मुकुटधर पाण्डेय

कविता निबन्ध लेखमाला भाग – 2

    कविता का उद्देश्य है लोकोत्तर आनन्द प्रदान करना। इस आनन्द का स्थान आहार-विहार जनित पाशविक आनन्दों से बहुत ऊँचा है ; इसी से वह लोकोत्तर कहा जाता है। कविता के पाठ से पाठक को लाभ हो या न हो, पर उसकी उक्तियों के चमत्कार से उसे चमत्कृत जरूर हो जाना चाहिए। विचार कर देखा जाय, तो ज्ञात होगा कि कविता अपने इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायता प्रदान करने के लिए ही भाषा और भाव-प्रकाशन में गद्य की अपेक्षा कई विशेषताएँ रखती हैं। यदि वह पाठकों को लाभ ही पहुँचाना चाहती, तो क्यों न साधारण लेख की तरह लाभ की बातें कह सुनाती। काव्य कला का सौन्दर्य-प्रदर्शन ही कविता का मुख्य व्यापार है, उपदेश का विषय गौण है।

  पर इस सम्बन्ध में एक बात स्मरण रखने योग्य है कि समय भेद से कभी-कभी कवियों को कविता के मुख्य उद्देश्य की उपेक्षा करके उसके गौण व्यापार को ही प्रधानता प्रदान करनी पड़ती है। जिस देश के कवि इस बात का ध्यान नहीं रखते उस देश को महान विपत्ति में फँसना पड़ता है। किसी जाति अथवा समाज का उत्कर्ष या अपकर्ष कई अंशों में उसके कवियों की लेखनी पर ही अवलम्बित रहता है अपने इस दायित्व को समझकर जो कवि लेखनी का परिचालन करता है उसकी रचना विशेष मूल्यवान होती है। देव और बिहारी की अपेक्षा गुसाईं जी ने इस तत्त्व को अधिक समझा था। समाज की अवस्था देखकर साहित्य बनाना पड़ता है। जिस समय कोई जाति अथवा समाज मोहान्ध होकर अवनति के गढ्ढे में गिरने जा रहा हो, उस समय उस जाति अथवा समाज का कवि कविता में निरे मनोरंजन ही को प्रधानता देकर चैन की वंशी भला कैसे बजा सकता है? ऐसे अवसरों पर वह उपदेश दान के आगे मनोरंजन की अवहेलना करता है। इस आचरण से वह कविता का आदर्श-भंग नहीं बल्कि अपने समाज अथवा देश को उस आदर्श के सुख को उपभोग करने योग्य बनाने का यत्न करता है।

   कवि ईश्वरीय दूत है। उसका कार्य एक क्षुद्र सीमा से घिरा नहीं रह सकता। घर का सुधार करके वह अज्ञानता-पूर्ण संसार की ओर फिरता है। हमारे विचार में तो कविता का मुख्य गुण हितैषिता ही है। जिसके पाठ से मानव-जाति का कल्याण हो, जिससे संसार का हित साधन हो, वही कविता संसार की स्थायी सम्पत्ति कही जा सकती है। पर इन हित के बचनों को साधारण रीति से कहने से कविता का उद्देश्य पूर्ण नहीं होता। उनके प्रकाशन में कुछ ऐसी विशेषता रहनी चाहिए कि उन्हें सुनकर सोता हुआ आदमी भी चौंक पड़े। कविता में जो बातें कही जायँ वे पवित्रता पूर्ण हों। कवि को अपने अन्तिम प्रयाण के समय इस बात का पूर्ण सन्तोष होना चाहिए कि मैंने कलुषित-विचार व्यक्त कर संसार का जरा भी अहित नहीं किया। कविता में जिस बात की शिक्षा दी गयी हो वह बिलकुल सत्य और शाश्वत हो। उसमें सौन्दर्य कूट-कूट कर भरा हो, चाहे वह सौन्दर्य भाव-सौन्दर्य हो, या नीति-सौन्दर्य या प्रकृति-सौन्दर्य ही क्यों न हो।

संसार में जहाँ तक सौन्दर्य है वह बिलकुल सत्य है। अतएव कविता में सौन्दर्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यहाँ सौन्दर्य से हमारा मतलब उस सौन्दर्य से है जो अविनश्वर है जो नेत्रानन्ददायक ही नहीं, किन्तु हृदयानन्द विधायक भी है। आजकल हमारे अधिकांश कवि ‘ नख-सिख-वर्णन ‘ को ही सौन्दर्य-वर्णन की पराकाष्ठा समझते हैं। पर, यह उनका भ्रम है। उनका यह विचार प्रकृत भारतीय-विचार तो नहीं कहा जा सकता। अशाश्वत वस्तुओं के प्रति घृणा प्रदर्शन ही भारतीय-विचार की विशेषता है। भारत का मुख्य लक्ष्य नश्वर शरीर-सौन्दर्य नहीं, प्रत्युत अविनश्वर आत्मा का सौन्दर्य है। शरीर सौन्दर्य अर्थात् रूप की उपेक्षा कवि लोग इसीलिए नहीं कर सकते कि उसमें एक अविनश्वर ईश्वरीय-सत्ता होती है, जो उनके चित्त को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। वे रूप का उपभोग करते हुए अपने हृदय में उसी ईश्वरीय-सत्ता का अनुभव करते हैं जिससे उनके चर्म-चक्षुओं ही की नहीं किन्तु आत्मा भी तृप्ति होती है। स्मरण रखना चाहिए कि कवि वह सौन्दर्योपासक है जिसकी उपासना में वासना की गन्ध नहीं होती।

  उक्त ईश्वरीय-सत्ता ही ‘रूप’ के आदर का कारण यथार्थ में दया, ममता, प्रेम, सहानुभूति, अहिंसा आदि के सम्पूर्ण सद्गुणों का विकास ही मानव जीवन का प्रकृत-सौन्दर्य है। अतएव कविता में इन्हीं स्वर्गीय-भावों का वर्णन होना चाहिए। जिस कविता को पढ़कर हृदय की संकीर्णता दूर नहीं होती, जिसके स्वभाव से मनुष्य व्यक्तित्व को भूलकर विश्व प्रेम के रस में डूब नहीं जाता, जिसके आकर्षण से पढ़ने वाले का मन उच्चता और महानता की ओर बरबस खिंच नहीं जाता, उसे कविता के मुख्य गुण से हीन समझना चाहिए। कविता के पढ़ते ही मनुष्य के हदय में कर्तव्य-परायणता और आत्म-सम्मान आदि का भाव जागृत हो जाना चाहिए। इन्हीं बातों पर मानव-जीवन का सौन्दर्य अवलम्बित है। हम कह आये हैं कि कविता ललित कला का एक अंग है अतएव शिल्प, संगीत चित्रकारी आदि के समान कविता का भी मुख्य आधार सौन्दर्य ही है।

सौन्दर्य-वर्णन के सिवा कविता में कुछ ऐसी विशेषता चाहिए कि उसके पाठ से सर्वत्र ईश्वरीय भाव अथवा एक अदृश्य शक्ति या किसी अखण्ड नियम की व्यापकता और प्रधानता परिलक्षित हो। कविता में सरलता अथवा एक प्रकार के भोलेपन की भी अत्यन्त आवश्यकता होती है। प्राचीन काल की कविता में यह गुण स्वभावतः विशेष पाया जाता था। तब न तो संसार में छल-कपट की अधिकता थी और न ईर्ष्या, द्वेष और पाखंड का प्राबल्य था। सर्वत्र सरलता का साम्राज्य था। तब सृष्टि स्वयं कवितामयी थी। पर अब वह हाल नहीं रहा। सभ्यता ने आज घोर परिवर्तन उपस्थित कर दिया है। संसार आज अपने चातुर्य और बुद्धिबल का परिचय देता हुआ सरलता का गला घोंट रहा है। इस अवस्था में यदि कविता अपनी बहन सरलता को आश्रय न देगी तो संसार में उसका अस्तित्व ही उठ जायेगा। दूसरी आवश्यक वस्तु है संक्षिप्तता।

कविता की विशेषता है थोड़े में अधिक भाव व्यक्त करना अतएव कवि को अपना मतलब बजनदार शब्दों में ही प्रकट करना चाहिए। कुछ लोग किसी विशेष बात को बतलाने के लिए पद्य के पीछे पद्य लिखते चले जाते हैं, ये उनकी रमणीयता और सार्थकता पर ध्यान नहीं देते। ऐसे लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि विशेषता-हीन एक पृष्ठ लिखने की अपेक्षा विशेषता-युक्त एक पंक्ति लिखना अच्छा है। कविता का आदर अथवा अनादर उसके विस्तार पर नहीं, बल्कि उसके अर्थ के चमत्कार पर अवलम्बित है। पर संक्षिप्तता ऐसी न हो जिससे कि कविता के अर्थ की स्पष्टता में बाधा पहुँचे। जहाँ तक हो सके, अर्थ को स्पष्ट ही रखना चाहिए, जिससे उसे समझने के लिए बुद्धि पर अधिक दबाव डालना न पड़े। कविता के भाव ऐसे गड्डम गोल न हों कि पढ़ने वाले को कवि का मुख्य उद्देश्य क्या है, इस बात के संशय में पड़ना पड़े।

कविता में जो कुछ कहना हो उसे पेंचीदे तौर से न कहकर बिलकुल सीधी तौर से कहना चाहिए, जिससे पाठक के चित्त पर पढ़ते ही उसका भाव बैठ जाय। कविता में मौलिकता और नवीनता का भी ध्यान रखना चाहिए। पूर्ववर्ती कवियों के भाव चुराकर उन्हें नया रूप देने में बहुत से कवि बड़े कुशल होते हैं। यद्यपि इस बात से भी उनकी चतुरता व्यक्त होती है, तथापि दूसरों से ग्रहण किये हुए भाव मूलभावों की समानता कभी नहीं कर सकते। कविता को उत्तम बनाने के लिए जहाँ तक बने उसमें मूल-भाव ही लाने का यत्न करना चाहिए। अन्य सब गुणों से युक्त होकर भी मौलिकता-हीन कविता पूर्ण आदर प्राप्त नहीं कर सकती। उसी तरह कवि को प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए अपनी रचना में कुछ न कुछ नवीनता भी जरूर रखनी चाहिए। भाव में ही नहीं, विषय और शैली में भी नवीनता चाहिए। हर समय अनुकरण अच्छा नहीं लगता। मनुष्य का जी नयी-नयी चीजें देखने को बहुत होता है। पुरानी वस्तुओं से नित्य के प्रयोग के कारण प्रायः अरुचि हो जाया करती है। यदि कवि अपनी कविता में कुछ न कुछ नवीनता रखेगा, तो लोग उसे बहुत चाव से पढ़ेंगे।

       कविता का एक और प्रधान गुण है स्वाभाविकता। कवि जिस अवस्था का वर्णन करे उसके विचार उस अवस्था के बिलकुल अनुकूल हों। यदि कोई मूर्ख, और बेसमझ आदमी वेदान्त के गूढ़ तत्त्वों का निरूपण कर बैठे, तो लोगों को वह जरूर खटकेगा। यदि हम किसी की दैन्य अवस्था का वर्णन करते हुए हास्य या व्यंग्य पर आ उतरें, तो वह सुनने वालों को इतना बुरा मालूम नहीं होगा। मतलब यह कि कविता में किस समय क्या कथन किया जाय और किसके मुख से क्या बात कहलाई जाय इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।

  कविता के अनेक भेद हैं, उन पर एक स्वतन्त्र लेख लिखा जा सकता है। हम यहाँ इतना ही कहना चाहते हैं कि उपदेश गर्भक कविता में यदि कवि निरे उपदेशक की नाई नैतिक वक्तृता न देकर अपना उद्देश्य प्राकृतिक घटना अथवा प्राकृतिक वस्तु की स्वाभाविकता की नींव पर खड़ा करे तो उसका प्रभाव पाठकों पर अधिक पड़ सकता है। प्राकृतिक वस्तुओं, प्राकृतिक नियमों से बढ़कर सत्य और प्रामाणिक दुनिया में और क्या हो सकता है। वे ईश्वरीय नियम हैं-सर्वव्यापी हैं। कवि नश्वर है। अतएव वे सब लोगों को सब काल के लिए मान्य हो सकते हैं। पर, ऐसी कविताओं के उद्देश्य को उनके अंत में सारांश रूप में व्यक्त नहीं कर देना चाहिए। प्राकृतिक घटना का ज्यों-का-त्यों वर्णन कर इच्छित उपदेश को ढूंढ़ निकालने का भार पाठक पर ही छोड़ देना चाहिए। पाठक जब कवि के इच्छित उपदेश को घटना वर्णन के पाठ से स्वयं ढूँढ़ निकालेगा, तो वह उपदेश उसके चित्त में स्थायी अधिकार कर लेगा। इससे उसकी बुद्धि को भी फैलने का अवसर मिलेगा।

 खेद की बात है कि हमारे अधिकांश पाठक पुरानी लकीर ही के फ़कीर है। वे ऐसी कविता को जिसके भाव समझने के लिए उन्हें जरा भी मेहनत पड़ती हो पढ़ना पसन्द नहीं करते। इसका कारण शिक्षा का अभाव है। बहुत से पाठक यह कहते हैं कि हम उच्च भावों को ग्रहण करने के योग्य नहीं। पर हम में इस बात की योग्यता आप ही आप आ जाएगी। हमें प्रयत्न करके अपनी रुचि का संस्कार करना होगा। अंग्रेजी-साहित्य की बात ही छोड़िये, बँगला साहित्य को ही लीजिए। उसमें आपको अधिकतर उच्च-भाव पूर्ण कविता ही देखने में आएगी। यह बात नहीं कि हिन्दी में वैसी कविता नहीं लिखी जा सकती या आजकल हिन्दी में उस ढंग की कविता लिखने वाले कवि नहीं। ऐसी कविता के अभाव का कारण पाठकों की रुचि की प्रतिकूलता ही है। पर अब हिन्दी में भी भाव-मूलक कविताएँ निकलने लगी हैं। यदि पाठकों ने पसन्द किया तो थोड़े दिनों में यह अभाव बहुत कुछ दूर हो जावेगा।

    अब हम कविता के स्वाभाविक क्रम-विकास का संक्षिप्त वर्णन करते हैं। कविता का क्रम-विकास कवि के अवस्था-क्रम पर अवलम्बित है। कवि जब सर्वप्रथम कविता करने बैठता है, जब सांसारिक और प्राकृतिक वस्तुओं का वर्णन करता है। उनके वर्णन में पहिले तो कोई विशेषता नहीं होती, पर धीरे-धीरे वह इसमें इतनी उन्नति करता है कि प्राकृतिक वस्तुओं का आश्रय लेकर कविता में उच्च से उच्च उपदेश निहित कर सकता है। यह कविता की प्राथमिक स्थिति है।

  दूसरी स्थिति वह है जब कवि सांसारिक वस्तुओं का वर्णन न कर सांसारिक भावों का वर्णन करता है, यह गुण अवस्था और अनुभव वृद्धि से प्राप्त होता है। उन्हें यदि सुख दुःख, योग-वियोग, मधुरता और कटुता-पूर्ण संसारी जीवन की आलोचना कहें तो असंगत न होगा। सर्व साधारण में ऐसी कविता का इतना प्रचार होता है। उसके पाठ से उन्हें हर्ष होता और विपत्ति में धैर्य मिलता है।

  कविता जब अपनी तीसरी स्थिति पर पहुँचती है, तब उसमें धार्मिक भाव और वेदान्त के तत्त्वों की अधिकता पायी जाती है। कविता की यही अन्तिम स्थिति है। मानव जीवन का प्रवाह जब धार्मिक भावों के समुद्र में जाकर लीन हो जाता है, तब वह अपने अन्तिम लक्ष्य पर पहुँच जाता है। मानव जीवन का जो उद्देश्य है, वही कविता का उद्देश्य है। इस स्थिति के कवियों को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि उनकी कविता नीरस न हो, दूसरी स्थिति की कविता का विषय स्वभाव से ही सरस होता है। पर वेदान्त एक कठिन विषय है। उसका रस बहुत भीतर घुसे बिना नहीं मिलता है।

 यदि कविता में कोरा वेदान्त ही छाँटा जायगा, यदि विषय की रुक्षता बनी रहेगी, तो उसके पाठ से लोगों को क्या लाभ होगा। वे वेदान्त के ग्रन्थों का ही अध्ययन क्यों न कर लेंगे। इस विषय की कविता ऐसी हृदयग्राहिणी और शान्ति-दायिनी होनी चाहिए कि उसका एक पद्य पढ़कर आदमी संसारी चिन्ताओं को एकदम भूल जाय।

कविता में सफलता प्राप्त करने के लिए विषय-निर्वाचन पर अधिक ध्यान देना चाहिए। कवि का काम है सोती जनता को जगाना, अन्धकार पूर्ण विषयों पर प्रकाश डालना, मोहान्ध लोगों को उचित मार्ग पर लाना, उन्हें उनकी आवश्यकताएँ सुझा देना, इत्यादि। इन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर कविता का विषय चुनना चाहिए। जिस देश में विषय-वासना की अग्नि लोगों को जला रही हो, वहाँ के कवियों का कर्त्तव्य है उसे उपदेश-पद-कविता-रूपी-वारि सिंचन से बुझाना, न कि ‘ नायिका भेद ‘ और ‘ नख-शिख ‘ वर्णन रूपी घृत डालकर उसे और प्रज्वलित करना।

            समाज सुधार और देश-हित ये कार्यों में जो काम बड़े-बड़े वक्ताओं को लम्बी-लम्बी वक्तृता और नेताओं के हलचल से नहीं निकलता, वही काम कभी-कभी एक छोटी-सी कविता से आसानी से निकल सकता है। अतएव कविता के विषय चुनने में समय की आवश्यकता का विचार जरूर रखना चाहिए। इस विषय का उल्लेख हम इस लेख के प्रारम्भ में ही कर आये हैं। कविता करते हुए एक और बात जो ध्यान में रखने लायक है वह उसका सुर है। कविता को अधिक जोरदार बनाने के लिए अर्थ की मधुरता के साथ सुर की मधुरता भी आवश्यक होती है। सुरस्वर कविता के पाठ का हृदय पर बड़ा असर होता है। सुर की मधुरता के कारण सुशब्द विन्यास और छन्द है।

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बसंत राघव साव

प्रस्तुतकर्ता : बसंत राघव साव, प्रकाशक, श्री शारदा साहित्य सदन, रायगढ़, छत्तीसगढ़ 496001 सम्पर्क: +918319939396, basantsao52@gmail.com
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