फणीश्वर नाथ रेणुशताब्दी स्मरण

रेणु : उदात्त पात्रों के रचनाकार

 

  • योगेन्द्र

 

लोक संवेदनाओं के महान कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु ने ‘संवदिया’ नामक कहानी 1962 के अक्टूबर माह में लिखी। आजादी के सत्ताईस वर्ष बीत चुके थे। बावजूद इसके ऐसा नहीं था कि ‘ सुराज’ सबके घर गाँव में आ चुका था। कहानी का प्रमुख पात्र संवदिया कहता है-‘कटिहार पहुँचने के बाद ही मालूम होता है कि सचमुच सुराज हुआ है। ‘कटिहार स्टेशन के रख रखाव और इन्तजाम में ‘सुराज’ झाँकता था।  संवदिया तो जलालगढ़ नामक गाँव का है, जहाँ विधवा बहुरिया कलप रही है। बहुरिया टूटते परिवार, निर्धनता और रिश्तों की कडुवाहट को भोग रही है।  गाँव जैसे का तैसा था- ठहरा हुआ। आजादी के पूर्व जो निर्धनता थी और रिश्तों में जो अमानुषिकता थी,वह वैसे ही कायम थी।  वैसे तो इस कहानी का नायक संवदिया है जिसका नाम हरगोबिन है,लेकिन कहानी के केन्द्र  में  बहुरिया की अपार वेदना और कष्ट है। कहना चाहिए कि यही वेदना कहानी के केन्द्र  में है।

कहानी शुरू होती है इन पंक्तियों से- “हरगोबिन को अचरज हुआ – तो, आज भी किसी संवदिया की जरूरत पड़  सकती है! इस जमाने में,जबकि गाँव- गाँव में डाकघर खुल गये हैं,संवदिया के मार्फत संवाद क्यों भेजेगा कोई? आज तो आदमी घर बैठे ही लंका तक खबर भेज सकता है और कुशल संवाद मंगा सकता है।” 1962 में गाँव की संचार व्यवस्था में डाकघर प्रवेश कर चुका था। डाकघर का मतलब था कि चिट्ठी- पतरी और टेलिग्राम का आदान-प्रदान। आज डाकघर भी बेमतलब हो गया है। चिट्ठी पोस्टकार्ड,अन्तर्देशीय पत्र या लिफाफे पर लिखना थम गया है। नेट,व्हाट्स अप,मोबाइल और सोशल मीडिया का जमाना है,समाचार तुरन्त प्रेषित होता है,लेकिन कहानी में यह महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। महत्त्वपूर्ण है- लोक संवेदना। आज भी रेणु रहते तो बहुरिया की कथा कहते। गाँव-घरों में आज भी विधवा बहुरिया के दुख कम नहीं हुए हैं। हां,संभव है कि कहानी के टोन बदल जाते। सन्दर्भ भी बदलते और घटनाक्रम भी।

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हरगोबिन को बुलाया है बड़ी हवेली की मालकिन बड़ी बहुरिया ने। बड़ी हवेली अब बड़ी नहीं रही। वह अब नाममात्र की बड़ी रह गयी है। रेणु लिखते हैं- “ बड़ी हवेली अब नाममात्र को ही बड़ी हवेली है। जहाँ दिन रात नौकर- नौकरानियों और जन- मजदूरों की भीड़ लगी रहती थी,वहाँ आज हवेली की बड़ी बहुरिया अपने हाथ से सूपा में अनाज लेकर झटक रही है। इन हाथों में सिर्फ मेंहदी लगाकर ही गाँव की नाइन परिवार पालती थी।”  इतना भर ही नहीं है कि बड़ी बहुरिया सूपा में अनाज फटक रही है,बल्कि हालात इतने बुरे हैं कि जिस मोदिआइन से उधार लेकर खाती है,उसका उधार नहीं चुका पा रही। जब हरगोबिन बहुरिया के पास पहुँचता है तो उधार वसूलने के लिए मोदिआइन दम दाखिल है और बड़बड़ा रही है- “उधार का सौदा खाने में बडा मीठा लगता है और दाम देते समय मोदिआइन की बात कड़वी लगती है। मैं आज दाम लेकर ही उठूँगी।”  मोदिआइन की कड़वी बात का कुछ भी उत्तर नहीं देती बहुरिया। बहुरिया का जीवन कितना उदास और लाचार है। बड़ी हवेली कैसे बिखर गयी, इसका भी संकेत देते हैं कथाकार रेणु। बहुरिया के पति अचानक गुजर गये। तीन देवर थे। जायदाद के लिए आपस में लडे। बँटवारा हुआ तो सारे रिश्ते तार तार हो गये। बहुरिया की देह पर जो जेवर थे,उसे भी खींच कर उतारे गये। यहाँ तक कि बनारसी साड़ी के भी तीन टुकड़े कर उसे भी बांटा गया। बँटवारा कर तीनों देवर शहर में जाकर बस गये। वे अब या तो बाल- बच्चों के साथ अगहनी धान के समय आते हैं या आम के मौसम में। वे चावल- चूड़ा और  आम बाँध कर ले जाते हैं। जाहिर है कि रिश्ते स्वार्थ- बुद्धि के शिकार हो गये।

बड़ी बहुरिया पर दुख के पहाड़ टूट पडे। अब वह इस उदास हवेली में अमानुषिकता को झेलते हुए कैसे रहे? इसलिए हरगोबिन ने संवदिया को बुलाया है कि वह नैहर जाकर माँ को संवाद कहे। बड़ी बहुरिया सिसककर कहती है-“माँ से कहना मैं भाई-भाभियों की नौकरी करके पेट पालूँगी। बच्चों के जूठन खाकर पड़ी रहूँगी,लेकिन अब नहीं….अब नहीं रह सकूंगी। … कहना,यदि माँ मुझे यहाँ से नहीं ले जाएगी तो मैं किसी दिन गले में घडा बाँधकर पोखरे में डूब मरूँगी। … बथुआ साग खाकर कब तक जीऊँ? किसलिए…. किसके लिए?” बड़ी बहुरिया का यह दुख सामान्य दुख नहीं है। इस दुख में संवदिया भींगता है। उसने गाँव घर के अनेक संवाद दूसरे गाँव में जाकर सुनाये हैं,मगर ऐसा करुण संवाद कभी नहीं सुनाया। रेणु लिखते हैं-‘हरगोबिन का रोम रोम कलपने लगा।’ बहुरिया द्वारा कहे गये संवाद को हरगोबिन ने आगे चलकर कई बार याद किया है और हर बार संवाद बदलते गये। हरगोबिन जब नैहर जाने के लिए गाड़ी पर सवार हुआ तो संवाद के प्रत्येक शब्द याद आये- “ किसके भरोसे रहूँगी? एक नौकर था,वह भी कल भाग गया। गाय खूँटे से बंधी भूखी-प्यासी हिकर रही है। मैं किसके लिए इतना दुख झेलूँ?” पहले संवाद में नौकर और गाय का सन्दर्भ नहीं है।

दूसरी बार जब कटिहार में बिहपुर के लिए हरगोबिन गाड़ी बदलने लगा तो फिर बहुरिया का करुण मुखड़ा याद आया और साथ में संवाद- “ हरगोबिन भाई,माँ से कहना,भगवान् ने आँखें फेर लीं,लेकिन मेरी माँ तो है….किसलिए…..किसलिए… मैं बथुआ साग खाकर कब तक जीऊँ?” पहले संवाद में भगवान नहीं हैं। संवाद को कारुणिक बनाने के लिए इसे जोड़ा गया है। तीसरी बार बहुरिया का संवाद हरगोबिन को तब याद आया,जब वह बहुरिया के नैहर में जलपान करने लगा। इस बार भी संवाद का रूप थोडा बदल गया- “कर्ज- उधार अब कोई देते नहीं। …एक पेट तो कुत्ता भी पालता है। लेकिन मैं? माँ से कहना।”  एक पेट कुत्ता भी पालता है,यह पंक्ति जब जुड़ती है तो बहुरिया की हालत और भी पीड़ाजनक लगती है। चौथी बार यह संवाद तब याद आता है,जब हरगोबिन नैहर बिस्तर पर पड़ा है और नींद नहीं आ रही। उसने तय किया कि सुबह वह बहुरिया की बूढी माता को साफ- साफ सुना देगा-“मायजी,आपकी इकलौती बेटी बहुत कष्ट में है। आज ही किसी को बुलवा लीजिए। नहीं तो वह सचमुच कुछ कर बैठेगी। आखिर,वह किसके लिए सहेगी?…. बड़ी बहुरिया ने कहा है,भाभी के बच्चों के जूठन खाकर वह एक कोने में पड़ी रहेगी। ”

संवदिया के लिए यह नयी स्थिति है। आज तक जितने भी संवाद सुनाये,उसमें वह कभी द्वन्दग्रस्त नहीं हुआ। कभी इतना तीखा मानवीय सन्दर्भ नहीं आया। पहले संवाद सीधा- सपाट या हँसी-खुशी वाला होता था,उसे वह सुना आता था। लेकिन यह संवाद एक ऐसी बहू का है जो ससुराल त्याग कर नैहर आना चाहती है। वह भी ताउम्र के लिए। बहू की जब नैहर से डोली उठती है तो उसके लिए नैहर का सुख सपना हो जाता है और पिया का देश ही सबकुछ होता है। बड़ी बहुरिया के पति अचानक जवानी में चल बसे। कोई सन्तान नहीं है। हवेली की आन बान शान सब ध्वस्त हो चुका है। इतना दुख है कि बड़ी बहुरिया झेल नहीं पा रही। संवदिया के सामने द्वन्द है-‘गाँव की लक्ष्मी गाँव छोड़कर चली आवेगी! …सुननेवाले हरगोबिन के गाँव का नाम लेकर थूकेंगे- कैसा गाँव है,जहाँ लक्ष्मी जैसी बहुरिया दुख भोग रही है।’ यही वजह है कि जब संवाद सुनाने का अवसर आता है तो संवाद सुना नहीं पाता। वह झूठ बोलता है-“ जमीन जायदाद अभी भी कम नहीं । … टूट भी गयी है तो बड़ी हवेली ही है। ‘सवांग’ नहीं है,यह बात ठीक है। मगर,बड़ी बहुरिया का तो सारा गाँव ही परिवार है। हमारे गाँव की लक्ष्मी है बड़ी बहुरिया। …. गाँव की लक्ष्मी गाँव छोड़कर बाहर कैसे जाएगी? यों,देवर लोग हर बार आकर ले जाने की जिद करते हैं।” सच यह है कि जमीन जायदाद भी नहीं है,गाँव के लोग परिवार का हिस्सा नहीं मानते और न ही देवर ले जाने की जिद करते हैं। हालात विपरीत हैं,लेकिन बहुरिया और गाँव के मान- सम्मान का प्रश्न है।

आखिरकार वह बहुरिया की बूढी माँ को संवाद नहीं सुना पाता है। संवदिया हरगोबिन जलालगढ़ से चलकर बिहपुर आया है। जलालगढ़ से चलने लगा तो उसने बहुरिया से राह- खर्च भी नहीं लिया,इसलिए कि निर्धनता हवेली में नाच रही थी। जो बहुरिया मोदिआइन का उधार नहीं चुका पा रही,उससे राह खर्च कैसे लेते? जब बिहपुर बहुरिया का नैहर छोड़ने लगा तो बहुरिया के भाई से राह-खर्च नहीं लिया,जबकि उसके राह- खर्च के पैसे पूरे नहीं हैं। बिहपुर से कटिहार किसी तरह आता है। वहाँ से जलालगढ़ बीस किलोमीटर है। रेल का पैसा नहीं है,इसलिए पैदल चल पड़ता है। मन में भारी द्वन्द है। कथाकार लिखते हैं- “ गाड़ी पर बैठते ही उसकी हालत अजीब हो गयी। वह कहाँ आया था? क्या करके जा रहा है? बड़ी बहुरिया को क्या जवाब देगा?” दस कोस तक हरगोबिन बाई के झोंके पर रहा। भूख लगी तो भरपेट पानी पीया। सौगात में बासमती चूड़ा मिला था जिसे छूआ तक नहीं। उसके पैर लडखडाते हैं,अँधेरा घिर रहा है। मन में तूफान है कि संवाद पहुँचाया नहीं। जलालगढ़ आते आते होश खो देता है और जब होश आता है तो देखता है कि वह बिछावन पर हवेली में लेटा है और बहुरिया उससे हाल समाचार पूछ रही है। तब हरगोबिन बहुरिया का हाथ पकड़कर कहता है-“ बड़ी बहुरिया। मुझे माफ करो। मैं तुम्हारा संवाद नहीं कह सका।” फिर बहुरिया से याचना करता है-“ तुम गाँव छोड़कर मत जाओ। तुमको कष्ट नहीं होने दूँगा। मैं तुम्हारा बेटा। बड़ी बहुरिया,तुम मेरी माँ,सारे गाँव की माँ हो! मैं अब निठल्ला बैठा नहीं रहूँगा। तुम्हारा सब काम करूँगा। ” कहानी और भी बड़ी और महत्त्वपूर्ण तब हो जाती है,जब पाठक अंतिम पंक्ति पढता है- “ बड़ी बहुरिया गर्म दूध में एक मुट्ठी बासमती चूड़ा डालकर  मसकने लगी। … संवाद भेजने के बाद से ही वह अपनी गलती पर पछता रही थी।” संवदिया कहानी के दोनों मुख्य पात्र बहुरिया और हरगोबिन उदात्त हो उठते हैं। सच पूछिए तो रेणु पात्रों को उदात्त बनाने में दक्ष हैं। विपरीत परिस्थितियों के बीच रेणु के पात्र भावनाओं से भरे होते हैं और पाठक को मनुष्यता के रूप दिखाते हैं। उनके मुख्य पात्र आदमीयत के स्तर से नीचे नहीं गिरते। वे भाषा को नये नये शब्दों से समृद्ध करते हैं। समाज की परिस्थितियॉं बदल रही हैं,लेकिन रेणु की कहानी अपने पूरे संदर्भों के साथ मजबूती से खडी है। इसकी बड़ी वजह है- लोक संवेदनाओं और अनुभूतियों पर उनकी जबर्दस्त पकड़।

डॉ योगेन्द्र लेखक, प्राध्यापक, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रखर टिप्पणीकार हैं|

सम्पर्क-  +919430425835

 

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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