंट्रास्ट की संगति जारी…।    

अब हीराबाई के जाने का वक़्त हो गया – कम्पनी का आदमी आ गया। वहाँ से आते हुए पैसों के मोल-भाव को रोकने वाली सवारी बहुत भायी थी हीरामन को, पर जाते हुए पैसे (ज्यादा भी) लेने के लिए उसके हाथ उठते नहीं.. शर्मसार हुआ जाता है हीरामन –  अपनों से पैसे न लेने का गाढा संकेत, पर कहे कैसे – ‘कहतो न बनै, सहतेई बनै’ वाली प्रेम की कश्मकश…।

इसके आगे अब यात्रा में हुए प्रेम-परिपाक के असर की बारी आती है। हीरामन अपने रुपयों की थैली मीता को दे आता है – सर्वस्व दे देने के समर्पण और अखण्ड विश्वास का संकेतक। फिल्म में इसे बढ़ा कर भौजी से पुछवाया और हीरामन के उत्तर ‘विश्वास था, तभी न रखा’ से सदर्थवाया भी जाता है। फिर अगले चरण पर भर रास्ते सबकी नज़रों से बचाकर लाने वाला हीरामन का स्वत्त्व-स्वामित्त्व (पज़ेस्सिव) भाव पब्लिक द्वारा अपनी मीता को नाचने वाली रण्डी कहने पर चलते शो में हाथापाई के प्रतिकार से जान लेने-देने की आक्रामकता और क़ुर्बानी तक पर उतर आता है। जाकर मीता से कहता भी है कि वो नौटंकी में नाचना छोड़ कर सर्कस कम्पनी में या कहीं और काम करे। पर कोई उसे कुछ ऐसी-वैसी बात कहे, यह नहीं सुन-सह सकता हीरामन।        

कहानी में इसके बाद दस दिन की नौटंकी का जिक्र और मेला पूरा होने के बाद हीराबाई का चले जाना… स्टेशन पर अन्तिम मिलन और करुण बिदाई, त्रासद बिछोह…यानी चरित्र व स्थिति के मुताबिक प्रेम को बिल्कुल वही मिला, जो सही प्रदेय था… अन्त तो फिल्म में भी यही होता है, लेकिन उसमें बीच में प्रेम के और भी बहुत से रूप समाहित होते हैं, जो प्रेम भाव को समृद्ध तो करते हैं, एक फिल्म के लिए अपेक्षित और इस फिल्म के ग़ैर वाजिब भी नहीं, पर फिल्मी होने से बरी भी नहीं। वो सब मुख़्तसर में यूँ…         

थियेटर वाली मार-पीट के बाद हीराबाई गुस्से में डाँट देती है हीरामन को – ‘तुम होते कौन हो मेरे लिए लोगों से लडने वाले’? इसमें ‘अपनों पर गुस्सा और ग़ैरों की उपेक्षा’ वाला सच भले कार्यरत हो, पर प्रेम कैसे सह सकता है ऐसा पराया वाला बर्ताव, तो हीरामन की प्रेम-नाराज़गी…। नहीं जाता दूसरे दिन नौटंकी देखने, लेकिन गेट पर खड़े -खड़े  मीता की बडी तस्वीर को निरखता व गाने सुनता है – प्रेमी की अनुरक्ति भी, मान भी। फिर हीराबाई का मन भी नहीं लगता मीता बिना। रिहर्सल नहीं कर पाती। बुलवाती है हीरामन को। वह आता है तने-रूठे-रूखे भाव से। तब मान की मनौव्वल होती है। गुस्से के लिए माफी माँगी जाती है। अपने हाथ से बनाकर खिलाने का घरनी वाला घरेलू दृश्य बनता है। भुने जाते तड़के  में पानी डालते हुए ‘लो हो गया गुस्सा ठण्डा’ का कला-लेप भी होता है और फिर ‘मनाएँगी  वो, मान जाऊँगा मैं’ की माफिक मान जाता है हीरामन – ‘बैठूँगा  भी और खाऊँगा भी’।

उस शाम लैला बनना था हीराबाई को। ‘मजनू कौन बनेगा’ – रोक न पाया अपने को हीरामन? ‘है कोई’ – ‘कोई’ के प्रति उपेक्षा भरा जवाब। दोनो में कुलबुलाता एक ही भाव…। उस शाम मंच पर ये ही रहे लैला-मजनू…जल्दी बुलाकर हीरामन को स्टेज पर ही बिठा लिया। अन्य पात्रों के दृश्यों को साथ बैठकर देखा – नौटंकी कम, मीता को ज्यादा। कभी हाथ लेकर हाथों में, तो कभी ‘फ़िदा थी कैस पर लैला, वो लैला पर दीवाना था’ जैसी पंक्तियों के समय हाथ हीरामन के कन्धे पर। अपनी भूमिका के दौरान गाते-गाते ‘दीद कब हो मयस्सर सनम कैस की, बस इसी धुन में लैला बिचारे रहे’ के बीच पर्दे की आड़ में जाकर मीता को छू आती…यानी प्रेम के संयोग पक्ष का सुन्दर नियोजन। हीरामन ने भी खूब लुत्फ़ उठाया और शो के बाद दोनो के मन की पुलक, तन की सिहर देखने ही लायक…तह तक का मज़ा।    

इसी पुलक भरे आकुल मूड में दूसरी शाम सरे आम घूमने निकल पड़ते हैं बैलगाड़ी में दोनो… देखती रह जाती है सारी यूनिट, पूरी दुनिया… प्रेम का असर यह भी कि दुनिया ठेंगे पर…। वे कहीं एकान्त में बैठते हैं। रोमैण्टिक वादियों से होते हुए मन्दिर जाते हैं। अपनी-अपनी मनौतियाँ मनाकर लौटते हुए गाड़ी के पीछे-पीछे गाँव की बच्चियों द्वारा वो गीत गाया जाता है, जिसमें दोनो के चिर संचित सपने पूरे होते हैं – ‘लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया…पिया की पियारी भोली-भाली रे दुल्हनिया…’। फिल्म और प्रेम दोनो का उपराम है यह दृश्य… इस सपने का उल्लेख रेणुजी ने कहानी के अन्तिम हिस्से में किया है, लेकिन यह गीत मेले आने की यात्रा में ही गवा दिया है। कहना होगा कि फिल्म का चयन कहीं ज्यादा संगत व लोमहर्षक है, क्योंकि अब तक दर्शक के मन में भी इनका प्यार अपनी जगह बना चुका होता है और वह सपना गूँजने लगा होता है।

यही सही स्थल था फिल्म के समाप्त होने का, पर अभी वो टकराहट बाकी थी, जो प्रदर्शन-परक कला माध्यम की जान-परान होती है। तो ज़मींदार का चरित्र जोड़ा गया और मीताओं के प्रेम को कसौटी पर रखा गया। यूँ कहें कि प्रेम की ही ताकत थी, जिससे जमींदार को मुँहतोड जवाब ही नहीं, उसे जबर्दस्ती पर उतारू देख कर गिरा व मार भी सकी हीराबाई – ‘देखहु प्रेम-प्रताप बड़ाई’।

लेकिन युग की सचाई का वो मंज़र भी, जब पूरी यूनिट उसे ‘मिर्च मसाला’ के मुखी व गाँव वालों की तरह जमींदार की बात मान लेने की सलाह देती है। पर हीराबाई नहीं डिगती। हाँ, प्रेम-पथ से मुड़ने की एक ठोस वजह बन जाती है, जब हीरामन को खत्म करने की धमकी आती है और उसकी सुरक्षा के लिए नौटंकी कम्पनी छोड़ने का फैसला अवश्य कर लेती है, पर कुछ और करके हीरामन के सपने को टूटने नहीं देती। उसे कुछ पता भी चलने नहीं देती – ‘बिक गयी महुआ’, का इल्ज़ाम भी अपने सर ले लेती है। और प्रेम अपनी अन्तिम सीढी पर पहुँचता है – उत्सर्ग। प्राण का नहीं – प्रेम का। प्रेमी (के जीवन) के लिए प्रेम का उत्सर्ग यानी प्रेम के लिए प्रेम का उत्सर्ग…।

यह कहानी में नहीं आता। यह जोड़ कहानी के लिए अवांच्छित भले हो, फिल्म के लिए एक हद तक वांच्छित अवश्य है, पर प्रेम के लिए तो अनिवार्य…। यहीं पहुँचकर प्रेम–पथ पर फिल्म बहुत आगे निकल जाती है…यह किसी भी प्रेम-भाव की पराकाष्ठा है… सराहनीय, अनुकरणीय, स्पृहणीय…       

 .

सत्यदेव त्रिपाठी

लेखक प्रसिद्ध कला समीक्षक एवं काशी विद्यापीठ के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं। सम्पर्क +919422077006, satyadevtripathi@gmail.com
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