सपने जमीन पर

धारा 51 52 57 

 

अब तक आपने पढ़ा : कभी अपनी जमीन बेचने को मजबूर, मंडल जी अब एक उभरते हुए नेता हैं। पत्रकारों को जबाब देने के क्रम में वेअपने अतीत के पन्नों को पलट रहे हैं। वे शोध कार्य के लिए गाँव आये विद्यार्थियों को सरकारी शिक्षा और सरकारी शिक्षक से मिलवाते हैं। अब आगे

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मास्टर साहब के घर से निकलने के बाद एक जगह लोगों की भीड़ दिखी। बरगद के पेड़ के चबूतरे का स्टेज बनाकर, बीच से कटे हुए पानी की बोतल को माइक बना कर, कोई पागल सा शख्स बोल रहा था। उसकी आवाज में कुछ तो खास बात थी जो दर्शक जमा होते जा रहे थे। उस वक्त अपनी तर्जनी अंगुली से भीड़ की तरफ इशारा कर पागल बोले जा रहा था, ”तुम सब कोल्हू का बैल हो। कोल्हू का बैल देखा है। यह बड़का पट्टी लगा रहता है, दोनों आंख पर और जिंदगी भर एक ही धुरी के चारों तरफ गोल गोल, गोल गोल, गोल गोल, घूम घूम कर तेल निकालता है। तो तुम सब न कोल्हू का बैल है। ऑफिस जाओ काम करो। खाली पीली टाइम वेस्ट मत करो। तेल निकालो भर भर कर तेल निकालो। जम कर टैक्स दो। यह सरकार उस तेल से फ्री में रोशनी बांटेगी। साइकिल फ्री, खाना फ्री, बिजली फ्री, लैपटॉप फ्री, मोबाइल फ्री ये फ्री वो फ्री, पुराना कर्जा डकार लिया कोई बात नहीं वो भी फ्री, सब फ्री पर एक चीज फ्री में नहीं देंगे।

जोर से पागल चिल्लाया, वो एक चीज क्या है भाई वो एक चीज क्या है। फिर वह पागल बायीं तरफ जाकर पूछता है जमूरा बता वो एक चीज क्या। फिर दायीं तरफ खड़ा हो कर जमूरा बन जाता है, “उस्ताद नहीं पता मुफ़्त का खाने के बाद बड़ी अच्छी नींद आती है। उस्ताद मैं सोना चाहता हूँ, डिस्टर्ब मत करो।” फिर पागल दाहिने तरफ खड़ा होकर उस्ताद बन गया और बोला, मेरा जमूरा मुफ़्त का खा लिया, अब सोना चाहता है। मुफ्त का खाने से यही होता है। सोचने समझने की शक्ति चली जाती है। कोई बात नहीं, उस्ताद इसका जवाब देगा। सब कुछ मिलेगा फ्री में पर शिक्षा नहीं मिलेगी। जमूरा फिर दायीं तरफ जाकर पब्लिक बन गया और पूछा, “क्यों भाई शिक्षा क्यों नहीं मिलेगी फ्री में, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय तीनों हमारा मौलिक अधिकार है। हम टैक्स पेयर्स हैं।”

जमूरा फिर दाईं तरफ जाकर नेता बन गया और बालों को आगे कर लालू यादव के अंदाज में बोला, ”ऐ टाई वाले बाबू, तुमलोग टैक्सपेयर है, तू जिताता है हमको इलेक्शन में, इलेक्शन में जिताता है हमको थोकिया वोट बैंक, हमारा यादव भाई, हमारा मुसलमान भाई। और तोहर बेटवा तो पढ़िए रहा है पब्लिक स्कूल में। जाओ स्कूल छुट्टी का टाइम हो रहा है।” फिर बायीं ओर जाकर वह टैक्स पेयर्स बन कर पहले तो अपना टाई ठीक करने का नाटक किया फिर बोला, थैंक यू फ़ॉर रिमाइंन्डिंग मी आई वाज गेटिंग लेट और फिर भागने की एक्टिंग करता है। और फिर वापिस आ उस्ताद बन गया, “तो उस्ताद तुम सबको बताएगा कि सब फ्री तो शिक्षा क्यों नहीं फ्री, क्योंकि थोकिया वोट बैंक वाले को यदि शिक्षा फ्री में मिल गई, फिर से सुनो जो शिक्षा फ्री में मिल गई तो दृष्टि मिल जाएगी, दृष्टि मिल गई तो थोकिया वोट बैंक टूट जाएगा। इसलिए खाना मिलेगा, मिड डे मील मिलेगा, कपड़ा मिलेगा, साइकिल मिलेगी पर शिक्षा नहीं मिलेगी।”

फिर पागल अपनी जगह बदल कर पब्लिक बन गया और बोला, “शिक्षा नहीं मिलेगी कोई बात नहीं है, खाना मिल रहा है, जय हो, जय हो, वैसे भी मेरा पढ़ने में नहीं लागे दिल।” फिर उस्ताद का जगह लेकर पागल बोला, आपको क्या फर्क पड़ता, पेट भरा है, नेता को क्या फर्क पड़ा उसका तो वोट बैंक भी पक्का और स्विस बैंक एकाउंट भी पक्का। फर्क पड़ता है देश को, फ्री का लालच दे, घुश देकर वोट बैंक खरीदता है पर चुनाव आयोग ऐतराज़ नहीं करती टैक्स पेयर के पैसा से देश के आगे बढ़ाने की जगह देश में निकम्मों निठल्लों की जमात तैयार कर रही सरकार। कोई नहीं बोलेगा तो ये पागल बोलेगा और तब तक बोलेगा जब तक तू सब जग नहीं जाता। फिर वह पागल आकाश की तरफ मुँह कर के सियार वाले अन्दाज़ में आवाज निकाला होअ…जागो… जागोअ…..जागते रहो…… जागते रहो।

 एक गोल मटोल पुलिस वाले ने तोंद पर से फिसलती हुई बेल्ट को ऊपर चढ़ाया, और पान की पीक फेंककर मुस्कुराते हुए बगल वाले वकील से मजाक में कहा, “अरे का वकालत सिंह! तुंही इस को जिरह में फंसा कर जेल भिजवाया था क्या रे?” और हंसने के क्रम में थोड़ा सरक कर खाँसने लगा। बगल में खड़ा कालाकोट वाला वकील दुबला पतला था, रंग भी सावला,  पर उसकी चमकती हुई सफेद आंख दूर से ही काफी तेज और शातिर लग रही थी। वकील हँसते हुए बोला, “अरे दरोगा, शाले ले हंस ले, हंस ले, अच्छे से पीक फेंककर हँस ले, इ पगलवा को जेल तुम्ही भिजवाया होगा।”

दरोगा अब पूरी पीक फ़ेंक चुका था। बेल्ट वापिस फिर सरक कर तोंद के नीचे चली गई थी, “छोड़ यार, इ पागल रोज ऐसे ही ज्ञान बांटता है। बहुत दिन से साला कोई क्लाइंट नहीं पकड़ में आया है।” वकालत सिंह, “तुम लोग को तो क्या दिक्कत है! किसी मोटरसाइकिल वाले को पकड़ लो, साला हेलमेट कहाँ है, नहीं है, पैसे निकाल।” दरोगा सिंह ने प्रतिवाद किया, “पब्लिक को सैतना इतना आसान नहीं है, अब तुरंते कोई नेता का फोन लगाकर मोबाइल थमा देता है। नहीं भाई कोई और तरकीब लगाना पड़ेगा।” वकालत सिंह मुस्कुराते हुए, तुम केस बनाता है हम मुकदमा लड़ते हैं। एक क्लाइंट से दोनों पैसा बनाते हैं। शाला अपनी दोस्ती का तो चोली दामन का साथ है

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डॉक्टर प्रभाकर भूषण मिश्रा

जन्म स्थान : जमालपुर (मुंगेर), बिहार, शिक्षा: एमबीबीएस, एमडी (मेडिसिन) रुचियां: पेंटिंग एवं लेखन
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