maila aanchal
फणीश्वर नाथ रेणु

मैला आँचल: पुनर्पाठ

  • गजेन्द्र पाठक

 

पिछले डेढ़ महीने से महामारी के अदृश्य विषाणुओं के भय से घर में बन्द होने की मानसिक यातना के बीच कुछ सवाल परेशान कर रहे हैं। रेणु आज जीवित होते तो इस वैश्विक यातना पर उनकी डायरी का इन्तजार रहता। यह कैसा विचित्र संयोग है कि रेणु का जन्म स्पेनिश फ्लू महामारी की छाया में हुआ और उनकी जन्मशती कोरोना की भेंट चढ़ने जा रही है।

कोरोना के दौर में पूरी दुनिया को मलेरिया की याद कैसे आयी,इससे आप परिचित हैं। जो दवा एक जमाने में मलेरिया के लिए संजीवनी बूटी साबित हुई थी उसको पाने के लिए दुनिया के कई देशों के बीच होड़ देखी गयी। हमारे देश ने हमेशा की तरह अपना उदार हृदय दिखाते हुए सबको यथासम्भव उपलब्ध कराने का सराहनीय प्रयास किया है,अब यह अलग बात है कि लाइलाज समझे जाने वाले इस वायरस पर यह दवा कितना असर दिखाती है। कोरोना महामारी ने दुनिया के विकसित समझे जाने वाले देशों की भी पोल खोल दी है। काश! हमारी दुनिया ने परमाणु बम बनाने की जगह अपनी बुनियादी चिकित्सा-व्यवस्था को दुरुस्त किया होता तो इतनी बुरी स्थिति नहीं होती। महामारियाँ हमारी प्राथमिकताओं और तैयारियों की परीक्षा लेती हैं और ऐसी परीक्षाओं की तिथि निर्धारित नहीं होती। इसलिये इसका परिणाम पता होता है। प्रायः हम अपनी गलतियों को यथाशीघ्र भूल जाना चाहते हैं और इसी भूल की वजह से हम कुछ सीखने की सम्भावनाओं को जड़ से ही खत्म कर देते हैं।  स्पैनिश फ्लू प्रथम विश्व युद्ध से लौट रहे सैनिकों की वजह से समुद्र के रास्ते मुम्बई आया। रेलगाड़ियों की वजह से पूरे देश में फैला। ब्रिटिश सरकार प्रथम विश्व युद्ध में लहना सिंह जैसे हजारों भारतीय सैनिकों को झोंकने के बावजूद भारतवासियों की वफादारी के प्रति आश्वस्त नहीं थी। इसलिये यह महज इत्तेफाक नहीं है कि वैश्विक महामारी से बचाने के लिए जो बन्दोबस्त किए वे ऊँट के मुँह में जीरा साबित हुए। एक करोड़ अस्सी लाख लोगों की दारूण मृत्यु से भी सन्तोष नहीं हुआ तो जालियाँवाला बाग जैसी नृशंस हत्याओं को अंजाम दिया गया। यह ध्यान रहे कि रेणु का जन्म जिस साल हुआ उसी साल भयानक अकाल भी पड़ा था। पेट में अन्न की कमी से कुपोषित भारत पर प्लेग,हैजा,फ्लू और मलेरिया जैसी महामारियों ने जो कहर बरसाया उसे याद कर उस पर कुछ रचनात्मक लेखन कर पाना सबके वश की बात नहीं थी। बाढ़ में घिरे हुए लोग बाढ़ पर कविता नहीं लिख सकते। आप सोचें कि इसी समय चम्पारण और अवध के किसान आन्दोलन भी हुए, हिन्दी  में छायावाद की भी शुरुआत हुई और गाँधी की प्रेरणा से  प्रेमचन्द फुलवक्ती लेखक बनकर अपनी रचनाओं में गाँव को केन्द्र बना कर साम्राज्यवादी महाजनी सभ्यता को बेनकाब करने के अभियान में शामिल हुए थे। उनके लिए यह बात चकित करने वाली थी कि साम्राज्यवाद,सामन्तवाद और वर्णाश्रमवाद तीनों के गठबन्धन से भारतीय किसान और मजदूर इतने बेहाल हैं कि उनके तलवे सहलाने से ज्यादा कुछ सोच भी नहीं सकते। छायावाद,प्रेमचन्द और प्रगतिवाद पर गाँधी की स्पष्ट छाया थी। पन्त,निराला से लेकर नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल और मुक्तिबोध की कविताओं को पढ़ें तो पता चलेगा की हिन्दी  साहित्य अपनी तमाम असहमतियों के बावजूद गाँधी के प्रति श्रद्धा भाव रखता था। चम्पारण के किसान आन्दोलन में ही गाँधी ने यह देखा कि गरीब घरों में स्त्रियों के पास लाज बचाने भर तन ढकने को कपड़े नहीं हैं। गाँधी ने आधा कपड़ा पहनने का संकल्प वहीं से लिया था। वे लम्बी चौड़ी बात में यकीन नहीं करते थे। शब्द और कर्म की एकता में विश्वास रखते थे। उन्होंने अँग्रेजी  में चलने वाली शहरी काँग्रेस पार्टी को धरती पर उतारा। उन्हें इस बात का गहरा अफसोस था कि अपने देश में स्वाधीनता की बात भी अँग्रेजी  में होती है। स्वाधीनता आन्दोलन को जन आन्दोलन बनाने का काम गाँधी की इतनी बड़ी उपलब्धि थी कि हमारी हिन्दी  ने उन्हें अपने हृदय से लगाया। हिन्दी  और हिन्दी  साहित्य के प्रति गाँधी का सम्मान भाव भी एक बहुत बड़ा पक्ष था। हिन्दी  के भक्त कवियों कबीर,मीरा और तुलसी के आधार पर अपने राजनीतिक और सामाजिक अभियान के जरिये भी उन्होंने हिन्दी  को आकर्षित किया। यही नहीं 1918 में ही उन्होंने हिन्दी  के लिए दो और बड़े काम किये। एक तो यह घोषणा की कि गाँधी अँग्रेजी  भूल गया है और दूसरा यह कि मद्रास में उन्होंने दक्षिण भारत हिन्दी  प्रचार सभा की स्थापना की। दक्षिण में उन्होंने हिन्दी  के साथ-साथ स्वाधीनता आन्दोलन के लिए कार्यकर्ता तैयार किये। यह बात कितनी बड़ी थी इसे जानना हो तो निराला की कविता ‘बाबू तुम मुर्गी खाते यदि’ देख सकते हैं।  रेणु ने अपनी पैदाइश  के साथ अवचेतन से लेकर अपनी प्रखर राजनीतिक सामाजिक चेतना के विकास क्रम में गाँधी को पढ़ने समझने का अभियान निरन्तर जारी  रखा। बिहार से गाँधीजी के बेहद करीबी सम्बन्ध थे।  गाँधी के निर्माण में बिहार के किसान आन्दोलन की भूमिका थी तो साथ ही बिहार के राजनीतिक चरित्र को बदलने में भी गाँधी की गहरी भूमिका थी। यह वह बिहार था जिसमें किसान आन्दोलन ने देश की राजनीतिक दिशा को रास्ता दिखाया। सहजानन्द सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन, रामवृक्ष बेनीपुरी और नागार्जुन जैसे लोगों की इस आन्दोलन में उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि कलम सिर्फ कमरे में बैठ कर अपना काम नहीं करती। जमींदारी प्रथा के विरोध में पहली आवाज भी बिहार से ही उठी। बेनीपुरी जी ने जब यह प्रस्ताव किया था कि जमींदारी प्रथा के विरोध में कॉंग्रेस  को प्रस्ताव लाना चाहिये तब नेहरू जी ने उसे बेवक्त की बाँसुरी बताया था। यह बात 1929-30 की है।गोदान से छः साल पहले और मैथिलीशरण गुप्त के किसान से 12 साल बाद, लेकिन 1942 से 1948 तक के भारत को अपनी कथाभूमि के रूप में भारत के इतिहास की पटकथा लिखने वाले रेणु के मैला आँचल में उस बाँसुरी के न बजने की  टीस साफ सुनाई पड़ती है। ‘मैलाआँचल’ भारत के इतिहास में गाँधी के साथ अब तक देखे गये सबसे बड़े सपने और उनकी हत्या के बाद उस सपने के त्रासद अन्त की महागाथा है। मुझे पूरा विश्वास है कि इतिहास के इस सर्वाधिक जटिल और गतिशील दौर पर लिखे हुए तमाम ग्रन्थों पर यह उपन्यास भारी पड़ेगा। यह उपन्यास भारत वृत्त की परिधि पर बैठ कर केन्द्रीयता की तथाकथित अवधारणा पर सवाल भी उठाता है और देश के एक कोने में बैठकर बावनदास की हत्या के रूपक के जरिये गाँधी की विचारधारा के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए अश्रुपूरित नेत्रों से श्रद्धांजलि भी व्यक्त करता है।

 

आकस्मिक नहीं कि गाँधी, प्रेमचन्द और निराला तीनों ही स्पैनिश फ्लू के भुक्तभोगी थे। ऐसा माना जाता है कि गाँधी और प्रेमचन्द दोनों इस महामारी में संक्रमित हुए थे। गाँधी जी की एक पुत्रवधू  और पोते का तो इसी महामारी में निधन भी हुआ था।  मैं कह नहीं सकता कि गाँधी और प्रेमचन्द की इस महामारी पर क्या राय थी। हिन्दी  साहित्य के इतिहास में इस फ्लू का वर्णन मेरी जानकारी में उस समय की दो महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं ‘सरस्वती’ और ‘स्त्री दर्पण’ में मिलता है। ‘स्त्री दर्पण’ की सम्पादक रामेश्वरी नेहरू ने लिखा कि, “मेड्रिड नगर में जर्मन लोगों ने एक बहुत बड़ा परीक्षा मन्दिर बना`या था। वहाँ विज्ञान जानने वाले पण्डित लोग वैज्ञानिक चर्चा और परीक्षाएँ किया करते थे। इन लोगों को न्यूमोनिया और एन्फ्लूएँजा यानी श्लेष्मा ज्वर के बीज रखने वाले जीवाणुओं यानी कीड़ों का आविष्कार करने की आज्ञा मिली थी। ये जीवाणु अब अविष्कृत हो गये तो उनको अमेरिका के जहाजी बन्दरों में छोड़ देने का प्रबन्ध होने लगा।यदि यह कार्य किया जा सकता तो अमरीकन जहाजों के मल्लाह और कर्मचारी लोग इस बीमारी से धड़ाधड़ बीमार हो हो कर मरने लगते और जहाज ले लेकर यूरोप में न आ पाते,न आज अमेरिकन सेना के रणभूमि में आ धमकने के कारण जर्मनों की ऐसी बुरी तरह अनायास हार हो सकती। पर हुआ कुछ और ही। विज्ञानबाज पण्डितों में आपस में ही कुछ तकरार हो गयी और तकरार का फल यह हुआ कि ज्वर के जीवाणु मेड्रिड नगर में ही फूट निकले।तब स्पेन राज्य भर में यह भयंकर ज्वर फैल गया और वहीं से समरभूमि में जा पहुँचा। वहाँ जो सिपाही बीमार होने लगे,वे उसे अपने संग भारतवर्ष में ले आये। अब उन्हीं जर्मन पण्डितों की पण्डिताई भारतवर्ष के घर घर में रोना पीटना मचा रही है। कैसी अँधेर हो गयी। किसी ज्ञानी का कहना है कि असुरों का सा बलवान होना अच्छी बात है,परन्तु उस बल से काम लेना उचित नहीं। यह कथन बहुत ठीक है। वह विद्या कैसी जो नाश करने वाली हो? विद्वान ही हुए तो संसार का भला करो। परन्तु आज कल तो विद्वान भी बहुधा अपना भला करने की युगत सोचते सोचते संसार को नाश करने का कारण बन जाते हैं।”(स्त्री दर्पण,जनवरी 1919) निराला जी ने कुलीभाट में इस महामारी में अपनी पत्नी,बेटी और भतीजे की मृत्यु का कारुणिक परिचय दिया था। गंगा के पानी में दूर दूर तक तैरती हुई लाशों के वर्णन के साथ बताया था कि, “दाह संस्कार के लिए लकड़ियाँ कम पड़ गयी थीं। पलक झपकते ही मेरा परिवार मेरी आँखों के सामने से गायब हो गया था। मुझे अपने चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा दिखाई देता था। अखबारों से पता चला था कि ये सब एक बड़ी महामारी के शिकार हुए थे।” मैला आँचल की चर्चा के क्रम में इस बात का उल्लेख इस लिए आवश्यक है कि हिन्दी  में यथार्थ के कठोर पक्षों पर लिखने की परम्परा कम रही है। अकाल और महामारी पर भारतेन्दु से पहले सिर्फ तुलसीदास ने लिखा है। भारतेन्दु भारत की दुर्दशा के चित्र खींचने के क्रम में महामारियों की,बीमारियों की चर्चा करते हैं। सब्यसाची भट्टाचार्य ने भारत के आर्थिक इतिहास की चर्चा करते हुए लिखा था कि किस तरह अँग्रेजी  राज में भारत की औसत आयु कम होती गयी।  आप भक्तिकाल के कवियों और भारतीय नवजागरण के लेखकों की उम्र की तुलना कर के देख लें तो बात स्पष्ट हो जाएगी।  तुलसी, भारतेन्दु मण्डल के लेखक, महावीर प्रसाद द्विवेदी,रामेश्वरी नेहरू और निराला के साथ साथ ‘सीमंतनी उपदेश’ को भी शामिल कर के देखें तो यह बात भी साफ होगी कि हिन्दी  नवजागरण देश के स्वास्थ्य संकट के लिये कितना चिन्तित था। होरी साठे पर पाठा नहीं हो पाता।  गाय की ख्वाहिश परिवार और बच्चों के स्वास्थ्य के लिये ही थी।

रेणु  हिन्दी  के उन थोड़े से लेखकों में हैं जो इस बात को समझते थे कि भारत का स्वास्थ्य संकट कितना गम्भीर संकट है। अकाल,बाढ़, बीमारी और महामारी को अपनी रचना का विषय बनाते हुए दरअसल इसके शिकार भारत गरीब लोगों की यन्त्रणा का रेखांकन करते हैं। लोक में ऐसी मान्यता है कि आदमी का जन्म जिस मौसम में होता है उस मौसम का असर उस पर जीवन भर रहता है। रेणु अकाल और महामारी के मौसम में पैदा हुए थे इसलिए भी उनपर उन शूलों का गहरा जख़्म दिखाई पड़ता है।  ऋण जल में  अकाल,धनजल में बाढ़ और पहलवान की ढोलक में महामारी के मार्मिक चित्र  हिन्दी   गद्य की अनमोल विरासत हैं। भारत के इतिहास में दुःखों के गहरे दाग को जानने समझने के क्रम में ये रचनाएँ कालजयी महत्त्व रखती हैं। ‘मैला आँचल’ इस दृष्टि से रेणु का एक अभिनव प्रयोग था।  जैसे अज्ञेय ने तारसप्तक में प्रगतिवादी कवियों को शामिल कर के जो पुल बनाया वैसा ही प्रयास रेणु ने कथा-साहित्य में किया। वे अज्ञेय के मुरीद थे लेकिन ‘मैला आँचल’ नाम प्रगतिवादी पन्त की कविता से लिया।। “भारतमाता ग्रामवासिनी,खेतों में फैला है श्यामल।।धूल भरा मैला सा आँचल”।  खेतों में ये जो श्यामल है उसका बिम्ब रेणु के लिये बेहद कीमती रहा होगा। स्वयं कवि थे।  पन्त जी की यह कविता बंकिम के ‘वन्दे मातरम’ पर मार्मिक टिप्पणी होने के साथ साथ 1940 के भारतमाता की जीवनी  है। शस्य श्यामला का श्यामल हो जाना…शरीर में खून की कमी से पीड़ित जर्जर काया जिसमें आँख के नीचे  उदास साँवली छाया स्थायी भाव ले लेती है।  हरी भरी धरती का यह का यह रंग परिवर्तन भारत माता के गम्भीर स्वास्थ्य संकट का पहला लक्षण है।

 

गाँधी ने कहा कि भारत गाँवों का देश है। गाँव का आधार  खेत होते हैं। कार्ल मार्क्स  ने लिखा है कि किसान की सबसे बड़ी ताकत उसके खेत हैं और उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी उसके खेत ही हैं क्योंकि वह जीवन भर खेत के चौखटे के बाहर कुछ सोच ही नहीं पाता। अब सवाल यह है कि किसान खेत के बाहर सोच कर क्या करे? जैसे बुद्धिजीवी किताब के बाहर सोच कर भी क्या कर पाता है? रेणु  ने पन्त जी की  इस कविता से नाम जरूर लिया लेकिन वे इस कविता में अपनी कथाभूमि के साथ उसे  महकाव्यात्मक सम्भावनाओं से जोड़ने के अभियान पर निकल पड़ते हैं।  ‘भारतमाता ग्रामवासिनी’ में भारत के आगामी आठ साल जुड़ने से जो योगफल प्राप्त होता है उसका नाम ‘मैला आँचल’है।

भारत के सबसे उपजाऊ खेतों में अँग्रेजों ने भारत की जरूरतों को नजरअन्दाज करते हुए अपने नफानुकसान के हिसाब से नील की खेती करायी। नील की खेती का एक बहुत बड़ा दुष्परिणाम यह था कि कुछ फसलों के बाद खेत धान गेहूँ की खेती के लिए बंजर हो जाते थे। बिहार बंगाल के ऊपजाऊ खेत वहाँ की आबादी का पेट भरने के लिए पर्याप्त थे। लेकिन अँग्रेजों की मनमानी ने खेतों को बर्बाद कर दिया। मैला आँचल में नीलहे किसानों की यन्त्रणा और पूर्णिया की बन्ध्या धरती का जो  श्याम चित्र खींचा है वह 1940 की पन्त की भारतमाता की विपदा गाथा है। भारत माता ऐसे ही जार बेजार नहीं रो रही हैं।  मुक्तिबोध ने लिखा है कि 19 वीं सदी के आखिरी दशकों में सिर्फ बंगाल को लूटकर इंग्लैंड यूरोप का सबसे धनी देश बन गया। तब का बंगाल मतलब आज का बांग्लादेश,पश्चिम बंगाल,बिहार,झारखण्ड और ओड़िसा।

पिछले साल से हम छायावाद का शताब्दी वर्ष मना रहे हैं। आने वाले सोलह वर्षों तक यह शताब्दी मनाई जाएगी। रेणु ने छायावाद के माहौल में ही होश सम्भाला था। उनका केश-विन्यास छायावादी कवियों से तो प्रेरित था ही भाषा पर भी गहरा असर था। रेणु की भाषा-शैली पर प्रेमचन्द का नहीं, छायावाद का असर है। मैला आँचल की भूमिका छायावादी गद्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। धूल भी,फूल भी,शूल भी,गुलाब भी सिर्फ रेणु के जीवनबोध और सौन्दर्यबोध के परिचायक नहीं हैं बल्कि समग्र रूप से छायावाद और विशेष रूप से निराला के जीवनबोध और काव्य-विवेक के भी कसौटी हैं। निराला की काव्य साधना का संक्षिप्त इतिहास, महाकाव्य और उपन्यास के लिए विशेष रूप से नायकत्व की अवधारणा विचारणीय होती है। रेणु ने मलेरिया को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर की जरूरत समझी।

मैला आँचल में नायकत्व का प्रश्न प्रायः एक उलझे हुए सवाल के रूप में उठाया जाता है। ‘शेखर एक जीवनी’ और ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ भी रेणु के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में मौजूद थे। गोदान था ही।  रेणु इस बात को जानते थे कि साहित्य के संसार में दूर तक जाने और देर तक टिकने के लिए सिर्फ कथ्य के रूप में गम्भीर विषय के चुनाव से काम नहीं चलता बल्कि ऐसे चरित्रों का निर्माण करना पड़ता है जो पाठक के हृदय पर अमिट छाप छोड़ने में कामयाब हो।  मुक्तिबोध प्रेमचन्द की इसी विशेषता के कायल थे कि उन्होंने अमर चरित्रों की रचना की।  रेणु इस बात को समझ रहे थे। इसलिए उन्होंने मैला आँचल में एक से एक बढ़कर चरित्रों की रचना की।  बावनदास हो, बालदेव हो, लक्ष्मी हो, कमली हो या बहुत थोड़ी देर के लिए आने वाला नक्षतर मालाकार हो। ये सारे चरित्र अब हिन्दी  उपन्यास में एक जीवन्त इतिहास के स्थाई नागरिक बन चुके हैं, लेकिन सबसे पहले डॉ. प्रशान्त।  वह वैसा डाक्टर नहीं है जो विद्या का दुरुपयोग करता है या उसका उपयोग सीढ़ी की तरह करते हुए देवलोक का सुख भोगने के लिए अहर्निश लालायित रहता है। डॉ. प्रशान्त प्रेमचन्द की कहानी मन्त्र के उस डॉक्टर की तरह नहीं हैं जिनकी समय की तथाकथित पाबन्दी एक गरीब और लाचार की मौत का कारण बनती है। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में गाँधी की उपस्थिति ने तथाकथित बुद्धिजीवियों के चरित्र को समझने में काफी मदद की। प्रेमचन्द जैसे लेखक ने गाँधी की उस वैचारिकता को जो बुद्धिजीवियों के भाषण की जगह उनके वास्तविक क्रिया कलाप को देखने का आह्वान करती थी,हिन्दी  कथा साहित्य की मूल चेतना के रूप में प्रस्तावित किया था।  ‘मैला आँचल’ पर गाँधी और प्रेमचन्द का गहरा असर है। रेणु ने अपने चरित नायक के चुनाव में एक लम्बी और गहरी यात्रा की है। आप उस दृश्य को याद करें जहाँ कोशी की लहरों पर सवार एक नवजात शिशु नागदेवता की रखवाली में नेपाल से बिहार की धरती पर प्रकट होते ही एक अभागी माँ की गोद का सहारा पाता है। रेणु बनारस में पढ़ाई कर चुके थे। लहरतारा का तालाब देखा था।  शायद उसी तालाब की सीढ़ियों पर ही उन्हें अपने भावी नायक की झलक दिखाई पड़ी हो… “कबीर मरि मरहट रह्या, तब कोई ना पूछे सार,हरि आदर आगे लिया ज्योँ गऊ बच्छ की लार।” थोड़ी देर के लिए कल्पना करें कि पैदा होते ही मृत्यु की गोद में फेंक दिए जाने वाले कबीर से लोग जब जीवन का सार पूछते होंगे तब उन्हें कैसा लगता होगा? आदमी ने पैदा जरूर किया लेकिन जानवर समझे जाने वाली गाय से अब तक यह नहीं सीखा कि अपने बच्चे से कितना और कैसे प्यार किया जाता है। गाय के लिए तो अपने नवजात शिशु के शरीर का रक्त माँस भी घृणा का विषय नहीं है,उसे जीभ से चाट कर साफ करती है। उसे इस बात की भी चिन्ता नहीं कि उसके और उसके शिशु के बीच किसी तीसरे के कुल की मर्यादा कोई दीवार बन सकती है।कैसी विडम्बना है कि अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने वाली आदमी की जाति मर्यादा की आड़ में अपने बच्चे को मरने के लिए छोड़ देती है। खैर,उस अभागिन माँ ने जन्म देकर दूसरी अभागिन को माँ बनने का अवसर दिया। कबीर की भी यही कथा है,प्रशान्त की भी यही। अकारण नहीं कि कबीर का आकर्षण प्रशान्त को पढ़ाई के लिए बनारस ले आता है।

भारत की धरती पर साम्यवादी और समाजवादी आन्दोलन की शुरुआत बिहार से ही हुई थी। दोनों आन्दोलनों में  मूल विवाद वर्ग और वर्ण को लेकर था। साम्यवादी विचारधारा वर्ग सत्य पर भरोसा करती थी, तो समाजवादी विचारधारा के लिए वर्ण का सवाल वर्ग से जुड़ा हुआ था।  समाजवादी आन्दोलन को इस बात को लेकर कोई दुविधा नहीं थी कि भारतीय सन्दर्भ में जाति के सवाल पर पर्दा डालकर वर्ग संघर्ष को समझना नामुमकिन है। रेणु की वैचारिक सहानुभूति इसी विचारधारा के साथ थी।  लेकिन वे डॉ प्रशान्त के जरिये एक सवाल खड़ा करते हैं। बड़ा लेखक किसी भी विचारधारा में लकीर का फ़क़ीर नहीं होता बल्कि बनी बनाई स्वयंसिद्ध मान ली गयी स्थापनाओं को प्रश्नांकित भी करता है। जाति भारतीय सामाजिक व्यवस्था की बहुत बड़ी सच्चाई है। ठीक है,मान लिया, लेकिन इस सामाजिक सच्चाई में उनकी जगह कहाँ है जिन्हें यह पता ही नहीं कि उनके माँ बाप कौन हैं? एक सामान्य व्यक्ति चाहे वह जिस जाति में पैदा हुआ हो,उसे गर्व या संकोच के साथ अपनी जाति बताने में कोई बड़ी परेशानी नहीं होगी, लेकिन आप सोचें कि कबीर को जाति के सवाल किस तरह परेशान करते रहे होंगे?  “ब्रह्मा नहीं जब टोपी दीन्हीं,विष्णु नहीं जब टीका…” जाति पूछने वाले लोगों के सवाल को ही वे टेढ़ा मानते थे…. “टेढ़ी तोर पुछनिया” भक्ति आन्दोलन जैसे समग्र और दीर्घ अखिल भारतीय आन्दोलन में एक से बढ़कर एक सन्तों के बावजूद लोग हर जगह उनकी जाति पूछते रहे और परेशान करते रहे। ऐसे जड़ लोगों के लिए यह बात मायने नहीं रखती थी कि जिनसे वे उनकी जाति जानना चाहते हैं उन्हें इतिहास बासवेश्वर, नानक, शंकरदेव, ज्ञानदेव, नामदेव, रैदास, कबीर और तुलसी जैसे नामों से कालजयी बनाने का इन्तजार कर रहा है। इतिहास की यह अजीब विडम्बना है कि प्रमाणपत्र देने वालों का हस्ताक्षर इतिहास के कचरेदान में चला गया। सच तो यह है कि इतिहास वालों को अपने नायकों का परिचय हमारे साहित्य के नायकों के जरिये दिया जा रहा है।गढ़ मिट गये,मठ मिट गये। कविताएँ  अमर हो गयीं। कविता पर सवाल उठाने वालों के लिए इससे बड़ा जवाब कुछ नहीं हो सकता।

हमारे सन्तों ने सीधी सी बात बतायी कि भईया जब पैदा करने वाले ईश्वर ने ही कोई जाति नहीं बनायी तब उसके पैदा किए हुए लोग जाति क्यों पूछते हैं? नाम-प्रशान्त,पेशा-डॉक्टर, जाति-? प्रशान्त किसकी जाति बताएँ? कबीर ने नीरू और नीमा की जाति मान ली। जुलाहा कहे जाने पर उन्हें कोई विशेष कष्ट नहीं होता। उनके लिए तो वह उनके पालनकर्ता पेशे की जाति है। लेकिन, प्रशान्त के साथ इतनी सुविधा नहीं है। पालन करने वाली माँ की जाति उनके लिए न तो पेशे की जाति है और न ही गौरव गर्व की। उनके बारे में जब लोग तरह-तरह की बात करते हुए सत्य से साक्षात्कार करते हैं तो उसी भाव से देखते हैं जैसे लोग लावारिश लाश को देखते हैं।  लावारिश पैदा होने की पीड़ा क्या होती है, इसे कबीर से जाने या फिर प्रशान्त से। लेकिन लावारिश मरने की पीड़ा? और लावारिश लाश ? जिन्होंने देखी है वही इस पीड़ा को समझ सकते हैं।  दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिन्हें पूरी जिन्दगी में मनुष्य होने का न्यूनतम सुख भी प्राप्त नहीं होता।  फिर भी वे मरने के बाद एक न्यूनतम सम्मान की अपेक्षा करते हैं।  जिन्दगी चाहे जैसे भी कटी हो इस दुनिया से जाते-जाते ही सही कम से कम उसके लिए किसी की आँख में आँसू हों या किसी के हाथ विदा करने के लिए उठे।  मरणोपरान्त सम्मान मनुष्य का नैसर्गिक अधिकार है लेकिन कल्पना करें उन लोगों की जिनका इस दुनिया में कोई नहीं है।  मेरे ख्याल से परिवार, सम्पत्ति और सन्तान की कामना के पीछे मनुष्य की ललक की मूल प्रेरणा का आधार दरअसल यही है।  बिना जाति के आदमी को लावारिश लाश की तरह देखने वाली दृष्टि वही दृष्टि नहीं है जो बिना माँ-बाप की सन्तान अर्थात् टुअर बच्चे को देखने की होती है।  जिस देश में मृत्यु की शुचिता को लेकर इतना बवाल हो वहाँ कोई कबीर काशी छोड़कर मगहर में मरने की सोचे तो यह सोच जीवन और मृत्य की तथाकथित पवित्रता के आख्यान पर एक प्रश्न है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बुद्ध के बाद कबीर को भारतवर्ष की इतिहासधारा को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा नायक माना था। कबीर की मगहर यात्रा बुद्ध की विरासत से जुड़ने की भी कोशिश है। स्वयं प्रशान्त बुद्ध की तरह नेपाल से बिहार आते हैं। बुद्ध, कबीर और प्रशान्त की त्रिवेणी में रेणु ने जिस सांस्कृतिक विमर्श का रूपक खड़ा किया है,उधर भी देखा जाना चाहिए। रेणु स्वयं नेपाल क्रान्ति से जुड़े थे। नेपाल उनके लिए हिमालय की उन नदियों की तरह भारत के सांस्कृतिक भूगोल का अनिवार्य हिस्सा है जिसके बिना न तो इतिहास बनता है और न ही भूगोल पूरा होता है। सीता और बुद्ध के बिना भारत के सांस्कृतिक इतिहास की कल्पना बेमानी है। हम सब बदल सकते हैं लेकिन इतिहास और भूगोल नहीं बदल सकते। चरित्र के चयन में रेणु ने जिस समझ का परिचय दिया है उसमें एक बात यह भी है कि हमारी संस्कृति की प्रतीक सीता भी उसी नेपाल की बेटी हैं और उन्हें भी विदेह राज जनक ने हल चलाते हुए खेत की हराइयों में पाया था। कबीर और प्रशान्त की तरह।। दूसरी बात यह कि जैसा हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘अशोक के फूल ‘में लिखा है कि परम्परा और संस्कृति में सब कुछ अविशुद्ध होता है। पवित्रता की बात केवल बात की बात होती है। दुनिया भर का इतिहास इस बात का गवाह है कि मिलावट के बल पर ही यह दुनिया आज तक जीवित है। रक्त की पवित्रता के पाखण्ड को सच साबित करने के लिये दुनिया में जितना रक्त बहाया गया है उसे भी याद रखने की जरूरत है। रेणु ने दूसरे विश्व युद्ध की छाया में होश सम्भाला था। इस संकट को उनसे बेहतर कौन समझ सकता है?

 

     मैला आँचल में मुख्य रूप से दो नदियाँ दिखाई पड़ती हैं। एक नदी है,कोशी, दुनिया के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर एवरेस्ट के पास के ग्लेशियर से निकली हुई नदी। दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वत कोशी के जरिये दुनिया के सबसे बड़े महासागर नामधारी प्रशान्त से जुड़ता है। बाबा नागार्जुन ने सिन्धु नदी पर जो कविता लिखी है उसे याद करिये, मुझे लगता है रेणु ‘मैलाआँचल’ के जरिये कोशी पर महाकाव्य लिखने की कोशिश कर रहे थे।  हिमालय के उस पार के सिन्धु पर बाबा लिखेंगे तो हिमालय के इस पार की कोशी पर वे लिखेंगे। उपन्यास में होड़ ली तो कविता में क्यों नहीं? लेकिन दुर्भाग्य ऐसा कि बिहार में गंगा के प्रवेश के साथ हुलास बाँध कर गले लगने वाली कर्मनाशा को अपवित्र सिद्ध किया गया। दूसरी नदी जो बक्सर में ठोरा नाम से मिलीं उसे नदी न मानकर ठोरा बाबा नाम देकर नदियों की पवित्र सूची से बाहर का रास्ता दिखाया गया। नर्मदा के साथ अमरकंटक से निकलकर आधे बिहार को अपने पानी से सोने जैसे अन्न देने वाली नदी जब महान मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिग्राम के पास आर्यभट्ट और बाणभट्ट जैसी विभूतियों को अपने धार से सींचते हुए मिली तो उसे भी धार्मिक रूप से कोई सम्मान नहीं मिला। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है,यह तो सुनते आए हैं लेकिन बड़ी नदियाँ छोटी नदियों का पानी खाकर उनका नाम तक मिटा देती हैं,यह सवाल कभी भी मेरा पीछा नहीं छोड़ता। आप फल्गु को देखें। सदियों से पूर्वजों की आत्मा को तृप्त करने के बजाय बदले में क्या मिला? मगध जहाँ सिद्धार्थ, बुद्ध हुए, उतना वैभवशाली नालन्दा विश्वविद्यालय उसे अपवित्र क्षेत्र सिद्ध किया गया। वर्णाश्रम व्यस्था का शिकार सिर्फ आदमी होता तो बात समझ में आ सकती थी। लेकिन यह महामारी इतनी संक्रामक थी कि गाँव, शहर,प्रदेश,पशु,पक्षी और नदियों को भी इसका शिकार होना पड़ा। मगध और मगहर एक ही वर्ण क्रम में माने गये। बिहार के एक छोर पर कर्मनाशा है तो दूसरे छोर पर कोशी। दोनों नदियाँ गंगा की ही सहायक हैं लेकिन दोनों को सम्मान नहीं मिला। कर्मनाशा के किनारे बसे हुए लोग हों चाहे कोशी के किनारे बहुत संकोच के साथ यह बताते हैं कि वे इन नदियों से ताल्लुक रखते हैं।  कोशी को बिहार का शोक माना जाता है। कसूर यही है कि उसे नदी की मर्यादा मालूम नहीं। मर्यादा के नाम पर स्त्रियों का सदियों से शोषण हुआ है। लेकिन मर्यादा के नाम पर किसी नदी  को इतना कलंकित  किया जाय कि उसे जीवन नहीं मृत्यु की नदी मान  लिया जाए  तब किसी नदी के लिए इससे बड़ी पीड़ा क्या हो सकती है? कोशी पर यह भी आरोप है कि हर बार वह अपना रास्ता बदल लेती है। सच है कि कोशी ने मिथिलांचल के बहुत बड़े भूभाग से बहुत कुछ छीना है लेकिन जो दिया है उसका हिसाब  भी होना चाहिए। स्याह पक्ष सब देखते हैं। साहित्य का काम बाँध बनाना नहीं है,पुल भी उसके बुते की बात नहीं लेकिन आप सोचें कि अभाव,भूख,पलायन और विस्थापन के बावजूद मिथिला के लोगों ने सदियों से अपनी प्रतिभा के बल पर मण्डन मिश्र और विद्यापति होते हुए अमरनाथ झा और नागार्जुन जैसी विभूतियों को जो जन्म दिया है,उसमें कोशी मैया का योगदान शामिल नहीं है? नदियाँ शोक नहीं हो सकतीं। गलती हम करते हैं,बदनाम नदियों को करते हैं। नदियाँ जीवन देती हैं।गलत नीतियाँ नदियों को शोक का विषय बनाती हैं। कोशी से जीवन आता है। कोशी से प्रशान्त आता है। कोशी मैया उसे अपनी लहरों पर एक ममतामयी माँ की तरह हिफाजत के साथ दूसरी माँ की  गोद में सौंप देती हैं। ‘मैला आँचल’ का यह रूपक कोशी की कलंक कथाओं का प्रत्याख्यान है। रेणु ने एक लोककथा का उल्लेख किया है जिसमें अपनी जरूरत के सारे बर्तन एक जमाने में कोशी नदी से मिल जाता था। एक किसान ने लोभ वशउन बर्तनों को वापस नहीं किया। तबसे कोशी मइया नाराज हो गयीं। गाँधी जी ने कहा कि प्रकृति के पास आदमी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं लेकिन लोभ की पूर्ति के लिए नहीं। अब तक हमने यही किया है। जिन नदियों ने हमें सब कुछ दिया, उनका हमने सब कुछ छीन लिया। साथ ही हमारी पवित्रता वादी दृष्टि ने किसी एक नदी को पवित्र बताकर बाकी को अपवित्रता की श्रेणी में धकेल दिया है। कर्मनाशा से लेकर कोशी तक हमने यही किया। यह समझने की कोशिश नहीं की कि पवित्र नदियों में भी अपवित्र माने जाने वाली नदियों और नालों का पानी शामिल है। “एक नदिया,एक नार कहावत,मैलो नीर भरो। जब दोनों मिल एक भयो तब सुरसरि नाम परो”। कोशी गंगा में मिलती हैं लेकिन गंगा में मिलने से पहले कोशी बिहार का सिर्फ शोक नहीं हैं।  कोशी मिथिला की संस्कृति और धरती के लिये प्रतिरोध और प्रतिभा की  संयुक्त संस्कृति का प्रसाद हैं। कोशी हर बार इतनी उर्वर मिट्टी जरूर छोड़ जाती हैं जिससे अन्न की कमी न हो। अब उस धरती और मिट्टी पर सबका हक न हो तो उसके लिए कोशी जिम्मेदार कैसे हो सकती हैं?

‘मैला आँचल’  की दूसरी नदी है,नागर।  पहली नदी कोशी से पहला नायक प्रशान्त प्रकट होता है तो दूसरी ओर आखिरी नदी के किनारे एक अन्य नायक बामनदास का अन्त होता है। नदियों से ही हमारी सभ्यताएँ पैदा हुई हैं।  उन्हीं से हम जन्म से लेकर जीवन और उत्सव के हर अवसर पर नाभिनाल आबद्ध होते हैं और फिर उन्हीं में विलीन भी हो जाते हैं। नागर नदी जो कभी अपने बंगाल की नदी हुआ करती थी,बँटवारे के बाद भारत और तब के पूर्वी पाकिस्तान के बीच विभाजन की रेखा बनी। दो भाइयों के बीच खेत का बँटवारा क्या होता है इसे या तो अपने अनुभव से जानते हैं या फिर प्रेमचन्द के कथालोक में। देश का बँटवारा, भाई के बँटवारे से अलग होता है और उसमें भी भारत पाकिस्तान का बँटवारा?    मशहूर ब्रिटिश नाटककार हावर्ड ब्रेंटों ने भारत और पाकिस्तान के बीच बँटवारे की लकीर खींचने वाले रेडक्लिफ़ के जीवन से प्रेरित होकर “ड्राइंग द लाइन”  में लिखा है कि  भारत के बँटवारे के बाद लाखों लोगों के कत्लेआम और विस्थापन से वे इतने विचलित हुए कि  रात रात भर सो नहीं  पाते थे।  जाने से पहले उन्होंने एक तो पारिश्रमिक लेने से इनकार कर दिया दूसरे जितने भी दस्तावेज और मानचित्र उनके पास थे उसे ब्रिटेन ले जाकर जला दिया। उनकी आत्मा पर लाखों बेकसूर लोगों का खून इस कदर  जख्म की तरह जम गया था कि अपने घर के लोगों से भी अपनी भारत यात्रा के बारे में कुछ भी नहीं बताया। हमारे समय के सबसे प्रामाणिक इतिहासकार एरिक हब्सबॉम ने लिखा है कि बीसवीं शताब्दी के विश्व इतिहास की हर उलझी हुई गुत्थी को सुलझाने में लगभग कामयाब रहे हैं लेकिन भारत के बँटवारे के वास्तविक कारण अन्त तक उनके लिए रहस्य बने रहे। बामनदास की हत्या के प्रसंग में रेणु ने इस बँटवारे के चरित्र और भविष्य पर जो टिप्पणी की है,वह किसी भी इतिहासकार की टिप्पणी से ज्यादा मार्मिक है,विश्वसनीय भी है।  बावन की लाश के साथ जो इधर हुआ,  वही उधर भी हुआ। कहीं जगह नहीं मिली। प्रोफेसर मैनेजर पाण्डेय ने महात्मा गाँधी से चेथरिया पीर के जरिये इस मार्मिक आख्यान पर गम्भीर टिप्पणी की है। एक डेग में  बावन की लाश ने हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की नैतिकता नाप ली, इंसानियत नाप ली। उल्लेखनीय यह  है कि यह सब गाँधीजी के श्राद्ध की रात हुआ। आजादी के जश्न में गाँधी शामिल नहीं थे। वे भीषण साम्प्रदायिक दंगे के बीच नोआखाली में थे।   बावन दास जैसे लोगों के लिए यह गाँधी और भी अनमोल हो गये थे। गाँधी और बावनदास के हत्यारे पाकिस्तान से नहीं आये थे। बावनदास का हत्यारा तो उसी कॉंग्रेस पार्टी का था जिसे बनाने में गाँधी का भी योगदान था तो बामनदास का भी। वही कॉंग्रेस पार्टी जिसकी जरूरत गाँधी जी सिर्फ देश की आजादी तक महसूस करते थे। इसके बाद इस पार्टी की जरूरत इसलिये नहीं थी क्योंकि उन्हें भय था कि इसमें काबरा जैसे लोग आएँगे। नेहरू जैसे लोग कुर्सी पाते ही बदल जाएँगे। जिन्ना और अपने बड़े बेटे को गाँधी कभी नहीं समझ पाए थे। 15 अगस्त 1947 के बाद नेहरू भी उनके लिए रहस्यमय पहेली बन गये। 15 अगस्त 1947 से 30जनवरी 1948 के बीच गाँधी कितने लाचार थे इसे बताने की जरूरत नहीं है। 120 साल जीने की इच्छा रखने  वाला व्यक्ति अपने आखिरी जन्मदिन पर यथाशीघ्र मृत्यु की कामना करता हो, यह रेणु के लिये भीतर तक झकझोरने वाली बात थी। आखिरी दिनों के लाचार गाँधी,आखिरी दिनों के बावनदास हैं।  हिन्दी  और अन्य भाषाओं में गाँधी की हत्या के बाद जितना कुछ लिखा गया है,उसमें ‘मैला आँचल’ मेरी दृष्टि में सर्वाधिक मार्मिक और प्रामाणिक श्रद्धांजलि है।

बात महामारी से शुरू की थी।  ‘मैला आँचल’ गाँव में मलेरिया अस्पताल बनने की घटना से शुरू होता है।गाँव में यह खबर बिजली की तरह फैली थी कि मलेटरी ने गाँव मे आकर क्या करामात शुरू कर दी है।पहला वाक्य लिखना कठिन होता है। हमारे समय के सबसे मशहूर रचनाकार मार्केस ने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि,“पहला वाक्य, किसी भी उपन्यास की शैली, उसके स्वरुप और यहाँ तक कि उसकी लम्बाई की भी जाँच-परख करने की प्रयोगशाला हो सकती है। ” मार्केस के इस कथन के आधार पर ‘मैला आँचल’ के पहले वाक्य से इस उपन्यास के बारे में बहुत कुछ जाना-समझा जा सकता है। अगर निराला ने ‘राम की शक्ति पूजा’ का प्रारम्भ ‘रवि हुआ अस्त’ से न कर ‘दिवस का अवसान समीप था’ से किया होता या ‘सूरज डूब गया’ से किया होता तो वह कविता कैसी होती, उसकी कल्पना कर सकते हैं। केदारनाथ सिंह रचना में पहले वाक्य को पगड़ी बाँधने के लिए गमछे के पहले फेटे की तरह देखते थे। पहला फेटा गड़बड़ तो सब गड़बड़। पेशबन्दी कहते थे उसे। रेमण्ड विलियम्स की शब्दावली का सहारा लें तो रेणु उपन्यास और प्रौद्योगिकी के सम्बन्धों की समझ रखते थे। उनकी कहानियों में भी यह बात दिखाई पड़ती है। ‘पंच लाइट’ इसका उदाहरण है। जिस गाँव में बिजली यथार्थ नहीं बल्कि कल्पना है उस गाँव मे तीव्र गति का सबसे प्रामाणिक प्रतिमान बिजली है। बिजली ने दुनिया को आधुनिक बनाने में सबसे क्रान्तिकारी योगदान दिया था। आप बिना बिजली के कितने घंटे बिता सकते हैं इससे आपके धैर्य की परीक्षा ली जा सकती है। लेकिन जिस गाँव ने बिजली के बारे में सिर्फ सुना है उसी जातिवादी जाल में उलझे हुए गाँव के बीच रेणु आपको ले जाकर एक ऐसी दुनिया से जोड़ते हैं जिसका हर तार शार्ट सर्किट का शिकार है। अस्पताल अभी शुरू भी नहीं हुआ कि राजनीति शुरू हो जाती है।वर्गीय राजनीति नहीं,जाति बरन की राजनीति। संक्रमण काल में खड़ा देश, गाँधी को नायक मान चुका देश, अपने पाखण्ड से लिपटा हुआ देश।  लेकिन इस देश के एक कोने में स्थित इस गाँव की स्मृतियों में अपने गाँव का पुराना नाम ही खतरे में है। नये मालिक मार्टिन साहब की मेम साहिबा मेरी के नाम को याद कराने में पुराना नाम डिलीट करा दिया गया है। भारत इण्डिया हो गया है। लेकिन मलेरिया नामक बीमारी मार्टिन साहब से नहीं डरी और रेलगाड़ी से भी तेज दौड़ने वाले घोड़े के बावजूद मार्टिन मेरी को नहीं बचा पाया। यहाँ से एक दूसरा मार्टिन पैदा होता है जो किसी लाचार हिन्दुस्तानी की तरह पटना दिल्ली एक करने के बावजूद जीते जी मलेरिया हॉस्पिटल खुलवाने में कामयाब नहीं हो पाता। ब्रिटिश सरकार कितनी असंवेदनशील सरकार थी इसके प्रमाण जुटाने की जरूरत नहीं है।

बक्सर में एक अँग्रेज कब्रिस्तान है।इस कब्रिस्तान में सैकडों अँग्रेज अपने परिवार और मासूम बच्चों के साथ अपने जीवन की अनसुनी कहानियों के साथ चिर निद्रा में लीन हैं। इन सारी कब्रगाहों पर संगमरमर की नायाब शिल्पकारी की धूमिल छवियाँ तो हैं लेकिन इतिहास गायब है।  1857 के बाद कुछ वर्षों के भीतर की तिथियों में इनकी मृत्यु इनके किसी महामारी के शिकार होने की सूचना देती है।इनमें अधिकांश अँग्रेज ओवरसियर ,इंजीनयर थे जो मेरे ख्याल से सोन नहर या रेल के काम से जुड़े थे। मलेरिया या प्लेग की वजह से इनकी जान गयी होगी।  मलेरिया कोई नयी बीमारी नहीं है। अंटार्कटिका को छोड़कर इसने दुनिया के हर हिस्से को प्रभावित किया था। दूसरे विश्वयुध्द के समय एक पोस्टर आज की शब्दावली में कहें तो बहुत वायरल हुआ था। यह पोस्टर अमरीकी लोक स्वास्थ्य विभाग ने बनाया था जिसमें खिड़की की फटी हुई जाली से झाँकते हुए एक मच्छर कह रहा है कि,”oh boy,what a break?This is where I come in”.  यह अलग से बताने की जरूरत नहीं है कि जिस तरह प्रथम विश्व युद्ध में बारूद से  सैकड़ों गुना ज्यादा लोग फ्लू  के वायरस से मारे गये थे उसी तरह दूसरे विश्व युद्ध में मलेरिया द्वाराकेवल अमरीकी सेना के साठ हजार जवान मलेरिया के चलते मारे गये थे।  इसी तरह अभी की महामारी में संक्रमित और मौत के निरन्तर बढ़ते हुए आँकड़े के बीच यह भी याद रखने की जरूरत है कि अभी दुनिया में हर साल मलेरिया से संक्रमित होकर मरने वालों की संख्या छह लाख है। अब तो यह संख्या कोई खबर भी नहीं बनती।  फ़ैशन की तरह नयी बीमारियाँ पुरानी बीमारियों पर भारी पड़ जाती हैं। अपने देश का दुर्भाग्य है कि हमारी एक बीमारी जाती नहीं कि दूसरी चली आती है।

प्रख्यात ग्रीक इतिहासकार हेरदेतस ने लिखा है कि 2700-1700 ईसा पूर्व मिस्र के पिरामिडों के निर्माण कार्य में लगे लोगों को प्रचुर मात्रा में लहसुन खिलाया जाता था जिससे वे मलेरिया जैसी बीमारी से बच सकें। डॉ प्रशान्त सभ्यता के इतने पुराने इतिहास की इतनी पुरानी और घातक बीमारी पर शोध करने के लिए इंग्लैण्ड जाने का अवसर छोड़ कर उस इलाके का चुनाव करते हैं जहाँ कौवे को भी मलेरिया होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के वेबसाइट पर आप जाएँ तो पता चलेगा कि ‘मैला आँचल’ के प्रकाशन के 62 साल बाद 2018 में पूरी दुनिया मे 2 करोड़ 28 लाख लोग मलेरिया से संक्रमित हुए थे। इनमें साढ़े चार लाख लोग अपने प्राण बचाने में कामयाब नहीं हुए। मादा एनोफिल मच्छर के द्वारा परजीवी जीवाणु से यह रोग पाँच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए बेहद घातक है।2।7 बिलियन डॉलर मलेरिया पर शोध के लिये खर्च हो रहा है इसके बावजूद जो देश इसकी जकड़ से बाहर निकलने में नाकामयाब रहे हैं वे इस प्रकार हैं- बुर्किना फासो, कैमरून, कांगो, घाना, भारत, माली, मोजाम्बिक, नाइजर,  नाइजीरिया, युगांडा और तंजानिया। ये सूची विश्व स्वास्थ्य संगठन  की है। अतिविकसित, विकसित और अविकसित श्रेणी से बाहर जिन देशों के साथ भारत इस श्रेणी में  आज भी शामिल है उससे यह समझा जा सकता है कि हमें अभी प्रशान्त जैसे कितने डॉक्टरों की दरकार है। प्रशान्त ने मलेरिया की  खोज में दो जीवाणु पाए थे एक गरीबी और दूसरी जहालत। एक से हम चाहकर भी निकल नहीं पा रहे हैं तो दूसरे से निकलना ही नहीं चाहते। दिमाग में लगे पुराने से पुराने जाले से हमें इतना लगाव है कि जाति की चौखट से बाहर निकलने में हमें भय लगता है। डॉक्टर की जाति और रोगी की जाति जिस देश में जानने की इच्छा बनी रहेगी उस देश से हर चीज निकल जाएगी, बीमारी नहीं निकलेगी।

मलेरिया के बहाने  रेणु ने  एक छोटे से गाँव से लेकर देश और दुनिया की नब्ज पर हाथ ही नहीं रखा है बल्कि लर लगाकर फेंफड़े में मौजूद हर वायरस की गति और प्रगति को समझने की कोशिश करते हैं। वह वायरस जो एक जिन्दगी पर धावा बोलने  से पहले पूरी दुनिया के शोषण तन्त्र से एक व्यापक संधि कर चुका होता है।

(प्रो.सुवास कुमार की स्मृति को सादर समर्पित)

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लेखक हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यलय, हैदराबाद में प्रोफेसर हैं|

सम्पर्क- +918374701410, gpathak.jnu@gmail.com 

 

साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)

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Gaikwad Devidas
1 year ago

बहुत ही सटीक और मार्मिक दृश्य को समझने और पढ़ने का अवसर मिला जो सराहनीय है।

धनंजय सिंह
1 year ago

बहुत ठोस शोध,तार्किक एवं मार्मिक लेख। लेख भाषा में धारा प्रवाह है। आज के समय में रेणु की प्रासंगिकता कितनी है, इस लेख से जाना जा सकता है।

अधीर कुमार
1 year ago

सुविचारित और व्यापक फलक पर की गई तथ्यात्मक आलोचना। अशेष शुभकामनाएं मित्र।

ashutoshji
1 year ago

So nicely presented ….the feeling which has a century old perspective with present day malady

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