फणीश्वर नाथ रेणु

समर्थ पात्रों की कहानी (अच्छे आदमी)

 

  • आकांक्षा पारे काशिव

 

कहानीकार होना अलग बात है और कहानियों पर लिखना बिलकुल अलग। उस पर भी यदि कहानी रेणु की हो तो यह मुश्किल और बढ़ जाती है। रेणु यानी फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी के ऐसे साहित्यकार हैं, जिनके ग्रामीण पात्र कहीं से भी लिखने के लिए या आँचलिकता लाने के लिए बनाए हुए नहीं लगते। उनमें विश्वसनीयता का प्रतिशत उतना ही है जैसे सोने में 24 कैरेट होना। यहाँ ग्रामीण शब्द पर जोर इसलिए कि प्रेमचन्द के बाद रेणु ने ही पूरी विश्वसनीयता के साथ गाँव को लेखन में जिया। कह सकते हैं कि रेणु ने ही  अपने लेखन के माध्यम से गाँव को वापस साहित्य में लाया जो प्रेमचन्द के जाने के बाद कहीं हाशिए पर चला गया था।

हाल के दिनों में भी साहित्य में लोक पर बहस होती रहती है। कुछ रचनाकार ग्राम्य जीवन और वहाँ के पात्रों को लेकर कहानी कह रहे हैं। लेकिन इन कहानियों में वह सौंधापन नहीं आ रहा जिसे लोक की कथाएँ कहा जा सकें। बल्कि आज की कहानियों में लोक का विवरण मात्र है। उसके उलट रेणु अपनी कहानियों में जब लोक बुनते थे तो उनके पात्र उभर कर आते थे। इसी के साथ उस दौर का एक चित्र पाठक के सामने उपस्थित होता था। गाँव का जीवन यदि घटना मात्र हो जाए तो घटनाएँ शहर में भी घटती हैं। इन घटनाओं में यदि पात्र और स्थिति जीवन्त हो, तभी यह लोक या ग्रामीण जीवन की सम्पूर्ण कहानी बन सकती है। साहित्य में लोक का होना हमेशा से बड़ी बहस रही है।

लोक कहानियों को अलग आस्वाद देता है, यह सच है। इसे पढ़ने वाले पाठक भी कई हैं। लेकिन जब तक उस आँचलिकता में सौंधापन न हो, तब तक रचना अधूरी सी लगती है। रेणु ने जिस परिवेश की कल्पना की या जैसा सोचा उसे हूबहू कागज पर नहीं उतारा। बल्कि वे ऐसे रचनाकार थे, जो अपने पात्रों के माध्यम परिवेश में बसे लोगों की कहानी कहते थे। यही वजह है कि उनकी कहानी में परिवेश भी एक पात्र की तरह उपस्थित रहता था। रेणु की आँचलिकता पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है।

आँचलिकता से पगी हुई कहानियों में लाल पान की बेगम, तीसरी कसम, रसप्रिया, ठेस, संवदिया पर बात होती ही रहती है। इस बीच ‘अच्छे आदमी’ कहानी भी ऐसी है जो ठेठ आँचलिकता के साथ आत्मविश्वासी तेवर लिए हुए है। अच्छे आदमी कहानी में समाज के ‘क्लास’ की सोच  जिस रूप में आती है, वह अद्भुत है। चाय की एक दुकान का मालिक उजागिर और उसकी पत्नी के जरिए रेणु समाज की रीति-नीति को दिखाते हैं, उस रीति-नीति को जिसे कोई मुँह से नहीं कहता लेकिन वह सबके दिमाग में होती है।  

हिन्दी कहानी में ऐसे विश्वसनीय ग्रामीण पात्र रेणु ही दे सकते थे। अच्छे आदमी का पात्र उजागिर उस आँचलिक दुनिया के दर्शन कराता है, जिस पर नजर डालना ही अपने आम में अलग सोच दिखाता है। उजागिर हमें खींच कर कहानी में लाता है और पाठक उजागिर के बहाने समाज के अलग-अलग रूपों को देखते हैं। इस कहानी की खूबसूरती यह है कि रेणु अपनी ओर से कुछ नहीं कहते। रेणु यानी लेखक। लेखक का अलग रहना और बिना कुछ भी कहे, सब बातें समझा देना ही इस कहानी को अलग ढंग की कहानी बना देता है।

रेणु भारतीय गाँवों का प्रतिनिधित्व करते हुए, सिर्फ कथा कहने वाले नहीं बनते बल्कि एक मनोविश्लेषण कर समाज की नब्ज पर हाथ रखते हैं। उजागिर की पत्नी सीता, उर्फ सितिया उर्फ प्रदीप कुमार की माय अपने पति के लिए साधन जुटाने का जतन कर रही है। वह जितनी दक्षता से कढ़ाही में पकौड़े छान सकती है, उतनी ही कुशलता से पक्के मकान का परमिट भी ला सकती है। चाय बनाने का ‘जादुई’ फन उजागिर के पास जरूर है, लेकिन उसकी ‘ब्राण्डएम्बेसडर’ उजागिर की घरवाली ही है।

पहले पाठ में कहानी सिर्फ इतनी लगती है कि एक चायवाला जिसकी पत्नी के रूप के कई दीवाने हैं और वह इसका खूब फायदा उठाकर अपने पति के लिए सुविधा के सामान जुटाती है। फिर भले ही वह सड़क बनाने वाला ठेकेदार हो, लाल बस का ड्राइवर हो, किसनपुर के बाबू हो, दरोगा हो, लाला हो, ठाकुर का बेटा हो या मिस्त्री। सितिया यानी प्रदीपकुमार की माँ के दरबार में आकर सब एक बराबर हैं। सब की एक ही देवी है, सबकी एक ही लालसा और सीता किसी को निराश भी नहीं करती। लेकिन वह जानती है कि किसी को निराश न करने की कीमत क्या होती है, वह जानती है कि किस व्यक्ति से क्या काम लेना है।Image may contain: 2 people, selfie and close-up

कहानी की यह स्त्री पात्र कहीं भी वाचाल नहीं, कहीं बड़े और समझदारी भरे संवाद नहीं लेकिन हर काम समझदारी भरा। उजागिर के सामने सब उजागर है। लेकिन वह वैसे ही आँखें मूंदे हुए है, जैसे बिल्ली दूध पीते वक्त मूंद लेती है। लेकिन कहानी के अन्त में जब सीता मिस्त्री के साथ जाती है तो उजागिर के अन्दर का मर्द जागता है और फिर वह उसे अपना पति रूप दिखाता है।

कहानी का अन्त समाज के उस बिन्दु की ओर संकेत करता है, जहाँ आर्थिक-सामाजिक जीवन का भेदभाव खुल कर सामने आता है। उच्च जाति के एक व्यक्ति का बेटा उजागिर के कच्चे मकान में आकर शराब पीता है, क्योंकि उसके लिए सुरक्षित ठिकाना चाहिए। उजागिर के घर से ज्यादा सुरक्षित ठिकाना और कहाँ। वह उजागिर की पत्नी से छेड़छाड़ भी करता है, लेकिन उजागिर की राय है कि वह ‘अच्छे आदमी हैं।’ ठेकेदार और ‘अच्छे आदमी हैं,’ लाल गाड़ी के ड्राइवर जी और नये दरोगा साहब  भी ‘हीरा आदमी हैं’ यानी रेणु बिना कहे कह जाते हैं, ‘समरथ को नहीं दोष गुसांई।’ रेणु खुद को डी-क्लास कर देते हैं। क्लास के आदमी के सौ खून माफ। लेकिन मिस्त्री तो उसी की क्लास का आदमी है। वह कैसे उसकी पत्नी के साथ कुछ करने का भी सोच सकता है।

लेकिन रेणु सिर्फ क्लास की बात ही नहीं करते, वो ‘गिव एण्ड टेक’ की भी बात करते हैं। बहुत बारीकी से वह दिखाते हैं कि कुछ दे कर ही कुछ पाया जा सकता है। उजागिर कई लोगों को अच्छे आदमी की पदवी से नवाजता है। लेकिन वह किसनपुर बाबू के लिए उजागिर कभी ‘अच्छे आदमी’ का खिताब नहीं उच्चारता। किसनपुर बाबू सीता को घूँघट में देख कर ही खुश हैं। वे उसके हाथ में गुदी मछलियों को देख कर ही मोहित हैं और उसी मोह में वह दो गाड़ी बाँस दिला दे रहे हैं। अलबत्ता सीता के मन में है कि वो अच्छे आदमी हैं!

इस कहानी में रेणु का कोई भी पात्र मूक नहीं है। न वो दुखी और गमगीन है। इस कहानी में ऐसा कोई पात्र नहीं जिसके जीवन में सिर्फ दुख ही दुख हो और अन्त में पाठक पढ़ते हुए गमगीन हो जाए। ये सर्वहारा वर्ग के पात्र नहीं हैं, सभी का अपन जीवन स्तर है और जीवनयापन करने के अपने साधन। उजागिर और उसकी पत्नी ग्रामीण पात्र हैं लेकिन वे न तो नामसझ हैं न ही अबोध। दोनों अपने हितों के प्रति सचेत हैं। दोनों जानते हैं जीवन को सुचारू ढंग से चलाने के लिए किन ‘परिस्थितियों’ से होकर गुजरना है। वे अपने आसपास हो रहे बदलावों पर भी बराबर नजर बनाए हुए हैं। उजागिर के बेटे के जन्म के वक्त ठेकेदार साहब नवजात को पच्चीस रुपये भेंट करते हैं।

गाँव के कुछ लोगों का कहना है कि प्रदीप कुमार की शक्ल ठेकेदार साहब से मिलती है, लेकिन उजागिर जानता है कि चाय की दुकान उनके दबदबे के कारण चल पड़ी थी। कोई मजदूर उधार लेकर भाग नहीं पाया क्योंकि ठेकेदार साहब साथ थे। एक और जगह सीता कहती है कि आज भीड़ ज्यादा होने से वह किसी के लिए भी बिना मिर्च के पकौड़े अलग से नहीं छानेगी। तभी पता चलता है, लाल बस के ड्राइवर साहब बिना मिर्च के पकौड़े चाहते हैं। सीता बिना मिर्च का बेसन फेंटने लगती है। यह जो सूक्ष्मता है, यह रेणु बहुत तरकीब के साथ पाठकों के सामने पेश कर देते हैं। यह रेणु की ही विशेषता है कि अच्छे आदमी कहानी में वह किसी विमर्श पर नहीं पहुँच जाते, न ही नरैटर के रूप में खुद बीच में आकर पाठकों को भ्रमित करते हैं।

अच्छे आदमी के दोनों मुख्य पात्र डिग्रीधारी नहीं हैं, यानी वे अनपढ़ हैं। लेकिन उनका आत्मविश्वास और काम निकलवा लेने का ढंग उन्हें किसी भी डिग्रीधारी से ज्यादा आगे ले जाता है। दोनों ही पात्र कहीं भी कभी भी असहाय नजर नहीं आते। रेणु अपने पात्रों को अपने ढंग से स्थापित करते हैं। सीता के संवाद बताते हैं कि वह गाँव की शर्मीली-लजीली लड़की नहीं है। वह अपनी मौसी से तुर्की-ब-तुर्की सवाल-जवाब करती है। लेकिन रेणु उसे शुरुआत में ही नहीं बता देते।

कहानी जब चल पड़ती है तो सीता का स्वभाव भी बीच से निकल आता है। मौसी के साथ उसके संवाद बताते हैं कि वह आत्मविश्वासी भी है और बातचीत में कुशल भी। लेकिन वह कहीं भी बड़बोली नहीं लगती। वह जहाँ दाव लगाती है, सफल होकर ही लौटती है, लेकिन अन्त में वह सिर्फ और सिर्फ पति की बाहों में ही रह जाना चाहती है। रेणु कहीं नहीं लिखते, न किसी स्थिति से दर्शाते हैं कि कहानी में उनके पात्र उपेक्षित है, फिर भी वे घटनओं से वर्ग विभाजन को खूबसूरती से दिखा पाने से सफल रहते हैं।

अच्छे आदमी कहानी के कई पक्ष हैं, इसके कई पाठ हो सकते हैं। प्रदीप कुमार की लक्ष्मी की तरह माँ, बाद तक लक्ष्मी ही बनी रहती है, बावजूद इसके कि वह लाल गाड़ी के ड्राइवर के साथ पति से बिना पूछे परमिट लेने गयी थी। पाठकों को यदि सीता से सहानुभूति नहीं होती तो नफरत भी नहीं होती। ठीक इसी तरह पाठकों को उजागिर पर सीधे तौर पर गुस्सा नहीं आता। अच्छे आदमी की यही विशेषता है कि वह मध्यवर्ग के परिवेश में उससे भी नीचे रहने वालों की कथा को इतनी विश्वसनीयता से कह देते हैं।

यह हाशिए के दो पात्रों की कथा होते हुए भी गरीबी-लाचारी के बजाय समर्थ होने की कथा है। समर्थ लोगों के बीच जगह बनाने वालों की कथा है। गाँव के जो लोग उजागिर से जलते हैं, उन लोगों को सबक सिखाने की कथा है कि दुनिया में हर जगह ऐसा ही कुछ हो रहा है, तो शोषित होने के बजाय शोषण करने वाले समाज से अपना हिस्सा लेने की कथा है।

आकांक्षा पारे मूलतः पत्रकार हैं, लेकिन कहन के स्तर पर नया रास्ता चुनने के कारण वह कथा जगत में भी अपनी बेहतर पहचान बना पाई हैं।

सम्पर्क- 5, सफदरजंग एनक्लेव, नई दिल्ली 110029
akpare@gmail.com, 09990986868

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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