समीक्षा

नये विमर्श पैदा करती कहानियाँ – प्रश्न पानी से नहीं धुलते

 

सन 1803 में इंशा अल्लाह खान कृत कहानी रानी केतकी की कहानी को हिन्दी की पहली कहानी कहा जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे इस कला में परिवर्तन होने लगा और कहानियाँ एक नया आयाम स्थापित करने लगीं। अकहानी, सचेतन कहानी, नयी कहानी, साठोत्तरी कहानी आदि जैसे कई बदलाव इस विधा में हमें देखने को मिले। वर्तमान युग उत्तर आधुनिक कहानी का है। जिसमें कई विमर्श शामिल हैं। वर्तमान में कहानी कला में कई परिवर्तन भी देखने को मिले हैं। खास करके भाषा के मामले में। भाषा के मामले में पूरी छूट इसमें ली जाती रही है। सम्भवतः आगे भी ली जाती रहेगी। पुस्तक समीक्षाओं के क्रम में आज की पुस्तक है ‘दिलीप कुमार शर्मा अज्ञात’ का कहानी संग्रह “प्रश्न पानी से नहीं धुलते।”

पुस्तक का शीर्षक ही अपने आप में रोचकता लिए हुए है। इसके साथ ही इसी शीर्षक से लिखी गयी कहानी भी पाठक के मस्तिष्क पर अपना एक अलग ही प्रभाव छोड़कर जाती है। जिसकी छाप कई दिन तक आपके जेहन में छपी रहेगी। कहानी संग्रह की पहली कहानी ‘सच्चा अपराध’ है। इस कहानी का मूल यह है कि कहानी की नायिका मनोवृति की शादी हो गयी है। आकृति उससे छोटी है और वह आगे पढ़ना चाहती है। एक भाई भी है परिवर्तन नाम का। जिसकी दोस्ती सूर्यकांत से है। सूर्यकांत जाति से चमार है। फिर भी दोनों की अच्छी जमती है। सूर्यकांत के पिता सरकारी टीचर है। जबकि परिवर्तन के पिता दिहाड़ी-मजदूरी करने वाला आदमी है। घर में एक दादी भी है जो पुराने ख्यालात रखती है। कहानी में एक मात्र माँ है जो आकृति को पढ़ाना चाहती है। अब यह तो आपको कहानी पढ़ने पर ही पता चलेगा कि आकृति की नियति किस ओर कदम बढ़ाती है।

संग्रह की दूसरी कहानी है – ‘तीन मछली बारह टुकड़े’ शीर्षक से कहानी नॉनवेज पर आधारित लगती है और ऐसा है भी। तीन मछलियों के बारह टुकड़े करके कैसे उनको बांटा जाएगा हम यह सोचते हैं लेकिन कहानी कहीं और ही मुड़ती चली जाती है। यही एक कहानीकार की सार्थकता भी कही जाएगी कि वह पाठक की सोच के परे जाकर कहानी लिखे। कहानी में ओमप्रकाश है जो सब्जी, माँस-भात आदि अच्छा बनाता है। मतलब आप उसे एक अच्छा कुक या रसोईया कह सकते हैं। वह अच्छा खाना पकाता है इसलिए दोस्त लोग उसकी तारीफ में कसीदे गढ़ते हैं। और उसे दूसरा संजीव कपूर मानते हैं। ओमप्रकाश मोजा बनाने वाली फैक्ट्री में काम करता है। वह पढ़ा लिखा भी है। पहले वह दुर्गापुरा में रहता था। अब दिल्ली आ गया है।

आटा चक्की की दुकान भी करता है मगर सफ़ल नहीं हो पाता। एक दीपक है जो ओमप्रकाश का दोस्त है। वह चित्रकार भी है। बंगाल से दिल्ली आया है। गाता भी ठीक ही है। गीत ग़ज़ल भी लिखता है। कुलमिलाकर आप उसे क्रिकेट की भाषा में हरफ़नमौला कह सकते हैं। फैक्ट्री में काम करने की वजह से उसकी प्रतिभा जाया हो रही है। ऐसा उसे लगता है। वहाँ काम करने की वजह से वह महंगा पेपर, रंग आदि भी नहीं खरीद सकता। ना ही उसे यह मालूम है कि फ़िल्म सिटी कहाँ है दिल्ली में जहाँ जाकर वह अपने गीत और गजल बेच सके। दूसरी ओर आनन्द भी लिखता है। लेकिन वह एक कांड के चलते पुलिस का मुखबिर बन जाता है। जबकि वह खुद पहले एक बदमाश रह चुका है।

संग्रह की तीसरी कहानी संग्रह के शीर्षक की ही कहानी है। ‘प्रश्न पानी से नहीं धुलते’ इस कहानी को आप विकलांग विमर्श के आईने से भी देख सकते हैं कारण। कहानी की पात्रा अंजली थोड़ी सी अपाहिज है। रवि उसका पति जब इस बात को जानता है, जब उसे मालूम होता है तब वह हैरान रह जाता है और खुद को ठगा सा महसूस करने लगता है। वह अंजली की परीक्षा भी लेता है। कहानी में लेखक की कलम से लिखा गया वक्तव्य कहानी को उच्च स्तरीय बना देता है। वह वक्तव्य है – “किसी भी लड़की के लिए औरत होना ही सबसे बड़ा अपराध है। वह पुरुष के लिए परोसी गयी एक ऐसे समान की तरह होती है, जिसमें कहीं कोई खामी नहीं होनी चाहिये। औरत अगर रोटी है तो उसे गर्म-गर्म होनी चाहिये। अगर चाय है तो ठंडी नहीं होनी चाहिये। औरत अगर कच्चा माँस है तो उसमें सांस होनी चाहिये। ताजी कटी हुई माँस जिसे छूने से गर्मी महसूस हो। औरत अगर पकी हुई माँस है तो उसे बहुत स्वादिष्ट होना चाहिये। औरत अगर वासना का सुख है तो कच्ची कली होनी चाहिये।” यह वक्तव्य पुरुषवादी मानसिकता को नग्न यथार्थ के रूप में पेश करता है।

चौथी कहानी ‘एक पत्ता उस पर गिरता है’ प्रेम कहानी है। अमित मधु को प्रेम प्रस्ताव भेजना चाहता है। उस लड़के का प्रेम विशुद्ध प्रेम है। एक तरफ़ा है। और जो पत्ता उसके ऊपर गिरता है वह प्रेम का स्वरूप है। प्रत्येक इंसान में दो दृष्टि होती है एक मन की दूसरा स्मरण की। उस गिरते पत्ते के माध्यम से वह प्रेम दर्शाया गया है। प्रेम पर आधारित अपने आप में विशेष बन पड़ी है।

संग्रह की अगली कहानी पांचवी कहानी है – ‘अपना आसमान’ इस कहानी का मूल सार यह है कि राजकुमार शहर में नोकरी करता है। एक दुर्घटना में वह अपना पांव खो चुका है। अब वह अपनी पत्नी रेखा से कैसे मिले? अपनी माँ को कैसे मुंह दिखाए? इसी उलझन और पसोपेश में वह फंसा हुआ है। वह बैठा आसमान देखता रहता है और पत्नी से भी कहता है कि आसमान को देखो। उसे वह आसमान अब अपना-अपना सा लगने लगता है। मनोवैज्ञानिक रूप लिए हुए या कहें मनोवैज्ञानिकता लबादा ओढ़े यह कहानी अंत तक आपको बांधे रखने में कामयाब होती है।

संग्रह की छठी कहानी है – ‘अपनी छाया से’ इस कहानी में कौए पूँजीवाद का पूँजीवादी लोगों का प्रतीक बनकर उभरा है। कहानी में एक लड़का है गरीब सा जिसे हर समय यही भय लगा रहता है कि कहीं कौए उसके हाथ से रोटी न छीन कर ले जाएं।

अगली कहानी है- ‘मैं भी तो इंसान हूँ’ इसमें भी पूँजीवाद को स्पष्टत: देखा जा सकता है। कहानी के नायक कालू की पत्नी चायना पीहर जाने के लिए अपने पति से झगड़ती है कि टैक्सी में ही जाएगी। शादी के पांच साल बाद भी अपना रुतबा और रौब दिखाना चाहती है। इस वजह से वह अपने गाँव में टैक्सी बीबी के नाम से भी जानी जाती है। कालू को भी टैक्सी से ससुराल जाना अच्छा लगता है। वह सोचता है इससे उसकी इज्ज़त बढ़ेगी। वह ईमान की कमाई खाना पसन्द करता है इसलिए उसने गाड़ी के पीछे सत्यम् शिवम सुंदरम् भी लिखवा रखा है। वह व्यवहार कुशल भी है। इस संदर्भ में लेखक कहानी में लिखते हैं। “दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है। जिस दिन भी कोई आदमी मेरे जैसा एक अच्छा काम कर देगा उसकी इंसानियत कई दिनों तक धरती पर जीवित रहेगी। इस दुनिया से इंसानियत कभी नहीं मिटेगी।”

एक अन्य कहानी ‘फेयरवेल’ के नाम से है जिसमें इस्पात सयंत्र के सिविल मेंटेनेंस विभाग में काम करने वाले दसई महतो का फेयरवेल दिखाया गया है। यह कहानी कहानी कला के नाम पर हालाँकि कोई महान कहानी नहीं बन पाई है। किन्तु संवेदना के स्तर पर कहानी ठीक कही जा सकती है।

संग्रह की अन्तिम कहानी है – ‘कैमरे से लिखी एक कहानी’ यह कहानी एक फोटोग्राफ की कहानी है। कहानी तो क्या दरअसल वह अपनी फोटोग्राफी के माध्यम से बातें बता रहा है शादी की और दूसरे कई कार्यक्रमों की। जहाँ हमें फोटोग्राफर की जरूरत पड़ती है। कहानी में लेखक पात्र के माध्यम से गूढ़ और गहन जीवन की बातें कहलवाते हैं “आज के आधुनिक कैमरा में डिलीट ऑप्शन का होना बहुत महत्वपूर्ण है। डिलीट शब्द का प्रयोग सिर्फ फोटो चित्र के साथ ही है। ऐसा नहीं है। जीवन में भी है। मगर हम उसका उपयोग नहीं कर पाते हैं।” एक अन्य स्थान पर पात्र दीपक कहता है – “जब कैमरा हाथ में होता है तो मैं कैमरे से कहानी लिखता हूँ और जब कैमरा मेरे हाथ में नहीं होता है तो मेरा मन ही कैमरा बन जाता है। जिससे मैं किसी कहानी के लिए फोटो भी खींच लेता हूँ। नहीं तो बिना खींचे उसे रख भी सकता हूँ। किसी भी फोटोग्राफर के लिए सबसे पहले उसका मन ही कैमरा होता है।”

कहानी संग्रह में शामिल कुल नो कहानियाँ अपने-अपने स्तर पर तथा भिन्न-भिन्न शैली से लिखी गयी कहानियाँ हैं। जिन्हें पढ़कर लगता है कि लेखक कहानी लिखने की कला को बखूबी जानते ही नहीं बल्कि समझते भी हैं। इसीलिए कहानियों को एक नया रूप, आयाम, शैली और कथ्य अपनी कहानियों में प्रस्तुत किया है। मैं ऐसा तो नहीं कह सकता ना ही ऐसा मानता हूँ कि ये कहानियाँ कहानी जगत में कोई बड़ा परिवर्तन लेकर आएगी। लेकिन अगर इसी तरह से कहानियाँ लिखी जाएं आगे भी तो कहानी कला में एक अलग बदलाव से जरूर सामने आ सकता है। कहानी संग्रह के लेखक दिलीप कुमार शर्मा अज्ञात की कहानियाँ देश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होती रही हैं। लेखक की कहानियों को लिखने की जो काशिव है वह अवश्य एक स्तर उन्हें प्रदान करती है।

लेखक – दिलीप कुमार शर्मा अज्ञात
किताब – प्रश्न पानी से नहीं धुलते
किताब प्रकार- कहानी संग्रह
प्रकाशन – अधिकरण प्रकाशन 2019
मूल्य – 150 रुपए

 

लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क +919166373652 tejaspoonia@gmail.com

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