फणीश्वर नाथ रेणु

प्रेम का अध्यात्म रचती सौंदर्यधर्मी कहानी : जड़ाऊ मुखड़ा

 

रेणु की रचना मनुष्य केंद्रित है। रेणु की जन्मशती मनाते वक्त इस वर्ष एक बार फिर हम उनके साहित्य के गहन अर्थात को खंगालते हुए इसी मनुष्य तक पहुँचने की पहल करेंगे। रेणु अक्सर कहते रहे कि रचनाकार को अपनी रचना में मनुष्य को रचना होगा… आदमी बनाना होगा।’ रचना में आदमी बनाने की उनकी इसी चिराकांक्षा ने हमें हिरामन,हीराबाई, लाल पान की बेगम, माधो, डॉ॰ उमेश जैसे स्मृतिशेष पात्र दिए जो विशुद्ध मानवता की अतीव सुंदरता लिए हुए है। यही मानवीय सुंदरता रेणु के पात्रों और पाठकों में एक विलक्षण तादात्म्य साधती है और ये पात्र अनायास ही मन की अतल गहराई में चिरस्थायी हो जाते हैं।

फरवरी 1967 में प्रकाशित ‘जड़ाऊ मुखड़ा’ अपनी विशिष्ट शैली में सुंदरता को परिभाषित करती हुई सौंदर्यधर्मी कहानी है जो प्रकारांतर से जीवनधर्मिता की बात करती है। वस्तुतः संपूर्ण कहानी में प्रवाहित कुरूपता की तह में सुंदरता का अभंग प्रवाह है। यह सुंदरता है निस्सीम कौटुंबिक प्यार की।

नई कहानी के उस दौर में जब पारिवारिक विघटन, अंतः संबंधों का संघर्ष या रिश्तों में अनंत उलझनों का चित्र अपने चरम पर था तब रेणु की रिश्तों में पारस्परिक आत्मीयता या एक दूसरे को मानसिक तौर पर सम्हालने की होड़ आकर्षित किए बगैर नहीं रहती। आकर्षण कहानीकार की कविधर्मिता का भी उतना ही है।

रेणु का मूलतः कवि होने का प्रभाव उनकी अनेक कहानियों में अक्सर दिखाई देता है। कहानी की प्रवाहमयी वृत्ति पाठकों को संपूर्ण कथानक में अपने कथ्यसहित बांधे रखती है। ‘जड़ाऊ मुखड़ा’ कहानी में पात्रों के साथ लेखक का विलक्षण आत्मसंवाद है और इसीलिए  कहानी के मर्म तक पहुँचने की पाठक की यात्रा नितांत आह्लाददायी होती है। प्रस्तुत कहानी में कहानीकार का अंतिम ध्येय मनुष्य के आत्मिक सौंदर्य को प्रगतिशील स्वर देना है,  स्त्री सुंदरता के रूढ़िवादी, जड़ सामंती मानकों को तोड़कर स्त्री की आंतरिक सुंदरता को स्त्री प्रज्ञा से जोड़ना है।

कहानी का कथानक बस इतना ही है कि कहानी की नायिका बुला के चेहरे पर गोल मिर्च जितना बड़ा मस्सा है, जिसमें केश उग आया है। बेटी के चेहरे का यह रोयाँधारी मस्सा पिता बटुक बाबू की मानसिक अशांति और चिंता का सबसे बड़ा कारण है। बेटी बुला के ब्याह को लेकर माँ भी परेशान है। बुला विज्ञान की महाविद्यालयीन छात्रा है और अपने बाह्य सौंदर्य से बेफिक्र है। परंतु पिता की मनःशांति के लिए मस्से के ऑपरेशन के लिए तैयार होती है। ऑपरेशन की पूर्वतैयारी के दौरान बुला की मुलाकात डॉ॰ उमेश से होती है। डॉ॰ उमेश स्टेट्स रिटर्ण्ड होनहार डॉक्टर है, जो ऑपरेशन की पूर्वप्रक्रिया के दौरान हुई चंद मुलाकातों में बुला की ओर आकर्षित होकर मस्से की तथाकथित कुरूपता सहित बड़े सहज मन से उसे स्वीकार करता है।

डॉ॰ उमेश कहानी का प्रतिनिधि युवा शिक्षित पात्र है जो विचारों में प्रगतिशील है जिसका मात्र एक संवाद सम्पूर्ण कहानी को एक विलक्षण सौंदर्य सूत्र में बांध देता है। यह संवाद ही कहानी की आत्मा है। चेहरे से मस्सा काटने को लेकर अपना विरोध दर्शाते हुए डॉ॰ उमेश कहते हैं- ‘इसको काटने के बाद आपका चेहरा बदसूरत भी हो सकता है, किसी की नजर में.. जैसे यह आपके गले में जो जड़ाऊ हार है, इसका पत्थर निकाल दिया जाए तो कैसा लगेगा?’ ऐसा कहकर डॉ॰ उमेश मात्र बुला को स्वीकार ही नहीं करता बल्कि उसके आत्मसम्मान की बड़ी खूबसूरती से रक्षा करता है। कुरूपता के लिए कारण बने मस्से को ही सुंदरता का कारण बनाकर रेणु जी कुरूपता और सुंदरता की सारी बहस को ही निःशेष कर देते हैं। स्त्री के इस नए सौंदर्य की पहचान की बागड़ोर वे शिक्षित नवयुवकों के हाथ में देते हैं जिनके प्रतिनिधि डॉ॰ उमेश है। यहाँ नई स्त्री की तेजस्विता को रेणु जी स्त्री स्वभाव और उसकी प्रतिभा में प्रतिबिंबित करते हैं।

यद्यपि कहानी का अंत डॉक्टर उमेश द्वारा बुला के स्वीकार से आदर्शवादी भले ही लगता हो,तथापि यह आदर्शवाद एकांगी नहीं है। इस आदर्श से रेणु ने डॉ॰ उमेश की भावात्मक संवेदना को वैचारिकता और प्रगतिशीलता से जोड़ दिया है। बुला की कुरूपता को सुंदरता में बदलते हुए डॉक्टर उमेश जो तर्क देते हैं, उससे पाठक भी समरस हो जाते हैं और अचानक बुला मस्से के साथ सुंदर लगने लगती है। डॉ॰ उमेश की वैयक्तिक संवेदना को पाठकीय स्वीकृति सहज ही प्राप्त होती है। यह भी एक कला है जो स्वभावतः गल्पकार रेणु को अवगत है। कहानी का जड़ाऊ सौंदर्य बुद्धि और भाव के समन्वय में है। इसलिए कुरूपता पर मात करती सुंदरता एक भावात्मक और वैचारिक लयबद्धता लिए हुए है।

रेणु फिर एक बार यह रेखांकित करते हैं कि सौंदर्य देखनेवाले की दृष्टि में होता है, हमें अपना नजरिया बदलना आवश्यक है। कहानी में कुरूपता को चित्रित करने के पीछे रेणु का उद्देश्य ही मानव मन की सुंदरता को चित्रित करना है। मनुष्य मन की स्निग्धता तक पहुँचना है। रेणु कहते हैं ‘धरती पर जमी सूखी पपड़ी को हटाकर उसकी आर्द्रता तक पहुँचा जा सकता है, जरूरत है मानव मन पर जमी सुखी पपड़ी को हटाना।’ रेणु की रचना की यात्रा मानव मन की इसी शुष्कता से स्निग्धता की ओर है।

रेणु कहानी का अंत शंखनाद से करते हैं। डॉक्टर की माँ द्वारा बुला के स्वीकार पर बंगालिन सखियों द्वारा शंखनाद। शंख की गहरी और गूँजती हुई इस मंगलमय ध्वनि में निश्चित ही स्त्री पुरुष के निर्मल और प्रगत प्रेम की अनुगूँज है।

जीवन सौंदर्य की कक्षा को विस्तृत करनेवाला स्त्री-पुरुष का आपसी प्यार और सौहार्द्र अक्सर रेणु की कहानियों को एक विशेष ऊँचाई प्रदान करता है। उन्हें अपनी रचना में मनुष्य की खोज है और रिश्तों में सुंदरता की तलाश। इसी तलाश में रेणु को हिरामन प्राप्त होता है और हीराबाई भी। अनपढ़-गँवार होने के बावजूद हिरामन में अप्रत्याशित रूप से सभ्यता और शिष्टाचार है। स्त्री के प्रति नितांत सम्मान में ही नर्तकी भी बिदागी में बदल जाती है। नर्तकी के लिए हिरामन की पुरुष दृष्टि लोलुप नहीं बल्कि समादृत प्यार की है। हीराबाई भी अपने मीता को समाज के तानों-ठोकरों से बचाना चाहती है और अंततः ‘चादर’ के रूप में अपने प्यार की ऊष्मा सदा के लिए हिरामन को सौंप देती है। रिश्तों में यही निर्लेप और निरपेक्ष प्यार रेणु के पात्रों को चिर-चैतन्य प्रदान करता है।

‘लाल पान की बेगम’ कहानी की सफलता का सौंदर्य भी इसी रिश्ते के सहज प्यार में है। यहाँ स्त्री कभी पुरुष की शक्ति बनती है तो कभी पुरुष अपनी संघर्षशील स्त्री की इच्छापूर्ति के लिए गाड़ीवान। स्त्री-पुरुष का यहीं अभिन्न प्यार हम ‘ भित्तिचित्रकी मयूरी’ में भी देखते हैं। फूलपतिया की अपने गाँव के प्रति निष्ठा और कला के प्रति आस्था का सम्मान करते हुए कहानी का नायक सनातन ‘मधुबनी कला भवन’ को ही गाँव में स्थापित करता है। फूलपतिया के माध्यम से ‘लोकल के लिए वोकल’ बनने का काम आजसे छः दशक पहले ही रेणु कर चुके थे। ‘कस्बे की लड़की’ कहानी में भी काली कुरुपा सरोज की यौनाकांक्षाओं को समझनेवाला पुरुष ही था। ‘नैना जोगन’ कहानी में स्त्री की  माँ बनने की ज़िद भी माधो ही समझता है और पति सहित नायिका को शहर ले जाता है। यहा स्त्री ग्रामीण है पर प्रगतिशील है।ओझागिरी, तंत्र-मंत्र से दूर शहर जाकर डोक्टरी चिकित्सा से अपनी गोद भरना चाहती है जहां माधो ही उसका संबल बनता है। स्त्री-पुरुष के बीच का यही स्नेहिल रिश्ता हमें जड़ाऊ मुखड़ा में बुला के माँ-पिता में भी दिखाई देता है। दोनों में एक दूसरे के लिए गहरा प्यार, समादर और सामंजस्य है।इसी पंक्ति में  डॉ. उमेश स्वयं प्लास्टिक सर्जन होते हुएभी कृत्रिम सौंदर्य से परे स्त्री के आत्मिक सौंदर्य को महत्व देते हैं और स्वयं ऑपरेशन को खारिज कर देते हैं।

रेणु के यहाँ स्त्री-पुरुष संबंधों में एक लयबद्ध संवादात्मकता है। स्त्री के दुख और वेदना तक पहुँचने की एक अद्भुत समझ और एक गहरी आत्मीयता उनमें हैं। यह लगाव, यह आत्मीयता रेणु को मूलतः अपनी धरती से है। धरती में उन्होंने स्त्रीत्व को देखा है, धरती से उन्होंने मातृत्व पाया है। इसलिए पुरुष होने के बावजूद वे स्त्री से आत्मिक संवाद साध लेते हैं। इस संवाद में संबंधों को स्वच्छ-सुंदर और लकदक देखने की आकांक्षा है।

‘जड़ाऊ मुखड़ा’ कहानी की सुंदरता पिता-पुत्री के आत्मीय लगाव में भी है। इस लगाव को काफी प्रगतिशीलता के साथ रेणु प्रकट करते हैं। बेटी के चेहरे पर उग आए मस्से को निकालने के लिए ‘प्लास्टिक सर्जरी’ जैसे आधुनिक प्रगत चिकित्साशास्त्र का आधार लेनेवाले पिता बेटी की माहवारी के दौरान उसके स्वास्थ्य और शारीरिक स्वच्छता का भी उतना ही ध्यान रखते हैं। माहवारी में ‘सैनिटरी पैड’ के महत्व को वे जानते हैं। 21 वीं सदी के दूसरे दशक में ‘सैनिटरी पैड’ का महत्व बताने के लिए ट्विंकल खन्ना ने ‘पैडमैन’ फिल्म बनाई जिसमें एक पुरुष को इस बात का महत्व समझाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। यही बात विगत सदी के छठे दशक में रेणु एक प्रगत पिता के माध्यम से अनायास कर देते हैं।

रिश्तों में यह सुंदरता रेणु की कहानियों का अपना सौंदर्य है। इस सुंदरता का भी अपना प्रवाह है, जो कहानी की सुरूपता को बढ़ा देता है। अपने मूल कथ्य की ओर प्रवाहित कहानी का शिल्प आप ही सुगढ़ बनता है। ‘जड़ाऊ मुखड़ा’ कहानी में “प्लास्टिक सर्जरी से संबंधित अनेक चिकित्साशास्त्रीय शब्द आए हैं, जैसे ‘वॉशरमैस रिएक्शन’,‘एस.आर.’,‘डब्लू.आर.’,‘सिफलिस के बीजाणु’,‘ग्राफिटी’। पर ये शब्द कथानक में इतनी सरलता से मिश्रित हो गए हैं कि कहीं भी कहानी की गत्यातमकता में बाधा निर्माण नहीं होती। ‘ग्राफिटी’ जैसे मेडिकल टर्म बड़ी सहजता से कहानी में व्याख्यायित हो चुके हैं। रेणु की विशेष कहन शैली को ही इस बात का श्रेय जाता है। कृत्रिमता तो रेणु को कहीं भी पसंद नहीं है- चाहे वह शिल्प में हो या कथ्य में। इसलिए तो ‘जड़ाऊ मुखड़ा’ में वे प्लास्टिक सर्जरी को माध्यम बनाकर मानव मन के आत्मिक सौंदर्य के विकास को रचते हैं, जो हर समय के लिए प्रासंगिक है।

आशा गहलोत

लेखिका शासकीय महाविद्यालय,खांडोला, मार्सेल गोवा में हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं।

सम्पर्क:  ashagahloth99@gmail.com +919420687160

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)

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