फणीश्वर नाथ रेणु

कितने चौराहे : ‘रेणु’ का एक सपना

 

हर बड़ा साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से एक समानान्तर दुनिया रचने का स्वप्न देखता है। जीवन अनुभव के परिपक्व होने के साथ-साथ उसकी स्वप्न दृष्टि और यथार्थबोध में परिवर्तन आ सकता है; जिसका प्रतिफलन उसकी रचनाओं में भी दिखता है। कुछ रचनाकारों की यात्रा ‘प्रेमचन्द’ की तरह होती है। प्रेमचन्द के प्रारंभिक उपन्यासों में आदर्श ज्यादा है यथार्थ कम; विचार ज्यादा हैं, उसकी कलात्मकता कम। आलोचकों ने चिह्नित किया है कि अपने उत्तरवर्ती दौर में प्रेमचन्द ने यथार्थ और उसकी कलात्मकता की बेहतर पहचान की; जिसका उदाहरण है – ‘गोदान’। ‘फणीश्वरनाथ रेणु’ की रचना-यात्रा इसके विपरीत है। उनका पहला ही उपन्यास ‘मैला आँचल’ जीवन बोध के रचनात्मक रूपान्तरण की कसौटी पर बिल्कुल खड़ा उतरता है।

‘मैला आँचल’ को जो लोकप्रियता मिली वह बाद में ‘रेणु’ के लिखे अन्य उपन्यासों का को नहीं मिली, बल्कि आलोचकों द्वारा उनके उत्तरवर्ती उपन्यासों को अपेक्षाकृत कमजोर सिद्ध किया गया है। मनुष्य की विचार यात्रा समय के साथ-साथ परिपक्व होती है। इस संदर्भ में ‘गाँधी’ से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है। एक दफा ‘गाँधी’ से विदेशी पत्रकार ने पूछा, आप एक ही विषय पर अनेक लेख लिखे हैं। अगले लेख में कुछ बातें अलग हो जाती हैं। ‘महात्मा गाँधी’ ने कहा, किसी भी विषय पर मेरे आखिरी लिखे को ही मेरा मन्तव्य माना जाए। मैं जड़ नहीं हूँ। जैसे-जैसे विषय की समझ बढ़ती है, मैं अपने लिखे को संशोधित करते रहता हूँ। इस दृष्टि से ‘रेणु’ पर विचार करें तो उनके परवर्ती उपन्यास ‘कितने चौराहे’ को कम से कम रेणु के विचार को जानने की दृष्टि से ज्यादा महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए।

विचारों में परिवर्तन को एक सकारात्मक दृष्टि से देखना चाहिए। इस दृष्टि से अगर विचार करें तो किसी भी रचनाकार की उतरवर्ती रचनाएँ कम से कम उस रचनाकार के परिपक्व विचारों को धारण करती हैं, अतः रेणु के परवर्ती उपन्यासों यथा ‘कितने चौराहे’, को विशेष सावधानी से पढ़ना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि ‘रेणु’ को समझने की एक बेहतर कुंजी उसमें ही मिले।

1966 ई0 में प्रकाशित इस उपन्यास के केन्द्र में गाँव का एक प्रतिभाशाली बालक मनमोहन है जो गाँव के मस्ती भरे जीवन को जीते हुए अपर प्राइमरी की परीक्षा में न सिर्फ उत्तीर्ण हुआ है बल्कि आगे की पढ़ाई के लिए वह स्कॉलरशिप के लिए नामित भी होता है। गाँव के खेत-खलिहानों और वहाँ की संस्कृति में पला-बढ़ा मनमोहन गाँव के स्कूल में ही आगे की पढ़ाई जारी रखना चाहता है। लेकिन घर के लोगों को लगता है कि यहाँ के स्कूल में रहकर उसकी प्रतिभा कुंद पर जाएगी या वह बिगड़ जाएगा। मनमोहन के पिता अपने ही गाँव के प्रसिद्ध स्कूल के बारे में कहते हैं ‘‘स्कूल का नाम जिला भर में हो जाय, मगर रहेगा हमेशा ‘गँवई’ स्कूल ही।” मनमोहन के काका की भी राय यही है। “कोसी के किनारेवाले गाँव में जाकर बनैला सूअर बनेगा? बनैला.. घैला..शहरी..गँवई?” (रेणु रचनावली-3-पृ0-23)

आश्चर्य यह भी है कि गाँव के स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को लेकर जहाँ रचनाकार अपने पात्रों के माध्यम से प्रश्न उठा रहा है वहीं शहर की शिक्षा व्यवस्था या रहन-सहन को लेकर भी बहुत खुश नहीं दिखता। मनमोहन के पिता बार-बार इस बात को दुहराते हैं कि शहर जाकर बिगड़ मत जाना – “शहर जाकर ‘शहरी लड़का’ मत बन जाना। बीड़ी-सिगरेट मत पीना।” खुद मनमोहन शहर की शिक्षा व्यवस्था को लेकर डरा हुआ है जो उसने शहर में रहनेवाले ‘मोहरिल मामा’ से कई बार सुना है “अंगरेजी में सवाल का जवाब दे सकोगे तो? वहाँ तुमसे भी छोटे बच्चे अंगरेजी में तुमसे नाम धाम पूछेंगे।” (पृ0-233) साथ ही शहर में बोर्डिंग में रहनेवालों को देखा हुआ हाल बताते हुए उसके मोहरिल मामा कहते हैं- बोर्डिंग में लड़के को देने का मतलब है लड़के को ‘फाटक’ माने ‘अड़गड़’ में डाल देना। मास्टर और रसोइया और नौकरों के पेट से जो फाजिल बचता है, बेचारे बोर्डिंग के लड़के वही पाते हैं। देखा जाए तो मनमोहन के बहाने रचनाकार रचना की शुरूआत में ही शिक्षा व्यवस्था को लेकर जो प्रश्न कर रहा है वह प्रश्न आज भी उसी रूप में है। स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्ष बाद भी हम अपनी शिक्षा-व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन नहीं कर पाए हैं। शिक्षा से देश की दशा एवं दिशा तय होती है जिसकी ओर भारतीय समाज को गहराई से समझनेवाला रचनाकार अपनी इस रचना के माध्यम से भारत के भाग्य-विधाताओं का ध्यान आकृष्ट करना चाह रहा है। कहीं-न-कहीं वह दुखी है कि एक ही देश के शहर और गाँव की शिक्षा व्यवस्था में अंतर क्यों है?

रेणु अपनी रचनाओं में गाँव की खासियत को बड़ी तन्मयता के साथ चित्रित करते हैं। इस रचना में भी जहाँ भी उन्हें अवसर मिलता है अपने पात्रों के माध्यम से इसे बताते चलते हैं।कितने चौराहे का मुख्य पात्र मनमोहन को जब शहर जाना सुनिश्चित हो जाता है या फिर शहर चला भी जाता है तब भी वह गाँव के खेत खलिहानों को नहीं भूल पाता – “खलिहान के धान के बोझों पर धूप ! अलाव के पास सकरकंद पकाते हुए बच्चे। फुले-फुलाए सरसों के पीले खेत पर ओस की सफेद चादर बिछी हुई है। चने के खेतों और सकरकन्द, मिसरीकंद की बगिया से कोई इशारा करता है – ‘‘यहाँ आओ !’ गाँव के संगी-साथी, लँगोटिया यारों की टोली जमती है। क्या शहर में भी ऐसा ही होगा सब कुछ?” जाहिर है शहर वैसा बिल्कुल नहीं है। ‘‘सड़क के किनारे पतली-सी गली में खपरैल के कई अध-उजड़े घर में एक बीमार सा घोड़ा मनों लीद के ढेर पर बँधा था। राख की ढेरी के पास कुत्ते और सूअर आपस में लड़ रहे थे। … मोहरिल मामा के घर में मच्छड़ों और खटमलों के अलावा छछून्दरों और चमगादड़ों का भी बड़ा भारी अड्डा था। …शहर के चौकीदारों की कर्कश और डरावनी बोली, चमगादड़ों की छटपटाहट, छछून्दरों की कचर-पचर और हजारों-हजार मच्छरों के हजारों-हजार सुइयाँ गड़ानेवाले गीत ! …. मनमोहन रात भर जगा रहा।” (पृ0-239-240)

शहर के रहन-सहन और तौर-तरीकों पर रचनाकार ध्यान आकृष्ट कराने के साथ ही रचनाकार मनमोहन के माध्यम से शहर के नामी स्कूल की शिक्षा-व्यवस्था पर भी हमारा ध्यान आकृष्ट कराता है। अररिया शहर के नामी स्कूल की कक्षा में मनमोहन जब पहली बार घुस रहा होता है तो मास्टर साहब की टिप्पणी है – “आइए जानबआलू, खाइए सप्तालू..।” जनाब आते तो हैं सभी मयूर का डैना लगाकर, मगर यहाँ आकर सभी कौए साबित होते हैं। … ठीक है, सुनिए’’ हिस्ट्री का क्लास था और नूरजहाँ के बारे में पढ़ाई हो रही थी … ‘‘नूरजहाँ जब पान .. सर ! सुना है, इस बार हम लोगों के स्कूल की ‘टीम’ ‘लूकस कप’ में नहीं खेलेगी।” मनमोहन ने देखा मास्टर साहब पढ़ाना छोड़कर फूटबॉल के बारे में गप करने लगे।” (पृ0-238)

रचनाकार इस तरह के रोचक प्रसंगों की रोचक ढंग से चर्चा सम्भवतः इसलिए कर रहा है कि शिक्षा व्यवस्था में किस तरह की कमियाँ हैं। किसी भी छात्र के लिए स्कूल का पहला दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है; और स्कूल के पहले दिन ही जब उसे इस तरह के बुरे अनुभव हों तो उस पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी। बावजूद इसके ऐसे ही वातावरण और स्कूल में मनमोहन का व्यक्तित्व निखरता है वह स्कूल ही उसे अच्छा लगने लगता है। धीरे-धीरे वह न सिर्फ छात्रों में बल्कि अध्यापकों के बीच भी लोकप्रिय होता जाता है। इसी बीच मनमोहन का सम्बन्ध स्कूल के आदर्शवादी और प्रतिभावान युवक प्रियोदा से होता है। प्रियोदा के साथ रहते हुए ही वह ‘गाँधी’ के स्वराज के सपनों से जुड़ता चला जाता है। प्रियोदा के अलावे रवीन्द्र खत्री, सूर्यनारायण, कृत्यानंद, इब्राहिम, कालु, इस्माइल, शिवनाथ आदि उसके स्कूल के मित्र बन जाते हैं और इन्हीं के बीच उसके व्यक्तित्व का विकास होता है।

उपन्यास का प्रकाशन वर्ष भले ही 1966 हो लेकिन इसमें वर्णित अधिकांश घटनाक्रम एवं प्रसंग स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास देखें तो ‘गाँधी’ इस आंदोलन के केन्द्र में थे। ‘गाँधी’ और उस समय के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े व्यक्तित्वों ने सभी भारतीयों खासकर नौजवानों को खूब प्रभावित किया था। रचना में मनमोहन के बहाने सुराज का सपना, देश और समाज की बेहतरी का सपना; किस तरह से युवाओं को प्रभावित कर रहा था, या किस तरह से वे एक बड़े लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अपने व्यक्तिगत और संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर देश के लिए; देश को आजादी दिलाने के लिए वे प्रयासरत थे; रचनाकार ने इन युवाओं के माध्यम से विस्तार से बताया है। साथ ही जीवन में घटित छोटी घटना भी किस तरह से जीवन जीने के लक्ष्य को बदल देती है उसका भी वर्णन रचनाकार ने ब्योरेबार किया है।

मनमोहन जिस मामा के यहाँ रहता है उनकी बेटी ‘शरबतिया’ का पति खद्दर पहनता था और उसकी गिनती स्कूल के प्रतिभाशाली छात्रों में होती थी; लेकिन ‘साइमन कमीशन’ के विरोध में उसने नारे लगाए; और पुलिस की मार से वह वीरगति को प्राप्त हुआ था। इसलिए एक दिन जब वह स्कूल में सीनियर क्लास के लड़के को ‘तकली’ चलाते हुए और खद्दर पहने हुए देखता है तो उसे ‘शरबतिया’ के दूल्हे की याद आ जाती है। यह घटनाक्रम मनमोहन के जीवन की दिशा बदलने में निर्णायक भूमिका निभाती है – “कालू ने कहा- ‘प्रियोदा हैं’। सेकेण्ड मास्टर साहब का सबसे छोटा बेटा। पढ़ने में बहुत तेज और भीषण साहसी…। मनमोहन की आँखों के आगे बहुत देर तक ‘प्रियोदा’ के कुर्ते पर टँकी हुई ‘गोल चकत्ती’ की तस्वीर छाई रही। जंजीर में जकड़ी एक देवी की मूर्ति। नीचे लिखा हुआ था – ‘वन्दे मातरम्’।” (पृ0-247)

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है इस रचना में रचनाकार का जोर ‘आदर्श’ पर है इसलिए पूरी रचना में रचनाकार ऐसे व्यक्तित्वों का, ऐसी घटनाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करता है जो हमारे सामने एक आदर्श उपस्थित करते हों। एक बात और भी हो सकती है कि रचनाकार का ध्यान इस रचना में कहीं-न-कहीं एक आदर्श व्यक्तित्व के निर्माण की प्रक्रिया पर भी है इसलिए भी वह ‘आदर्शवाद’ को छोड़ता नहीं है। उदाहरण के लिए इस रचना में कुछ अपवाद को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश पात्र आदर्शवादी ही हैं। कुछ छात्र जो गलत रास्ते पर थे रचनाकार ने अंततः उनके साथ बुरा होता दिखाया है, उदाहरण के लिए स्टूडेण्ट होम में रहनेवाला पूरन विश्वास जो विद्यार्थी जीवन में ही सूद पर पैसा लगाता था, या नेवले को मार दिया था, वह जब ओवरसियर बनता है तब ठेकेदार से डेढ़ हजार का घूस लेता हुआ पकड़ा जाता है। लेकिन रचना में ऐसे यथार्थवादी प्रसंग कम और बहुत संक्षेप में हैं। वहीं स्कूल के प्रिय और आदर्शवादी छात्र प्रियोदा के बारे में रचनाकार विस्तारपूर्वक बताने लगता है –

“प्रियोदा ! मैट्रिक में पढ़ता है। स्कूल के सभी लड़के और मास्टर उसको प्यार करते हैं। स्कूल ही नहीं, उस छोटे से कस्बे में उसको प्रायः सभी जानते हैं। हर रविवार की सुबह बगल में झोली लटकाकर ‘संन्यासी’ – आश्रम के लिए मुठिया वसूलने निकलता है – कभी-अकेला, कभी साथियों के साथ। स्कूल का कोई छात्र या शिक्षक बीमार पड़ा कि प्रियोदा अपनी टोली के साथ उसके घर पर हाजिर। जब तक रोगी भला-चंगा न हो जाये, उसका दल सेवा में जुटा रहता है। हर शनिवार को परमान नदी के उस पार ‘बालूचर’ पर प्रियोदा के दल के सदस्य, स्कूल की छुट्टी के बाद जमा होते हैं। खेल-कूद, गाने-बजाने के अलावा प्रियोदा दुनिया भर की खबर सुनाते हैं। रविवार का प्रोग्राम तय करते हैं, किस मुहल्ले में कौन जाएगा मुठिया वसूलने। किस बीमार की सेवा करने कौन-कौन जाएँगे।” (पृ0-254) सम्भवतः रेणु का यह शिक्षा सम्बन्धी दृष्टिकोण है कि छात्रों में शुरू से ही शिक्षा के महान उद्देश्य ‘सेवा भावना’ का विकास व्यवहारिक रूप से हो। या फिर यह भी हो सकता है कि रेणु ने अपनी इस रचना में अकाल,  महामारी और भूकम्प का जिक्र किया है; इस आपदा के समय में युवाओं की क्या भूमिका थी या होनी चाहिए; इस तरह के प्रसंगों के माध्यम से उसका वर्णन करते हैं।

प्रियोदा के गुणों से प्रभावित होकर मनमोहन भी क्लब का सदस्य होना चाहता है। “प्रियोदा ने मनमोहन को सिर से पैर तक देखकर पूछा था – भारतवर्ष के ऐसे आदमी का नाम लो जिसे लोग भगवान का अवतार समझते हैं।” – ‘महात्मा गाँधी’। बीमार लोगों की सेवा करना जानते हो?- सीख लेंगे” शाबाश ! … यदि रोगी हैजा से पीड़ित हो? मनमोहन चुप रहा। … गाना जानते हो? – जी। उसने शुरू किया –

“राम रहीम न जुदा करो भाई

दिल को सच्चा रखना जी..।” (पृ0-254)

और इस तरह क्लब के कुछ नियमों यथा अपशब्द या गाली नहीं देना जैसे नियमों को बताते हुए उसे ‘किशोर क्लब’ का सदस्य चुन लिया जाता है। यह किशोर क्लब जैसा प्रयोग निश्चित ही रेणु का सपना है जो कई आदर्शवादी नियमों से भरा हुआ है। रचनाकार ने दिखाया है कि इस क्लब से जुड़े हुए छात्र समाजसेवा के महान व्रत का आनंदपूर्वक पालन करते हैं। ‘किशोर क्लब’ से जुड़ने के बाद प्रियोदा, मनमोहन को उसके घर छोड़ने खुद जाते हैं। रास्ते में जहाँ पोस्टमार्टम हाउस था वहाँ भी प्रियोदा उसे समझाते हुए पूछते हैं – “अकेले यहाँ आ सकते हो? जी नहीं, तब प्रियोदा ने कहा – “भूत-प्रेत ऐसे आदमी को कभी नहीं तंग करता, जो ‘दस’ का काम करता हो। ‘दस’ और ‘देश’ का काम करनेवाला तो खुद ‘भूत’ होता है – उसको भूत क्या कर सकता है?” (पृ0-256)

इस तरह के प्रशिक्षण और वातावरण का प्रभाव मनमोहन या क्लब के अन्य छात्रों पर ऐसा होता है कि जब महात्मा गाँधी गिरफ्तार होते हैं तो वह उन गिने-चुने विद्यार्थियों में सम्मिलित होता है जो इसके विरोधस्वरूप हड़ताल करते हैं। हड़ताल करने की सजा भी उन्हें मिलती है। हड़ताल में भाग लेने वाले छात्रों को बेंत से मारने की सजा मिलती है। बेंत की मार से मनमोहन के हाथों से खून निकलने लगता है फिर भी ‘वन्दे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते रहता है। देखते-देखते मनमोहन न सिर्फ स्कूल का बल्कि उस क्षेत्र का हीरो बन जाता है। रचनाकार ने मनमोहन की माँ द्वारा देखे हुए एक स्वप्न का जिक्र किया है। बचपन में मनमोहन बहुत गंभीर रूप से बीमार पड़ा था। उसके बचने की संभावना न के बराबर थी; उसी समय उसकी माँ ने एक सपना देखा जिसमें एक जटाधारी बाबा उससे पूछते हैं कि यह किसका पुत्र है यह कहने पर कि यह मेरा पुत्र है उसका गला दबाने लगते हैं और जब उसकी माँ कहती है कि आपका पुत्र है तब मनमोहन स्वस्थ होने लगता है। उसी दिन से मनमोहन की माँ मनमोहन को पराया पुत्र मानने लगती है। इस प्रसंग के माध्यम से रचनाकार कहीं-न-कहीं यह संकेत करना चाह रहा है कि कुछ लोग इस धरती पर सिर्फ अपने घर-परिवार की सेवा के निमित्त न आकर देश-समाज की सेवा के निमित्त आते हैं। मनमोहन भी उनमें एक है।

मनमोहन को घर से जो ‘स्कॉट’ के कपड़े के लिए पैसे मिलते हैं उससे वह खद्दड़ का ‘सुराजी’ कपड़ा खरीद लाता है। जिससे मोहरिल मामा के घर के सभी सदस्य डर जाते हैं। सूचना मनमोहन के घर भी दी जाती है; मनमोहन के बाबूजी इससे नाराज तो नहीं होते लेकिन ये जरूर कहते हैं कि पढ़-लिखकर वकील बनना … लेकिन वह कहता है कि “मैं मनमोहन ही रहना चाहता हूँ।” इस प्रकार से मनमोहन के क्रांतिकारी व्यक्तित्व का निर्माण होता है। रचनाकार ने दिखाया है कि जो मनमोहन के चाचा मान रहे थे कि प्रियोदा जैसे लोगों की संगति में वह बिगड़ जाएगा, वही चाचा बाद के दिनों में खुद भी न सिर्फ सुराज आंदोलन से जुड़ते हैं बल्कि जेल भी जाते हैं। देखा जाए तो रचना में भी सुराज का प्रश्न सिर्फ छात्रों-युवाओं का प्रश्न नहीं है बल्कि इसके प्रभाव में आम सामान्य जन भी धीरे-धीरे आते जाते हैं। यही कारण है कि रचनाकार ने यह दिखाया है कि गाँधी जी के गिरफ्तार होने की खबर मिलते ही छात्र और सामान्य जन भी अपने-अपने ढंग से हड़ताल का समर्थन करते दिखते हैं। गाँधी के विचारों से लोग इतने प्रभावित हैं कि गाँधी द्वारा सुझाये रास्ते पर भी चलने की कोशिश में दारू-शराब की दुकान का विरोध करते हुए जेल तक जाने को तैयार रहते हैं। विचारणीय यह भी है कि खुद मनमोहन जिस मोहरिल मामा के यहाँ रहता है उस परिवार के सदस्य भी बराबर दारू पीते हैं लेकिन रचना में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं आया है कि मनमोहन ने कभी भी मोहरिल मामा का इस मुद्दे पर विरोध किया हो। हाँ ये जरूर है कि वह इन चीजों को बिल्कुल नापसंद करता है।

जो भी हो, प्रियोदा जब मैट्रिक की परीक्षा देनेवाले होता है, तब ‘किशोर-क्लब’ के लिए नए संचालक का चुनाव होता है और मनमोहन उम्र में छोटा होते हुए भी सर्वसम्मति से ‘किशोर क्लब’ का संचालक चुन लिया जाता है। इस अवसर पर इब्राहीम तुकबन्दी करते हुए गाता है – “सबसे छोटा वीर-बहादुर / प्यारा साथी मोना / मिट्टी को भी छू दे तो / हो जाएगी सोना ..।’’ (पृ0-279) इसी बीच छुट्टी में जब वह गाँव जाता है तो गाँव के आकर्षण में खो जाता है लेकिन सभी आंदोलन धर्मी दोस्तों की उसे याद भी आते रहती है, इसलिए जल्दी ही वह शहर लौट जाता है। उसकी दीदी शरबतिया बताती है कि मौलवी मास्टर हफीज साहब पगला गए हैं तब वह प्रियोदा के साथ हफीज साहब को देखने जाता है उनके चारों ओर भीड़ लगी है – वे कह रहे हैं – पागलों ! चर्खा कातो, कपास उपजाओ, फिर तुरन्त अपनी आवाज को मद्धिम करके गाने लगते हैं – “मोरा चरखा के ना टूटे तार। चरखवा चालू रहे / … चरखा चलावे गाँधी महतमा / थर-थर काँपे सरकार अँगरेजियाँ / पलटन करे तैयार जुलुमियाँ / … चरखवा चालू रहे …।’’ (पृ0-285) मनमोहन ने एक बात पर ध्यान दिया कि पहले हफीज साहब हमेशा महात्मा गाँधी को ‘मिस्टर गाँधी’ कहते थे। अब ‘गाँधी महात्मा’ कहते हैं। (पृ-0-286) कहीं-न-कहीं यह प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि गाँधी का प्रभाव आम लोगों पर धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। लेकिन मनमोहन सोचता है कि अब हिस्ट्री कौन पढ़ाएगा .. ‘नूरजहाँ जब पान खाती थी…|’

रचना में रचनाकार जहाँ सुराज आन्दोलन के प्रति लोगों, युवाओं के मन में उसके बढ़ते प्रभाव का चित्रण करता है वहीं बार-बार शिक्षा के महत्व की ओर भी इशारा करता रहता है। रचनाकार सुराज आंदोलन के साथ-साथ शिक्षा पर भी उतना ही जोर देता है। यही कारण है कि ‘स्टूडेन्ट होम’ का संचालक बनने के बाद उसे संन्यासी महाराज जी समझाते हुए कहते हैं – ‘‘कभी ‘झोंक’ में आकर तुम भी पढ़ना-लिखना मत छोड़ बैठना … अभी सीधे बढ़े चलो। राह में छाँव में कहीं बैठना नहीं है। कितने चौराहे आएँगे। न दाएँ मुड़ना न बाएँ, सीधे चलते जाना।’’ … यही कारण है कि स्टूडेन्ट्स होम में रहते हुए इस एक साल में ही मनमोहन ने कितने चौराहे पार किये … बिना अगल-बगल देखे .. आगे बढ़ आया है। बढ़ता जाता है।’’ (पृ0-296) कहना न होगा कि उपन्यास का शीर्षक भी इसी बात की ओर इशारा करता है लेकिन जीवन में कुछ घटनाएँ अनायास ही ऐसी घट जाती है जिसका प्रभाव बाद में प्रतिकूल भी पड़ता है जैसा कि मनमोहन के साथ घटित होता है। जब वह भिक्षाटन के निमित्त कालीबाजार में दीपू और तपू के घर जाता है तो भिक्षा उसकी दीदी की बड़ी बेटी नीलिमा लेकर आती है उसे देखते ही मनमोहन को लगा – ‘साक्षात भगवती दुर्गा की प्रतिमा’। इसके बाद तो मनमोहन बराबर दीपू और तपू के यहाँ जाने लगा। यह घटना उसके जीवन में चौराहे के रूप में साबित होती है।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है यह संपूर्ण उपन्यास जीवन के महान आदर्श को लेकर लिखा गया है जिनमें देश की सेवा और मानव सेवा प्रमुख है। उपन्यास के कथानक के अनुसार 15 जनवरी 1934 को भूकंप आता है। सारे उत्तर बिहार में त्राहि-त्राहि मच गई। महात्मा गाँधी के साथ तमाम राजनीतिक बंदियों को और क्रांतिकारियों को लोगों की सेवा के लिए रिहा कर दिया जाता है। मनमोहन भी अपने जत्था के साथ सेवा के निमित्त चला। चलते समय सुनील महाराज ने कहा – ‘आदमी की सेवा नहीं, भगवान की सेवा करने जा रहा है’। ‘‘तस्वीरों से भी भयंकर दृश्य, जिसकी कल्पना भी नहीं की थी मनमोहन ने। चारोँ ओर खण्डहर … आह-कराह, दुर्गन्ध..महाश्मशान।’’ ऐसे समय में गाँधी जब पहुँचते हैं – हजारों अभागों के चेहरे पर एक हल्की सी आभा छिटक जाती है, ‘‘गाँधीजी आए हैं।’’ मनमोहन ने पहली बार इस महामानव को देखा। अचानक स्वयंसेवकों की एक टोली के साथ महात्माजी उसके वार्ड में आए। गाँधीजी ने मनमोहन से पूछा .. क्या बाँट रहे हो? ‘बार्ली’ – सेवा करो। परमेश्वर की सेवा है यह तो।’’ (पृ0-302) डेढ़ महीने की सेवा के बाद मनमोहन जब सेवादल के साथ लौट रहा था, उसे लगा न जाने कितने आत्मीय स्वजनों से बिछुड़कर वह परदेश जा रहा है।

इस बीच राष्ट्रीय मानस को झकझोर देनेवाली कुछ और घटनाएँ घटती हैं जिसके बारे में रचनाकार ने रचना में संकेत किया है। भगत सिंह को फाँसी दी जाती है; जेल में 62 दिनों के अनशन के बाद यतीनदास की मृत्यु हो जाती है। स्वतंत्रता की कामना को लेकर जगह-जगह आंदोलन होने लगे। स्कूल के मैदान में विधिपूर्वक ‘तिरंगा झंडा’ फहराया गया। पुष्प-वृष्टि के साथ तिरंगा झंडा अररिया-कोर्ट के आकाश में भी लहराया। 1936 ई0 में ‘शहीद-बालिका-विद्यालय’ के शिलान्यास का कार्यक्रम बना। इस अवसर पर नीलिमा अपनी सहेलियों के साथ ‘वंदे मातरम्’ गीत गाती है। मनमोहन ‘साइमन कमीशन’ के विरोध में शहीद हुए सुन्दर सहाय की विधवा शरबतिया सहाय से शिलान्यास कराने का सुझाव देता है जिसे मान लिया जाता है।

रचनाकार ने दिखाया है कि स्वतंत्रता की राह पर देश तेजी से आगे बढ़ रहा होता है इसी बीच सांप्रदायिक दंगा करवाने में अंग्रेज सफल हो जाते हैं। गाड़ीवान-पट्टी में पहुँचकर लोगों ने देखा, आग लगी नहीं,लगाई गई है। लगाई जा रही है। घर फूँके जा रहे हैं। मार-काट हो रही है। हफीज साहब और सूर्यनारायण की हालत चिंताजनक है। उपन्यास का पूरा घटनाक्रम अररिया जिले का है लेकिन कुछ-कुछ घटनाक्रमों का वर्णन ऐसा है जिसका सम्बन्ध अररिया से नहीं है। उदाहरण के लिए हम सभी जानते हैं कि पत्रकारिता और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े गणेशशंकर विद्यार्थी कानपुर में सांप्रदायिक दंगे में शहीद हुए थे; रचनाकार ने अररिया में हुए सांप्रदायिक दंगे में गणेशशंकर विद्यार्थी का जिक्र किया है। ‘‘सुबह को मनमोहन ने बड़े महाराज से कहा – महाराज जी ! मैंने .. रात में गणेशशंकर विद्यार्थी की .. छाया … या .. पता नहीं क्या .. लेकिन मैंने साफ-साफ देखा … ठीक गणेशशंकर विद्यार्थी जैसा आदमी इस शहर में तो कभी नहीं देखा …।’’ (पृ0-310)

तथ्यात्मक रूप से यह बात गलत होते हुए भी रचनाकार इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि जगह-जगह गणेशशंकर विद्यार्थी जैसे महान लोग थे जो सांप्रदायिकता को रोकने की भरसक कोशिश कर रहे थे। इस सांप्रदायिक दंगे में सूर्यनारायण और हफीज साहब नहीं बच पाते। ‘‘अर्थी पर प्रसन्न-मुख सूर्यनारायण सोया है – फूल-मालाओं के ढेर पर, तिरंगा कफन ओढ़े … चौराहे पर दूसरी अर्थी आकर मिल गई। इस ‘मौन जुलुस’ के साथ हफीज साहब का जनाजा .. तिरंगे झंडे के कफन के पास उनका प्यारा चरखा … हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई। ‘‘राम-रहीम ना जुदा करो भाई’’ मनमोहन ने गाना शुरू किया – ‘‘मोरे चरखा के ना टूटे तार, चरखवा चालू रहे..।’’ (पृ0-311)

राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के निर्णायक वर्ष में 1942 का विशेष महत्व है। बम्बई में कांग्रेस ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव पारित किया था। देश के सामने ‘करो या मरो’ का नारा उपस्थित था। रचनाकार ने दिखाया है कि इस आंदोलन का प्रभाव किस तरह से अररिया में भी पड़ा। ‘‘पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण चारों ओर बिखर गए सभी साथी। तय हुआ, परसों हर सदस्य अपने साथ स्कूल के विद्यार्थियों के जत्थे लेकर अररिया कोर्ट आएगा। दस बजे से पहले। ट्रेजरी और कचहरी पर झंडा फहराना होगा। .. ऐ अंग्रेजों, भारत छोड़ो। … हम झंडा फहराकर वही लौटेंगे। आगे बढ़ोगे तो गोली मार दी जाएगी। कृत्या ! .. मेरे बाद तुम हो। झंडा जमीन पर गिरने मत देना। महात्मा गाँधी की जय ! और इस प्रकार पहले प्रियोदा। फिर कृत्या – मोनादा ! मोनादा !! तपू मामा कोथाय ? दीपू मामा कोथाय। कृत्या ने पुकारा मो … ना !.. अब मोना की बारी है। नीलू मुझे छोड़ो … ना छोड़बो ना – दीपू मा-मा-मा ! अशर्फी आगे बढ़कर झंडा सँभालता है। .. ट्रट्ठाँय ! मोना .. झंडा न झुके !!

मोना कहाँ ? भोला ने झंडा सँभाला। ट्रट्ठाँय … फिर तपू ..तपू चढ़ गया ट्रेजरी के ऊपर ! झंडा लहराने लगा- तिरंगा झंडा ! राष्ट्रध्वज ! वन्दे मातरम्..ट्रट्ठाँय। तपू नीचे गिरा। …..

भोला के बाद तपू .. तपू का लिस्ट में नाम नहीं था .. ‘परमान नदी के किनारे पर एक साथ पाँच चिताएँ धू-धूकर जल उठीं। चिता में आग देने के समय मोना ने कहा था, मैं जिंदगी-भर जलता रहूँगा तुम्हारी चिताओं की आग कलेजे में लेकर … मैं दोषी हूँ। … अनुशासन भंग किया है मैंने।’’ (पृ0-315) .. पाँच-पाँच चिताओं की आग में झुलसता हुआ मनमोहन,पाँच साल तक जेल और सेल में यही बुदबुदाता रहा – नीलू नहीं होती तो इस ग्लानि की आग में क्यों तपता ? जेल से निकलकर मनमोहन ने बाबूजी और काका के नाम पत्र लिखा – ‘‘मुझे क्षमा करें। मैं ‘गृहस्थ’ होने योग्य नहीं। … मैं अपना नाम, गोत्र, जाति, जाति-संस्कार सब कुछ का परित्याग कर दूसरी बार जन्म लेने जा रहा हूँ। देश शीघ्र ही आजाद होगा। गुनीजी की पढ़ाई-लिखाई मेरे कारण बन्द न हो। पुष्पी.. !’’ (पृ0-314-315)

और इस प्रकार पश्चाताप की आग में जलता हुआ मनमोहन देहरादून स्टूडेण्ड्स होम का सेक्रेटरी स्वामी सच्चिदानंद के रूप में भारत माँ की सेवा में लगा हुआ है। लेकिन उसके हृदय का दाह नहीं बुझता। 1965 का युद्ध थम चुका है। भारत के वीर जवानों की बहादुरी की कहानियाँ सुनकर उसे भरोसा होता था कि भारत के उन महान पुरुषों ने ऊसर में बीज नहीं बोए थे।… ‘‘ स्वामी सच्चिदानन्द की दृष्टि एक समाचार पर टिक जाती है। फ्लाइट लेफ्टिनेन्ट जे. मोहन ने शत्रु के तीन-तीन टैंकों का सफाया करते हुए विमान में हुए विस्फोट से उसकी मृत्यु… ‘अब उसकी लाश उसकी जन्मभूमि पर’ …’’ (पृ0-316) स्वामी सच्चिदानन्द ने जब देखा कि वह लेफ्टिनेन्ट उनका छोटा भाई जनमोहन है तो उसे लगता है कि – पाँच-पाँच चिताओं की आग में एक युग से झुलसते हुए हृदय पर चन्दन लेप रहा है कोई।’’ (पृ0-317)

इस प्रकार संपूर्ण उपन्यास स्वाधीनता आंदोलन का औपन्यासिक दस्तावेज जैसा है। मनमोहन के बहाने राष्ट्रीय बोध के विकासक्रम का उपन्यास है। इस विकासक्रम में अनेक चौराहे आते हैं। उस चौराहे पर कभी हम चूक जाते हैं तो कभी निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं। रचनाकार कहीं न कहीं आह्वान करता है कि परिस्थिति या समय चाहे जो भी हो, हम निरंतर देश सेवा, समाज सेवा में लगे रहें – ‘‘मोरे चरखवा के ना टूटे तार … चरखवा चालू रहे।’’ यह तार टूटनी नहीं चाहिए। कभी गाँधी के रूप में तो कभी किसी और के रूप में। बड़ा रचनाकार बड़े लक्ष्यों को लेकर रचना करता है। देश सेवा, समाज सेवा हमेशा से बड़े और आवश्यक प्रश्न रहे हैं। इसलिए ‘रेणु’ ने इस बड़े उद्देश्य को लेकर यह रचना की है ताकि हर आने वाली पीढ़ी के अंदर इस तरह की भावना का विकास हो। कहना न होगा कि रचनाकार इसमें बखूबी सफल रहा है।

भाषा शैली के दृष्टिकोण से देखा जाए तो रचनाकार ने बिल्कुल सरल, सहज भाषा का इस्तेमाल किया है। गीतों और नारों का प्रयोग जो रेणु की एक खास पहचान है उसका प्रयोग भी रचनाकार ने जगह-जगह बहुत ही सार्थक ढंग से किया है – ‘‘आम के बागों में ‘मड़ैया’ के पास लोग बैठे हैं। जेठ के शुरू में पकनेवाले आमों का रंग बदल गया है। जोते हुए खेतों से सोंधी महक आ रही है। पाट के खेतों में ‘कमौनी’ करते हुए मजदूर मिल-जुलकर ‘लगनी’ गीत गा रहे हैं – कौन बने भीगे राम रे रामचनर कि / कौन बने भींगे लखन – भा-य-य-य / कौन बने भींगे राम रे सीया सुकुमारी / भइया के मन कल-पा-य-य !’’ (पृ0-283) कहावतों, लोकोक्तियों का प्रयोग भी रचनाकार ने प्रसंगवश बड़े ही रोचक ढंग से किया है यथा – “जब गुड़ गंजन सहे, मिसरी नाम धराए।”

देखा जाए तो आजादी के बाद का दौर रचनाकारों को कभी-कभी उल्लसित करता था तो कभी-कभी निराश करता था। तत्कालीन बड़े राजनेताओं को देखने पर उनमें अवश्य आशा का नवसंचार होता होगा तो यथार्थ की कठोर धरती को देखने पर उनके सपने टूटते होंगे। वह खुद को एक ऐसे चौराहे पर पाते होंगे जिसकी दिशा तय नहीं। रेणु ने भी खुद को भी एक चौराहे पर पाया और उपन्यास के अंत होते-होते अपने आदर्शवादी स्वप्न की परिणती के रूप में ‘स्टूडेंट होम’ का गठन किया। ठीक वैसे ही जैसे ‘प्रेमचन्द’ अपनी रचनाओं में अपने आदर्श को कभी ‘सेवासदन’ के रूप में मूर्तिमान करते हैं तो कभी ‘प्रेमाश्रम’ के रूप में। ‘रेणु’ का ‘स्टूडेंट होम’ इसी प्रकार का एक आदर्श है। यथार्थ की आँच में तपे वर्तमान को यह पसन्द आए या न आए, एक साहित्यकार ने और केवल साहित्यकार ही नहीं एक ‘आंदोलनधर्मी,’ ‘धरती के धनी’, साहित्यकार रेणु ने बीच चौराहे पर अपना सपना रख दिया है।

अर्जुन कुमार

जन्म: 5 दिसम्बर,1980.

पत्रिकाओं में छिटपुट लेखन

सम्प्रति: असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, विश्वभारती, शान्तिनिकेतन (प.बं.)

सम्पर्क +919749973864, arjunkumarbhu@gmail.com

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samved

साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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