फणीश्वर नाथ रेणु

रेणु का लोक

 

रेणु ने राष्ट्रीय आख्यान के समानांतर स्थानिक संस्कृति के जीवन और संघर्षों को अपने कथा साहित्य का विषय बनाया। वे सबाल्टर्नवादी अर्थात् उपाश्रयी दृष्टिकोण से आजादी के आसपास के समय को एक अंचल विशेष के परिप्रेक्ष्य में रचनात्मक आकार देते हैं। कोशी अंचल के एक स्थान विशेष को केन्द्र में रखकर उन्होंने एक पूरा प्रतिसंसार रचा है। इसमें इतिहास के घटना चक्र को दीन-हीन बहिष्कृत पात्रों की दृष्टि से देखा गया है। इसमें बिहार का कोशी अंचल भी एक पात्र की जीवंतता के साथ चित्रित किया गया है। उत्तर औपनिवेशिक विमर्शों में सबाल्टर्न अथवा उपाश्रयी दृष्टि को इतिहास लेखन की एक पद्धति के रुप में महत्व दिया गया है। इसमें विमर्शों के केन्द्र में समाज के वंचित-उपेक्षित और परिधि पर रहनेवाले लोगों को स्थान दिया जाता है। उनके मनोभावों और प्रतिक्रियाओं के आधार पर इतिहास राजनीति और सामाजिक घटनाओं की व्याख्या की जाती है।

सबाल्टर्न शब्द का पहला प्रयोग ग्राम्शी ने सेना के अधीनस्थ पदक्रमों के संदर्भ में किया था। रेणु के कथा साहित्य में इन वर्गों की अस्मिताओं और अपेक्षाओं को नए संदर्भों में स्थान दिया गया है। विभिन्न जातीय समूहों जैसे ततमा, धनुर्धारी आदि में संस्कृतिकरण की प्रक्रिया के तहत क्षत्रियकरण की प्रवृत्ति का उल्लेख रेणु ने किया है। ये जातीय समूह अस्मितापरक कारणों से अपना आत्मइतिहास लिखकर स्वयं को जाति पदक्रम में पुर्परिभाषित करना चाहते हैं। इसके फलस्वरुप सामाजिक एवं राजनीतिक संघात की स्थितियाँ भी पैदा होती हैं। रेणु ने आंचलिकता के माध्यम से कोशी और उसके निकटस्थ भूभाग की आंतरिक संवेदनाओं के तंतुओं से विभिन्न सांस्कृतिक पर्वों, त्योहारों, मेलों, कथावार्ताओं, कीर्तन एवं पाठों आदि के माध्यम से परिचय करवाया है। इस प्रयुक्ति द्वारा उन्होंने उस अंचल का सांस्कृतिक व्यक्तित्व निर्मित किया है। उनसे पूर्व बांग्ला में यह कार्य ताराशंकर बंद्योपाध्याय ‘गणदेवता’ और सतीनाथ भादुड़ी ‘ढोंढ़ाई चरितमानस’ द्वारा कर चुके थे।

इन उपन्यासों में लोक संस्कृति के उपादानों, लोककथा, लोकगीत और नृत्य, पर्व-त्योहार, मेले आदि का आकलन, जनविधा के अन्य प्रकारों वेशभूषा, आचार-विचार आदि के साथ प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि रेणु और अन्य आंचलिक उपन्यासकारों में अंचल विशेष को केन्द्रीयता प्रदान की जाती है, परंतु इसके माध्यम से देश की आत्मा की तलाश की जाती है। लोकभूमि और लोक जीवन के वैशिष्ट्य को चित्रित कर आंचलिक कथाकार वैविध्य में अंतर्निहित एकत्व का प्रकाशन करता है। वह लोक समाज के जीवन का आलेखन कर जन की आशाओं-आकांक्षाओं से हमें जोड़ता है। लोक संस्कृति का चित्रण सांस्कृतिक परंपरा की समृद्धि का द्योतक है। इसके उपादानों में लोक कथाएं भी हैं, लोकगीत भी हैं और लोक कलाएं भी।

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रेणु के साहित्य में लोक संस्कृति के ये सभी तत्व मिलते हैं। किंतु इनका उपयोग उन्होंने केवल सूचनात्मक ब्योरा देने के लिए नहीं किया है। इनके कलात्मक विनियोग द्वारा उन्होंने अपने कथा साहित्य में मानवीय संदर्भों को उजागर करने का कार्य किया है। उनके द्वारा उल्लिखित लोक कथाएं और लोकगीत उनके द्वारा रचित वृतांत का अभिन्न अंग बन जाते हैं। इसी तथ्य को परिलक्षित कर कहा गया है कि आंचलिक साहित्यकार के लिए लोक साहित्य पुरातन मुद्राओं के समान मूल्यवान होता है। लोक साहित्य हमारे रिक्थ के अमृतकण हैं जिनका निर्माण पारम्परिक रुप से समूह द्वारा किया जाता है। यह जन-जन में प्रचलित और लोकस्मृति में सुरक्षित रहता है। परम्पराओं और अनुभूतियों को संरक्षित रखने वाला लोक साहित्य अज्ञात काल से श्रुति परम्परा में चला आ रहा है। लोक मानस अपनी समग्रता में लोक कथाओं का उद्गम स्थल होता है।

समग्र लोकजीवन ही इनका कलेवर है, समग्र लोककंठ ही इनकी वाणी है। रेणु के कथा साहित्य में लोक कथाओं और गीत कथाओं को विलक्षण ढ़ंग से विन्यस्त किया गया है। कथा तत्व के साथ इनका सुंदर संयोजन रेणु की कलात्मक क्षमता का परिचायक है। रेणु के उपन्यासों में जिन लोक कथाओं का चित्रण हुआ है उनमें ‘मेरीगंज की कथा’ ‘कमली मैया की कथा’ और सारंगा सदाब्रिज की कथा चित्रित हैं। इसके अलावा कुछ अन्य स्थानीय लोककथाएं जैसे ‘कोशी मैया की कथा’ ‘दुलारी दाय की कथा’ ‘रानी डूबीघाट की कथा’ ‘ब्रह्मपिशाच की कथा’ ‘मिसेज रोजवुड की कथा’ ‘परमदेव की कथा’ ‘पंचचक्र की कथा’ बकर चरवाहा और लकड़ सुँघवा की कथा जैसी कहानियाँ भी विन्यस्त हैं। इन लोक कथाओं के अलावा रेणु के साहित्य में गीत कथाओं का उल्लेख और विशद चित्रण भी हुआ है। इनमें सुन्नरिनेका, लोरिक कुम्मर, घुघती घंटवर, ढ़ोलामारु तथा चिन्नियाँ की गीत कथाएँ प्रमुख हैं। गीतों के बोलों के साथ जनमानस की मनःस्थितियों व भावानुभूतियों की रसमयता, तल्लनीता व सौम्यता आदि का कलात्मक चित्रण निश्चित ही कथा की जीवन्तता का प्रमाण है।

रेणु कथा विकास के क्रम में लोकजीवन के चित्रों को अनुस्यूत करते जाते हैं। इनके प्रस्तुतिकरण से रचना अपने परिवेश यानि ‘लोकेल’ को रेखांकित करती है। यह प्रविधि रेणु की निजी विशेषता बन गई है। जैसे कथा के मध्य खलासीजी का मोरगियाँ गाँजा लाने का प्रयोजन, रमजू की स्त्री के लिए कंगन का उपहार, सहदेव मिसिर का हाल आदि प्रसंग इस कथा प्रविधि के नमूने हैं। कथा गीतों और लोकप्रसंगों को वे पात्रों की परिस्थितियों की संगति में दिखाते हैं। इन लोकवृतांतों को कथानक से जोड़ देना रेणु की खासियत है। कथा के विशद चित्रण में वे उपकथाओं और परीकथाओं का रेखांकन करते चलते हैं। ‘परती परिकथा’ उपन्यास की पृष्ठभूमि ही लोक कथा पर आश्रित है। परती भूमि बंध्या रानी बन जाती है। लोककथा में परती की कथा को पण्डुकी ही पहचानती है जो बंध्या रानी की परिचारिका रह चुकी है। उपन्यास का आरंभ पण्डुकी कथा के माध्यम से प्रभावशाली बन पड़ा है। लोक कथा मूलतः यहाँ अलंकरण का ही प्रयोजन सिद्ध करती है। यह मूल कथा के संकेतक के रुप में ही विन्यस्त है।

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अंचल विशेष के जनजीवन में प्रचलित किम्वदंतियों जन-श्रुतियों, मान्यताओं, धारणाओं, प्रकृतिपरक आस्था का सम्बन्ध लोकजीवन की श्रद्धा और आस्था से है। ये तत्व कथा के विशद चित्रण को प्रामाणिकता प्रदान करती है। रेणु ने लोकश्रुतियों और जनविश्वासों को कथा में कलात्मक ढ़ंग से रचा है। ये तत्व कहीं भी बोझिल अथवा कथेतर प्रतीत नहीं होते। ‘दुलारी के आँचल में नौ मन हीरा झरे, हाँ कोसी मैया हँसे, तो नौ मन हीरा झरे और रोये तो दस मन मोती’ जैसी कई जनश्रुतियाँ रेणु ने प्रयोग की हैं जो कथ्य में स्थानीयता और परिवेश का विधान करती हैं। इनके समायोजन से कथा की सजीवता और प्रभावोत्पादकता कई गुना बढ़ जाती है। रेणु की कथात्मकता प्रमुखतया लोकोन्मुखी है। रेणु लोकगीतों को ही अपने उपन्यासों का आधार मानते हैं। इन गीतों का स्थानीय लोक-वृत्तों से गहरा सम्बन्ध है। लोकगीतों की मधुर रागिनी उनके सभी उपन्यासों में प्रवाहित होती है। उनके उपन्यासों के कथानक तत्कालीन बिहार के पूर्णिया-कोशी अंचल पर आधारित हैं। इनमें उस अंचल विशेष की आशा, पीड़ा, भावना और लोकानुभूतियों की लयात्मक और कलात्मक अभिव्यंजना है। ये गीत अंचल विशेष के जनमानस की संवेदनाओं, संवेगों, स्वानुभूतियों व सौन्दर्य भावना को रुपायित करते हैं। इनके द्वारा जन-जन की पीढ़ियों में प्रचलित लोक परम्परा उजागर होती है। इनके माध्यम से जन-जन की आत्मा और आत्मतत्व का सजीव चित्रण होता है।

रेणु के सभी उपन्यासों में लोक जीवन में प्रचलित लोकगीतों का उल्लेख हुआ है। उदाहरणार्थ ऋतुगीत, बारहमासा, झूमर, संथालगीत, बिज्जैभान, पूजा और विवाह गीत, त्योहार और होली गीत आदि का उल्लेख विशिष्टतापूर्वक हुआ है। ये गीत कथागीत, नाट्यगीत, नृत्यगीत और सिनेमागीत के रुप में हैं। ‘मैला आँचल’ में अन्य गीतों के साथ चैता का भी उपयोग किया गया है। ये गीत. प्रशांत के हृदय में एक मादक पीर जगाते हैं। मठ के परिवेश में रेणु ने कबीरपंथी गीतों का डॉ भी उपयोग किया है। इन गीतों के उपयोग में भी रेणु की सबार्ल्टवादी दृष्टि सक्रिय है। वे निम्नवर्गों में प्रचलित गीतों का खुलकर उपयोग करते हैं। खलासी जी के गीतों में फुलिया के प्रति उनकी दमित प्रेम संवेदना गीतों के माध्यम से ही प्रकट होती है।

रेणु के उपन्यासों में लोकरंजनार्थ और आमोद-प्रमोद के लिए लोक नृत्यों का भी उपयोग हुआ है। इनमें बिदापत नाच, जालिम सिंह नाच, थेटर कम्पनी का नाच और संथाल नृत्य चित्रित हैं। इनमें मृदंग, करताल, झाँझ, शंख, मानर डिम्मा, तुरही और खंजड़ी जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया गया है। विदापत नाच विद्यापति के गीतों पर आधारित एक लोकनाट्य रुप है। इसमें विदूषक के रुप में विकटा जनता का अनुरंजन करता है। इसके अलावा रेणु के उपन्यासों की आंचलिकता विदेसिया, मछुआरिन, पाला नाच, बेहुला-लखिंदर और सावित्री नाच के माध्यम से एक विशिष्ट परिवेश रचती है। ये लोकनृत्य लोकतत्व के सबल एवं समर्थ परिचायक है। इनमें सामूहिकता और लोकजीवन का सुंदर चित्रण हुआ है। रेणु इनका कुशल और स्वाभाविक संयोजन अपने कथ्य में करते हैं। रेणु के कथासाहित्य में लोकश्रद्धा और लोकविश्वास के आधार रुप में कई पर्वों और त्योहारों की भी चर्चा है। इनमें सिखापर्व, बधना पर्व, शामा चकेवा पर्व, होली और करमा-धरमा पर्व आदि प्रमुख हैं  इसके अतिरिक्त इनमें लोकरंजनार्थ जाट-जट्टिन खेल तथा जन-जन के आमोद के लिए नाच-गानों, नाटकों व अखाड़ों का भी उल्लेख हुआ है। इसके साथ ही विदेशी विशिष्ट वर्ग के आनंदोत्सव के उदाहरण भी उनमें मौजूद हैं। जैसे पूर्णिया डे, सोनपुर डे, बेतिया डे आदि। इन पर्वों त्योहारों के साथ-साथ अंचल विशेष के मेलों, हाटों तथा आपस में होनेवाली पार्टियों का चित्रण भी रेणु ने विस्तार से किया है। जैसे मदनपुर का मेला, रोतहट का मेला, लालबाग का मेला, सोनपुर का मेला और पशुपति मेला आदि। ये जनजीवन में आमोद-प्रमोद व मनोरंजन आदि के प्रबल माध्यम है।

रेणु ने अंचल विशेष के जन-जीवन को अत्यंत सजीवता और सहानुभूति से चित्रित करते हैं। उनका नैरेटर समाज के वंचित और उपेक्षित तबकों की दृष्टि से घटनात्मकता को एक सबार्ल्टन अर्थात उपाश्रयी दृष्टि से देखता और व्याख्यायित करता है। दृष्टि सापेक्षता के बावजूद उपदेशात्मकता और प्रायोजन से रेणु मुक्त हैं। सबार्ल्टनवादी साहित्य के प्रस्थान बिंदु की तलाश की दृष्टि से रेणु साहित्य एक रोमांचक और नवीन लीलाभूमि है।

ऋषिकेश राय

जन्मः 13 जून 1967  गाजीपुर (उ.प्र.)। शिक्षाःएम.ए. (हिन्दी,अंग्रेज़ी,इतिहास) पी.एच.डी., डी.लिट., अनुवाद में डिप्लोमा। सात पुस्तकें प्रकाशित। विभिन्न पत्रिकाओं में आलेख समीक्षाएं, कविताएं और अनुवाद प्रकाशित। सम्प्रति: सचिव, टी बोर्ड,इण्डिया (भारत सरकार का प्रतिष्ठान) 

सम्पर्कः 09903700542 

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)

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