संवेद

स्वयं प्रकाश का कहानी संसार

 

  • पल्लव  

 

स्वयं प्रकाश इस 20 जनवरी को 70 साल के हो गए। 1969 में पहली कहानी लिखने वाले स्वयं प्रकाश इससे पहले कवितायेँ लिखते थे और मंचों पर सस्वर काव्य पाठ भी करते थे। यह उनकी रचनाशीलता का स्वर्णजयंती वर्ष भी है। उनके पिता अजमेर में रहते थे वहीं प्रसिद्ध कथाकार रमेश उपाध्याय की सोहबत में उन्होंने कहानी लिखना प्रारम्भ किया। उनके रचना संस्कारों पर अपने ननिहाल इंदौर के उर्वर वातावरण का भी गहरा असर है जहाँ चंद्रकांत देवताले, होमी दाजी और सी के नायडू जैसे सितारे परिदृश्य में थे। यहाँ उनका बचपन बीता था। बाद में अजमेर से ही उनकी पहली पुस्तक भी प्रकाशित हुई।

एक कथाकार के रूप में उनकी विशेषता थी कहानी का जनवादी स्वभाव और कला की ऐसी बारीक बुनावट की अनुभववाद भी मुंह देखता रह जाए। ‘सूरज कब निकलेगा’ राजस्थान के मारवाड़ इलाके में 70 के दशक में आई बाढ़ पर लिखी गई कहानी थी जिसे एक अखबारी सूचना की तरह उन्होंने ग्रहण किया और कला के रूप में जिसकी प्रस्तुति आज भी इस तरह चौंकाती है कि पाठक भूल न सके। राजस्थान उनकी कहानियों में बोलता है। उनके देशी पात्र अपने रूप-रंग -आभा में अपने बुनियादी भाषा संस्कार कभी नहीं भूलते।

उनकी कहानी पढ़ने से अधिक सुनने की चीज़ होती है तो उसका कारण यही है कि कहन का जातीय स्वभाव उन्होंने प्रयत्नपूर्वक अर्जित किया है। ऐसा हँसता – खिलखिलाता गद्य कि उसमें छिपी सोद्देश्यता कभी तैरती हुई न दिखाई दे। विचारधारा का ऐसा सटीक प्रयोग कि पाठक को कहानी की परिणति असहज न लगे। यह कौशल हर कहानीकार के पास नहीं होता। स्वयं प्रकाशने जब कहानियां लिखना प्रारम्भ किया था तब हिन्दी कहानी नयी कहानी के अभूतपूर्व उल्लास के बाद कहानी आन्दोलनों की अराजकता के बोझ से चरमरा रही थी। किसिम किसिम के आन्दोलनों ने पाठकों को कहानी से दूर कर दिया था। उस दौर में काशीनाथ सिंह, असग़र वजाहत, संजीव, पंकज बिष्ट, उदय प्रकाश, अरुण प्रकाश जैसे कथाकारों के साथ स्वयं प्रकाश ने कहानी को फिर जनवादी तेवर दिए। कहानी मानो सजीव हो उठी और पात्र अपने गाँव -देहात की भाषा बोली में अपने दुःख दर्द साझा करने लगे। स्वयं प्रकाश इस दौर में मध्य वर्ग की शक्ति और संभावनाओं को देख रहे थे और उसे बखूबी अभिव्यक्त कर रहे थे। इस वर्ग की कमियों-कमजोरियों और छद्म को उघाड़ना उन्हें आता था लेकिन वे इस वर्ग से उनकी उम्मीद समाप्त नहीं हो गई थी। उनकी कहानियाँ ‘तीसरी चिट्ठी’ या ‘बाबूजीका अंतिम भाषण’ भारत के विशाल मध्य वर्ग के प्रति आशा का उजास ही तो हैं।

उन्होंने राजस्थान में रहते हुए भीनमाल से अपने मित्र मोहन श्रोत्रियके साथ लघु पत्रिका ‘क्यों’ का सम्पादन -प्रकाशनकिया तो ‘फीनिक्स’, ‘चौबोली’ और ‘सबका दुश्मन’ जैसे नाटक भी लिखे। उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘बीच में विनय’ भीनमाल के परिवेश पर ही लिखा गया है। इससे पहले वे अपने सैन्य जीवन के अनुभवों पर एक उपन्यास  ‘जलते जहाज पर’ लिख चुके थे। इधर के वर्षों में उनकी रचनाशीलता में परिवर्तन हुए और उन्होंने बदल रहे भारतीय समाज को अपने लेखन में देखने समझने की भरपूर कोशिश की। उनका उपन्यास ‘ईंधन’ भूमंडलीकरण की वृहद् परिघटना का भारतीय समाज पर पद रहे प्रभावों का अध्ययन करने वाला पहला हिन्दी उपन्यास है तो उत्तर आधुनिक हो-हल्ले के बीच कहानी को ठेठ जन सामान्यतक जोड़ने के प्रयास में उन्होंने ‘जंगल का दाह’, ‘गौरी का गुस्सा’, ‘बाबूलाल तेली की नाक’ और ‘कानदाँव’ जैसी कहानियां लिखीं।

अपनी नौकरी के दौरान वे कुछ वर्षोंतक चित्तौड़गढ़ में रहे थे। तब वे हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में अधिकारी थे। यहाँ रहते हुए उन्होंने अपना उपन्यास ‘ईंधन’ लिखा था। एक तरफ देश भर में निजीकरण और उदारीकरण का शोर था वहीं खुद उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के अपने उपक्रम हिंदुस्तान ज़िंक लिमिटेड का निजीकरण देखा। ‘जो बचा रहा’ का चित्तौड़गढ़ अध्याय इस निजीकरण की घटना का हिन्दी साहित्य में किया गया पहला और एकमात्र  अंकन है।

संवेद का स्वयं प्रकाश प्रसंग वस्तुत: सम्पादक किशन कालजयी की सुरुचि और आग्रह का संगम है। उन्होंने अपने स्नेह और  अधिकार का उपयोग  करते हुए मुझ आलसी से यह आयोजन संभव करवाया। स्वयं प्रकाश मेरे प्रिय लेखक हैं। उनकी कहानियां पढ़कर मैंने साहित्य के संस्कार अर्जित किये हैं। भाषा, परिवेश और यथार्थ का हृदयग्राही अंकन मिलकर उनकी कहानियों को पाठ से आगे ले जाता है और तब वे कहानियां मूल्य निर्णय में पाठक के सामने रोशनी की तरह आ खड़ी हो जाती हैं। आशा करता हूँ पाठक इस आयोजन को पसंद करेंगे और सम्पादक किशन कालजयी को ऐसे अनेक प्रसंग बनाने के लिए कहेंगे।

 

साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
2 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Mukul Joshi
4 years ago

Dear Pallav, bahut-bahut badhai !
Padhkar bahut achha laga. Aajkal ek mahine ke Europe tour par Tulika ke ghar aya huon family ke saath.

Unknown
4 years ago

Bahut umda,rochak aur jaankaari bhara lekh, Pallav ji ko badhai

2
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x