कथा संवेद

कथा संवेद – 20

 

इस कहानी को आप कथाकार की आवाज में नीचे दिये गये वीडियो से सुन भी सकते हैं:

 

 

वैलेंटाइन डे विशेष

अनुभव और कलात्मकता की संयुक्त जमीन पर प्रेम, प्रकृति और पुनर्वास की कहानियाँ लिखनेवाले भालचन्द्र जोशी का जन्म 17 अप्रैल 1956 को हुआ। 9 सितंबर 1976 को दैनिक नई दुनिया के रविवारीय अंक में प्रकाशित कहानी ‘मोक्ष’ से अपनी कथायात्रा शुरू करनेवाले भालचन्द्र जोशी के छह कहानी-संग्रह ‘नींद से बाहर’, ‘पहाड़ों पर रात’, ‘चरसा’, ‘पालवा’, ‘जल में धूप’ और ‘हत्या की पावन इच्छाएं’ दो उपन्यास ‘प्रार्थना में पहाड़’ और ‘जस का फूल’ तथा एक आलोचना पुस्तक ‘यथार्थ की यात्रा’ प्रकाशित हो चुके हैं।

भालचन्द्र जोशी की कहानी ‘पहाड़ पर ठहरी नींद’ में पहाड़ भी है, ठहराव भी और नींद भी। नींद के इस ठहराव में स्मृतियों के धुंधलके से जीवन की जो छवियाँ यहाँ निर्मित होती हैं उसके पीछे यथार्थ और कल्पना की पारस्परिकता का सघन संसार छिपा है। दर्शन की रोशनी में लिपटे संवाद, कुहासाजनित पहाड़ी अंधेरे में आकार ग्रहण करते दृश्य और इन सबके बीच वर्तमान और अतीत की अभिसंधि पर प्रेम की परिभाषा तलाशते अर्पित और नंदिता किसी जादुई सम्मोहन की तरह कदम-दर-कदम हमारे भीतर उतरते चलते हैं। स्वप्न, स्मृति, ख्याल और खुमार से बनी यह दुनिया तब एक बिलकुल भिन्न अर्थ लेकर हमारे सामने प्रकट होती है, जब यहाँ कल्पना और यथार्थ की छवियाँ आपस में अपने चेहरे बदल लेते हैं। कल्पना और यथार्थ की इस अदलाबदली में ही इस कहानी का मर्म छुपा है। असफलता में सफलता, टूटन में संघटन, विस्मृति में स्मृति, वियोग में संयोग और अदृश्य में दृश्य के दर्शन को मूर्त करती इस कहानी से गुजरना उस आईने को धो-पोंछ कर साफ करने जैसा भी है, जिसमें प्रेम की छूट गई संभावनाओं और छूट गए प्रेम की पुनः संभावनाओं के स्वप्नों की आवाजाही से विनिर्मित प्रतिबिम्बों को सहज ही देखा जा सकता है।

राकेश बिहारी

 

पहाड़ पर ठहरी नींद

भालचन्द्र जोशी

वह एक फरेबी शाम थी। धूप जाने की तैयारी में उजाला समेट रही थी और रात के आने की आहट नहीं थी। बर्फ के पहाड़ अपनी सफेदी खोकर एक अजीब-से धुँधले रंग में डूबे उदास नजर आ रहे थे। घुमावदार सड़कें हल्की-सी बारिश की वजह से एक मासूम नमी से भरी थी, जिसपर नंगे पैर चलना अच्छा लग रहा था। लम्बे ऊँचे चीड़ के पेड़ एकदम सीधे तने खड़े थे लेकिन उसमें दर्प नहीं, बल्कि जल्दी से रात के अँधेरे में गुम हो जाने की व्याकुल पीड़ा थी। घाटी के घरों से उठता धुआँ शाम के धुँधलके में धँसता जा रहा था।

धूप जब पूरी तरह गुम हो गई तो शाम एक मटमैली झीनी चादर-सी तन गई। यह मटमैली-सी धुँधली शाम में कोई साफ दिखाई नहीं दे रहा था। किसी के होने का अहसास था या फिर किसी के होते हुए भी ना होने का अहसास था। यह भ्रम की स्थिति नहीं थी। शाम का जादू था। अब बर्फ के पहाड़ सिर्फ क्षितिज पर अटकी एक आकृति भर रह गए थे जैसे कोई चित्रकार पूरी पेंटिंग बनाकर पहाड़ बनाना भूल गया और बाद में याद आते ही फिर बचे रंगों से पहाड़ बनाए जो थे और नहीं भी थे। हवा में एक भली-सी नमी थी जो सड़क पर चलते हुए अपनी नमी को देह के भीतर तक नम कर रही थी।

करीब के पेड़ भी जैसे इस धुँधलके में छिपने के लिए सड़क के किनारे से पीछे सरक रहे थे। लग रहा था पेड़ जैसे गलत जगह पर खड़े हो गए थे और रात के डर से शाम से ही दौड़-भाग कर अपनी जगह बदल रहे थे। सड़क से लगे जंगल में ऐसी ही भाग-दौड़ की सरसराहट थी। कोई वाहन आता तो थोड़ी देर के लिए पूरे दृश्य को रोशनी से भर देता था और जब तक कोई ठीक से जंगल या पहाड़ों को देखे शाम का धुँधलका रोशनी को बेदखल करके फिर से जंगल और पहाड़ों पर काबिज हो जाता।

चित्र : भालचन्द्र जोशी

-“तू यूँ एकाएक नहीं मिलता तो मुझे तो खबर भी नहीं हो पाती?” नंदिता ने कहा और शायद मुस्कराई भी थी लेकिन धुँधलके में मुस्कान नजर नहीं आई पर उसके होने का अहसास था।

-‘‘मेरा भी यहाँ आना कोई योजनाबद्ध नहीं था। बस एकाएक प्रोग्राम बना और चल दिया।” अर्पित ने भी मुस्करा कर कहा लेकिन उसकी मुस्कान भी वह देख नहीं पाई बस उसके होने का अहसास था।

-‘‘यानी बेवजह आ गया?” नंदिता ने पूछा।

-‘‘पहाड़ों पर जाना बेवजह ही होता है। वजह देखो तो घूमने-फिरने के अलावा और क्या हो सकती है?” अर्पित ने कहा और नंदिता की ओर देखा। हल्की नीली साड़ी में वह सुन्दर नजर आ रही थी। इतने बरसों के बाद भी उसके सौन्दर्य में कोई कमी नहीं आई। लम्बे समय बाद देखने के कारण या पहाड़ों की सर्द हवाओं का असर था, नंदिता के चेहरे पर एक अजीब-सी शुष्क उदासी थी। इस धुँधलके में भी उसके गालों में पड़ने वाले भँवर नजर आ रहे थे। उसकी खूबसूरती आज भी उतनी ही मोहक और बहकाने वाली थी। बावजूद इसके उसके चेहरे पर एक खूबसूरत बर्फीलापन था जो नजर नहीं आता था, लेकिन महसूस होता था।

-‘‘उस लड़की का क्या हुआ?” नंदिता सूनी-सूनी आँखों से उसकी ओर देखते हुए बोली, -‘‘आज भी वहीं है या किसी और के साथ शादी करके चली गई। तेरी कहानियों की नायिकाओं की तरह?” कहकर वह हँसी उसकी सामान्य-सी हँसी भी घाटी में एक अजीब सी आवाज के साथ गूँजने लगी। उसकी हँसी में अर्पित को एक करुण ध्वनि का भी अहसास हुआ।

-‘‘सब लोग अपनी-अपनी तरह अपनी सुविधा से जगह खोज लेते हैं। मार्केट में अभी लेखक का रेट बहुत कम चल रहा है।” कहकर अर्पित भी हँसा।

वे दोनों घाटी उतर गाँव में आ गए थे। गाँव में शाम जा चुकी थी।

-‘‘मैंने तुझसे तो पूछा ही नहीं, तू इन पहाड़ों में क्या कर रही है?” अर्पित ठिठक गया।

-‘‘जिंदगी खोज रही हूँ या समझ ले जिंदगी का नाटक खेल रही हूँ।” वह बहुत ही सपाट स्वर में बोली।

-‘‘दार्शनिक हो गई है? फिलासफी झाड़ रही है।” अर्पित ठिठक कर बोला।

-‘‘हाँ यार! जीवन पर जब वक्त की धूल जम जाती है तो दार्शनिकता या फिर मन की निर्ममता ही उसे साफ कर पाती है।” नंदिता ने उसका हाथ पकड़ा और थोड़ा खींचकर चलने का संकेत दिया।

अर्पित फिर कहना चाहता था कि फिलासफी से बोर मत कर लेकिन कह नहीं पाया। नंदिता के स्वर में किताबों में दबी दार्शनिकता नहीं थी, बल्कि एक डरावना-सा बीहड़ था। किस बात का दुख है इसे? नंदिता अच्छा भला शहर, अच्छा-भला घर छोड़कर यहाँ इन पहाड़ों की गरीबी में क्यों आ गई। अर्पित ने पूछा नहीं, उसे लगा वह खुद बताएगी।

-‘‘मैं यहाँ घाटी में बच्चों के लिए एक स्कूल चलाती हूँ। लगभग निःशुल्क। पहाड़ों में गरीबी इतनी है कि स्कूल से ज्यादा जरूरी मजदूरी करने जाना इन्हें ठीक लगता है।”

-‘‘वो तो ठीक है लेकिन म.प्र. से इतनी दूर मनाली के इस छोटे-से गाँव में तेरा होना मुझे अजीब लग रहा है।” अर्पित ने अपना अचरज छिपाया नहीं।

-‘‘यार, मध्यप्रदेश के उस छोटे से शहर में रूककर करती भी क्या? तू तो शहर छोड़कर चला ही गया था। हिसाब में मतलब है कि गणित में तू हमेशा से अव्वल रहा है।” कहकर वह थोड़ा रुकी फिर कुछ देर की खामोशी के बाद बोली, -‘‘मैं तेरे जैसा हिसाबी जीवन नहीं जी सकती थी। जीवन गणित नहीं, एक खूबसूरत कविता है।”

-‘‘जीने के लिए व्यवहारिक होना पड़ता है।” अर्पित ने उसकी ओर देखा, उसकी चुप्पी के बाद फिर बोला, -‘‘और व्यवहारिकता ही फ्यूचर का प्लान बनाती है। अच्छे फ्यूचर के लिए जीवन का फ्यूचर का हिसाब-किताब लगाना ही पड़ता है।”

-‘‘बड़ा सयाना हो गया रे! लड़की छोड़कर गई उसके बाद यह जीवन दर्शन समझ में आया या पहले ही सयाना हो गया था।” वह हँसी, खुलकर हँसी।

-‘‘समझ ले, लड़की छोड़कर गई तो मेरे पास अपने जीवन के हिसाब-किताब, फ्यूचर की प्लानिंग की पुस्तक छोड़ गई।” अर्पित कुछ क्षण चुप रहा फिर बोला, -‘‘मुझे लावण्या के छोड़कर जाने का अब उतना दुख नहीं है। उसने हिसाब-किताब लगाया और जो बेहतर लगा वह चुन लिया। मैं उसके गणित की गणना में फिट नहीं हो रहा था।” इस बार अर्पित हँसा एक सूखी हँसी जो तपेदिक के मरीजों की सूखी खाँसी की तरह थी।

चित्र : भालचन्द्र जोशी

-‘‘तूने शादी कर ली?” अर्पित ने पूछा।

-‘‘कहाँ यार, तू उस साँवली लम्बे बालों वाली लड़की का दीवाना था और उस समय कॉलेज में तुझसे बेहतर विकल्प नहीं था।” कहकर वह उसके कंधे पर हाथ मारकर हँसने लगी।

-‘‘यार, हमारी दोस्ती में प्रेम संभव नहीं था।” अर्पित बोला। वह कुछ और कहता तभी नंदिता ने कहा, -‘‘लो घर आ गया।” कहकर वह मुख्य सड़क से बायीं ओर एक कच्ची गली में मुड़ गई, उसका हाथ थामे हुए। गली के आखिरी कोने पर उसका एक बहुत ही सामान्य-सा घर था। उसने बताया कि यही घर उसका स्कूल भी है।

-‘‘बच्चों को पढ़ाती हूँ तब तक स्कूल। बच्चों की या स्कूल की छुट्टी हो जाती है तो स्कूल फिर घर बन जाता है।” वह दरवाजे पर लटका ताला खोलते हुए बोली। ताला और दरवाजा दोनों इतने पुराने थे कि ताला जिस मुश्किल से खुला, दरवाजा भी उसी मुश्किल से, एक खरखराती आवाज में। उस आवाज में दरवाजे के पुरानेपन की चरमराती चीख उसे साफ-साफ सुनाई दी। मकान का भीतरी हिस्सा उतना पुराना और खण्डहर नहीं लगा, जितना बाहर से देखकर सोचा था।

ढेर सारी किताबें, बेतरतीब कॉफी की प्याले यहाँ-वहाँ फैले अखबार, खाने की जूठी प्लेट्स, गिलास और कुछ कपड़े सब कुछ बेतरतीब था लगता नहीं था कि यहाँ एक बेहद पढ़ी-लिखी, सभ्रान्त और किसी समय की सफाई को लेकर बेहद सजग और नकचढ़ी लड़की रहती है।

नंदिता ने कुर्सी पर से कपड़े उठाए और पास पड़े स्टूल पर रख दिए। खटिया के बिस्तर पर पर पड़ी किताबे और कपड़े भी हटाकर एक खुली अलमारी में डाल दिए।

-‘‘यह तू है?” अर्पित ने अचरज से पूछा।

-‘‘क्यों, ऐसा क्यों पूछा?” नंदिता चादर की सिलवटें मिटाते हुए बोली।

-‘‘तू समझी नहीं?” अर्पित को फिर अचरज हुआ, -‘‘अरे तू इतनी सफाई पसंद थी कि हरी घास पर बैठते हुए भी पहले रूमाल बिछाती थी।” नंदिता कुछ नहीं बोली। बस, मुस्करा दी।

-‘‘याद नहीं?” अर्पित ने दोबारा पूछा।

-‘‘याद है, लेकिन बेहद पुरानी बातें हैं। लोग कहते हैं समय हर जख्म भर देता है, लेकिन मुझे लगता है समय सिर्फ जख्म पर पर्दा डालता है, झीना-सा। परदे के पीछे जख्म पुराना लेकिन ताजा रहता है।” कहकर उसने प्लेट्स और चाय के प्याले उठाए और भीतर एक किचन नुमा कमरे में रख आई। उसे अचरज हुआ कि स्मृतियों को नंदिता जख्म कह रही थी। क्या स्मृतियों के पास कोई जख्म होते हैं? अलबत्ता जख्मों की स्मृतियाँ जरूर होती हैं।

-‘‘क्या पियेगा?” उसने भीतर के कमरे से लौटते हुए पूछा।

-‘‘कॉफी पी लूँगा।” अर्पित ने सहज ही कहा।

-‘‘तेरे मुँह शाम के समय कॉफी पीने की बात शोभा नहीं देती।” वह हँसकर बोली।

-‘‘मेरे पास ओल्डमंक रम है, पियेगा?” फिर उसके जवाब की प्रतीक्षा किए बगैर उसने अलमारी से ओल्डमंक की बोतल निकाली। दो साफ गिलास लेकर आई फिर भी उसे नैपकिन से साफ किया और उसकी ओर देखकर कहा, -‘‘नीट पीने की आदत छोड़ दी या कुछ मिलाने के लिए लाऊँ?” नंदिता ने गिलासों में रम डालते हुए पूछा।

-‘‘यार, मैं कहूँगा तो तू भरोसा नहीं करेगी, लेकिन मैंने पीना छोड़ दी है।” वह ऐसे संकोच से बोला जैसे पीना छोड़कर कोई अपराध किया हो। वह आँचल मुँह में दबाकर हँसने लगी। जैसे कोई मजाक सुन लिया हो।

चित्र : भालचन्द्र जोशी

एक गिलास उसके हाथ में थमाकर कहा, -‘‘समझदार लोग, सयाने लोग ऐसी बचकानी बातें नहीं करते।” कहकर उसने अपना गिलास उसके गिलास से टकरा कर कहा, -‘‘चीयर्स! तेरे मनाली आने की खुशी में।”

वह नंदिता को जानता था। एक बार उसने जब तय कर लिया तो उसे पीना ही पड़ेगा।

-ओके ! कहकर उसने भी अपना गिलास उसके गिलास से टकराया। एक अजीब-सी खनक रात के सन्नाटे में गूँजी।

-पहाड़ों पर रात जल्दी हो जाती है। सूरज को पहाड़ों से नीचे उतरने की सुविधा रहती है। उसके रात के बारे में सोचने को वह भाँप गई थी।

-‘‘और दिन भी देर से निकलता है।” नंदिता ने कहा तो वह प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखने लगा।

-‘‘क्योंकि सूरज को पहाड़ों से उतरने में जो सुविधा है सुबह उन्हीं पहाड़ों के शिखर के ऊपर निकलना कठिन रहता है। ऐसी चढ़ाई से वह भी हाँफने लगता है।” कहकर वह कुछ देर रूकी फिर बोली, -‘‘सच! सुबह की हवा को ध्यान से महसूस करना उसमें सूरज के हाँफने की आवाज साफ सुनाई देगी। वैसे बता, आजकल वह लड़की है कहाँ, जिसके लिए तू आहें भरता था।” वह व्यंग्य में मुस्करा कर बोली।

-‘‘मैं कई बरसों से नहीं मिला। सुना है किसी शहर के कॉलेज में लैक्चरर है। और क्या पता, चली भी गई हो। इतने बरसों में इतिहास इतनी गलियाँ बना देता है कि न चाहकर भी आदमी उसमें भटक जाता है।” कहकर अर्पित ने एक घूँट लिया और गिलास टी-टेबल पर रख दिया, -‘‘तू ही बता कुछ गलत कहा मैंने?”

-‘‘नहीं यार, तू ठीक कहता है। हमारा वर्तमान जब बिगड़ता है तो सिर्फ फ्यूचर ही नहीं बिगड़ता, हमारे अतीत पर भी खरोंच के निशान आ जाते हैं।” कहकर वह देर तक गिलास को देखती रही फिर धीरे से एक घूँट लिया। फिर नंदिता को लगा माहौल बोझिल हो रहा है तो अकारण हँसकर बोली, -‘‘छोड़ यार, वो क्या शेर है….. हर किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता।” कहकर उसने गिलास उठाकर ऐसी व्यस्तता जताई जैसे रम का घूँट लेना बहुत श्रम का काम हो।

-‘‘नंदिता!” अर्पित ने एक ऐसी आवाज में कहा जो प्रायः दूसरों के दुख से आहत होकर एक भिन्न ध्वनि बन जाती है, -‘‘दरअस्ल मैं तेरे लायक नहीं था, न आज हूँ। मैं जीवन में तुझे भी दुख ही दे पाता। मुझ जैसे लोग कभी सुखी नहीं रह सकते हैं। दुखों के मुहल्ले में रहकर दुख के साथ ही उठना-बैठना पड़ता है।” अर्पित ने कहा और बहुत अपराध-बोध के साथ नंदिता को देखने लगा।

-‘‘छोड़ यार! तू तो बहुत गंभीर हो गया। मेरे लिए तो सारी बातें अतीत का ऐसा हिस्सा है जिसे सिर्फ याद किया जा सकता है, चाहकर भी दुबारा जिया नहीं जा सकता है।” कहकर वह खाली गिलास भरने लगी, -‘‘अब जो कुछ है, मेरे लिए वर्तमान है। भविष्य के भारी दरवाजे पर वजनी ताला लगा है। यहाँ पिछली दुनिया से दूर बच्चों को पढ़ाकर खुश हूँ।” कहकर वह सिर्फ पलकें झपकाती रही। दोनों चुप हो गए। काफी देर की खामोशी के बाद नंदिता ने पूछा, -‘‘किस सोच में डूब गया?”

-‘‘नहीं, डूबने लायक तरल यादें साथ नहीं लाया हूँ।” कहकर वह एक मद्धिम-सी हँसी हँसा।

-‘‘तू गिलास खाली कर तब तक मैं कुछ बनाती हूँ।” कहकर उसने अपना गिलास खाली किया और दूसरे कमरे की ओर चल दी।

-‘‘क्यों व्यर्थ मेहनत करती है। कहीं बाहर चलकर खा लेंगे।” अर्पित ने कहा तो वह दूसरे कमरे से बोली, -‘‘घर का खाना छोड़कर होटल में क्यों खाएँ।” कहते-कहते वह किचन नुमा कमरे से देहरी पर आ गई, -‘‘इस समय मनाली के बाजार में पर्यटकों और लोकल लोगों की इतनी भीड़ रहती है कि खाना खाने से पहले धक्के खाने पड़ते हैं।” कहकर वह वापस भीतर चली गई।

वह अपना गिलास भर कर किचन के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया, -‘‘मैं कुछ मदद करूँ?”

उसने भौंहें उठाईं और होंठ टेढ़े करके अचरज और हास्य के मिश्रण की मुद्रा में कहा, -‘‘तुझे आता क्या है?‘ चल प्याज और टमाटर काट दे।” कहकर उसने प्याज और टमाटर की प्लेट उसकी और बढ़ा दी। वह भी किचन में रखी दूसरी टेबल के पास खड़ा होकर प्याज काटने लगा, -‘‘देख अर्पित, आज का खाना हम सिर्फ पेट भरने के लिए खा रहे हैं इसमें स्वाद तलाश करने की कोशिश मत करना।”

-‘‘वह तो मैं तेरे कहने से पहले ही समझ गया था।” अर्पित प्याज और टमाटर काटकर वापस पहले वाले कमरे में आ गया। दोनों गिलास भरे और एक गिलास किचन में नंदिता को थमाकर आया और वापस लौटकर अपना लाल मफलर उतार कर पलंग के कोने पर डाला और अपनी पहली वाली कुर्सी पर गिलास थामे बैठ गया।

-‘‘नंदिता!” उसने किचन की ओर मुँह उठाकर कहा, -‘‘कभी कॉलेज के दोस्तों की याद नहीं आई?”

-‘‘क्यों नहीं आएगी? और तुझे कैसे भूल जाती।” किचन की व्यस्तता को स्थगित करते हुए उधर से नंदिता की आवाज आई, -‘‘यार, व्यक्ति चाहे रहे न रहे, लेकिन प्रेम कभी नहीं मरता है।”

-‘‘पुराना जुमला है।” अर्पित ने हँसकर कहा।

-‘‘हाँ, लेकिन इस पुराने जुमले के नएपन को महसूस करने के लिए पुराना होना पड़ता है।” बर्तनों की खनक के साथ नंदिता की हँसी भी इस कमरे तक आई, -‘‘एक सामान्य-सी बात को समझने के लिए किसी अजान टीचर को बहुत बड़ी ट्यूशन फीस देनी पड़ती है।”

-‘‘छोड़ यार।” अर्पित उसकी बात को रद्द करने वाले अंदाज में बोला, -‘‘प्रेम सिखाया नहीं जाता है।”

-‘‘हाँ।” वह संजीदगी से बोली, -‘‘लेकिन प्रेम उपहार में भी नहीं मिलता है।”

-‘‘यार नंदिता !” अर्पित रम का घूँट लेकर बोला, -‘‘तुन इतनी गुणी, इतनी सुंदर हो, कौन तुझसे प्रेम नहीं करेगा? मेरा दिल तो तेरा नाम सुनते ही धड़कने लगता है।”

उधर से उसने किसी बर्तन को घंटी की तरह बजाया और बोली, -‘‘दिल का तो काम ही है धड़कना, लेकिन अफसोस यह है कि तेरा दिल मेरे लिए नहीं धड़कता।”

-‘‘ऐसी कोई बात नहीं है यार। तू इजाजत दे तो मैं आज भी तुझसे प्रेम कर सकता हूँ।” कहकर वह जोर से हँसा। उधर से भी नंदिता की हँसी की आवाज आई।

-‘‘झूठ मत बोल।” वह बोली।

-‘‘यार, मैं सच कहता हूँ।” वह लम्बी हँसी को एक संक्षिप्त-सी मुस्कान में बदलकर बोला।

-‘‘रहने दे यार !” वह उधर से हँसते हुए बोली, -‘‘तुझे झूठ बोलना आज भी नहीं आता और ज्यादा जोर मत दे इस बात पर।”

-‘‘क्यों?” अर्पित ने गिलास टेबल पर रखकर किचन की ओर देखते हुए पूछा।

-‘‘तेरे झूठ पर भी भरोसा होने लगेगा।” कहकर वह जोर से हँसी, -‘‘तू क्या समझता है, तू ही फिल्मी संवाद बोल सकता है।”

-‘‘यार नंदिता !” वह हार मानने वाले अंदाज में बोला, -‘‘तू मेरी अच्छी दोस्त है। मैं समझता हूँ दोस्ती तो प्रेम से ज्यादा बड़ी होती है। दोस्ती में अपेक्षाओं के दबाव नहीं होते हैं।”

-‘‘मतलब?” वह किचन के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई।

-‘‘क्या है कि प्रेम में भावुक अपेक्षाएँ बहुत होती है। आधी रात को फोन किया जाता है। जानू, एक बार खिड़की के नीचे आ जाओ। मैं तुम्हें देखना चाहती हूँ। सारे काम छोड़कर इसी तरह के नखरे या भावुकताएँ झेलनी पड़ती हैं।” वह समझाने के अंदाज में बोला।

-‘‘तो?” नंदिता ने पूछा।

-तो क्या? वह उसके अचरज को रद्द करते हुए बोला, – “दोस्ती में इंकार की गुंजाइश होती है।”

वह थोड़ी देर उसे देखती रही फिर ठण्डी आवाज में बोली, -‘‘इंकार की गुंजाइश नहीं, जिम्मेदारी से बचने की गुंजाइश रहती है। प्रेम के आवेग को झेलने की शक्ति हर किसी में नहीं होती है।”

वह कुछ कहता उसके पहले ही वह पलटकर किचन में चली गई।

फिर वहीं से बोली, -‘‘प्रेम किसी भी भाषा में उच्चारित किया जाए, आवाज कंठ की अपेक्षा दिल की खाई से निकलकर आती है तो भाषा आड़े नहीं आती। व्यक्ति उस प्रेम को समझ लेता है।”

अर्पित ने कंधे उचकाए और टेबल से गिलास उठा लिया।

चित्र : भालचन्द्र जोशी

उसने कमरे को ध्यान से देखा। उसने पुस्तकें, प्लेट्स, प्याले, कपड़े आदि हटा दिए थे फिर भी इस घर में एक अजीब-सा उदास सन्नाटा लगता था। मिट्टी और लकड़ी की मूर्तियाँ, लैम्पशेड आदि तमाम एक कमरे के लिए स्वाभाविक चीजों को वह देख रहा था, लेकिन उसे लगता था कि यह सब उसके छूते ही भरभरा कर गिर जाएँगी। मर जाएँगी। उसे निर्जीव वस्तुओं को देखते हुए लगता था कि उन मूर्तियों और तस्वीरों में जान है जो अभी बोल पड़ेंगी, लेकिन ऐसे जीवन से भरे घर में करुण चुप्पी क्यों है? खिड़कियाँ बंद हैं, लेकिन फिर भी उन पर सफेद पर्दे डले थे। सफेद रंग नंदिता को शुरु से प्रिय था। उसे अचरज हुआ जब एक फूलदान में उसने रजनीगंधा के फूल उनकी लम्बी पतली शाखों सहित रखे थे। रजनीगंधा से एक मोहक खुशबू उठ रही थी। ऐसे खुशबू जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी। थोड़ी देर पहले कमरे से सीलन की बू थी, वह एकाएक गायब हो गई थी। फिर उसे लगा कि रजनीगंधा के फूलों से मोहक गंध नहीं, बल्कि मादक खुशबू आ रही थी। एक ठण्डी और सुकून देने वाली खुशबू। जैसे देर तक इसी फूलदान के करीब बैठ रहें।

बाहर चल रही हवाएँ शायद थोड़ी तेज हो गईं थीं। बंद खिड़की-दरवाजों से ऐसे टकरा रही थीं कि तेज सरसराहट की आवाज आती थी। कभी लगता बाहर कोई है जो दरवाजे भड़भड़ा रहा है, लेकिन दरवाजे भड़भड़ाने की आवाज में तेजी नहीं थी। जैसे कोई बहुत धैर्य से दरवाजे-खिड़की बजा रहा है।

उसने चुपचाप अपना गिलास खाली किया और उठकर दरवाजे तक आया और धीरे से दरवाजा खोला, बाहर कोई नहीं था और न कोई हवा चल रही थी। गली के दो कुत्ते थे जो गली के छोर पर खड़े होकर उसे देखते हुए गुर्राने लगे थे। उन कुत्तों की गुर्राहट में एक अजीब-सी प्रतिहिंसा की ध्वनि थी। कुत्तों की आँखें गुस्से से या सर्दी के मारे लाल हो रही थीं। कुत्ते उसकी ओर देखते हुए और गुर्राते हुए गली में पलट गए, अब वे दिखाई नहीं दे रहे थे और न उनकी आहट सुनाई दे रही थी। गली में एक दारुण सन्नाटा था जो किसी भी सामान्य व्यक्ति को भय की सिहरन पैदा कर दे। रात ज्यादा नहीं हुई थी पर सभी घरों के दरवाजे बंद थे। हालाँकि उसे मालूम था कि पहाड़ी लोग जल्दी सो जाते हैं। जागते भी हैं तो किसी कारणवश सामूहिक रूप से या फिर अपने घर के भीतर दरवाजे बंद करके जागते हैं, बातें करते हैं।

कितनी अजीब-बात थी, मनाली जो खूबसूरती का दूसरा नाम माना जाने वाला शहर है। इस शहर की गलियों में ऐसा भयावह सन्नाटा है।

-‘‘खाना मैंने टेबल पर लगा दिया है।” अचानक नंदिता की आवाज आई और वह चौंक पड़ा। दरवाजा बंद किया और टेबल तक आया। दाल-सब्जी और रोटियाँ थीं। शायद चावल भी बनाए थे। अकेली लड़की ने कितनी जल्दी कितना खाना बना लिया है? खाने से पहले दोनों ने बोतल खाली करते हुए दो गिलास फिर तैयार किए और खाली बोतल को टेबल के कोने पर रख दिया।

कुछ देर वह चुप रही फिर कमरे के अँधेरे कोने को देखते हुए बोली, -‘‘अर्पित, पुरुष के लिए अक्सर स्त्री या उसका प्रेम एक जरूरत होता है। यदि स्त्री सुंदर हुई तो विजय भाव का मैडल, लेकिन स्त्री के लिए प्रेम एक सम्पूर्ण जीवन होता है। इसीलिए स्त्री के बारे में यह बात सच के ज्यादा करीब है कि वह प्रेम के एक क्षण में पूरा जीवन जी लेती है।” नंदिता ने कहकर उसकी ओर देखा। वह चुप रहा, क्योंकि वह जानता था कि बात अभी पूरी नहीं हुई है।

-‘‘अर्पित, प्रेम एक पानी का घर है।” वह बहुत तरल आवाज में बोली, -‘‘और पानी के इस घर की पानी की दीवारों में दरवाजे भी पानी के होते हैं, इसलिए प्रेम तरल होता है। शायद इसलिए प्रेम का प्यासा या प्रेम की प्यासी जुमला बना है।”

-‘‘प्रेम का भूखा भी तो कहा जाता है।” अर्पित ने कमरे की वजनदार गम्भीरता को तोड़ना चाहा।

-‘‘नहीं।” वह गरदन इंकार में हिलाकर बोली, -‘‘प्रेम का भूखा जुमला तो भक्ति के लिए है। ईश्वर के लिए है। भक्ति में भूख लगती है और प्रेम में भूख मर जाती है।” कहकर वह चुप हो गई। गिलास उठाकर धीरे से रम का सिप लिया।

-‘‘नंदिता !” अर्पित बोला तो उसे अपनी आवाज पर अचरज हुआ जैसे दूर कहीं पहाड़ों से भटक कर यह आवाज आई, -‘‘अतीत के दुखों को पूँजी नहीं बनाना चाहिए। स्मृतियों का खजाना तैयार करो, स्मृतियाँ मूल्यवान होती हैं। स्मृतियाँ हमें खींचकर सुख के नए अहसास के पास ले जाती हैं और दुख हमारे लिए एक नया अँधेरा एकांत निर्मित करता है।”

-‘‘हाँ, तू ठीक कहता है।” नंदिता के स्वर में तसल्ली थी।

-‘‘और फिर पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगता है कि तू मुझसे छिपाकर कोई दुख पाल रही है।” अर्पित ने धीरे से कहा।

-‘‘ऐसी कोई बात नहीं यार ! प्रेम पर व्याख्यान देने और सुनने का मन हो गया था।” कहकर वह जोर से हँसी जैसे हँसी से कमरे की गम्भीरता को टुकड़े-टुकड़े कर देगी।

फिर बोली, -‘‘चल गिलास खाली कर। खाना ठण्डा हो रहा है।” अब उसे चेहरे पर फिर वही मोहक मुस्कान थी।

दोनों ने थोड़ी देर में गिलास खाली किए और इत्मीनान से खाना खाया। खाना सचमुच स्वाद से भरा था।

-‘‘तू इतना अच्छा खाना बनाना कब सीख गई?” अर्पित ने सिर्फ आँखें उठाकर पूछा।

-‘‘अकेलापन सब सिखा देता है।” कहकर फिर टेबल पर झुक गई और खाना खाने लगी।

-‘‘ये अकेलापन तूने चुना है नंदिता!” अर्पित ने उलाहना दिया।

-‘‘चयन की सुविधा दुनिया में किसी को नहीं है। एक क्षण भी अपने चयन से कुछ नहीं कर सकते हैं।” कहकर वह माहौल के भारीपन को शायद हल्का करने के लिए हँसी और बोली, -‘‘तू चला गया तो सब कुछ चला गया। तूने तो खीर जमीन पर बिखरा दी।” वह मुस्कराई।

-‘‘मतलब?” अर्पित ने पूछा।

-‘‘न वह लैक्चरर लड़की तुझे मिली और न तू हमें मिल पाया।” वह ऐसे बोली जैसे अपने कहे का मजा लेना चाहती हो।

-‘‘तूने किसी की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। सैकड़ों दीवाने तेरे कदमों में लोट जाते।” कहकर वह हँसा, -‘‘मुझमें क्या धरा है?” इतना साधारण कि एक लड़की आसानी से मुझे छोड़कर चली गई।

-‘‘तू खास है। औरों से अलग। इतना अलग कि तुझ जैसा कोई नहीं।” फिर वह भर्राई आवाज में बोली, -‘‘सच कहती हूँ, तुझ जैसा कोई नहीं। तू खुद भी नहीं।” कहकर इस बार वह हँसी नहीं। चेहरा एक अव्यक्त पीड़ा से भर गया। अर्पित चुप हो गया। हँसी-मजाक में ही बातें गंभीरता की ओर पलट गई थीं। नंदिता का चेहरा भावहीन था। चुपचाप खाना खाती रही।

-‘‘मैं खास इसलिए था कि तूने मुझसे दोस्ती की या मजाक में जिसे तू प्यार कह रही है। तेरी संगत ने मुझे खास बनाया, वर्ना मैं तो बिल्कुल साधारण हूँ। न शक्ल, न अक्ल।” कहकर अर्पित ने नंदिता का हाथ थपथपाया जिसमें नंदिता के लिए तसल्ली की चाह थी कि वह बात को समझ जाए। बदले में वह सिर्फ मुस्कराई। उसकी मुस्कान में उसे दी जा रही तसल्ली के लिए भरोसा नहीं था।

नंदिता कॉलेज के दिनों में भी बहुत सुन्दर थी। कॉलेज में लड़के उसके दीवाने थे। हालाँकि आज भी उसकी खूबसूरती में कोई कमी नहीं थी।, लेकिन एक अजीब-सा ठण्डापन था। वह हँसती भी थी तो उसकी आँखें नहीं हँसती थी। उसकी आँखों में मोहक उजाड़ था। लुभावनी-सी वीरानगी थी।

खाना खत्म करके अर्पित प्लेटें उठाकर किचन में रख आया। नंदिता ने मना भी नहीं किया। टेबल साफ करने वह नैपकीन से हाथ पोंछकर उसके पास आई।

-‘‘तुझे याद है, तेरी उस लैक्चरर लड़की, क्या नाम था उसका? हाँ, लावण्या! उसका नाम तूने पॉलिएलथिया पेड़ पर नुकीले पत्थर से गोद दिया था जो कॉलेज के पीछे के ग्राउण्ड पर कोने में था।”

-हाँ याद है।

-‘‘वह पेड़, वह नाम अभी भी है?”

-‘‘हाँ, लेकिन पहुँच से बाहर।”

-‘‘मतलब!” नंदिता आँखें अचरज में फैलकर और खूबसूरत हो गई।

अर्पित हँसा, फिर बोला, -‘‘जब नाम गोदा था तब पेड़ छोटा था। अब इतने बरसों में पेड़ ऊँचा होता गया और नाम भी। अब सबकुछ पहुँच से बाहर है। वह तो पहले से एलीट क्लास की थी। पहुँच से बाहर। करीब होने का भ्रम तो सिर्फ मुझे था।” कहकर वह क्षण भर के लिए कमरे के अस्त-व्यस्त सामान में गुम-सा हो गया। फिर रुककर बोला, -‘‘पेड़ ऊँचा हुआ तो भ्रम भी दूर हो गया। पेड़ ऊँचा हुआ तो उसका नाम भी ऊँचा होता गया। इतने नीचे से मैं ठीक से पढ़ भी नहीं पाता हूँ सिर्फ उस नाम का उस पेड़ पर होने का अहसास है।”

नंदिता ध्यान से सुन रही थी, धीरे से बोली, -‘‘होने या न होने का अहसास ही सबकुछ बदल देता है। कभी-कभी तो पूरी दुनिया ही बदल देता है।” कहकर वह चुप हो गई। थोड़ी देर की चुप्पी रही फिर वह हँस पड़ी। अर्पित भी हँसने लगा। देनों की हँसी कमरे के हल्के उजाले में पृथक-पृथक अवसाद घोलने लगी।

-‘‘अब चलूँ मैं?” सहसा अर्पित ने पूछा।

-‘‘आज का दिन मतलब आज तेरा पूरा समय मेरा है।” कहकर उसने बाहर का दरवाजा खोला और कहा, -‘‘चलो मंदिर तक घूम के आते हैं।”

-‘‘इस समय?” अर्पित थोड़ा अचकचा गया।

-‘‘इस समय में क्या खराबी है?” नंदिता ने सहज स्वर में पूछा।

-‘‘बाहर तेज हवाएँ चल रही हैं। कैसे चलेंगे और कहाँ?” अर्पित ने पूछा।

-‘‘मंदिर चलते हैं। यहाँ हिडिम्बा देवी का मंदिर है। बहुत प्रसिद्ध। मनाली आए और यह मंदिर भी नहीं देखा तो तू एक पौराणिक आख्यान को साक्षात देखने से वंचित रह जाएगा।” कहकर वह उसका हाथ पकड़ कर लाई और बाहर का दरवाजा बंद किया, -‘‘तू मंदिर से अपने हेाटल चले जाना, मैं वापस आ जाऊँगी।” कहकर वह गली में आगे बढ़ी पर उसका हाथ नहीं छोड़ा।

-‘‘तुझे नींद नहीं आ रही है?” चलते हुए अर्पित ने पूछा।

-‘‘नहीं, नींद कहीं बर्फ के पहाड़ों में दबी है या वहाँ रुकी हुई है।” कहकर वह दूर अँधेरे में डूबे बर्फ के पहाड़ों को देखती रही फिर जैसे आगे कुछ बोलते-बोलते रुक गई।

वह मुस्कराकर बोला, -‘‘आज तो तूने गम्भीरता के अपने खुद के सारे रिकार्ड तोड़ दिए।”

बदले में नंदिता भी हँसने लगी।

उसे अचरज हुआ कि अब न हवा चल रही थी न पेड़ों की सरसराहट थी। एक तल्ख चुप्पी भी जैसे उनके साथ चल रही हो जो नंदिता की हँसी से महज क्षण भर के लिए टूटी थी। उसे लगा कि आसपास न सिर्फ घरों में लोग सोए हैं, बल्कि घर भी सोए हैं। नंदिता शायद अँधेरे में चलने की अभ्यस्त थी। नंदिता उसका हाथ थामें चल रही थी और उसे लग रहा था कि अँधेरे में नंदिता नहीं है सिर्फ एक हाथ है जो उसका हाथ पकड़े चल रहा है। फिर धीरे-धीरे हाथ के स्पर्श का अहसास भी खत्म हो गया और उसे लगा सिर्फ अँधेरा उसका हाथ पकड़ के चल रहा था। हालाँकि वक्त ज्यादा नहीं हुआ था लेकिन फिर भी इतना कम नहीं गुजरा था कि उसे साधारण समय कहा जा सके और फिर पहाड़ों की रात तो तेजी से पहाड़ों और बस्ती पर अपना कब्जा जमाती है।

अर्पित को सारा कुछ अजीब लग रहा था हालाँकि इसमें अजीब होने जैसी कोई बात नहीं थी। नंदिता शुरु से ही ऐसी बिंदास थी। फिर भी कुछ ऐसा था नंदिता के व्यवहार में जो उसे असहज लग रहा था, लेकिन वह उसे व्यक्त नहीं कर सकता था। वे दोनों बीच बाजार से नहीं गुजरे। पीछे एक गली से होकर वे दोनों मंदिर की सीढ़ियों तक आए। मंदिर एक छोटी-सी पहाड़ी के ऊपर था। वे लोग सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे तभी एक कुत्ता अर्पित की ओर भौंकता हुआ आया। अर्पित डरकर भागने लगा। नंदिता ने उसका हाथ अभी भी नहीं छोड़ा था इसलिए नंदिता ने उसे वापस खींच लिया। नंदिता ने पलटकर कुत्ते को ऐसी डाँट लगाई जैसे किसी स्कूली बच्चे को डाँट रही हो। कुत्ता भी सहमकर चुप हो गया। कुत्ता आगे नहीं बढ़ा। वे लोग मंदिर की सीढ़िया चढ़ते रहे कुत्ता अभी भी वहीं खड़ा था और एक अजीब-सी करुण आवाज में भौंक रहा था।

-‘‘कुत्तों से डरकर भागना नहीं। रूक जाओ। हमारे रूकने से कुत्ते का साहस खत्म हो जाता है। फिर वह भौंकता रहेगा, लेकिन झपटेगा नहीं” नंदिता ने कहा तो क्षण भर के लिए उसका हाथ नंदिता के हाथ से छूट गया। चारों तरफ गहरा और स्याह अँधेरा था। ऐसे में उसे कुत्ते का करुण रुदन और उसकी आवाज सुनकर दूसरे कुत्तों का रुदन भी शुरु हो गया। अँधेरा ऐसा था कि एक कदम भी आगे बढ़ना उसके लिए मुमकिन नहीं था। तभी नंदिता ने उसका छूटा हाथ फिर पकड़ लिया। अब उसका साहस धीरे-धीरे लौटने लगा। नंदिता के कोमल हाथों में उसका हाथ जिस तरह से गिरफ्त में था उससे लगता था कि जैसे उसे डर हो कि दुबारा हाथ नहीं छूट जाए।

अर्पित को फिर भी यह बात जरूर खटक रही थी कुछ ऐसा हो रहा है या होने जा रहा है जो उसकी समझ से बाहर है। कुत्ते ही नहीं, पेड़ भी अपनी जगह खामोश और एक दूसरे के पीछे छिपने की कोशिश करते दिखाई दे रहे थे जबकि पेड़ों को ऐसे ही क्रम में लगाया गया था कि एक लम्बी कतार में दिखाई दे लेकिन अर्पित को वो ऐसे डरे हुए लग रहे थे जैसे एक दूसरे के पीछे छिपने से किसी बड़े तूफान से बचा जा सकता है जबकि हवा का कोई मामूली-सा झोंका तक नहीं महसूस हो रहा था। बस, माहौल में एक नमी थी जो गरम कपड़ों के बावजूद पसलियों तक पहुँचकर पहाड़ों की ठण्डक कैसी होती है, समझा रही थी।

आकाश में एक तारा भी नहीं था और चाँद भी दिखाई नहीं दे रहा था। रात इतनी उजाड़ और विधवा-सी लग रही थी जैसे उसका सारा लावण्य अपहरण कर लिया गया हो। एकदम सूखी और रंगहीन रात थी।

ऊपर मंदिर में कुछ लोग थे जो देवी दर्शन के बाद बाहर सीढ़ियों पर आकर बैठ गए थे। अर्पित को अचरज हुआ कि ऐसी ठण्ड और रात को ये लोग कैसे एंजॉय कर रहे होंगे। सीढ़ियाँ गीली नहीं लेकिन ठण्डी थी। सीढ़ियों के पुराने पत्थर अब घिसने लगे थे और अपने खुरदरेपन की योग्यता से खारिज हो रहे थे। ऐसी ठहरी हुई ठण्डी और बेजान रात उसने पहले कभी नहीं देखी थी। दूर शहर की रोशनी चमक रही थी, लेकिन उसकी चमक मंदिर से देखने पर बहुत धुँधली और मन के उल्लास को जगाने मे असमर्थ थी। यहाँ से देखने पर लगता था कि शहर की रोशनी रात के अँधेरे को बेदखल नहीं कर पाई थी। रोशनी के बावजूद शहर में रात थी और अपने होने का अहसास भी दिला रही थी।

-‘‘कैसा लगा?” सहसा नंदिता ने पूछा।

-‘‘क्या?” अर्पित के खयालों को धक्का लगा।

-‘‘अरे यार, यहाँ मंदिर आकर कैसा लगा?” वह उसके कंधे को हिलाकर बोली जैसे वह विचारों में गुम हो और धक्का लगने से विचारों के भीतर गिरने की अपेक्षा बाहर गिरेगा।

-‘‘बहुत खूबसूरत! और कोई क्षेत्र या प्रदेश हिडिम्बा को देवी की तरह पूजता है यह जानकर तो और भी अचरज हो रहा है।” कहते हुए वह मंदिर की गुफा में थोड़ा ठिठक गया। मंदिर का स्थापत्य बता रहा था कि मंदिर बेहद पुराना है। उसकी गुफा भी प्राकृतिक थी।

-‘‘क्या माँगा?” नंदिता हँसकर बोली, -‘‘उस तेरी निर्मम लड़की के सिवा।”

-‘‘यार हम किसी को एकाएक फैसला सुनाकर अपराधी नहीं बना सकते।” अर्पित को एकाएक यूँ लावण्या को निर्मम कहना बुरा लगा, -‘‘हर किसी की अपनी मजबूरी होती है। हर किसी के अपने कोई निजी दुख होते हैं।”

-‘‘यानी तेरे अलावा भी कोई….. ।” वह कुछ कहती उसे पहले ही अर्पित ने उसकी बात काटी और कहा, तुझे यूँ बात नहीं करना चाहिए। कोई जरूरी नहीं कि हम किसी से प्रेम करें तो कोई हमसे प्रेम करे। फिर मुस्कराकर बोला, -‘‘प्रेम में डेमोक्रेसी तो होना चाहिए। हाँ यह बात और है कि वह मुझे चाहे-न-चाहे मेरी चाहत पर पाबंदी नहीं लगा सकती।”

-‘‘क्यों?” नंदिता के चेहरे पर बच्चों-सी उत्सुकता आ गई थी।

-‘‘क्योंकि मेरी चाहत देखने के लिए उसे मेरे मन के भीतर दाखिल होना पड़ेगा और उसकी ऐसी कोई मंशा नहीं लगती थी।” अर्पित बोला, -‘‘एक प्रेम ही है ऐसा जो जबरदस्ती हासिल नहीं किया जा सकता और न गिड़गिड़ाकर हासिल किया जा सकता है।”

-‘‘बड़ा दार्शनिक हो गया है।” वह हँसकर बोली, -‘‘फिर लोग क्यों कहते हैं कि प्रेम और युद्ध में सब जायज है?”

-‘‘गलत कहते हैं। एक ईमानदार योद्धा ही विजेता होता है और प्रेमी भी।” कहकर अर्पित ने प्रतिक्रिया के लिए उसकी ओर देखा वह उसके चेहरे की ओर ही ताक रही थी, -‘‘ऐसे जुमले बोलने और सुनने में अच्छे लगते हैं। प्रेम में असफल व्यक्ति प्रेम की इतनी बढ़िया व्याख्या कर सकता है, मुझे मालूम नहीं था।”

वह चेहरे पर हास्य मिश्रित अचरज लाकर बोला, -‘‘मजाक उड़ा रही है मेरा?”

-‘‘नहीं बिल्कुल नहीं। पर यह बात तेरी उस लैक्चरर प्रोफेसर, जो कुछ भी है, लड़की को समझा।” कहकर वह भी उसके करीब सीढ़ी के पास आकर रुक गई, -‘‘उसे बता कि प्रेम क्या होता है?”

-‘‘क्या होता है?” अर्पित ने पूछा।

चित्र : भालचन्द्र जोशी

-‘‘लैक्चर तो तू दे रहा था। तुझे गिफ्ट कर गई।” कहकर वह हँसी फिर बोली, -‘‘देख, प्रेम एक उजली सुबह की भाँति होता है। विश्वास सुबह के उजाले की भाँति होता है। छू नहीं सकते, लेकिन उसके होने का अहसास घर के भीतर भी होता है। प्रेम में एक सामान्य-सा, छोटा-सा संदेह भी सबसे पहले विश्वास को नष्ट करता है। प्रेम को हम अँधेरे में भी पहचान सकते हैं, लेकिन छल को उजाले में भी पहचान नहीं पाते हैं।”

-‘‘कुछ देर पहले तूने प्रेम को पानी का कहा था।” अर्पित ने कहा।

-‘‘हाँ, कहा था। प्रेम का कोई एक रूप होता है?” कहकर वह उसकी ओर देखने लगी।

-‘‘यार, तू भी लैक्चर देना सीख गई।” अर्पित उलाहने भरे स्वर में बोला।

-‘‘तो क्या वह तेरी लैक्चरर ही लैक्चर दे सकती है। हम कॉलेज में नहीं पढ़ाते, लेकिन मेरी स्कूल किसी कॉलेज से ज्यादा बड़ी है। भवन के आकार की बात नहीं कर रही हूँ, लेकिन मेरी स्कूल सच पर खड़ी है। सच का सामना किए बगैर कोई भी बच्चा अच्छा विद्यार्थी कैसे बन सकता है? मैं यही कर रही हूँ।”

कहकर वह रूकी फिर अपने इतनी लम्बे वाक्य पर झेंप गई और हँसकर बोली, -‘‘छोड़ यार, तू बता कैसी गुजर रही है?”

-‘‘कोई खास परिवर्तन नहीं।” वह सीढ़ी पर बैठ गया। नंदिता भी वहीं उसके पास सीढ़ी पर बैठ गई। -‘‘जैसे जिंदगी पहले चल रही थी, वैसे ही अभी भी है।” कहकर वह जबरन मुस्कराया, क्योंकि मुस्कराने की कोई वजह नहीं थी।

-‘‘एक बात पूछूँ?” फिर उसके जवाब की प्रतीक्षा किए बगैर बोला, -‘‘तुझ जैसी बिंदास, इंटेलेक्चुअल लड़की इन पहाड़ों में, ऐसी छोटी-सी बस्ती में क्यों जीवन बर्बाद कर रही है?”

-‘‘यार, अब जीवन बचा ही कहाँ है?” कहकर उसने उसके कंधे पर बहुत आत्मीयता से हाथ रखा।

-यार, जिंदगी ने जितना खराब सुलूक किया, वक्त इतना भी खराब नहीं था मेरा। वह कंधे उचका कर एक मीठे उलाहने के साथ बोली। उसकी आवाज जंगल की तरह सघन थी। वह कुछ देर जंगल की साँसे सुनता रहा फिर नंदिता की ओर देखा जो बोले गए वाक्य की प्रतिक्रिया के लिए क्षण भर रुकी थी। उसे गंभीर देखकर तत्काल बात की गम्भीरता को नष्ट करने के लिए बोली, – “यार, तुझ जैसा काबिल व्यक्ति उस लैक्चरर के पीछे समय बर्बाद कर सकता है तो मैंने इन पहाड़ों पर आकर क्या बुरा किया? फिर उस दुनिया से खुद को पूरी तरह काटकर जो कर रही हूँ, वह मुझे सुख देता था।”

-‘‘देता था मतलब?” अर्पित ने पूछा। नंदिता कहीं गुम थी। अर्पित ने धीरे से उसके कंधे को छुआ। वह चौंक पड़ी और सोच की गुफा से बाहर आई।

-यार, भाषा की जबान मत पकड़। हम कोई तेरी तरह लेखक नहीं है और न किसी कॉलेज में लैक्चरर। कहकर वह हँसी ऐसे जैसे हँसी से रात को काट देगी। उसकी हँसी में एक पैनापन था।

दोनों सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आ गए। फिर पैदल पगडण्डी पर चलने लगे।

-‘‘इतनी रात हो गई, तुझे नींद नहीं आती है?” अर्पित ने पूछा।

जवाब में वह फैले हुए पहाड़ों को देखने लगी फिर कुछ रुक कर बोली, -‘‘तू जा। मैं चली जाऊँगी।” नंदिता ने कहा।

-‘‘तेरा घर ज्यादा दूर नहीं है, मैं तुझे छोड़कर वापस चला जाऊँगा। ठण्ड लग रही है, अपना लाल मफलर भी तेरे घर भूल आया हूँ। वह भी ले लूँगा।” अर्पित ने कहा तो उसने इन्कार में गरदन हिला दी।

-‘‘कोई खास दूर नहीं है। मेरी फिक्र मत कर। इस बस्ती में किसी की हिम्मत नहीं कि मुझे छू सके। छूना तो दूर मेरी ओर देख भी सके।” कहकर उसे धौल जमाकर बोली, -‘‘कॉलेज वाली दादागिरी अभी गई नहीं है।” फिर वह एकाएक चुप हो गई और कहीं दूर अँधेरे में देखती रही। वह उसे जाते हुए देखता रहा। कैसी हो गई है नंदिता? कितना बदलाव आ गया है। कितनी गंभीर हो गई है, हँसती भी है तो उसकी हँसी का खोखलापन साफ महसूस होता है। कभी-कभी तो ऐसा लगता था जैसे वह साथ होकर भी साथ नहीं है। क्या हो गया है इसे? कौन-सा बड़ा दुख पाल रही है मन में, जिसे बताती भी नहीं। शायद सोचती होगी कि दुख बताने से अभिमान का कद छोटा हो जाता है। निश्चित यही सोचती होगी। वह शुरु से ऐसी ही है।

वह वापस होटल की ओर चल दिया। रास्ते से उसने ब्राण्डी की बोतल खरीदी ओर एक कागज की थैली में रखा और बिल को जेब के हवाले कर चल दिया।

होटल आकर उसने कपड़े बदले। फिर बोतल खोलकर ब्राण्डी एक गिलास में डालकर वेटर से कुनकुना पानी बुलाया। फिर इत्मीनान से पीने लगा।

क्या नंदिता मजाक कर रही थी या सचमुच उसके मन के किसी कोने में प्रेम का अंकुर था। कॉलेज के दिनों में उसे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ वर्ना प्रेम की तो हजारों भाषाएँ, मुद्राएँ और संकेत हैं। वह किसी भी संकेत या मुद्रा को पकड़ क्यों नहीं पाया? या फिर मजाक कर रही है। कॉलेज के बाद वह दिल्ली चली गई थी। एकाध बार किसी ने बताया था कि दिल्ली में किसी कॉलेज से उसने एम.ए. किया है, फर्स्ट डिविजन में। फिर उसके बाद उसका पता नहीं चला। कोई कहता दिल्ली में ही पी.एच.डी. कर रही है, किसी ने कहा वहीं किसी कॉलेज में लैक्चरर है। कोई मुकम्मल-सा अता-पता मालूम नहीं हो पाया। किसे पड़ी थी? सबसे करीबी दोस्त वही था। नंदिता ने उसे भी कोई खबर क्यों नहीं भेजी?

चित्र : भालचन्द्र जोशी

पहला पेग खत्म करके उसने दूसरा पेग बनाया और बालकनी में आकर खड़ा हो गया। दूर तक पहाड़ियों पर फैले मकान और होटल या रिसॉर्टस थे। बाजार की चहल-पहल खत्म हो गई थी। चीड़ के वृक्षों पर अँधेरे की चादर गिर गई थी। वृक्षों के होने का अहसास बहुत धुँधला था। थोड़ा कोहरा भी था। हल्के से कोहरे में डूबी बस्ती बहुत खूबसूरत लग रही थी। जैसे कोहरे ने रात को ही नहीं, सारी बस्ती को धुँधले रंग से पेंट कर दिया है। कोहरे के आकार का कम ज्यादा होने से बस्ती के मकान भी अपनी जगह से खिसकते दिखाई दे रहे थे। पेड़ों की ऊँचाई से कोहरा नीचे टपकता हुआ दिखाई दे रहा था। कभी लगता जैसे पेड़ ही कोहरे में किसी अजान भय से छिपना चाहते हैं। सब कुछ दिखाई दे रहा था, लेकिन जमीन दिखाई नहीं दे रही थीं। पेड़ों से रिसता कोहरा जमीन पर फैलकर एक मोटे गलीचे-सा बिछा था। कोहरे के गलीचे के ऊपर से वह कोहरा टूट नहीं पा रहा था। वाहन को मामूली-सा रास्ता देकर वाहन के गुजरते ही फिर जमीन को ढँक देता था। वाहन की हैडलाइट्स भी विवश थी कि वह पूरी शक्ति लगाने के बाद भी, हाई-बीम पर होने के बाद भी कोहरे में पर्याप्त रास्ता नहीं बन पा रहा था। ठण्ड बढ़ने लगी तो वह बालकनी का दरवाजा बंद करके भीतर कमरे में आ गया। फिर खिड़कियों के पर्दे खींचकर कमरे को बाहर के माहौल से, ठण्ड से मुक्त करने की कोशिश की। उसने ब्राण्डी का तीसरा गिलास तैयार किया और रूम-हीटर चालू किया। उसने फ्रीज खोलकर देखा, कुछ नमकीन रखा था। उसने वही निकाला और प्लेट में डालने की अपेक्षा पैकेट खोलकर टेबल पर रख लिया। फिर इत्मीनान से बैठकर पीता रहा, खाता रहा।

नंदिता का मिलना कितना सुखद अचरज भरा था। बातों में उससे पूछ नहीं पाया कि इतने सालों तक वह कहाँ रही, क्या करती रही। जैसे उसकी बातों में भी एक कोहरा था जो बातों की तह तक पहुँचने नहीं देता था। कोहरा मन को भटकाता था वर्ना तो लोग मिलने पर सबसे पहले यही पूछते हैं कि इतने बरसों से कहाँ थे? खिड़कियों पर पर्दा था और खिड़कियों के शीशों पर कोहरा ठिठका था। लगा, जैसे उसकी बात सुनना चाहता है, लेकिन वह तो बात नहीं कर रहा है। वह तो अकेला है किससे बात करें? शायद उसका सोच सुनना चाहता है। उसे खिड़की पर हल्की-सी आहट भी सुनाई दी तो उसने पर्दे हटाए और खिड़की खोलकर बाहर झाँका। एक कोहरे में डूबी स्याह अँधेरी रात के सिवा कुछ नहीं था। कुछ था तो इस रात की नमी में ठण्डक घुल गई थी। एक हल्का-सा ठण्डा हवा का झोंका आया तो वह काँप कर रह गया। उसने जल्दी से खिड़की बंद की और वापस पर्दे खींच दिए। फिर टेबल से गिलास उठाया और धीरे-धीरे पीने लगा। उसे पता नहीं ऐसा क्यों लगा कि खिड़की हवा से नहीं बजी थी। कौन था उस तरफ? तीसरे माले तक क्या उड़कर आया और खिड़की खटखटाई। लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं था तो फिर खिड़की पर आहट कैसी थी, किसकी थी? विचारों के इस द्वन्द्व में ही उसे नींद ने अपनी तरफ खींच लिया।

सुबह सोकर उठा तो उसका सिर भारी था, चूँकि उसने बहुत पहले से पीना छोड़ दिया है, शायद इसीलिए पीने के बाद इस तरह सिर में भारीपन महसूस हो रहा था। बहुत सारे चित्र थे मस्तिष्क के भीतर जो याद रखने की लाख कोशिश के बावजूद अब धीरे-धीरे धुँधले हेाकर मिटते जा रहे थे। उसने फ्लोर बॉय को बुलाया और कॉफी और अखबार लाने के लिए कहा और उठकर बेसिन पर जाकर मुँह धोया और आँखों पर छींटे मारकर कोशिश की ताकि ठीक से आँखें खोल सके। थोड़ी देर में कॉफी और अखबार आ गया। उसने बॉय को कॉफी बनाने को कहा और अखबार उठा लिया।

-सर, शुगर?

-‘‘आधा चम्मच!” उसने कहा और वापस अखबार में डूब गया।

कॉफी पीने के बाद उसे थोड़ी राहत मिली। ब्राण्डी का हैंग ओवर और अनाम थकान से थोड़ी मुक्ति मिली।

उसने वेटर से कहा, -‘‘रात की ब्राण्डी की बोतल कहाँ है?”

-‘‘सर, बोतल इसी रूम की अलमारी में रख दी है, लेकिन सर, ब्राण्डी रात को नहीं शाम को आपने बुलाई थी। आपने कहा था चेंज रख लो।” वेटर ने कहा तो वह आँखें फाड़कर देखने लगा।

-‘‘मैंने पी और चढ़ी तुम्हें है। रात को ब्राण्डी मैं खुद खरीदकर लाया और देर रात पीता रहा। फ्रीज में रखा नमकीन पाउच भी यहीं कहीं पड़ा होगा।” अर्पित ने झुँझलाकर कहा।

-‘‘नो सर, ब्राण्डी मैं आपके लिए लाया था। खाने का आपने मना कर दिया था। ब्राण्डी का बिल भी साइन नहीं किया था। ये रहा बिल।” कहकर उसने जेब से बिल निकाल कर दिखाया। अर्पित हतप्रभ उसे देखता रहा। उसे याद आया कि रात को ब्राण्डी खरीदकर उसने भी बिल लिया था वह शर्ट की जेब टटोलने लगा। बिल नहीं था। उसने वेटर के लाए ब्राण्डी के बिल पर साइन किए और सिर थामकर बैठ गया। क्या हो रहा है यह? उसे ठीक से याद है, उसने ब्राण्डी खरीदी थी और बिल लिया था। ब्राण्डी पीते हुए रूम के फ्रीज से नमकीन निकालकर खाया था। उसने तत्काल फ्रीज खोलकर देखा। नमकीन का पाउच अपनी जगह मौजूद था।

रात यह बस्ती अँधेरे में डूबी और अब उसे लगा सुबह एक तिलिस्म में डूब रही है। क्या शाम की ब्राण्डी पीते हुए उसे यह भ्रम हुआ था कि वह रात को ब्राण्डी खरीदकर लाया था या शाम की ब्राण्डी खत्म होने पर दूसरी खरीदकर लाया, लेकिन कमरे में बोतल तो एक है। सुबह रूम का दरवाजा भी फ्लोरबॉय ने उसके सामने खोला। उसे लगा, ब्राण्डी सचमुच स्ट्रांग थी, वह बहक गया था।

फिर वह कपड़े लेकर बाथरूम में घुस गया। नहाकर निकला तो उसे काफी हद तक अच्छा लगा फिर वह कुर्ता-पाजामा पहनकर सो गया। लगभग तीन बजे दोपहर उसकी नींद खुली। होटल का लंच टाइम गुजर चुका था।

उसने कपड़े बदले और बाजार में आ गया। बाजार में पर्यटकों की भीड़ थी। खाने से लेकर कपड़े, मूर्तियाँ, खेल-खिलौने, तमाम तरह की चीजों से दुकानें भरी थीं और सड़क पर्यटकों से भरी थी। उसने एक ठीक ठाक सा होटल खोजकर खाना खाया। फिर उसे याद आया कि दोपहर को नंदिता ने मिलने को कहा था। वह एक टेक्सी लेकर उस गाँव तक पहुँचा। उसे जानकर अचरज हुआ कि जिस गाँव में नंदिता ने कहा था कि मनाली से तीन किलोमीटर की दूरी पर है, आज लगभग सात-आठ किलोमीटर आना पड़ा। क्या रात के धुँधलके में गाँव खिसक कर ज्यादा दूर हो गया? फिर अपनी मूर्खता को उसने मन-ही-मन डाँटा। बेवकूफी भरी बातें हैं यह। वह नंदिता के साथ पैदल आया था यह तो लेकिन सच है तो क्या वह रात को सात-आठ किलोमीटर पैदल चला। उसे इस बात पर भी यकीन नहीं आया।

चित्र : भालचन्द्र जोशी

उसने गाँव पहुँच कर टेक्सी छोड़ दी। टेक्सी का भुगतान करके उसे विदा किया क्योंकि नंदिता के पास उसे कब तक रूकना पड़े उसे खुद नहीं मालूम। नंदिता यदि किसी बात कि जिद पकड़ ले तो उसे समझाना कठिन काम है। नंदिता की जिद ऐसी है कि फिर उसे कोई नहीं मना सकता है। समय ज्यादा नहीं हुआ था। ठीक से शाम भी नहीं हुई थी लेकिन आज आसमान अकेला नहीं था, वह बादलों की उपस्थिति से खुश था। माहौल में नमी कल से कुछ ज्यादा थी और थोड़ा-सा धुँधलका भी आ गया था।

रात के बाद अब दिन में बस्ती बदली-सी लग रही थी। उसे वह गली भी याद नहीं आ रही थी जहाँ नंदिता का घर और स्कूल थे। रात को और दिन में इस बस्ती में ही नहीं, किसी भी शहर में यह दिक्कत आती है कि रात की शहर को जिस तरह से देखती है दिन में नजरों में बदलाव आ जाता है। वह रात की पहचान को स्मृतियों से प्रायः बेदखल करना चाहती है, खासकर किसी गली या घर को खोजने के लिए।

उसे बहुत भटकना पड़ा बस्ती बहुत छोटी थी, लेकिन नंदिता को कोई नहीं जानता था। आखिरकार बहुत भटकने के बाद बस्ती के आखिरी सिरे पर एक अधेड़ दम्पत्ति रहते थे उसी गली में। गली के आखिरी छोर पर। नंदिता के घर के पास। नंदिता के घर ताला लगा था। रात को घर जैसा दिखाई दिया, आज दिन में देखने पर थोड़ा-सा बदलाव जरूर लगा, लेकिन यह बदलाव रात के अँधेरे और दिन के उजाले में देखने के आम भ्रम की भाँति ही था। अधेड़ दम्पत्ति ने उसे अपने घर के भीतर बुलाया और बैठने के लिए एक कुर्सी दी। वे दोनों सामने खटिया पर बैठ गए।

-‘‘अब आप बताएँ, किस नंदिता की बात कर रहे हैं आप?” अधेड़ पुरुष ने उसकी ओर देखते हुए पूछा।

-‘‘यही इस सामने घर में, जहाँ ताला लगा है। वहीं रहती है वह। नंदिता नाम है उसका और स्कूल टीचर है। यहाँ बच्चों को पढ़ाती है वह।” अर्पित ने उलझन भरे स्वर में कहा कि उसे खुद लगा कि ये लोग कैसे अजीब बात कर रहे हैं कि अपने पड़ौसी को नहीं जानते।

-‘‘इस घर में पिछले चार सालों से ताला लगा है।” वह अधेड़ औरत बहुत सहज स्वर में बोली जैसे अर्पित ने कोई बचकानी बात कही हो।

-‘‘माताजी, क्या कह रही हैं आप।” अर्पित उनकी बात को मजाक जैसा समझ कर बोला, -‘‘कल रात को हमने साथ खाना खाया और….   और घूमने गए होंगे।” अधेड़ ने व्यंग्य किया।

-‘‘जी हाँ…, बिल्कुल।” अर्पित उत्साह से बोला, -‘‘इसका मतलब है आप हमें देख रहे थे।”

-‘‘मैं तो कल काम से कुल्लू गया था। आज दोपहर को लौटा हूँ।” अधेड़ व्यक्ति भावहीन स्वर में बोला, -‘‘लेकिन मैं जानता हूँ कि ऐसा कुछ हुआ होगा।”

अर्पित स्तब्ध-सा उन्हें देखता रहा फिर बोला, -‘‘किसी ने आपको बताया होगा।”

-‘‘नहीं, मैं क्यों पूछने लगा किसी से।” अधेड़ व्यक्ति ने जिसने अभी तक अपना नाम नहीं बताया था, कहा, -‘‘कोई क्यों बताने लगा मुझे?”

-‘‘मेरा नाम अर्पित है। मै मध्यप्रदेश से आया हूँ।” सहसा अर्पित ने अपना परिचय दिया जैसे वह सोच रहा हो कि परिचय देने से वे मजाक खत्म करके सच बात बता देंगे।

-‘‘मेरा नाम रामदयाल कश्यप है। बाहर से आकर बसा हूँ यहाँ। लगभग चालीस साल पहले से।” उसने भी बदले में अपना परिचय दिया, -‘‘यह मेरी पत्नी प्रभा है।”

-‘‘लेकिन मैं सच कहता हूँ। मैं रात को यहाँ आया था। अचानक राह चलते मुलाकात हो गई। कॉलेज के दिनों में हम साथ पढ़ते थे। फिर बातें करते हुए वह मुझे यहाँ अपने घर लाई और खाना बनाकर खिलाया।” अर्पित ने धड़कते दिल से कहा कि ये अधेड़ दम्पत्ति उसकी बात को मजाक या झूठ नहीं समझे, -‘‘उसी ने मेरा मतलब है नंदिता ने ही बताया कि वह यहाँ स्कूल टीचर है और बच्चों को पढ़ाती है।”

अधेड़ व्यक्ति थोड़ी देर तक उसे भावहीन चेहरे के साथ देखते रहे। अर्पित को माहौल अचानक ही भारी और रहस्यमय लगने लगा। उस अधेड़ पुरुष रामदयाल ने बहुत ही ठण्डे स्वर में कहा, -‘‘मैंने तुमसे अभी बताया कि वहाँ पिछले चार सालों से उस घर का ताला नहीं खुला है। तुमने रात को उस घर में खाना खाया तो प्लेटें तो अभी भी वहीं, जूठे बर्तन भी वहीं होंगे। आओ मेरे साथ।” कहकर रामदयाल उठे और घर से बाहर आए इस विश्वास के साथ कि अर्पित भी उनके पीछे आएगा ही।

-‘‘यह घर भी हमारा ही है। अभी चार साल पहले सामने का घर खरीदकर वहाँ रहने चले गए हैं।” रामदयालजी इतना कहकर चुप हो गए और जेब से चाबी निकालकर नंदिता के घर का ताला खोलने लगे।

दोनों घर के भीतर आए तो अर्पित स्तब्ध रह गया। कमरे में वह जूठे बर्तन, प्लेट्स, कॉफी के प्याले कुछ भी नहीं था। सब कुछ पीछे के कमरे में लकड़ी के पटीए पर जमे थे ऐसे कि जैसे बरसों से किसी ने उसका इस्तेमाल नहीं किया हो। धूल की एक मोटी परत सभी बर्तनों और क्रॉकरी पर जमी थी। आगे का कमरा जो कल अस्तव्यस्त जमा था, लेकिन आज इस कमरे में भी पुस्तकों पर बिस्तर पर धूल की मोटी परत जमी थी, जैसे बरसों से किसी ने उसको छुआ भी ना हो। पूरे घर के कोनों में मकड़ी के बड़े-बड़े जाले थे और घर एक अजीब-सी ठण्डक और सर्द हवा से भरा था कि वहाँ साँस लेने में कठिनाई आने लगी।

तो क्या कल मैंने सचमुच होटल में ज्यादा पी ली थी और रात को जल्दी सो गया था। ब्राण्डी की बोतल भी तो आखिर उसके कमरे में ही थी। उसने पूरे कमरे का चक्कर लगाया, लेकिन उसे रम की खाली बोतल नजर नहीं आई।

-‘‘चार साल हो गए।” उस अधेड़ ने उसकी ओर ऐसे देखा जैसे कोई व्यक्ति नहीं अँधेरे में सिर्फ दो आँखों ने कुछ कहा हो।

-‘‘मतलब?” अर्पित ने असमंजस से कहा।

-‘‘चार साल पहले नंदिता यहाँ रहती थी। बच्चों को पढ़ाती थी।” अधेड़ उसी तरह भावहीन और सर्द स्वर में बोला।

-‘‘तो अब कहाँ चली गई?” अर्पित को अब अधेड़ से डर लगने लगा जो अकारण ही एक पुराने घर में रहस्यमय ढँग से बातें करके फिल्मों जैसा सस्पैंस पैदा कर रहा था।

-‘‘मर चुकी है।” अधेड़ ने ऐसा कहा जैसे कोई सामान्य-सी सूचना अखबार में पढ़कर सुना रहा हो।

-‘‘क्या?” अर्पित जैसे अँधेरे कुएँ में गिरा हो। उसके अचरज का उस अधेड़ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

-‘‘घाटी से पैर फिसला या खुद कूद पड़ी, कोई नहीं जानता।” अधेड़ की सर्द आवाज में एक नमी आ गई थी, -‘‘बहुत भली लड़की थी। खूब पढ़ी-लिखी। बच्चों को खूब लगन से पढ़ाती थी। कहती थी हर पढ़ा-लिखा आदमी गाँव में रहने को तैयार नहीं होगा तो इन बच्चों को कौन पढ़ाएगा? ये बच्चे जमाने के साथ आगे कैसे बढ़ेंगे।” कहते-कहते उस अधेड़ की आवाज पीड़ा से काँपने लगी।

अर्पित तो कुछ बोल ही नहीं पाया। अपनी जगह जैसे जड़ हो गया हो।

-‘‘बच्चों से फीस भी नहीं लेती थी। बच्चों की कॉपियाँ और पुस्तकें भी वही लाती थी।” कहकर उस अधेड़ ने पनीली आँखों से उसकी ओर देखा और कहा, -‘‘स्कूल और खुद का घर चलाने के लिए यहाँ किसी बड़े होटल में रिसेप्श्निस्ट भी थी और कुछ अनुवाद का काम भी करती थी।”

-‘‘देखिए ये बातें आपकी सच हो सकती हैं, लेकिन कल रात इसी घर में उसके साथ मैंने बैठकर खाना खाया है।” अर्पित ने ऐसी कमजोर आवाज में कहा कि जैसे उसे खुद अपने कथन पर भरोसा न हो।

-‘‘तुम्हें भ्रम हुआ होगा।” अधेड़ सपाट और पूरे विश्वास से बोला, -‘‘एक अच्छी और भली लड़की के बारे में ऐसी बातें मत फैलाओ। उसकी आत्मा को दुख होगा।” अब उस अधेड़ की आवाज में गीलापन आ गया था, -‘‘उसने कभी किसी का बुरा नहीं किया और न बुरा चाहा। हर किसी की मदद करती थी। तुम अपने भ्रम को भूल जाओ और अपने घर जाओ।” अधेड़ धीमे स्वर में बोलकर कुछ क्षण चुप रहा। उसकी गर्दन अजीब-से अंदाज में हिलने लगी वह दुख का दोलन था या कुछ और वह समझ नहीं पाया। फिर उस अधेड़ ने अँधेरे में घूरते हुए कहा, -‘‘तुम नंदिता के बारे में ऐसी बातें दूसरों से मत करना। पूरी बस्ती उसका आदर करती थी। उसके बारे में ऐसी बातें सुनकर बस्ती के लोगों को दुख होगा और गुस्सा भी आएगा। गुस्से में वे तुम्हारे साथ कुछ बुरा सुलूक भी कर सकते हैं। और दुख में खुद के साथ भी जाने क्या कर बैठे।”

अर्पित को सचमुच लगा कि वेटर ठीक कह रहा था। वह शाम से ही होटल में पी रहा था और खयालों में एक दुनिया बना ली। वैसे भी कॉलेज के दिनों के बाद से मन में, कहीं अवचेतन में नंदिता की यादें सुरक्षित थीं इसलिए वह जरा से जिक्र या स्मृतियों की मामूली-सी आहट पर वह स्मृतियों में अपना यथार्थ मिलाकर उन स्मृतियों को आज की तरह जीने लगा है। एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति जो नंदिता के लिए मन में इतना स्नेह रखता है। इतना सम्मान करता है। उसके बारे में गलत सुनने पर गुस्सा कर सकता है तो खुद क्यों कुछ गलत कहेगा?

उसे अब वेटर की बात सही लगने लगी। सचमुच ब्राण्डी वह नहीं वेटर लाया था। वह लाया होता तो बिल उसके पास, उसकी जेब में होता, क्योंकि वेटर की मानें तो शाम के बाद तो वह कमरे से नहीं निकला था। उसे अपने ऐसे भ्रम पर जो यथार्थ समझने के लिए जिद की हद तक चला गया था, बहुत शर्म आई। कमरे की जो हालत है उसे देखकर लगता है बरसों से यहाँ किसी ने कदम नहीं रखा है।

उस अधेड़ ने उसकी कोहनी को छुआ और चलने का संकेत दिया। वे दोनों बाहर आए। नंदिता का मिलना उसकी कल्पना को यथार्थ में जीने की चरम सीमा थी या रात को नंदिता सचमुच उसकी साथ थी? कुत्ते उसे देखकर डर रहे थे। उसे याद आया नंदिता ने कल चाहे खयालों में ही सही उससे कहा था कि, -‘‘यहाँ पहाड़ों पर जिंदगी खोज रही हूँ। समझ लो, जिंदगी का नाटक खेल रही हूँ।”

यह बात सपनों में कितनी मार्मिकता से नंदिता ने कही थी। नंदिता जिसे वह भूल नहीं पाया था क्योंकि ऐसी दोस्त मुश्किल से और भाग्य से मिलते हैं। अर्पित ने सोचा जिसने कभी भाग्य जैसी चीजों पर भरोसा नहीं किया।

अधेड़ और वह दोनों बाहर आए तो अधेड़ ने पलटते हुए उसका हाथ पकड़ा और कहा, -‘‘किसी से ऐसी बातें मत करना। तुम्हारे लिए तुम्हारी कल्पना खेल है, लेकिन ऐसी अफवाहों से मेरा और मेरी पत्नी का मन दुखता है। इस बस्ती के इस मोहल्ले में या आसपास के मोहल्ले में ऐसी बात करोगे तो कोई भरोसा नहीं करेगा, बल्कि गुस्सा होकर हाथापाई पर उतर आएगा।

अर्पित ने बूढ़े का हाथ आश्वस्ति में थपथपाया और चल दिया। उसने सोचा ब्राण्डी कितनी स्ट्रांग थी? उसके भीतर छिपी भावनाओं और विचारों की उड़ान को कितना ऊपर ले गई। उस जैसा व्यक्ति भी ऐसी बातों के विश्वास में पड़ गया। वह अधेड़ अपने घर में दाखिल हुआ और अर्पित अधेड़ दम्पत्ति से विदा लेकर गली में धीरे-धीरे चलने लगा और अपने भ्रम और कल्पनाओं की उड़ान और उसकी गति पर अचरज करने लगा। उसने तय किया लौटकर वह किसी अच्छे सायकॉयट्रिस्ट को दिखाएगा। वह स्वप्न को यथार्थ में तब्दील करके उसे बड़े और मजबूत विश्वास न सिर्फ समझकर, बल्कि उस विश्वास को सामने बैठे व्यक्ति पर जबरन थोपने की कोशिश भी करता है। उसने मनोविज्ञान की कुछ पुस्तकों में पढ़ा था कि ज्यादा संवेदनशील व्यक्ति कल्पना को इस हद तक जीता है कि धीरे-धीरे वह उसके लिए मजबूत यथार्थ हो जाती है।

वह चलता हुआ गली के मुहाने पर आया तो सहज ही पलटकर नंदिता के घर को देखा तो स्तब्ध रह गया। जैसे जमीन में उसे किसी ने कीलों से ठोंककर जड़ कर दिया है।

नंदिता के मकान की छत पर एक बड़े लकड़ी के डण्डे में उसका लाल मफलर किसी कँटीले तार में फँसे पंछी की भाँति हवा में फड़फड़ा रहा था जो कल रात वह नंदिता के इस घर में भूल गया था। उसने बहुत भारी मन से वापसी के लिए कदम उठाए। शहर दूर था उसे कोई टेक्सी भी नजर नहीं आ रही थी, लेकिन वह आज ही मनाली छोड़कर जाना चाहता था।

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भालचन्द्र जोशी

संपर्क: मोबाइल – 8989432087 ईमेल –joshibhalchandra@yahoo.com

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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निर्देश निधि
निर्देश निधि
3 months ago

बहुत रोचक,मार्मिक और बाँधकर रखने वाली कहानी।
हार्दिक शुभकामनाएं लेखक भाल चंद्र जोशी जी को

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