लेख

श्रीप्रकाश शुक्ल : ग़ाज़ीपुर और बनारस की कविताओं में अन्तर

 

  • कमलेश वर्मा

 

श्रीप्रकाश शुक्ल 1998 से 2005 तक ग़ाज़ीपुर में रहे। 2005 के अन्त में वे बनारस चले आए। इन दोनों शहरों के बीच की दूरी मुश्किल से 80 किलोमीटर की है। दोनों भोजपुरी भाषा के क्षेत्र हैं। तुलनात्मक रूप से ग़ाज़ीपुर छोटा शहर है और बनारस बड़ा। श्रीप्रकाश शुक्ल का गृह जनपद, बनारस से 200 किलोमीटर दूर, सोनभद्र है। उनकी उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सम्पन्न हुई। उत्तर प्रदेश के कुछ सटे हुए जनपदों के बीच उनका समय व्यतीत हुआ है। उनके जीवन में महानगर नहीं आए, इसलिए उनकी कविताओं में भी महानगर अनुपस्थित हैं। उनके काव्य-विकास के एक महत्त्वपूर्ण चरण के रूप में, ग़ाज़ीपुर और बनारस की कविताओं में अन्तर को रेखांकित करते हुए, कुछ बातें कही जा सकती हैं।

श्रीप्रकाश शुक्ल के कवि-जीवन में ग़ाज़ीपुर का बहुत महत्त्व है। उनकी कविताओं को मजबूत बुनियाद और विकास प्रदान करने में इस शहर में गुजारे गए सात-आठ साल मायने रखते हैं। 2005 में बी।एच।यू की नौकरी के कारण उनका बनारस आना और यहाँ रच-बस जाना, उनके कवि-व्यक्तित्व को निखार कर ऊँचाई प्रदान करने का काम करता है। इन दोनों शहरों की छवियाँ इनकी कविताओं में मौजूद हैं। इनकी काव्य-भाषा में बदलाव को भी पहचाना जा सकता है। कविता और जीवन के प्रति इनकी दृष्टि के अन्तर को भी रेखांकित किया जा सकता है। बनारस आने के बाद उनकी काव्य-वस्तु में बड़े बदलाव हुए। मगर ग़ाज़ीपुर ने जिस तरह की ख़ूबसूरती उनकी कविताओं को दी थी, उस तरह की खूबसूरती फिर देखने को नहीं मिली। खूबसूरती की जगह समझदारी ने ले ली। समझदारी के प्रति हमारी सहमति होती है, मगर ख़ूबसूरती का अपना आकर्षण होता है।

‘बोली बात’ (2007)की ज्यादातर कविताएँ ग़ाज़ीपुर में रहते हुए लिखी गयी हैं। बनारस आने के बाद की कविताएँ उनके दो संग्रहों में संकलित हुईं — ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ (2014)तथा ‘रेत में आकृतियाँ’ (2012)। इन दोनों संग्रहों की अधिकतर कविताएँ बनारस आने के बाद पाँच वर्षों के भीतर लिखी गयी हैं। इन कविताओं से ‘बोली बात’ की कविताओं की तुलना की जा सकती है। इन तीनों संग्रहों के बीच ग़ाज़ीपुर और बनारस के भीतरी रिश्ते और बाहरी अन्तर को पढ़ा जा सकता है। यहाँ यह कह देना भी जरूरी है कि ‘क्षीरसागर में नींद’ (2019) की कविताएँ,श्रीप्रकाश शुक्ल के, बनारस में स्थापित हो जाने के बाद की मनोदशा और देशकाल को व्यक्त करती हैं। इस संग्रह की कविताओं की तुलना ग़ाज़ीपुर के सन्दर्भ से  करना बहुत उचित नहीं है।

‘अथ काशी प्रवेश’ के एक महीने बाद कविता लिखी गयी – ‘अलविदा ग़ाज़ीपुर’। इस संधि पर खड़ा कवि दोनों शहरों से जुड़ा था। एक में उसकी आत्मा बसी थी और दूसरे से दिल लगाने का समय आ गया था। कवि की इस हालत को इस तस्वीर में देखिए कि माघ की चौथ को चाँद को ‘अर्घ्य’ (‘बोली बात’, पृ.– 118) देती पत्नी की याद कवि को आ रही है। चाँद मानो ग़ाज़ीपुर की चाँदनी के सहारे उस दूरी के आवरण को हटा रहा है और यह एहसास कवि को भावुकता से भर दे रहा है। ग़ाज़ीपुर की स्मृति और उपस्थिति — दोनों में व्यक्तिगत प्रेम की रोमानियत है, “निकला हुआ चाँद/ग़ाज़ीपुर की चाँदनी से/मुझे बेपर्दा कर रहा था/और मैं बनारस की बरसात में भीग रहा था”। आत्मा ग़ाज़ीपुर में और दिल बनारस में दर्द से भरा था। ‘अथ काशी प्रवेश’ (‘बोली बात’, पृ.– 114) में भी आत्मा और दिल का यह मामला कितना साफ़-साफ़ दिखाई पड़ रहा है, “जब कभी ग़ाज़ीपुर की गंगा में लहरें उठी हैं/या कि वहाँ की स्त्रियों ने गुनगुनाए हैं छठ के गीत/इस शहर के तट पर न जाने कितनी बार/गंगा की लहरों में उतरती आरती की तरह/देखा है अपने चेहरे को चुनचुनाते”

ग़ाज़ीपुर से अलविदा होते हुए कवि ने एक बात कही कि, “यहाँ सिर्फ जन्म के उत्सव होते हैं/मृत्यु तो इसने काशी के लिए छोड़ रखी है”(‘बोली बात’, पृ.– 104) श्रीप्रकाश जी ने ग़ाज़ीपुर की कविताओं में मृत्यु को न तो विषय बनाया है और न ही उस पर विचार किया है। ‘अलविदा ग़ाज़ीपुर’ की इन पंक्तियों में उनकी पेशबंदी, अनजाने ही सही, बिल्कुल ठीक थी कि ‘मृत्यु’ का रिश्ता तो काशी से है। बनारस आने के बाद श्रीप्रकाश शुक्ल की एक नहीं अनेक कविताओं में ‘मृत्यु’ को विषय बनाया गया है या उस पर विचार किया गया है या उसकी दार्शनिकता गढ़ी गयी है। यहाँ यह कह देना ठीक होगा कि यह सब लिखते हुए भी वे ‘मृत्यु-बोध’ की कविताएँ नहीं लिखते!

शुरुआत ‘अथ काशी प्रवेश’ (‘बोली बात’, पृ.– 114) से ही हो जाती है, जहाँ वे अपनी माँ की मृत्यु की चर्चा करते हैं, “इस शहर में ठीक मणिकर्णिका की लहरों के बीच/इसी बीस सितम्बर को/अपनी माँ को रख आया था चुपचाप” और माँ की मृत्यु का यह समय ग़ाज़ीपुर से जुड़ा है। मगर इस ‘मृत्यु’ की कविता बन रही है बनारस में आकर! आगे की कविताओं में तो मृत्यु के असंख्य प्रसंग मिलने लगते हैं। ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ संग्रह में – ‘प्रायश्चित’, ‘बाबो रेस्टूरेंट’, ‘मरे हुए लोग’ – ऐसी ही कविताएँ है। ‘क्षीरसागर में नींद’ में यह संख्या और भी बड़ी हो गयी है और मृत्यु की दार्शनिकता भी बढ़ गयी है– ‘हे महाश्मशान!’, ‘क्षीरसागर में नींद’, ‘ललिता घाट’, ‘पक्का महाल में छायाएँ!’, ‘पहरे पर पिता’, ‘पिता की रुलाई’, ‘देवदारु पिता’ आदि।

श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं में ‘मृत्यु’ की उपस्थित भय से नहीं जुड़ती। उनकी किसी भी कविता में इस तरह के भय को नहीं देखा जा सकता है। यह शायद इसलिए सम्भव हो सका है क्योंकि वे मृत्यु-बोध को अपना विषय नहीं बनाते हैं। उनकी कविताओं में मृत्यु के चित्र कई रूपों में दिखाई पड़ते हैं।जैसे, यह बनारसी ठाट के साथ भी चित्रित हुई है, “यहाँ हर आदमी/एक तरफ अपने कंधे पर अपनी चिता को उठाए/मस्ती से टहल रहा होता है”। दूसरा रूप देखिए, “मरे हुए लोगों के इस शहर में/।।।जीने की आशा लिए/लगातार मरते जा रहे हैं/अपनी सारी बरक्कत के बावजूद/इस पवित्र शहर में!” (‘ओरहन और अन्य कविताएँ’, पृ.– 108)।

काशी के बारे में –‘मरे हुए लोगों के इस शहर में’ –कह पाना आसान काम नहीं है।और तुर्रा यह कि काशी के सामने जिस ग़ाज़ीपुर को कुछ भी नहीं समझा जाता वहाँ कवि ने जीवन ही जीवन देखा है। ग़ाज़ीपुर की कविता है –‘बूढ़ी माँ का हालचाल’।  बीमार माँ के बारे में विस्तार से बताने के बावजूद इस कविता का अन्त ‘मृत्यु’ को विषय बनाकर नहीं होता, बल्कि जीवन की पूरी स्वीकृति के साथ होता है, “लेकिन यह जानकर चकित होता हूँ/कि बच्चों की तमाम उछलकूद के बीच/पत्नी अभी से गिनने लगी है कपड़े” (‘बोली बात’, पृ.– 34) बूढ़ी और बीमार माँ की रुचि ‘राम’ में नहीं, सन्दूक के कपड़ों को देखने में है। ‘ख़ूबसूरती’ और ‘समझदारी’ की छवियाँ जीवन और मृत्यु की इन कविताओं में पैबस्त हैं। ‘भुतहिया टाँड़’ में है तो भूत, मगर जीवन की घनी होती आबादी के आगे बेबस!

श्रीप्रकाश शुक्ल ग़ाज़ीपुर पर संदेह नहीं करते और काशी पर विश्वास नहीं करते! ‘अँधेरे में काशी’ में वे यूँ ही नहीं लिखते कि “अँधेरे में यह शव है/उजाले में पाखंड”। ‘कनफुँकवे’ और ‘अड़ीबाज’ केवल कुछ लोगों पर लिखी गयी कविताएँ नहीं हैं, इनमें काशी है। भला इन पर कोई विश्वास कैसे करे! इस काशी को ‘क्षीरसागर में नींद’ की कुछ कविताओं में विस्तार पाते देखा जा सकता है, जैसे –‘चापलूस’, ‘आलोचक’, ‘पाँव छूने के किस्से’, ‘पाँव छुआई’। श्रीप्रकाश शुक्ल की किसी भी कविता में काशी के प्रति पूरे लगाव का भाव नहीं मिलता। वे इस शहर के प्रति हमेशा आलोचना की मुद्रा में दिखाई पड़ते हैं। ‘शहर’ की तुक उन्होंने ‘ज़हर’ से बिठाई है और बिलाशक यह ‘शहर’ बनारस है। इसके पहले वे ऐसी जिन्दगी देख चुके थे ‘जहाँ सब शहर नहीं होता’। श्रीप्रकाश शुक्ल ‘मृत्यु’ से नहीं डरते, मगर शहर/काशी से सहमते हैं!‘ग़ाज़ीपुर’ के बारे में वे विश्वास के साथ बताते हैं, “यहाँ आनेवाला हर व्यक्ति कुछ सहमा-सहमा रहता है/।।।लेकिन धीरे-धीरे ससुराल गयी महिला की तरह/जीना सीख लेता है”(‘बोली बात’, पृ.– 36)।

मगर काशी में विधिवत प्रवेश होता है ‘धूल और धूएँ के बीच/लपकों और गपकों से अटे पड़े’ (‘बोली बात’, पृ.– 114) वातावरण में। यह कैसी छवि है काशी की! धूल और धुएँ से भरा यह शहर लपक लेनेवाले दलालों और गपक लेनेवाले ठगों के नाना रूपों से भरा है।हलफ़नामे की तरह हैं ये पंक्तियाँ कि “मेरे लिए यह काशी प्रवेश/लपरी गंगा से झपरी गंगा में प्रवेश जैसा है”।यह केवल गंगा के रूप का अन्तर नहीं है, बल्कि दोनों शहरों के स्वभाव का अन्तर है। वहाँ गंगा और जीवन, दोनों की गति ‘लपर-लपर’ यानि निर्बाध है, प्रवाहमय है। अपनी स्वाभाविक गति से ये दोनों प्रवहमान हैं। मगर यहाँ यानि बनारस में गंगा झपर-झपर बहती है। उसकी गति बाधित है। वह बहती हुई कभी इस कारण से तो कभी उस कारण से रुकती-बढ़ती है। ‘लपकों’ और ‘गपकों’ के इस शहर की ज़िंदगी भी झपर-झपर ही चलती है। अस्वीकृति का ऐसा भाव श्रीप्रकाश शुक्ल में बनारस आने के पहले से ही मिलता है। 2003 की उनकी एक कविता है – ‘रामफेर’। काशी के नाम और कीर्ति का भ्रम लेकर रामफेर गाँव से यहाँ आए थे अपने बच्चों के बीच! यहाँ की चीज़ों को देखकर और बनारस में रहकर उनके मन के भ्रम टूट जाते हैं। वे गाँव को लौटते हुए प्रसन्नता महसूस करते हैं!

गाँव और छोटे शहरों के प्रति श्रीप्रकाश शुक्ल की आत्मीयता उनकी कई कविताओं में व्यक्त हुई है। उनके शुरुआती दोनों संग्रहों – ‘अपनी तरह के लोग’ तथा ‘जहाँ सब शहर नहीं होता’ – में इसे आसानी से पहचाना जा सकता है।उदाहरण के लिए इन कविताओं को पढ़ा जा सकता है – ‘पिता’, ‘कुर्सी’, ‘छोटे शहर में’, ‘भरोसा’, ‘स्थिति’, ‘माप’, ‘मकर संक्रांति’, ‘संतुलन’, ‘अचार’ आदि।‘बोली बात’ की कुछ कविताओं से लेकर ‘क्षीरसागर में नींद’ तक की कविताओं में ‘बड़े शहर’ की संस्कृति के प्रति कवि की आलोचनात्मक मुद्राओं को रेखांकित किया जा सकता है। बनारस की कविताओं में ‘छोटे शहर’ छूटते गए हैं।

गाँव को जीते और याद करते हुए ‘हड़परौली’ जैसी कविता लिखी गयी थी।‘हड़परौली’ ग़ाज़ीपुर की कविता है। बनारस की कविताओं में ‘किसान’ और ‘भैंस’ शीर्षक कविताएँ हैं ज़रूर, मगर इनका सन्दर्भ गाँव से जुड़ा हुआ नहीं है। ‘किसान’ में किसानों से जुड़े कुछ मुद्दों को संकेतित किया गया है। ‘भैंस’ लोकतांत्रिक राजनीति की एक कविता है। सारांश यह कि ‘हड़परौली’ में गाँव ही गाँव है और इन कविताओं में गाँव नहीं है। ‘छोटे शहर’ के साथ ‘गाँव’ का तालमेल श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं में बना हुआ है। बनारस आने के बाद ‘गाँव’ के साथ इस तालमेल में कमी आई है। हाँ, यह ज़रूर हुआ है कि लोक संस्कृति में उनकी रुचि बढ़ी है। मगर इस रुचि-विस्तार का परिवेश शहरी है, जैसे – ‘नागनथैया’।

बनारस में रहते हुए श्रीप्रकाश शुक्ल अपने सम्पूर्ण मनोयोग से डूबते हैं ‘रेत में आकृतियाँ’ की कविताओं में!ये कविताएँ ‘लपकों’ और ‘गपकों’ से मुक्त हैं।इनमें कवि अपने उच्चतम दार्शनिक भाव में है। नदी को जीवन के वैविध्य की तरह देखने की कोशिश इन कविताओं में की गयी है।गंगा पार फ़ैली हुई रेती पर बननेवाली या बनायी गयी ये आकृतियाँ कवि को आकर्षित करती हैं। इनमें वह तरह-तरह की छवियों, प्रतीकों, अप्रस्तुतों को देखते हुए अपनी बातें कहता है। उल्लेखनीय है कि बनारस की कविताओं में नदी के सन्दर्भ बढ़ते गए हैं। ‘रेत में आकृतियाँ’ में तो आद्यंत नदी है ही, उनके संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ की आधी से अधिक कविताओं में नदी मौजूद है। नदी के रूप में हर जगह गंगा हो जरूरी नहीं। वे नदी को उसके जातीय रूप (जातिवाचक संज्ञा) में रखकर भी कविता रचते हैं।

ग़ाज़ीपुर की कविताओं में ‘खूबसूरती’ की जो बात कही गयी है उसे ‘हड़परौली’ और ‘खजुराहो’के माध्यम से महसूस किया जा सकता है। ‘हड़परौली’ स्त्री की सामाजिक या सामूहिक आत्म-सजगता को व्यक्त करती है। स्त्री समाज ने निर्णय ले लिया कि वे नंगी होकर निभाए जानेवाली रस्म को अब नहीं निभाएँगी! यह कविता स्त्री-विमर्श की टकसाली भाषा के बिना रची गयी है। कवि बताता है कि संस्कृति के इतिहास में ‘हड़परौली’ का प्रवेश हुआ, “यूँ हमारी संस्कृति में पहली बार जुतीं औरतें/पहली बार पकड़ीं मुठिया/पहली बार उठाया हल और फावड़ा/और तो और पहली बार बहुत चुपके से निकलीं/मध्य रात्रि में!” इतिहास के एक कठिन समय में एक टोटके की तरह ‘हड़परौली’ की घटना घटी होगी।

मगर उसे याद रखा गया एक अमोघ उपाय के रूप में! कविता के बहुत भीतर से स्त्री समाज की बेबसी झाँकती है, “मूकता और कूकता की ये औरतें” — ये औरतें चुप रहती हैं और बहुत तकलीफ़ होने पर कूक उठती हैं! कविता की केवल अंतिम पंक्ति स्त्री के प्रतिरोध को प्रत्यक्ष भाषा में व्यक्त करती है, “कि औरतों ने हल उठाने से मना कर दिया।” —केवल एक पंक्ति पूरी कविता को स्त्री-विमर्श के पक्ष में खड़ी कर देती है। संस्कृति और देशजता की शब्दावलियों से रची गयी यह कविता केवल एक पंक्ति के दम पर नए विचारों से जुड़ जाती है। कविता का ऐसा नक्शा ग़ाज़ीपुर की कविताओं में दिखाई पड़ता है, बनारस की कविताओं में नहीं!

इस ‘खूबसूरती’ का दूसरा रूप ‘खजुराहो’ में देखने लायक है। शिल्पी ने अपने खुरदरे हाथों से ऐसी मूर्तियाँ बनाईं जो राजा-रानी-विलासिनियों के बीच के प्रसंग थे! कवि ने इन मूर्तियों को देखा और अपने मन में उठी कामनाओं को साफ़-साफ़ स्वीकारा भी कि “तरसता रहा था अब तक”।कविता के कलाकार ने मूर्ति के कलाकार को समझने की कोशिश की। मूर्ति के कलाकार ने राजाओं की कामनाओं को समझने की कोशिश की थी और उनके अनुरूप मूर्तियाँ गढ़ी थीं।

कमाल देखिए कि इन मूर्तियों को देखकर, कवि के मन में सँजोकर रखे गए, न जाने कितने सपने छटपटा उठे!मगर पर्यटन के बाज़ार ने कला की इस दुनिया को ‘कामसूत्र’ की पुस्तिका बनाकर बच्चे के हाथ से बिक्री के लिए उपलब्ध करा दिया है।इस कविता में दो पंक्तियों को मिलाइए –‘चन्देल की आँखों में उभरते चित्रों को’ (राजा)और ‘अपने स्थूल नेत्रों से दिखाता रहा कुछ मुद्राएँ’ (बच्चा)। इस कविता की पंक्तियों के बीच का रिश्ता केवल क्रम से नहीं है, बल्कि आगे-पीछे भी है। यह कविता अपने मूल स्वभाव में प्रतीकात्मक होनी चाहिए थी। इसका विषय कुछ इसी तरह का है, लेकिन कवि को इसे प्रतीकात्मक बनाए रखने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। ऐसे विषयों पर स्पष्टता के साथ कविता लिख पाना विशेषता की तरह है। ग़ाज़ीपुर की कविताओं में द्वंद्वात्मकता तो है, मगर उलझन या रहस्यमयता प्रायः नहीं है। बनारस की कविताओं में इन तीनों (द्वंद्व, उलझन, रहस्य) को बढ़ते हुए देखा जा सकता है।

02/02/06 को ‘अलविदा ग़ाज़ीपुर’ लिखने के अगले ही रोज़ 03/02/06 को कविता लिखी जाती है – ‘हकलाहट’। इसमें कई तरह की हकलाहट है। कवि मानो कविता, जीवन और जगत तीनों को फिर से समझने के लिए आत्मसंघर्ष कर रहा है। स्थिति स्पष्ट न होने से हकलाहट पैदा हुई है। एक तरह से ‘बनारस की कविता’ की बदलने वाली मनोभूमि की यह तैयारी है। इस छोटी-सी कविता में द्वंद्व, उलझन और रहस्य की प्रमुखता है। कुछ पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं, (क)‘हर होने देने वाले को नहीं होने देना चाहता/जो हो रहा है उसे रोक नहीं पाता’(ख) ‘अपने चिल्लाने में मैं अपने आप से भाग रहा होता हूँ’(ग) ‘ज़िंदगी जैसी भी है उसे यूँ ही छोड़ दिया जाय/यह हो नहीं पाता’

बनारस की एक कविता का शीर्षक भी है – ‘रहस्य’।

दो महीने के बाद की कविता है ‘मैत्री में मोर’ (04/04/06)। बनारस कवि की कविता को बदल रहा है। ‘मोर’ से शुरू हुई यह कविता ‘नीले रंग’ पर बौद्धिक बहस में बदल जाती है। अन्त में हिन्दी विभाग में पद की अंदरूनी लड़ाई को संकेतित करती है। इस तरह यह कविता ‘मोर’ की कविता रह नहीं जाती है। लगभग एक महीने बाद 14/05/06 की कविता है ‘घुरफेकन लोहार’। घुरफेकन के बारे में केवल एक पंक्ति लिखने के बाद कवि बताता है कि “हमारे लोकतन्त्र का सबसे महत्त्वपूर्ण नागरिक है/जब वह चलता है/हमारे लोकतन्त्र का सबसे सजग पात्र चल रहा होता है”– कवि का ध्यान घुरफेकन जैसे लोगों के राजनीतिक महत्त्व पर है। वह बताना चाहता है कि हमारे लोकतन्त्र को लोक से जुड़ा होना था! मगर अब आवाज़ लोहे से नहीं घुरफेकन की हड्डी से आ रही है। बेबसी और उपेक्षा का पात्र बनाकर लोकतन्त्र के दायरे से बाहर फेंक दिया गया है श्रमजीवी वर्ग!

श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं का यह क्रम बताता है कि अब वे राजनीतिक रूप से जागरूक कविताओं की ओर बढ़ रहे हैं। और इसके प्रमाण के रूप में ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ में संकलित पहली ही कविता को देखा जा सकता है – ‘देश के प्रधानमंत्री के नाम देश के एक नागरिक का ख़त’। पूरी सजगता के साथ नागरिक की तकलीफ़ और शिकायत को इस कविता में व्यक्त किया गया है।उदाहरण के लिए कुछ और नाम लिए जा सकते हैं – ‘ग़नीमत’, ‘मोबाइल और लड्डू’, ‘हमारे समय का एक शोकगीत’ आदि। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताएँ बनारस आने के बाद राजनीतिक रुख अख्तियार करती हैं।

पूछा जा सकता है कि ‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ जवाब में कहना पड़ेगा कि श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘पॉलिटिक्स’ किसी पार्टी या संगठन से जुड़कर विकसित नहीं हुई है। वे वाम की तरफ झुके मालूम पड़ते हैं, मगर वामपंथी नहीं हैं। और दक्षिणपंथ का कोई लक्षण उनमें दिखता नहीं है।कहा जा सकता है कि लोकतन्त्र के एक जागरूक नागरिक की राजनीतिक चेतना ‘बनारस की कविताओं’ में सक्रिय है। शायद यही कारण है कि अपने समय की दर्दनाक घटनाओं पर कविता लिखने की कोशिश उनमें  बढ़ी है, जैसे – ‘बच्ची’, ‘पानी में प्रसव’, ‘गनीमत’ आदि।

ग़ाज़ीपुर की कविताओं में सामान्य और मामूली चीज़ों को विषय बनाकार सभ्यता और संस्कृति के प्रश्न उठाने की कोशिश दिखती है। ऐसी कविताओं में वे प्रायः राजनीतिक प्रश्न नहीं उठाते हैं। जैसे – ‘कील’, ‘मित्रता’, ‘गोदना’, ‘पल्लेदार’, ‘पोतना’, ‘घुघरी’, ‘बहुरूपिये’, ‘जम्हाई’ आदि। ऐसी कविताओं में ‘सगड़ी’ की चर्चा ज्यादा हुई है। इसका एक अंश है –‘फ़र्क नहीं करती/आदमी व इंसान में’। ग़ालिब याद आते हैं –‘आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना’।श्रीप्रकाश शुक्ल मानो मामूली चीज़ों से बने लोक-संसार के बीच, ‘आदमी’ और ‘इंसान’ के फ़र्क को समाप्त करने की, संभावना देखते हैं।केदारनाथ सिंह ने ‘बोली बात’ को ‘सबाल्टर्न’ से जुड़ा यूँ ही नहीं बताया है। सामान्य और मामूली चीज़ों की तरह ही है – ‘बाटी’ – मगर यह कविता बनारस की है – और अचंभा नहीं कि इसमें ग़ाज़ीपुर की कविताओं के स्तर पर सभ्यता और संस्कृति के प्रश्न नहीं उठे हैं!

ग़ाज़ीपुर की कविताएँ सभ्यता के विभिन्न रूपों से बनी संस्कृति पर विचार करती हैं। बनारस की कविताओं में धर्म से जुड़ी चीज़ों का प्रवेश होता है। मगर उनका ज़ोर धर्म को आध्यात्मिक रूप से समझने पर ज्यादा है। पहले की कविताओं में ऐसी कोशिश कम दिखती है। बनारस की एक कविता है – ‘साईं’ –“साईं को जानना/ख़ुदा को नहीं/ख़ुद को जानना है।”धर्म से बनी आध्यात्मिक संस्कृति को समझने की उत्कट इच्छा-शक्ति श्रीप्रकाश शुक्ल में बढ़ती गयी है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि यह सब लिखते हुए वे सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को बिल्कुल नहीं भूलते। ‘पक्का महाल’, ‘प्रायश्चित’ ऐसी ही कविताएँहैं। धर्म से बनी संस्कृति और इसमें निहित सामाजिक-आर्थिक ताना-बाना बनारस को रचता है। श्रीप्रकाश शुक्ल सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को भूलकर संस्कृति की चर्चा नहीं करते। वे भरोसेमंद तरीके से धर्म से बनी संस्कृति को बनारस के सन्दर्भ में चित्रित करते हैं। उनकी कविताएँ बनारस की चित्रात्मक अभिव्यक्ति हैं।

शिल्पगत प्रयोग का फ़र्क भी दिखाई पड़ता है।सबसे बड़ा बदलाव यह दिखाई पड़ता है कि वे क्रमशः भाषा की संक्षिप्ति की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। वे कम शब्दों में ज्यादा कहने की अनवरत कोशिश कर रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी काव्य-भाषा अबूझ हो रही है। उनकी काव्य-भाषा को प्राथमिक तौर पर समझने में कोई कठिनाई महसूस नहीं होती। मगर उस भाषा के  भीतर अर्थ का विस्तार हो रहा है। उनकी काव्य-भाषा विस्तृत व्याख्या की माँग करने लगी है।‘हे महाश्मशान!’, ‘द्वा सुपर्णा’ की काव्य-भाषा को उदाहरण के रूप रखा जा सकता है।

शब्द की चिन्ता से जुड़ी उनकी कविता है – ‘शब्द’। ‘आँच’ में भी ‘अपने मूल से छिटके हुए शब्द’ की चिन्ता है!

यह आलेख श्रीप्रकाश शुक्ल के काव्यात्मक बदलाव को रेखांकित करने के उद्देश्य से लिखा गया है। बदलाव के और भी आयाम हो सकते हैं। यह सब कहने का अर्थ यह नहीं है कि दोनों जगहों की कविताओं में श्रेष्ठ कौन है? अन्तर को चिह्नित करते हुए ही किसी कवि के उत्थान-पतन को समझा जा सकता है।

श्रीप्रकाश शुक्ल

समकालीन हिन्दी कविता में नब्बे का जो दशक सबसे उर्वर,सक्रिय व मूल्यवान रहा है, श्रीप्रकाश शुक्ल उसी दशक की एक सार्थक उपस्थिति हैं जिन्होंने परम्परा से अंतर्दृष्टि पाई है और परिवेश से काव्य की संपदा।वे शास्त्र से सीखते हैं और लोक से प्रेरित होते हैं।उनके कविता का संसार विविधतागामी व अर्थपूर्ण है ।उनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है—–

जन्म:18 मई 1965 को सोनभद्र(उत्तर प्रदेश) जिले के बरवां गाँव में ।
शिक्षा: एम ए(हिन्दी),पीएचडी.(इलाहाबाद विश्वविद्यालय)

*प्रकाशित कृतियाँ:
कविता संग्रह:”अपनी तरह के लोग”,”जहाँ सब शहर नहीं होता” ,”बोली बात” ,”रेत में आकृतियाँ”, ”ओरहन और अन्य कवितायेँ ”. “कवि ने कहा” .
‘क्षीरसागर में नींद’ .

*आलोचना:
”साठोत्तरी हिन्दी कविता में लोक सौन्दर्य “ और “नामवर की धरती “ .

*संपादन:“परिचय “ नाम से एक साहित्यिक पत्रिका का संपादन.

*पुरस्कार: कविता के लिए “बोली बात ” संग्रह पर वर्तमान साहित्य का मलखानसिंह सिसोदिया पुरस्कार , “रेत में आकृतियाँ” नामक कविता संग्रह पर उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान का नरेश मेहता कविता पुरस्कार,. “ओरहन और अन्य कवितायेँ” नामक कविता संग्रह के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का ‘विजय देव नारायण साही कविता पुरस्कार’ ।

*वर्तमान में बी०एच०यू० के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं तथा भोजपुरी अध्ययन केंद्र, बी. एच. यू. के समन्वयक(Coordinator) हैं।

आवास:सुमेधस,909,काशीपुरम कालोनी,सीरगोवर्धन,वाराणसी:221011

ई मेल: shriprakashshuklabhu@gmail.com
मो:09415890513

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कमलेश  वर्मा

जन्म : 24 जून, 1974, ज़िला : पटना, सम्प्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी

राजकीय महिला महाविद्यालय, सेवापुरी, वाराणसी

पुस्तकें : 1. काव्य-भाषा और नागार्जुन की कविता

  1. जाति के प्रश्न पर कबीर
  2. निराला काव्य-कोश
  3. दूसरी परम्परा का शुक्ल-पक्ष, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2016
  4. 5. प्रसाद काव्य-कोश, द मार्जिनलाइज्ड, नयी दिल्ली, 2017
  5. छायावादी काव्य-कोश, द मार्जिनलाइज्ड, नयी दिल्ली, 2019

सम्पादन :

  1. सत्राची : वीर भारत तलवार विशेषांक, 2017
  2. सत्राची : छायावाद पर केंद्रित विशेषांक, 2018
  3. बेटियाँ – जितेन्द्र श्रीवास्तव की बेटियों पर लिखी कविताएँ, अंकित प्रकाशन, वाराणसी, 2019

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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