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कथा संवेद

कथा संवेद – 8

 

इस कहानी को आप कथाकार की आवाज में नीचे दिये गये वीडियो से सुन भी सकते हैं:


लोक के उपादानों से कहानियाँ सिरजने वाले प्रेम रंजन अनिमेष का जन्म 18 अप्रैल 1968 को आरा, भोजपुर  (बिहार) में हुआ। कविता और कहानी दोनों ही विधाओं में समान रूप से सक्रिय प्रेमरंजन अनिमेष की ‘तमाशबीन’ और ‘पेड़ होती हुई लड़की’ जैसी शुरुआती कहानियाँ 1988-89 के दौरान वर्तमान साहित्य में प्रकाशित हुईं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अबतक इनकी तीस से ज्यादा कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। विगत तीन दशकों से रचनात्मक रूप से सतत सक्रिय इस कवि-कथाकार के पाँच कविता-संग्रह ‘मिट्टी के फल’, ‘कोई नया समाचार’, ‘संगत’, ‘अंधेरे में अंताक्षरी’ और ‘बिना मुंडेर की छत’ प्रकाशित हैं। सुर और स्वर के धनी अनिमेष के तीन अलबम ‘माँओं की खोई लोरियाँ’, ‘धानी सा’ और ‘एक सौगात’ भी जारी हो चुके हैं।

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मूल कारण विश्लेषण (Root Cause Analysis) की तकनीक का प्रयोग करते हुये लोक कथा की शैली में लिखी गई कहानी ‘जानी है जब जान पियारे’ का रचनात्मक सौन्दर्य सबसे पहले हमारा ध्यान खींचता है। स्वप्न, फंतासी और जादू के रचनात्मक उपकरणों का समस्या पूर्ति के जटिल प्रश्नों की तरह नहीं, बल्कि रस और औत्सुक्य की स्वादपरक डली की तरह व्यवहार में लाना इस कहानी की संरचना को विशिष्ट बनाता है। कौआ, कविता और किस्सागोई के तीन सूत्रों से बुनी गई यह कहानी समाज के आखिरी या सबसे कमजोर व्यक्ति की ताकत और जिजीविषा को रेखांकित करते हुये बड़ी सहजता से लोकल और ग्लोबल के अंतर्संबंधों तथा दुरभिसंधियों का उद्घाटन करती है। घरेलू हिंसा से लेकर रंगभेद तक की नाड़ी पर किसी कुशल वैद्य की तरह उंगली रखने वाली यह कहानी वाचिक और लिखित के बीच जिस सेतु का निर्माण करती है वह इसे बच्चों और बालिगों दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण बना देता है। बचपन में भरी साँझ दादी-नानी से सुनी गई बढ़ई और गौरैये की कहानी के रस, रूप और गंध से सिक्त यह कहानी समकालीन वैश्विक आर्थिक राजनैतिक परिदृश्य का एक बड़ा रूपक है, जो सत्ता और प्रतिपक्ष दोनों की समीक्षा करता है।

राकेश बिहारी

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जानी है जब जान पियारे…

  प्रेम रंजन अनिमेष

 

कभी पहले वहले की बात है। अभी तो यह बात हो ही नहीं सकती। आज कुल मिला कर हालात काफी बेहतर हैं। जिधर देखें उधर… दीवारों पर क्या हर दृश्यपटल पर… परिवर्तन के पोस्टर आते नजर! लोकतंत्र की शीतलछाया में देश सुख शांति से सँभल सँभल कर चल रहा है। तब की बात कुछ और थी मगर…! तो उस गये गुजरे जमाने के एक गाँव में आमलाल नाम का एक आम आदमी रहता था। दो बेटे थे उसके। रामलाल और श्यामलाल! जैसी उस परिवार में परिपाटी सी थी कि अगर दो या दो से अधिक हुए तो एक बेटा इसी तरह रह जाता। सो श्यामलाल का कुछ न हुआ। अलबत्ता रामलाल की ही कृपा से रामलाल के दो बेटे हुए। एक चुस्त एक हल्का सुस्त। उसी हिसाब से नाम भी पड़े – आरामलाल और कामलाल। इन दिनों की तरह हिंगलिश उस जमाने का हिस्सा होता तो क्या पता कामलाल को कोई काम‘रेड’ भी कह देता! लेकिन वह तो एक बच्चा था बिचारा…। अपने मरने से पहले किसी तरह शहर जाने वाली गाड़ी में उसे बिठाते  माँ ने कहा था कि चला जाये। इधर रहा तो उन्हीं की तरह मर खप जायेगा। उधर जाकर कहीं शांति से रहे और जिंदगी जिये। आदमी बनने का जतन करते। और जो हुआ माँ बाप के साथ भूल जाये। किसी सूरत में उनके बदले का खयाल दिल में न लाये। बल्कि आने भी न दे…।

कुलबुल कौवा काँव काँव करने लगा राजू चाभी वाले की काठ की पेटी पर बैठ कर। ‘राजू चाभी वाला’ एक पद या पीठ सदृश था। राह किनारे खंभे पर तख्ती लगी हुई थी। जो वहाँ आकर बैठ जाता और ताले ठीक करने चाभियाँ बनाने का काम सँभाल लेता बन जाता राजू चाभी वाला! इस शृंखला की नवीनतम कड़ी यह राजू था। वय में होगा कामलाल से कुछ बड़ा। कौवा क्या कह रहा कुछ समझ नहीं पाया। उसे समझने को कामलाल का कलेजा चाहिए था। उसी का दुलारा था सो वही समझता। पर राजू के पल्ले इतना जरूर पड़ा कि कहीं कामलाल को कुछ कठिनाई थी। जाना चाहिए उसके पास। गया तो ज्वर में तपता पाया उसे। बोलने में भी तकलीफ हो रही थी। किसी तरह कहा कामलाल ने कि पेटी से कुछ पैसे निकाल कर दे दे ताकि हकीम जी से बुखार की दवा ले सके। पेटी थी और ताला ताली भी इसलिए पैसे जब कुछ जुड़ें राजू के पास रख देता।

राजू को उसकी हालत देखकर लगा कि यह मामूली बुखार नहीं। वैसे भी इन दिनों शहर में नया अजब गजब बुखार फैला हुआ था जिसके बारे में बताया जा रहा था कि कहीं बाहर से आया है और कई मामलों में जानलेवा साबित हुआ है। उसने हिदायत दी कि बेहतर होगा वह अगले जमाने के जाँचघर में अपने खून की जाँच करा ले। मँहगा हुआ तो क्या वह अपनी ओर से भी पैसे मिला देगा। लेकिन जान जोखिम में डालना ठीक नहीं। इलाज ढंग से कराना जरूरी है। बहुत समझाने बुझाने के बाद किसी तरह कामलाल को जाँच के लिए तैयार कर पाया।

पैसा भी दे आया कामलाल और खून भी। जाँच का नतीजा आना बाकी था मगर बुखार और सिरदर्द बढ़ता ही जा रहा था। यह हालत भी नहीं थी कि जाकर रिपोर्ट ले आ सके। कुलबुल कौवे ने देखा तो खुद उड़कर जाँचघर पहुँचा। चोंच में पर्ची लिये काउंटर पर जाकर लगा काँव काँव करने। रिपोर्ट देने वाले कर्मचारी ने कुछ जाना न समझा लाठी डंडा हुरपेट कर उसे बेलगा दिया। हारकर लड़खड़ाते कँपकँपाते कामलाल ही पहुँचा वहाँ। हालाँकि राजू ने कहा था कि नहीं तो कल लौटते में वह लेता आयेगा। आज कहीं जाना पड़ा था उसे काम से।

रिपोर्ट देने वाली महिला को कुछ सहानुभूति हुई। किसी अच्छे डाक्टर से दिखा लेना – उसने कहा। यहाँ क्या नहीं कोई देखने वाला ? कँपकँपी दबाते हुए कामलाल ने पूछा।

‘नहीं। यहाँ खाली जाँच होती है। यहाँ डॉक्टर हैं। पर उनका समय बँधा है। और फीस भी। जमा कर दो तो नंबर लगा देंगे आगे का।’

‘पैसे कहाँ हैं! यही जुटाये थे किसी तरह।’

‘पैसे नहीं तो फिर जनता अस्पताल जाकर देखो। दिखाना तो पड़ेगा…।’

‘क्यों…जाँच में कुछ निकला है क्या ?’ दर्द से कराहते कामलाल ने कहा।

‘निकला है न! वही अजब गजब बुखार जो इन दिनों दहशत फैला रहा।

चित्र : प्रवेश सोनी

जनता अस्पताल के डॉक्टर ने रिपोर्ट देखकर उसकी ओर देखा। सिर से पैर तक। पूछा फिर – ‘सूअर की चर्बी तो नहीं खायी हाल फिलहाल में ?’

‘घास फूस ही खाता हूँ मैं तो!’

‘क्या बाहर कहीं गये थे पिछले कुछ दिनों में ?

‘बाहर मतलब… घर से बाहर ही तो निकला हूँ।’ कामलाल ने कहा।

‘वो नहीं। कहने का मतलब कि परदेस कहीं…?’

‘उतनी हमारी उड़ान कहाँ। मेरी क्या उतना तो कुलबुल भी नहीं गया होगा।’

‘अब यह कुलबुल कौन है ?’

‘कौवा है। साथ रहता है।’

‘कौवे के साथ रहते हो ? फिर तो यह बुखार उसी से हुआ है। वह बैठा होगा घूरे पर किसी सूअर की पीठ पर। और फिर तुमने छुआ होगा उसे। तुम जैसे लापरवाह लोग ऐसे ही बीमारी लाते हो फिर फैलाते हो।’ जाँच पर्ची पटकते कहा चिकित्सक ने।

‘कुछ दवा तो होगी। सुना है जनता अस्पताल में व्यवस्था है!’ कामलाल ने देखा उम्मीद भरी नजरों से।

‘व्यवस्था और जनता…? इंतजाम कहने के लिए है। कुछ चुने हुए राजकीय अस्पतालों में। और न तुम चुने हुए हो न यह अस्पताल। दवायें बाहर से ही लेनी होंगी अगर खरीदने की औकात हुई। क्योंकि हैं महँगी…।’

कुछ कहते बना नहीं कामलाल से। वह चुप रहा। ‘अब अजब गजब का बुखार है फिर तो जान की खैर!’ तनिक छोह से कहा चारागर ने। ‘दवायें लेकर ठीक होना भी  दूभर। क्योंकि दवायें ये हैं ही नहीं गरीबों के लिए। फिर कायदे से ये बीमारियाँ भी औकात वालों को ही पकड़नी चाहिए। पता नहीं ऊपरवाला ऐसी बीमारियाँ बाँटता क्यों है उन्हें जो पहले से दीन दुखियारे। शायद पहले ऊपर उठाने के लिए। जान तो जानी ही है एक दिन। मान कर चलो कि चली। बच गयी तो बढ़िया…!’

न जाने क्यों उसकी सूरत देखकर कुछ तरस आ गया चिकित्सक को। उन्हें तो नहीं आया जिन्होंने उसके बाप को मौत के घाट पहुँचा दिया था। जबकि कहते सब यही थे उसका चेहरा बिल्कुल अपने बाप की तरह था।

‘वैसे यह अजब बुखार वुखार भी दवा बनाने वालों का मँहगी दवायें बेचने का जुगाड़ ही जान पड़ता है। वरना तो मामूली ज्वर से भी कितने गरीब गुरबा गुजर जाया करते हैं हर मौसम में। इन नयी अजनबी बीमारियों की बनिस्पत कहीं ज्यादा। पर वह नहीं कोई गिनने पूछने वाला। उनका इस तरह प्रचार नहीं होता कहीं…।’

लौटते हुए शरीर से बेहद कमजोर महसूस कर रहा था वह मगर मन से मजबूत। जान जाने का डर जा चुका था। मान लिया था कि जा सकती है कभी। लिहाजा डर अब कोई था नहीं। उससे अधिक फिक्र तो कुलबुल को थी। रात भर पास से गया नहीं। दुबका रहा वहीं। लगा रहा ज्वर से तपती उसकी देह से। राजू भी आया था रात में। कहा कि अपने सारे पैसे मिलाकर मँहगी दवा खरीदने की कोशिश करेगा। पर कामलाल ने मना कर दिया। अजब गजब बुखार हुआ हो तो हो। जानी होगी जान तो दवा खाकर भी चली जायेगी। इसलिए हकीम वाली सस्ती दवा लेने से भी अब मना कर दिया। एक बार डर से उबर लिया तो फिर क्या! अब उसे पार कर दूसरी ओर उतर चुका था। हार कर राजू ब्रेड वगैरह जो उसके लिए लेकर आया था रख गया। कामलाल ने खाया भी नहीं। कुलबुल को दे दिया। कुलबुल कैसे खा लेता भला ? उससे भी खाया नहीं गया। पेट सोन्हाये रह गये रात भर दोनों। उसी ताप में तपते। उसी आग में जलते…।

 

जिंदगी सुख चैन से तो नहीं पर गुजर रही थी गाँव में। कामलाल का बापू रामलाल बड़के मलिकार का बनिहार था। लुगाई रामलाल की वहीं घर के काम किया करती। बड़े मालिक ने खाट पकड़ ली तो सब कुछ छोटके मलिकार के हाथ आ गया। छोटका मलिकार सचमुच एक छोटे से भी छोटे यानी नीच कोटि के आदमी का नाम था। कायर भीरू लोलुप। रामलालबो कही जाने वाली रामलाल की जोरू दो बच्चों वाली होने के बाद भी ‘खपसूरत’ थी। छोटका मलिकार ने उसके लिए लार टपकानी शुरू की तो एक रोज सबक सिखा कसकर उसकी दुम ऐंठ वह बैठ गयी हमेशा के लिए अपनी झोंपड़ी में। ग्लानि तब भी नहीं हुई उस प्राणी को। बल्कि बदला निकालने के लिए कुटिलता में वह रामलाल के कान भरने लगा। कि उसका बड़ा बेटा आरामलाल सच में बड़के मलिकार की ‘देन’ है! जरा गौर कर वह उसके रंग रूप देखे…  उसकी चाल ढाल और उसका मिजाज! क्या वह कहीं से रामलाल की तरह है ? कैसा गोरा चिट्टा है और आरामपसंद…!

शुरू शुरू में तो असर न हुआ पर घिसते घिसते आखिर पत्थर पर लकीर पड़ ही गयी। संदेह धीरे धीरे सदेह रामलाल के भीतर उतरने लगा और अंततः पूरा पैठ गया। आरामलाल का रंग रूप उसका उठना बैठना बोलना चालना रहना खाना सब विजातीय जैसे लगने लगे। उसकी सुस्ती भी बड़ों के खून और तबीयत का असर जान पड़ती। और लुगाई की भोली मुसकान चतुर शातिर मेहरिया का दिलफरेब जाल! धीरे धीरे छोटका मलिकार द्वारा भरा जहर सारे शरीर में फैल गया – उसकी नस नस और दिल दिमाग पर काबिज होता – और फिर तो वह पूरा पगला ही गया। उसी बावलेपन में एक रात उसने घरनी और बड़े बेटे दोनों को जहर दे दिया और आप छोटे मलिकार के दुआर पर जाकर फँसरी लगा ली। मासूम आरामलाल तो नींद में ही चल बसा पर माई उसकी जहर से मरी नहीं। बुरी तरह बीमार जरूर हो गयी। उसे लगा कि एक जो बेटा बचा हुआ है वह भी उधर रहा तो बीमार हो जायेगा या छोटका मलिकार का शिकार! सो सारी सकत जुटा उठी एक दिन और आखिर साँस रहते समझा बुझा कर राजधानी जाने वाली रेल पर बिठा दिया कामलाल को। माई ने मना किया था इस बारे में सोचने को फिर भी कभी सोचता तो बचपन से यही एक यह बात खटकती जहन में – मरना ही था तो बापू ऐसे क्यों मरा ? कुछ कर गुजरा क्यों नहीं ? कम से कम एक उस बुराई से टकरा कर उसकी जड़ हिलगा कर जाता जिसने लगभग खत्म कर दिया था उसका परिवार सारा…!

चित्र : प्रवेश सोनी

कुलबुल उससे लगा दुबका हुआ था। और वह ज्वर में बर्राते हुए मानो कुलबुल के पंख लेकर तैर रहा था विचरण कर रहा था आसमान में… दुनिया को विहंगम दृष्टि से देखता। जान जानी है तो जाये। पर यूँ ही नहीं! जाने से पहले कुछ कर जाने की तमन्ना जाग रही थी आधी नींद में। माँ ने उनके साथ जो हुआ उसके बदले की बात सोचने से बरजा था। इसलिए अपना बदला नहीं… दुनिया को बदलने की बात सोच रहा था। जितना हो सके। जान जाने से पहले! डर तो अब था नहीं। बस हौसला… अंदर से उमगकर लहराता… कोर तक भरा! कुछ कर गुजरने का। कम से कम एक विषबेल को तो काटने का। कहीं किसी बुराई को जड़ से उखाड़ फेंकने का। कि पाप का कुछ तो निस्तार हो संसार से। थोड़ी भी तो बेहतर हो दुनिया जैसी है अभी उससे…।

रातोंरात उस आँच में जलते साथ हो गयी जैसे कोई करामात! सुबह काम पर निकलने का समय हो चला तो कुलबुल ने चोंच से हल्के से कोंच कर जगाया उसे। ‘सूरज सर पर चढ़ आयेगा! आज काम पर नहीं चलना क्या ? जो जागेगा वो पायेगा… जो सोयेगा सो खोयेगा! जल्दी निकलने से अच्छी मिलती है रद्दियाँ…।’

सुनकर वह चकित रह गया। कुलबुल बिल्कुल साफ साफ बोल रहा था। तोते की तरह…! उसके कहे को वह तो समझ लेता था पहले पर अभी इस सुबह जिस तरह सधे स्वर में वह उचार रहा था उसमें तो किसी को भी कोई दिक्कत नहीं होनी! रात भर ज्वर की आँच ने तपा कर कुलबुल का कायांतरण नहीं तो वागांतरण अवश्य कर दिया था। किसी आदमी के साथ होता ऐसे तो शायद आसपास वाले पहचानने से ही इनकार कर देते। पर वह कुलबुल था। और वह कामलाल। उनके बीच नहीं मुमकिन था कुछ ऐसा। इस दोस्ती की थी और ही कुछ बात…।

‘बुखार से शरीर पूरा पस्त है दोस्त! तुम देख ही रहे हो। काम पर नहीं जा  पाऊँगा।’

‘कोई बात नहीं। तुम आराम करो आज। मैं निकल जाता हूँ। चुन चुन कर लाता हूँ जो कुछ बन  पड़ेगा।’ कुलबुल बोला।

‘अब यह काम तमाम ही समझो। अभी तो कुछ और ही सोच रहा हूँ…!’

‘हम कोई नया काम शुरू कर रहे हैं ?’ कुलबुल किलका।

‘नया क्या! पर अपने लिए होगा नया। देखो… कल चिकित्सक ने बोल दिया कि अजब गजब बुखार हो गया है मुझे। शायद अब जल्दी ही छोड़ कर जाना पड़ेगा तुम्हें।’

‘दूसरी जगह जाना है ? फिर छोड़ कर क्यों। नयी जगह चलेंगे न साथ। मेरे तो पंख हैं। तो पाँव भी नहीं दुखेंगे! कहीं जाने में कोई तकलीफ नहीं।’ कुलबुल मचला।

‘वहाँ तो न पाँवों से जा सकते हैं न पंखों से! जान से जाना होगा मुझे। डॉक्टर ने बताया इस बीमारी में जान भी चली जाती है…।’

सुनकर कुलबुल रुआँसा हो गया। आँखें भर आयीं। ये नमी न पाँव पोंछ सकते थे न पंख।

‘जाने से पहले एक काम कर जाना चाहता हूँ। क्या तुम इस काम में करोगे मदद मेरी ?’

‘कुछ भी करो मैं साथ हूँ। मैं कहो किस काम आ सकता हूँ। जान हाजिर है।’ कुलबुल ने कहा।

‘जान देने की बात नहीं।’ कामलाल ने बीमारी के बीच से एक बेजान सी मुसकान निकाली। ‘जब जाना ही है तो जान जाने से पहले कम से कम किसी एक बुरे को खत्म कर जाना चाहता हूँ कि धरती का भार थोड़ा कम हो। उतनी तो आसान हो अच्छाई और अच्छाई के साथ जीना!’

‘नीयत तो नेक है!’ सिर हिलाया कुलबुल ने गंभीरता से।

‘यही इस दुनिया को मेरा अवदान होगा और मेरे जीवन की सार्थकता!’ एक पुरानी पुस्तक से यह चिह्नित रेखांकित वाक्य उसने पढ़ा। गाँव में पिता ने सिखाया था पढ़ना। और स्लेट पर उँगली चला कर माँ ने लिखना। यहाँ आकर उसने इसे आगे बढ़ाया। रद्दी में पड़ी कोई पुरानी पोथी मिल जाती तो टो टटोल कर पढ़ने की कोशिश करता। धीरे धीरे अभ्यास बन गया। बापू को याद करते पढ़ता। माई को स्मरण करते रद्दी के साथ मिली एक पुरानी डायरी में कुछ कुछ लिखता। अपने पढ़ने के साथ साथ कुलबुल को भी पढ़ना सिखा दिया था।

‘दिक्कत लेकिन यह है कि देह कमजोर पड़ गयी है। और कोई औजार हथियार भी नहीं।’ कामलाल ने अपनी अड़चन बतायी।

‘कहो तो देखूँ चाकू वाकू कोई और उठा लाऊँ कहीं से चोंच में दबाये।’ कुलबुल ने पेशकश की।

‘नहीं रहने दो…।’

‘रहने कैसे दूँ ऐसे! आखिरी इच्छा तुम्हारी अधूरी ? तुम्हारा काम पूरा करना मेरा धर्म है।’ भावुक होकर कहा कुलबुल ने।

‘मेरा मतलब… उसकी जरूरत नहीं। मैंने पढ़ा था कहीं कि कलम में तलवार से ज्यादा ताकत होती है। तुम अगर साथ दो तो काम ऐसे ही तमाम हो जायेगा। मैं तुम्हें अपनी कवितायें याद करा दूँगा। वे कवितायें तुम जिसे सुना दोगे एक साथ वह बच नहीं पायेगा!’ कामलाल की आँखों में कौंध जगी।

‘फिर तो कोई कठिनाई नहीं।’ कुलबुल कसमसाया। ‘जी लगा कर सारी कवितायें याद कर लेता हूँ  मैं। जाकर नींद में बिस्तर पर ही बाँध दूँगा उस आदमी को और फिर कटु ककर्श कठोर स्वर में इस तरह सुनाता जाऊँगा कवितायें कि तड़फड़ा छटपटा कर सिधार जायेगा! अब बस इतना बताओ कि वह होगा कौन…?’

कामलाल के ध्यान में वह बदमाश आया जो इलाके में सबसे कुख्यात था। धोखाधड़ी रहजनी उठाईगिरी हर तरह के मामलों में उसका नाम आता। और तो और गये साल अपनी पत्नी को भी मार दिया था उसने कि दूसरी शादी कर सके। सारा इलाका जानता था। पर जब दिन दहाड़े की वारदातों के लिए कुछ हुआ नहीं था उसका तो इस ‘घरेलू हिंसा’ के लिए क्या होता!

लेकिन अगली सुबह आँख खुली तो अपने आप को अपने ही बिस्तर से बँधा हुआ पाया उसने। और एक काले कौवे को देखा अपनी छाती पर बैठे हुए। नयी बीवी तो मायके गयी हुई थी। किसी और को मदद के लिए पुकारना चाहा कि कुलबुल ने अपनी चोंच से होंठ उसके टाँक दिये और कहा – तेरे पाप का घड़ा भर गया है! अब बस फूटने ही वाला  है। कोई नहीं आयेगा तुझे बचाने के लिए। क्योंकि किसी को नहीं बचाया है आज  तक तूने! तुझसे कोई नहीं बचा है। घरनी तक तुम्हारी! अब इतनी कवितायें सुनाऊँगा एक के बाद कि सुनते सुनते पुरखे याद आ जायेंगे और दम निकल जायेगा। सीधा नरक सिधारोगे…।’

विस्फरित आतंकित नयन कोटरों के नीचे फड़फड़ाते अधर कोरों से किसी तरह निसरती उँ उँ उँ की ध्वनि से कुलबुल को लगा कि वह कुछ नम्र निवेदन करना चाह रहा है। आदमियों में अंत समय अंतिम इच्छा पूछने की परिपाटी होती है उसे याद आया। रहम खाकर बदमाश के होंठों को आजाद कर दिया।

‘देखो पाप तो मैने किया है और उसका प्रायश्चित भी कर रहा हूँ। परंतु पहली पत्नी के परलोकवास ने मेरा हृदय परिवर्तित कर दिया है। अब मैं बदल गया हूँ। उसके बाद से किसी का कुछ बुरा नहीं है किया। फिर मुझे क्यों मार रहे ? मैंने तो अपने बुरे मन की बुराई को मार दिया है पहले ही। मारना ही है तो नगर कोतवाल को मारो जिसने मेरी मरी पत्नी की हँसुली लेकर मुझे छोड़ दिया था। अपराध मैंने जरूर किये हैं। लेकिन मेरे दामन में तो एक वही दाग है खून का। पर उसके हाथों तो रोज लोग मर रहे हैं! सौ चोर मरते हैं तो एक कोतवाल कहीं जनमता है! उसके उठने से भार भले कुछ कम होगा धरती  का! मुझ मामूली के मरने से क्या होगा भला…?

सुनकर कुलबुल किंचित सोच में पड़ गया। उसकी बात कुछ कुछ ठीक जान पड़ी। दुविधा में कोई काम नहीं करना चाहिए कामलाल को कभी पढ़ते सुना था। सो ठिठक गया। रोक लिया अपने को। लौटकर किस्सा बयान किया। सुनकर कामलाल को भी बात उसकी ठीक ही लगी। उठाना ही है तो क्यों न किसी ऐसे को जिसके पाप की पोटली ज्यादा बड़ी और अधिक भारी हो कि उठने से धरती को भी लगे कि हाँ बोझ कुछ हुआ  हल्का!

अगले दिन कोतवाल ने अपने आप को उसी दशा में पाया। रात बिस्तर पर आते नशे में इतना धुत हो जाता था कि उसे बाँधना और आसान था। बँधकर भी उसी तरह सुरूर में पड़ा था। कुलबुल को खोद खोद कर जगाना पड़ा। जगकर हाथ पैर बँधे पाये और सीने पर काल की तरह काला कौवा तो घिग्घी बँध गयी। बँधे हाथ पैर तो जोड़ नहीं सकता था। इसी तरह कहा किसी तरह – यह सही है कि जानें कभी कभार मुझसे गयी  हैं। कैद में पीटते हुए या बाहर चोर उचक्कों का पीछा करते। लेकिन किसी किसी दिन और इक्का दुक्का। अगर धरती का भार कम करना है तो मेरी औकात क्या! साहूकार के बार में सोचो। लालच में वो जो मिलावट करता है उससे कितनी जानें चली जाती हैं। वह भी एक साथ…!

चित्र : प्रवेश सोनी

अगर ऐसा है तो वह भी सही था। कुलबुल को लगा। पाप का ऐसा अंबार फिर तो उसका और अधिक इस धरती पर भार! क्यों नहीं साहूकार ? जाकर कहा तो कामलाल को भी उचित जान पड़ा। गर्व भी हुआ सोचकर कि उसके साथ में रहने वाला एक पक्षी भी कितनी सादगी सफाई और गहराई से है सोचता।

साहूकार की सहचरी भी साथ सोयी हुई थी। कुलबुल ने काफी इंतजार किया कि वह उठकर कहीं जाये। पर भोर होने लगी तो लाचारी में दोनों को ही साथ बाँध दिया बिस्तर से। हाँ स्त्री के कानों में कपड़ा जरूर ठूँस दिया कि जब सुनाना शुरू करे तो कविताओं का असर उस पर न हो। उसके बाद साहूकार की मोटी तोंद पर चोंच रगड़ कर जगाया और चेताया उसे – बहुत भरा और भारी है तुम्हारी तिजोरी की ही तरह तुम्हारे पापों का घड़ा। अब तुम्हारे जाने के साथ धरती से यह भार कम हो जायेगा। बिस्तर से नहीं अब तुम सीधे इस दुनिया से उठोगे…!

रिरियाते घिघियाते साहूकार ने कहा – मंत्रीजी का अभयहस्त सिर पर नहीं रहता तो क्या हम ऐसा काम करते ? हमारे कंकड़ पत्थरों वाली मिलावट से तो तब भी धीरे धीरे कर जाती है जनता की जान। पर मिलावट के पुल और सड़कें बनाने वाले और दवाओं में जहर मिलाने वाले कारोबारी तो कितनी जानें ले लेते हैं एक झटके में। लेकिन द्रव्यदान के बदले अभयदान है उनको भी। बस मंत्री जी के यहाँ उनका नजराना ज्यादा। जो जितनी मिलावट करता है उतना उन तक पहुँचाता है। मेरे जैसे कितने फल फूल रहे हैं उनकी छत्रछाया उनकी निगहबानी में…।

कुछ सही करने के लिए सोचना भी सही होता है। और बेहतर करने के लिए इंतजार भी बेहतर। लेकिन दिनों दिन हालत बिगड़ती जा रही थी कामलाल की। जाने से पहले चाहता था कि यह काम हो जाये। गुजरने से पहले अरमान था कुछ कर गुजरने का! पुनः शुभकामनाओं के साथ उसने कुलबुल को अपनी अगली उड़ान के लिए रवाना किया। अबकी मुकाम था माननीय मंत्री महोदय का।

रात उतर चुकी थी पर मंत्री का कारोबार बदस्तूर जारी था। राज्य के कोने कोने से नजराने आ रहे थे जिन्हें एक कोने में रखता जा रहा था। बीच बीच में गिनकर खुश होता मुसकुराता। नजरानों का सिलसिला थमा तो उसने उन्हें दो भाग में बाँट दिया। छोटे हिस्से को अपनी ओर कर लिया और बड़े को एक किनारे। राजकीय सत्कार में सौंपने की तैयारी में…। दिन का सब दान ठिकाने लगा आखिरकार वह बिस्तर पर आया। गद्दे पर गिरते नींद ने धर दबोचा उसे और नींद के बाद कुलबुल ने।

‘पंछी हो न शायद इसीलिए फुनगी पर बैठे हो! जरा इसकी जड़ में झाँककर देखो। हम सब तो डालियाँ और शाखायें हैं केवल। वो और जमाना था जब मंत्री मंत्रणा देते थे और राजा सुनता समझता था। अब यथा राजा तथा मंत्री। मैं या कोई और मंत्री माध्यम मात्र। राजा के लिए काज करने वाले। जो वह कहता है। या कहें कि जो चाहता है। कहना भी कई बार उसे नहीं पड़ता। उसके मन की ताड़ लेते हैं इसलिए मंत्री हैं! तो भाई अगर धरती के बोझ का सचमुच कुछ करना है तो तुम्हें वहाँ जाना होगा। या जाना चाहिए। मंत्री हूँ तो मंत्रणा ही दे सकता हूँ। तो इतनी ही मंत्रणा है मेरी। बाकी तुम राजा हो अपने मन के…!’

वह पहला आदमी था जो बिना घबड़ाये हड़बड़ाये संयत सधे स्वर में संभाषण कर रहा था। ऐसे कि कुलबुल को यकीन आ गया उसकी बात पर। मन ही मन उसका धन्यवाद करता पर फड़फड़ाता वह सीधा चला आया कामलाल के पास।

पता चला कि राजा विदेश प्रवास से कल लौटने वाले हैं। ‘दिक्कत यह है कि समय साथ नहीं है अपने। मैं शायद कुछ एक दिनों का मेहमान हूँ। और उसी में करना है जो कर गुजरना है…!’ किंचित चिंतित स्वर में कहा कामलाल ने। कुलबुल ने उसे आश्वस्त किया कि यदि इस सृष्टि का कोई सिरजनहार या नियंता है तो उसकी अभिप्रेरणा से इस बार काम तमाम हो ही जायेगा। आर या पार… इस बार अपने हर तीर के साथ होगा वह तैयार…!’ कामलाल दंग रह गया कि इन कुछ दिनों में कुलबुल की भाषा कितनी प्रखर हो गयी है। उसके उड़ान भरने के बाद में याद आया कि किसी पुरानी पोथी के फटे पन्ने में यह संवाद था।

पंछी नहीं होता तो शायद कुलबुल के लिए कठिन होता राजप्रासाद पहुँचना। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी। पर इतनी भी नहीं कि परिंदा पर न मार सके। व्यवस्था तो आखिर व्यवस्था ही होती है! यों भी स्याह रात में कुलबुल की स्याह रंगत सहज ही छुप जाने वाली थी। एक झिरी के पीछे बैठा सब देख रहा था वह। मौके की ताक में। राजा के शयनकक्ष में दाखिल होने में दिक्कत नहीं हुई। न ही साहूकार वाली अड़चन! राजा अकेला ही था। परेशानी यह कि उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। ऊँचाई पर जैसे साँस दूभर हो जाती है उसी तरह ऊँचे पद वालों को नींद! जो जितना अमीर और सर्वसुखसुविधाप्राप्त होता अकसरहा नींद में उतना ही दरिद्र।

आखिरकार भोर से ठीक पहले रात के आखिरी पहर राजा बिस्तर पर गया। और बिस्तर पकड़ते बेसुध नींद में चला गया। ऐसे कि बाँधने बूँधने के बाद चोंच से उसकी उजली दाढ़ी खींचकर जगाना पड़ा। ‘प्राण सें प्यारें मेरें प्रजाजनों!’ जागते अनायास मुँह से उसका प्रिय वाक्य निकला। राजा का संबोधन संभाषण किंचित अनुनासिक हुआ करता था। आँखों के ठीक सामने छाती पर सवार काले कौवे को देख ठगा सा रह गया वह। मगर अंदर से घबराया या चौंका भी हो तो बाहर जाहिर होने नहीं दिया।

‘कहीं आप काल के दूत तो नहीं हैं काकदेव ? मेरे राजगुरुदेव ने कहा था कि क अक्षर वाला कोई आपका काल हो सकता है।’ बड़े सुलझे लहजे में कहा राजा ने। नींद से अचानक उठे किसी का संवाद इतना सधा होना यही सिद्ध करता है कि या तो सच में कोई सिद्धपुरुष वह होगा या शातिर।

‘क तो काल में भी है। भला इसमें कौन सी बात अजूबी!’ कहा कुलबुल ने। ‘जो  हो। काल तो हूँ ही मैं तुम्हारे लिए! लेकिन कवितायें सुनाकर तुम्हारे प्राण लूँगा। और कविता भी क से अक्षर से आरंभ होती है…।’

‘नहीं! कवितायें मत सुनायें कृपया। उन्हें जब तब कहीं कहीं कोट जरूर मैं करता हूँ अपने भाषणों में। लेकिन कविता बरदाश्त बिल्कुल नहीं कर सकता। न पढ़ सकता हूँ न सुन सकता। इसीलिए कार्यक्रमों में कविगण जब सुनाने आते हैं तो झट से उन्हें पुरस्कार दे देता हूँ। कि शांत हो जायें और संतुष्ट होकर सिधार लें!’ राजा ने अनुनय किया।

‘बतौर राजा तुम्हारी नीतियों अनीतियों ने राज्य में इतने लोगों की जान ली है। इसलिए जान से जाना ही चाहिए तुम्हें!’ कुलबुल कड़क कठोर हो गया।

‘देखियें जान की अमान की खातिर नहीं कह रहा। एक बार ताज जिस सिर पर चढ़ा उसकी तो यों भी खैर नहीं। लेकिन मैं कहूँ आपसें कि जो मैं करता हूँ दरअसल मैं करता नहीं हूँ। करता लगता हूँ पर होता नहीं उसका कर्ता! कठपुतली मात्र हूँ मैं। या कोई भी मेरे जैसा। जो भी यहाँ रहेगा ऐसा ही करेगा। अपनी हस्ती कुछ कहाँ ? गरीबों का देश है अपना। मैं तो वही करता हूँ जो बाँह मरोड़ कर करवाता है राजा दुनिया का। वैसा ही करते हैं मेरी सरीखे राजा दूसरे। इसीलिए अगर दुनिया को बेहतर करना है तो मित्र मेरा कहना होगा कि पकड़ो दुनिया के राजा को…। आप चाहेंगे तो मैं इसमें भरसक छिपी हुई मदद कर सकता हूँ आपकी। बस दिक्कत है कि यहाँ से दूर है दुनिया का राजा का ठिकाना…।’

कहाँ ?’ कुलबुल ने पूछा।

‘सात समंदर पार जाना होगा।’ नक्शे पर दुनिया के राजा की डीह दिखाते हुए राजा बोला। ‘एक दिक्कत दूसरी भी है वैसे…!’

‘क्या ?’

‘दुनिया के सजा का परिसर पूरा उजला है। काले से सख्त नफरत और परहेज है उसे। किसी भी काली चीज को इसलिए दूर से देख लेते हैं और चट से मार गिराते है उसके निशानची। ऐसे भी उजले महल में किसी काली चीज का छुपना कठिन है। और तुम ठहरे पूरे काले। तो वहाँ जाने से पहले अपना रंग बदलना होगा। उजले रंग में रँगना   होगा! आप चाहें काकदेव तो इसमें हम आपकी मदद कर सकते हैं…।’

प्राप्य का पता चल जाये तो पाना उसे ही चाहिए! पुरानी पोथी का पन्ना कोई कुलबुल की आँखों के आगे फड़फड़ाया। लक्ष्य नजर में आ गया हो तो फिर छूना उसे ही…। पथ पर पड़े किसी पत्थर को क्यों ? मन की यही बात बताने लौटा कुलबुल कामलाल के पास। मगर वह तो बेसुध था बुखार में। तबीयत और बिगड़ गयी थी इस बीच। ज्वर से जल रहा था शरीर। बात की जगह बर्राहट निकल रही थी रह रह कर। ऐसे में क्या कहता भला और कैसे ? रुआँसा होकर दुबक गया उससे लगकर। तरह तरह की बातें आ जा रही थीं सोच में। कि साथी क्या इसी लाचारी में चला जायेगा जो सोचा था पूरा हुए बिना ? और क्या खुद उसके पंखों में इतनी उड़ान का माद्दा होगा कि सात समंदर पार कर पायेगा ? चला भी गया तो अपने काले रंग के चलते पकड़ा नहीं जायेगा उस धवल महल के परिसर में प्रवेश करते…? सोचते सोचते और उसी के साथ आँखें मींच कर प्रार्थना करते न जाने कब आँख झपक गयी उसकी भी। कितने दिनों का हारा थका जागा हुआ था वह भी। सोया रहा इसी तरह जाने कितनी देर।

सहसा पानी की आवाज से आँख खुली। बुखार से कमजोर कामलाल धीरे धीरे बुदबुदा कर ‘पानी! पानी!’ टेर रहा था। सबसे पहले तो प्रसन्नता हुई कुलबुल को यह देखकर कि अब भी जिंदा है दोस्त और जूझ रहा है! मगर यह देख कर उदास हो गया कि सिरहाने रखे मिट्टी के पात्र का जल तल में चला गया है। तभी अपने किसी पुरखे की कंकड़ ठीकरे डाल पानी ऊपर उमगाने वाली कहानी याद आयी जो किसी पुरानी पोथी के पन्ने में थी। वैसे ही पानी को उमगाया। और उस उमगे हुए पानी के आईने में देखा अपने को तो दंग रह गया। रात की सियाही कहीं चली गयी थी। और रंग उसका सुबह की तरह सफेद हो गया था। बुखार से दहकती उस काया की धाह में। जैसे कोयला जलकर राख हो जाये…। इस राख में भी जाने कहाँ से आ गयी थी इतनी   जान! पंख फड़फड़ाकर देखा तो लगा मानो उनमें भर गयी हो सात समंदर की उड़ान…! परों के साथ कुछ अक्षर फड़फड़ा रहे थे :

जानी   है  जब  जान   पियारे
मन का रख कुछ मान पियारे
 
दिल  कबसे  वीरान  पड़ा है
भीतर   इक  तूफान  बड़ा है
 
बाहर   भी   तूफान  पियारे
 
दहक चुकी  सूरज सी काया
छूट रही  अब  अपनी  छाया
 
और  डगर  अनजान पियारे
 
खूब  कमाया  पर सब  माया
सोच भला क्यों जग में आया
 
अपने  को  पहचान  पियारे
 
इतराता  आसन  पर  तन कर
खुश है जाने क्या क्या बन कर
 
होना   था  इनसान  पियारे
 
किसकी यहाँ  रही है हरदम
समझे वही  सही  है  हरदम
 
जो   सबसे  नादान  पियारे
 
चार  दिनों  का  खेला  मेला
संग  न  जायेगा   इक  धेला
 
फिर क्यों  सौ सामान पियारे
 
अपनी  ही  चादर को  सीना
खाली  अपनी  खातिर जीना
 
क्या  इसका है मान पियारे
 
ऐसा   कुछ  कर   तेरे  पीछे
उनका  जो  सीधे  जो  सच्चे
 
जीना  हो   आसान  पियारे
 
कहने  दे  दुनिया  को  पागल
होने  दे  आँखों  को  छलछल
 
बिखरा  तू  मुसकान  पियारे…

प्रेम रंजन अनिमेष

लोक के उपादानों से कहानियाँ सिरजने वाले प्रेम रंजन अनिमेष का जन्म 18 अप्रैल 1968 को आरा, भोजपुर  (बिहार) में हुआ। कविता और कहानी दोनों ही विधाओं में समान रूप से सक्रिय प्रेमरंजन अनिमेष की ‘तमाशबीन’ और ‘पेड़ होती हुई लड़की’ जैसी शुरुआती कहानियाँ 1988-89 के दौरान वर्तमान साहित्य में प्रकाशित हुईं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अबतक इनकी तीस से ज्यादा कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। विगत तीन दशकों से रचनात्मक रूप से सतत सक्रिय इस कवि-कथाकार के पाँच कविता-संग्रह ‘मिट्टी के फल’, ‘कोई नया समाचार’, ‘संगत’, ‘अंधेरे में अंताक्षरी’ और ‘बिना मुंडेर की छत’ प्रकाशित हैं। सुर और स्वर के धनी अनिमेष के तीन अलबम ‘माँओं की खोई लोरियाँ’, ‘धानी सा’ और ‘एक सौगात’ भी जारी हो चुके हैं।

सम्पर्क- एस-3/226, रिजर्व बैंक अधिकारी आवास, गोकुलधाम,गोरेगाँव (पूर्व), मुंबई 400063

+919930453711, +919967285190, premranjananmesh@gmail.com

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चित्रकार : प्रवेश सोनी

चित्रकला और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय प्रवेश सोनी का जन्म 12 अक्तूबर 1967 को हुआ।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रेखाचित्र, कवितायें और कहानियाँ प्रकाशित।पुस्तकों के आवरण के लिए पेंटिंग।

सम्पर्क- praveshsoni.soni@gmail.com

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)

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