कथा संवेद

कथा-संवेद – 19

 

इस कहानी को आप कथाकार की आवाज में नीचे दिये गये वीडियो से सुन भी सकते हैं:

स्वाभाविक किस्सागो मोहम्मद आरिफ़ का जन्म 5 जुलाई 1961 को सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश में हुआ। वागर्थ के मई 2004 अंक में प्रकाशित कहानी ‘दांपत्य’ जो उनके कहानी-संग्रह में ‘फुर्सत’ नाम से संकलित है, से अपनी कथा यात्रा शुरू करनेवाले मोहम्मद आरिफ़ के तीन कहानी-संग्रह ‘फूलों का बाड़ा’, ‘चोर सिपाही’ और ‘फिर कभी’, एक प्रतिनिधि कहानी-संग्रह ‘मैं और मेरी  कहानियाँ’, एक उपन्यास ‘उपयात्रा’ तथा अंग्रेजी में दो उपन्यास ‘ड्रीमी ट्रेवलर’ और ‘ब्रेक जर्नी’ प्रकाशित हैं।

अपने समय की ऐसी त्रासदी, जो अभी अतीत नहीं हुई है और जिसके चपेट में समाज का लगभग हर व्यक्ति तेज गति से आता जा रहा है, को किसी कथा या आख्यान में बदल पाना किसी कथाकार के लिए बड़ी चुनौती है। इस मुश्किल को मूर्त करने के लिए पूर्णतः प्रत्यक्ष यथार्थ के बहुत भीतर स्थित उन बारीक रेशों को पहचानने का हुनर चाहिए होता है, जिसमें रचना की संभावनाएं मौजूद होती हैं। मोहम्मद आरिफ़ की कहानी ‘दिलपत्थर’ की छोटी-छोटी घटनाओं में रचना की  उस चुनौती और रचनाकार के उस हुनर दोनों को महसूस किया जा सकता है। ‘पूर्वकथा’, ‘कथा’ और ‘उत्तरकथा’ के तीन हिस्सों में  नियोजित इस वर्तमान-कथा को अपनी त्रासदी से ज्यादा उस त्रासदी के बावजूद और बीच स्थित उन मानवीय क्षणों और संवेदनाओं की पहचान के लिए पढ़ा जाना चाहिए, जिसके खत्म होने को हम लगातार महसूस करते हैं। भय, असुरक्षा और जीवन-मृत्य की अभिसंधि पर स्थित कथा स्थितियों की सघनता के बीच कथाकार का सहज परकाया प्रवेश यहाँ पाठक और भोक्ता के बीच की दूरी को लगभग खत्म कर देता है। बाहर के अंधेरे और भीतर के उजाले की आपसदारी से विनिर्मित समय का धूसर जिस पारदर्शिता के साथ यहाँ दीप्त होता है, वही इस कहानी का हासिल है।

राकेश बिहारी

 

   दिलपत्थर

     मो. आरिफ

(पूर्वकथा)

दोनो कोर्ट से बाहर निकले तो उतना अच्छा नहीं महसूस हुआ जितना कि ऐसे मौके पर लगना चाहिए। बदली थी, सन्नाटा था, और चुप्पी, जैसे कुछ नाखुशगवार गुजरा हो। लेकिन मास्क की वजह से उनके चेहरे की असल रंगत का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था।

   वे सीधे अपने आशियाने को चल पड़े। आशियाना जो उन्होंने दो दिन पहले ही बनाया था ….आज से रहने  जा रहे थे। पहले पैदल चलते रहे। फिर जैसे तैसे थ्री व्हीलर की सवारी मिली और सफर आसान। मौका देखकर उसने जेब से अँगूठी निकाली और बिना किसी रूमानी भूमिका के उसकी उंगली में सरका दिया जिसको उतारकर लड़की ने सही उंगली में पहना और नाक सिकोड़ी – कुछ नहीं पता …. कुछ नहीं आता। फिर लड़का पीछे वाली पैंट की जेब से खरे सोने की चेन निकालकर उसके हाथों में ठूँसते हुए फुसफुसाया, इस तरह कि कहीं ड्राइवर न सुन ले। मम्मी की है। चुरा के लाया हूँ। पुरानी लग रही है न। लेकिन साफ करवा दूँगा, चमक जायेगी। क्या देख रही हो, धीरे से पहन लो। दादी ने मम्मी को दिया था।

  वह चुप रही। चेन उसकी मुट्ठी में बंद थी।

 सुनो, किस फिकर में हो, खुश नहीं हो क्या। वह उसे घूरने लगा, निराशा से। कितनी मशक्कत करनी पड़ी थी उनके बक्से से चेन उड़ाने में, और ये हैं कि कोई भाव ही नहीं दे रहीं।

  वह बिना किसी भाव के चेन को देखे जा रही थी। फिर उसने मुट्ठी बंद कर ली और बाहर ताकने लगी। क्या हुआ, क्या सोच रही हो? नहीं पसंद आई? वह अनमनी सी बाहर ही देखे जा रही थी। उसे कुछ सूझा। उसने उसकी कमजोर नस को पकड़ा- चोरी का माल पसंद नहीं आया न, लाओ वापस दो। उसने सिकड़ी छीन लेने का उपक्रम किया, लेकिन मुट्ठी थी कि लोहे की बख्तर हो गई। वह हँसने लगा। सुनो, वह फिर फुसफुसाया, और इस बार बहुत धीरे से, जान बूझ कर क्यों कि ड्राइवर मजबूत कद काठी का था, दिल्ली के आसपास का होगा, बदमाश लग रहा था। लेकिन बोलना तो था ही- और अब नहीं तो कब- पर ये बदमाश न सुने- सुनो! अच्छा रखे रहो, रात में मैं खुद पहनाऊँगा। फिर कुछ और रूककर – बेबी! वह कसमसा गई, उसके बाँह में कसकर चिकोटी काट बैठी। दरअसल ड्राइवर का सर एक डिग्री उनकी तरफ हो गया था। फिर जैसे ही ड्राइवर का सर सीधा हो गया और वह फिर से गाड़ी चलाने में मशगूल हो गया, उसने अपना सर अपने नये नवेले पति के कंधे से लगा लिया। कुछ दूर और चलने के बाद लड़के को कुछ अटपटा सा लगा। लड़की आँखे बंद किये उसके कांधे से लगी हुई थी। इस बार उसने ड्राइवर की परवाह नहीं की – क्युँ, तबीयत तो ठीक है न? उसने उसी मुद्रा में कहा – नहीं। मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही।

चित्र : प्रवेश सोनी

रास्ते में कुछ स्नैक्स, चादर, तकिये का गिलाफ, ताजे फूल, प्राइवेट कपड़े, कान्डोम और चूड़ी का डिब्बा खरीदते हुए वे अपने ठिकाने पर पहुँच गये। पहुँचते ही उसने जो पहला काम किया वह था स्वीगी। उसके बाद वह कमरा सजाने लगा।

 डिलीवरी ब्वाय दस मिनट से ज्यादा लेट हो चुका था और वह घड़ी देखे जा रहा था। इतनी देर, कहाँ रह गया बंदा। वह चुपचाप बैठी उसे खीजते देख रही थी। कॉलबेल बजी, लेकिन किसी ने शायद गलती से बजा दिया था। वह मुस्कुराई, क्या बात है, किस बात की जल्दी है, आ जायेगा, पूरी रात पड़ी है।

  चुप करो! वह बाथरूम की तरफ बढ़ गया।

बाहर आया तो नहा धोकर फ्रेश था- तौलिया में नंगे बदन! पर उसने नोटिस नहीं किया, कुछ गुनते बैठी रही। फिर जैसे जगी, घर बात कर लूँ?

  वह पाऊडर छिड़क रहा था। चुप ही रहा।

   सोच रही हूँ अब तो बता दूँ।

उसने कहा सोच लो। तुम्हारे घर वाले ज्यादा दूर नहीं रहते। ये जो फूल-पत्ती और नये नये रिझाने वाले कपड़े खरीद कर लाई हो धरे रह जायेंगे। खींच के ले जायेंगे तुम्हें वे लोग।

 -अच्छा छोटू से बात कर लेती हूँ। आप बोलो…………………..।

 उसने मोबाइल को एक हाथ से दूसरे हाथ में कर लिया।

 करूँ?

  बुला लो कमरे में साथ सो जायेगा।

चुप्प …. तुमको मजाक सूझता है बस। जाओ मै किसी से बात नहीं करती, मेरा सर फट रहा है।

मुझे मालूम है, अब तुम्हें बहाने सूझ रहे हैं। खाना लगा रहा हूँ, खाना खा लो, फिर सर दबा दूँगा।

चलो हटो……बड़ा सर दबा दूँगा।

 क्यों, आज देखना कैसे दबाता हूँ। वह मुस्कुराया।

खाने के टेबल परवह बस चुगती भर रही। न भूख लगी थी, न स्वाद आया, न सुगंध मिली। बेतरतीब सजे बेडरूम को उसने और सजाने की कोशिश की पर बात बनी नहीं। वह आँखें बंद किये पड़ गई और धीरे से बुदबुदाई- बदन गर्म लग रहा है, देखो फीवर है। उसने संशकित होकर उसे देखा, बोला तुम्हारा वहम है, हाथ दिखाओ। देखो तुम थक गई हो, डिस्टर्ब भी हो कोई बात नहीं, तुम सो जाओ ….. सुबह तक ठीक हो जाओगी। ऐसा करता हूँ, मैं दूसरे वाले कमरे मे सो जाता हूँ, तुम सचमुच बीमार लग रही हो। अच्छा ऐसा करो घर बात कर लो, हल्की हो जाओगी। कर लो बात, मैं चलता हूँ….ठीक। वह उसके माथे पर हाथ रखता हुआ निकलने लगा।

वह कुनमुनाई- प्लीज बुरा न मानो, मुझे सचमुच फिवरिश लग रहा है। सुनो मरा मास्क दो, तुम भी पहन लो, जस्ट इन केस …….। उसने कंधे उचकाये और मास्क लेने चला गया। मास्क लेकर लौटा तो वह उठने की कोशिश करते हुए बोली- ऐसा करो नीचे किसी मेडिकल स्टोर से थर्मामीटर और ऑक्सीमीटर ले लो……मेरे पर्स में पैसे है…. जाओ प्लीज, थोड़ा प्रिकाशन तो लेना पड़ेगा।

उसने मास्क पहना, पैसे लिये और जाने के लिये मुड़ा। दो कदम चलने के बाद फिर वापस मुड़ा- तो मैडम, सुहाग रात कैंसिल न।

   वह सोती सी लग रही थी, कुछ नहीं बोली।

थर्मामीटर और ऑम्सीमीटर सामने वाले मेडिकल स्टोर में नहीं मिले। पीछे वाले में भी नहीं। बायें और दायें वाले में भी नहीं। दूर वाले में भी नहीं। गुम हो गई थीं सारी मशीनें। वह भटकता रहा, पुलिस वालों को सफाई देते देते, पैदल चलते चलते थक गया। जब लौटा तो रात के दो बज रहे थे। गनीमत थी कि एक पुलिसवाले की मदद से ही मशीनें मिल गईं।

फीवर था 102। दो घंटे बाद भी पारासीटामाल का कुछ असर नहीं हुआ था और ऑक्सीजन लेवेल 97 से 90 पर आकर रूक गया था। कुछ देर तक वह गूगल पर रिसर्च करता रहा और जब वह पूरी तरह सोती सी लगी, वह भी दूसरे कमरे में चला गया। और आदतन दरवाजा बंद कर लिया।

  अलग अलग कमरे में सोने के फैसले के साथ उनकी पहली रात कोविड के साये में बीतना शुरू हुई। और लगभग साढ़े चार बजे सुबह, जबकि वह गहरी नींद में था, उसके दरवाजे को खुलवाने की कोशिश शुरू हुई और लगभग पाँच बजे ठक ठक और एक कमजोर सी हॉफती आवाज ने उसे जगाने में कामयाबी पाई। वह झटके में उठा, दरवाजा खोला।

वह पूरा हाथ फैलाकर मना करने की मुद्रा में पीछे हटते हुए बोली-बुखार नहीं उतरा ……. साँस और फूलने लगी है …… दूर रहो। बहुत बेचैनी है, प्लीज डाक्टर से बात करो या हॉस्पिटल ले चलो। मुझे कोरोना हो गया…. मैं जानती हूँ, मैं जान रही हूँ …. कोविड, पक्का। बदहवासी में वह वहीं गिर पड़ी।

वह नीचे भागा। क्या इत्तेफाक था कि जिस थ्री व्हीलर वाले को उसने सोते से जगाया यह वही था जिसने उन्हें पिछली शाम यहाँ ड्रॉप किया था। ये लोग स्मार्ट होते हैं, झट पहचान गया- क्या बाऊजी, क्या हुआ? एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन… चलिये रेडी हूँ। उसने एक पल के लिए भी यह आभास नहीं होने दिया कि वह सो रहा था। उसने घीरे से कहा, हॉस्पिटल … हॉस्पिटल चलना है जल्दी। ड्राइवर ने ऐसे देखा जैसे कह रहा हो, अरे शाम को तो अच्छे भले आये हैं, अभी क्या हो गया, कौन सी इमरजेंसी हो गई भाई। फिर वह जैसे कुछ समझते हुए झिझका-हॉस्पिटल, अँय! अभी हॉस्पिटल!

उसने विनती की, हाथ बस जोड़ते जोड़ते रह गया, फिर भी आधा जुड़ ही गया- हाँ हॉस्पिटल चलना है भइया, थोड़ी जल्दी कर सकते हो … क्या सोचने लगे? भइया, अपने पैसे ले लेना, जो कहोगे दे दूँगा, मुझे जल्दी है, …. मुझे नही …. पेशेंट ऊपर है, मैं बस लेकर आया।

ड्राइवर ने स्टेयरिंग हैंडिल से हाथ हटा लिये- बाऊजी ऐसा है, एक मिन्ट इधर आओ…… हाँ आप देख लो …. हॉस्पिटल उलटे साइड है, मन्ने स्टेशन की तरफ जाना है। ड्राइवर ने अपना मास्क चढ़ा लिया।

वह बेतहाशा आगे भागा। आगे क्रॉसिंग पर खड़ा होकर बेसब्री से देखने लगा। कुछ नहीं। कुछ भी नहीं। एक चिड़िया तक नहीं थी वहाँ। अब क्या करे। दो एक गड़ियाँ जो उधर से पास हुईं सभी स्टेशन की तरफ जा रही थीं। कछ स्लो हुईं, रूकीं, लेकिन हॉस्पिटल सुनकर आगे बढ़ गईं। उसकी बेहाली का बस अंदाजा भर लगाया जा सकता है! और तभी पीछे से एक थ्री व्हीलर उसके नजदीक आकर रूक गया- वही था। वही ड्राइवर। चलिये उन्हे ले आइये नीचे…. किस हॉस्पिटल चलेंगे- कहीं भी जगह मिलना मुश्किल है….बल्कि नामुमकिन है, कोई कुछ भी कहे। बहन जी को कोरोना हुआ क्या … मुझे तो लग रहा है।

जब वे थ्री व्हीवर में सवार हुए तो उसका ऑक्सीजन लेवेल 89 था और फीवर 102.6, फिर भी वह नार्मल एक्ट करने की कोशिश कर रही थी। ऊपर ही उसने बता दिया था कि वही ड्राइवर है तो उसने रुक रुक कर प्रतिरोध जताया- नहीं, उसके साथ नहीं जाना है…. आदमी ठीक नहीं लग रहा था… अभी बहुत सुबह है, दिन भी अच्छे से नहीं निकला है, उसके साथ नहीं। उसी के डर से शायद उसने साँसों को संभाल रखा था, सीधे अपने बल बैठी, और शायद कुछ खुद में ही बोलती भी जा रही थी।

वे पहले सबसे बड़े हॉस्पिटल पहुँचे। उसके बाद उससे बड़े, और उसके बाद उससे भी बड़े। मालूम हुआ कि इनमें बड़े लोग भर्ती हैं या फिर उनसे भी बड़े लोगों के लिए उनके बेड रिजर्व हैं। ड्राइवर को उसने बता दिया था भईया जितने भी पैसे बनेंगे सब देंगे, बस एक बेड मिल जाय। लोगों ने जहाँ जहाँ बताया वे गये। बड़े से छोटे, फिर उससे छोटे और फिर उससे छोटे। अब दोनों को ही ड्राइवर पर पूरा भरोसा हो गया था। वह उसी के भरोसे उसे छोड़ हॉस्पिटल में जाता, पूछताछ करता, मिन्नतें करता, हाथ पाँव जोड़ता, उतने में वह भी गाड़ी लेकर वहीं पहुँच जाता और उसके साथ वह भी अस्पताल वालों के सामने रिरियाने लगता। वे दोनो गाड़ी की तरफ इशारा करते- देखिये डाक्टर साहब, देखिये सिस्टर, साँस नहीं आ रही है पेशेंट को … प्लीज ले लीजिए, बेड नहीं तो जमीन पर लिटा दीजिएगा, बस एडमिट कर लीजिए… फीस की कोई बात नहीं, बिल्कुल फिकर न करें हम एडवांस जमा कर देंगे, जितना कहेंगे।

चित्र : प्रवेश सोनी

अंततः वे जीवन ज्योति अस्पताल पहुँचे। रिसेप्शन पर बैठी सिस्टर विनम्र थी, अच्छी भी। कुछ लोग, कुछ चेहरे, कुछ मौजूदगियाँ पहली नजर में ही आपको भीड़ से अलग-थलग दिख जाते हैं। गोकि वे मास्क पहनें हों तब भी। उसे जैसे इलहाम हुआ, यहाँ और इनसे उसको मदद मिलेगी। जरूर मिलेगी। वह उन्ही लोगों को बड़े गौर से देखे जा रही थी- एक को, दोनो को, तीनों को, और फिर एक को और दोनो को। वह जान रही थी वे उसके पास ही आ रहे हैं और उसने अपने आपको तैयार कर लिया था- सॉरी, रियली सॉरी, हम कोई पेशेंट नहीं ले रहे हैं और आपके पास पॉजिटिव सर्टीफिकेट भी नही है। हम मजबूर हैं। कर सकते तो हम आपकी मदद जरूर करते।

बात नहीं बनी। इलहाम का अबवह क्या करे। सिलिंडर, ऑक्सीजन, वेंटीलेटर, बेड और इंजेक्शन की बात तो थी ही। साथ में उन्हें पॉजिटिव होने का प्रमाण पत्र भी चाहिए होगा। उस पूरी भाग दौड़ में वह ड्राइवर तिनके का सहारा की तरह उसके साथ था। उसकी कुछ बातों से उसे संबल मिलता- जैसे कि जहाँ भी बाऊजी हम जा रहे हैं मरीजों का रेला लगा हुआ है, जिसको कोरोना नहीं वह भी डर के मारे दौड़ा चला आ रहा है। अस्पतालों की मौज है, इनका बैंक बैलेंस बढ़ रहा है, दिन दूनी रात चौगुनी। फिर अचानक वह चौंका- एक बात बताइये बाऊ जी, क्या गारंटी है कि बहन जी को कोरोना ही है, कोई जाँच तो हुई नहीं है? आँय! चलो मान भी लेते हैं इनको कोरोना है तो आप ही बताइये अस्पताल वाले करे तो करें क्या। इनके सामने भी तो दिक्कत है, अस्पताल सभी को कहाँ से बेड दे, कहाँ से इतनी गैस लायें। बिचारी लड़की चाह तो रही थी कि ले ले, लेकिन क्या करती, मजबूर है।

अस्पताल में एक एजेण्ट ने उन्हें एक नंबर दिया – कहा इस पर बात करें, एडमीशन ऑक्सीजन और बेड का पूरा पैकेज है। इस पर न लगे तो इस पर लगाइयेगा, उसने दूसरा नंबर भी दिया। एडमीशन हो जाने पर मैं आप से खुद मिल लूँगा- मेरा बस दो हजार बनता है। आप चाहें तो एक पाँच की टिक्की दे सकते हैं, बाकी पन्द्रह काम होने परा। उसने पाँच सौ का एक नोट बढ़ा दिया।

   देखिये आपके पेशेंट की हालत बिगड़ रही है, देर करेंगे तो केस खराब हो जायेगा, फिर आप जानें- उसने नोट को तोड़मोड़ कर जेब में रख लिया। फिर शुरू हुआ- वैसे भाई साहब बुरा न मानें, समय ऐसा है कि आदमी जानवर बन गया है। मैं भी। जीमैं भी। दरअसल काम करते करते। बता ही देता हूँ आपको। सुबह से शाम तक साँस लेने की फुर्सत नहीं- फिर हँसने लगा, जैसे उसे मजाक सूझा- साँस कहाँ से लेंगे। ऑक्सीजन तो है नहीं, साँस कहाँ से लेंगे। बेड तो है नहीं, आराम कहाँ करेंगे। देखिये- अदरवाइज न लीजिएगा। सुबह से शाम तक इस अस्पताल, से उस अस्पताल, उस अस्पताल से इस अस्पताल बस यही काम रहता है, तब जाकर चार पैसे मिलते हैं। अब क्या कहें, कुछ दिनों से एक नया काम भी फाँद लिया है सर पे। बॉडी डिस्पोजल का। उसमें मार मची है। कंपटीशन भी। ऑक्सीजन और बेड से ज्यादा तो वहाँ दिक्कत है- लाइनें लगी हुई हैं लेकिन लकड़ियाँ नदारद। कबर खोदने वालों के अलग नखरे- छोटी बड़ी सभी का एक ही दाम। कहते हैं हमें भी बच्चे पालने हैं, मेहनत लगती है, कोविड पकड़ने का खतरा अलग से। लेकिन भाई साहब, सामने वाला बात समझे तब न। बॉडी बदबू मारने लगेगी, लेकिन जेब ढीली करने को तैयार नहीं। और तो और, अस्पतालों से ज्यादा घरों से बॉडियाँ निकल रही हैं, उनका कोई हिसाब नहीं। उनका हिसाब हम लोग रखते हैं। आई बात समझ में।

  एजेंट बोले जा रहा था। वह और ड्राइवर सुनते जा रहे थे, घड़ी देखे जा रहे थे। जब उसने बॉडी की बात की तो वे दोनों थ्री व्हीलर से दूर खिसक गये। वह होश में थी, और सुन सकती थी।

   उसने फिर बोलना जारी रखा- मेरा तो ऑफर है। बॉडी मेरे हवाले करो, पैसे दो आप जाओ घर आराम करो। सब काम फिनिश करके आपको फोटो सेन्ड कर देंगे। पहले दस दिन लोग झिझके, फिर एक दो कस्टमर मिले, उसके बाद तो हमने पूरा विडियो बनाया, पिच्चरें उतारी, लोगों को दिखाया, उन्हें विश्वास होने लगा और अब साँस लेने की फुर्सत नही। दस बारह लड़के रख लिये हैं। वे अस्पतालों के चक्कर काटते रहते हैं- हाँ हलो, अरे बेटे, पार्टी को रोक के रखो, बस पहुँचे, पुलिस वालों को पाँच पाँच टिक्कियाँ दे देना। चलो रखो। फोन को ऑफ करते हुए एजेंट ने अपना फाइनल रिमार्क दिया- देख रहे हैं कितना बखेड़ा है, ऊपर से सरकारी खुरपेंच, जिससे बच निकलना आप जैसे लोगों के लिए संभव नहीं है। उसी लिए तो हम हैं ….।

चित्र : प्रवेश सोनी

    उसकी नसें जो तनी हुई थीं वे ढीली होने लगीं। उसकी बेसब्री बेचैनी और बेड और ऑक्सीजन की जल्दबाजी सहसा सुस्त पड़ने लगी। एजेण्ट ने जैसे उसे हल्का कर दिया था। आखिर दीवाल में सर फोड़ने से क्या हासिल होगा, इमरजेंसी तो है, पर क्या इतनी कि दौड़ते दौड़ते मर जायें? इसी बीच एजेण्ट ने जेब से एक कार्ड निकाला- बस कम ही छपवाया है भाई साहब। लीजिए, उसने हाथ बढ़ाया। कार्ड तकरीबन सादा ही था। सिर्फ तीन मोबाइल नंबर छपे हुए थे- एक के नीचे एक। उसने कहा एडमीशन कराना, ऑक्सीजन, वेंटीलेटर और बेड के लिये पहले दोनों नंबरों पर ट्राई कर लें। वह जिम्मेदारी मेरी नहीं, साफ बात। वो लोग कर देते हैं, आप संतुष्ट हैं, तो मैं आकर पन्द्रह टिक्की ले लूँगा। अगर नहीं कर पाते हैं तो भाई जी सुन लो, ये जो आपने दिया है पैसे, ये पाँच सौ की टिक्की, समझना अपने छोटे भाई को यों ही दे दिया। उसने पाँच सौ की नोट निकाल लिया फिर वापस जेब में रखते हुए बोला, और तीसरा नंबर मेरा है, बॉडी का काम हो तो मुझे याद कर लेना। उसने बिना कोई मौका दिये मोटर साइकिल स्टार्ट की और फुर्र हो गया।

  कुछ देर वे वहीं खड़े रहे चुपचाप। वह और ड्राइवर। थोड़ी दूर पर थ्री व्हीलर में वह निढाल पड़ी थी। उसने ड्राइवर से कहा पानी ला भाई, और कुछ खाने को लाना। ड्राइवर रोड पार दुकान की तरफ बढ़ गया। उसने उस कार्ड को फिर देखा। तीनों नंबरों के नीचे, एकदम से नीचे बाटम पर कुछ छपा था – महीन छोटे अक्षरों में कुछ लिखा था। उसने आँखे गड़ाईं- बेफिक्र रह बंदे, आखीर में कुदरत ही मुस्कुरायेगी। उसने दुबारा पढ़ा। फिर पढ़ा। फिर एक बार और। फिर एकदम शांत हो गया। फिर जैसे मुस्कुरा उठा। लेकिन मुस्कुरा नहीं सका।

  वह वैसी ही पड़ी थी। बेसुध। हलके नाश्ते के बाद उसने पहले नंबर पर कॉल लगाई- फोन झट उठा। बात हुई। डील हुआ। एडमीशन करवा देने का उसने अपना खर्च बीस हजार कोट किया। अस्पताल का अलग से। इसमें बस एडमीशन, बेड की गांरटी नही। उसने हो- हुज्जत नहीं की। मिन्नत और कुछ कम करने की फरियाद भी नहीं। हनीमून ट्रिप के पूरे पैसे बचे थे। पहले जान।

  फिर सामने वाले ने कहा आप अस्पताल पहुँचो, हमारा लड़का पहुँच रहा है, कैश रेडी रखना। ट्रीटमेण्ट, ऑक्सीजन बेड मिलने पर, और उसका चार्ज अलग से अस्पताल को। अस्पताल अगर ऑक्सीजन का इंतजाम नहीं कर पायेगा तो हम करेंगे- चालीस तक लग सकता है। पाँच दस एक्सट्रा रखना। इधर-उधर का। उसने कहा कोई बात नहीं, बस अस्पताल के अंदर करवा दो, वैसे पेशेंट स्टेबल है, फिर भी जल्दी करो। जवाब आया- बस बस आप पहुँचो, लड़का निकल चुका है।

  ‘बेफिक्र रह बंदे, आखीर में कुदरत ही मुस्कुरायेगी‘ पढ़कर न जाने क्यों उसको उसकी नवविवाहित कोरोना पेशेंट स्टेबल लगने लगी थी। उसने ऑक्सीजन नापा, पहले 95 फिर घिसटते हुए 84 पर रूका। बुखार 101। वह बुदबुदाई- पानी, बहुत प्यास लगी है। अस्पताल में भरती करवा दो न……। साँस में बहुत दिक्कत हो रही है……. कुछ करो, कुछ भी!

   यह वही अस्पताल था और वही नर्स थी- जो पहले मजबूर थी। पर अब नहीं। लड़के ने आते ही पैसे झपटे और अस्पताल के अंदर भागा। उसने गौर किया कि भागते भागते उस लड़के ने आधे या लगभग इतने ही पैसे अपनी दाहिनी जेब में सरका लिया। कुछ ही पलों में वह लौटा और उसी नर्स को कुछ बोलते हुए बाहर निकल गया।

   वार्ड ब्वाय, स्ट्रेचर, पेशेंट और नर्स। और जीवन-ज्योति अस्पताल। वह दौड़ा लेकिन नर्स ने उसे हाथ के इशारे से मना कर दिया- आप नहीं, आप रूकिये, सिर्फ पेशेंट, मरीजों की भीड़ देख रहे हैं? कुछ देर बाद वह लौटी और कुछ और मरीजों को अंदर ले गई। फिर कुछ और को। फिर कुछ और।

   अस्पतालों का अपना एक माहौल होता है जिससे वह परिचित था। एक सुंगध होती है, चाहे तो उसमें से ‘सु’ हटा दें। इस गंध में फिनायल, एसिड, दवाओं और दूसरे केमिकल्स का तड़का होता है। यहाँ रोना और हँसना भी बराबर का होता है। लेकिन इस पल में जीवन-ज्योति में फिनायल की गंध में सिर्फ रोना शामिल था। पर हे प्रभु, रोने वाले कहाँ हैं? वे तो थे नहीं। कोई रोने वाले नहीं थे, सिर्फ रूलाई थी, डॉक्टर थे, नर्सें थी, वार्ड ब्वाय थे, पेशेंट थे, हल्का बुखार था, आधी साँस थी, टूटती आस थी। रोना था, लेकिन रोने वाले नही थे।

  अंदर ले जाते हुए पेशेंट ने कुछ इस तरह मुँह बनाया था जिससे लगा कि साँस की तकलीफ कुछ कम हुई थी। वह बाहर ही खड़ा रहा, मास्क अच्छी तरह मुँह पर चढ़ाये हुए, और थ्रीव्हीलर का ड्राइवर थोड़ी दूरी पर। नर्स उसकी नई नवेली बीवी को जाने कहाँ रखकर फिर अपने काम में मशगूल हो गई थी। वह सोच रहा था कि वह पूछे क्या किया उसने उसकी पेशेंट का परवह नर्स तो जानवरों के माफिक काम करती जा रही थी। वह दो तीन बार उसके नजदीक तक पहुँचा, उस नर्स ने दो तीन बार उसकी तरफ हमदर्दी से देखा। बस। पूछ पाने और बता देने के बीच कितनी अड़चनें, कितनी रुकावटें, कितने मरीज, कितने बीमार, कितने काम। घंटो बाद भी उसे निश्चित रूप से यह नहीं पता चला सका था कि उसे किस तरह से भर्ती किया गया है, वार्ड में है या आई सी यु में या बराम्दे में या कहाँ। उसने ड्राइवर का नम्बर लेकर उसे विदा किया और वहीं पिलर के पास जम गया, नीचे ही जमीन पर। उसे बताया गया कि यों तो कोरोना पेशेंट के कोई तीमारदार यहाँ अलाऊड नहीं हैं, लेकिन जो भी हो वे रोड के उस पार सामने वाले पार्क में रात बिताते हैं।

   शाम के करीब आठ बजे और बहुत सी नर्सों की आपाधापी में वह फिर दिखी, वही नर्स! वह लपका, सिस्टर, सिस्टर बेड मिल गया? वह मुस्कुरा पड़ी मास्क के अंदर ही। दिन में शायद पहली बार। बेड? नहीं नहीं अभी कहाँ… अभी तो बराम्दे में ही सेट अप किया है, वार्ड के लिए लंबी वेटिंग है। और तबियत कैसी है, मतलब कि ऑक्सीजन लेवेल, फीवर, साँस…। नर्स ने कहा कल बात करियेगा, जाइये कहीं आराम कर लीजिये। सीरियस है लेकिन रात निकल जायेगी, फिर धीरे से बोली, जैसे स्वयँ से ही, …. निकल जानी चाहिए!

वह देखता रह गया।

(कथा)

   वह रात उसने पार्क में बिताई। इक्के दुक्के तीमारदारों के साथ। सुबह होते ही वह जीवन-ज्योति अस्पताल के गेट पर था। अस्पताल स्टाफ ने उसे मास्क के लिए डाँटा- एक नहीं दो, दो मास्क पहनिये, डबल मास्किंग। वह जेब टटोलने लगा- एक ही था, जो उसके मुँह पर था। सामने खड़े पुलिस वाले ने झट अपनी खैनी, मास्क के नीचे से मुँह के अंदर रखी, हाथ झटका और ऊपर वाली जेब से एक मास्क निकालकर उसकी ओर बढ़ा दिया।

   -मैं भी रात में पार्क में ही था – यहीं ड्युटी लगी है। सुबह डेड बॉडी निकलवाकर फिर वहीं पार्क में बैठ जाता हूँ… पहले दिन भर यहीं रहता था, पर भीड़ बढ़ गई तो मेरे रहने न रहने से फर्क नहीं पड़ता… दिन में एक बार शमशान घाट भी जाना पड़ता था, पर अब जाता नहीं यही से हिसाब कर देता हूँ… मास्क अच्छे से पहन के रखिये। लेकिन उसने ऊपर वाला मास्क फिर से उतार लिया।

   फिर से सिस्टर दिखी। सभी लगभग एक जैसी होती हैं लेकिन उसे लगने लगा था वह अलग है। वह लपका, सिस् …। उसने हाथ से इशारा किया अभी रूकिये .. बताती हूँ। मुड़ी-तुड़ी युनीफार्म से लग रहा था कई दिनों से छुट्टी नहीं मिली है। रात में शायद ही सोई हो!

   पुलिस वाले ने उसे इशारा किया-सुनिये, ऐसे जवाब नहीं मिलेगा… ऊपर से फोन करवाइये। फिर रूक कर बोला- भाई फोन से भी कुछ नहीं हो रहा है अब। यही लोग कर सकते हैं जो कर सकते हैं- अच्छा एक बात बताइये पेशेंट अभी जिंदा है या डेड बॉडी लेने आये हैं… अंबुलेंस चाहिए था  … प्राइवेट देख लीजिए… इनके पास मिलना असंभव है… बहुत मारामारी है। उसने पुलिस वाले के एकालाप को सुना लेकिन बोला कुछ नहीं। हॉ फिर से एक मास्क के उपर दूसरा मास्क भी चढ़ा लिया।

   वार्ड ब्वाय, डॉक्टर, नर्स, सफाई कर्मचारी सभी को कुछ न कुछ काम था, सभी जल्दी में थी, सभी रात भर सोये नहीं थे, सभी खुद को बचाते हुए दूसरों को बचा रहे थे। लेकिन फिर भी लोग बच नहीं रहे थे।

  किसी तरह वही फिर से दिखी। वही नर्स। वही सिस्टर। वह दौड़ा और उसके सामने खड़ा होगया।

   जी, क्या हुआ? वह चुप रही। उसके हाथ में बिस्कुट का एक छोटा पैकेट था। उसे अपने सफेद कोट के सामने वाली जेब में रखते हुए वह खड़ी हो गई। उसने धीरे से पूछा क्या हुआ उसका … बेड मिला? वह जो बोली इस तरह से था- बेड की तो दिक्कत है। वार्ड और आई.सी.यु में डेड बाडीज पड़ी हुई हैं कोई उठाने वाला नहीं है। जैसे ही जगह बनती है बरामदे वाले पेशेंट को अंदर ले लेंगे। लेकिन वेटिंग ज्यादा है। अभी दो दिन और लगेंगे। हाँ आप ऑक्सीजन सिलिंडर का इंतजाम कर लीजिए। जल्द ही। आज ही। उसने पूछा, तो ठीक है न वो? वह कुछ नहीं बोली, चली ही गई।

   ड्राइवर को नंबर मिलाते हुए वह पार्क की तरफ लौटा, बेचैन, बेखुद। उधर ड्राइवर ने गाड़ी किनारे लगाई और शुरू हो गया- जी क्या हुआ, ठीक तो? कहो तो सवारी छोड़कर मैं आ जाऊँ। सिलिंडर? देखों भाई मैं भी देखता हूँ पर आप उन लोगों को फोन लगाओ न…। मैं आज किसी समय मिलता हूँ। नहीं नहीं मै ट्राइ करूँगा, पता है बाबू जी पता है … बस दो चार घंटे निकल जायें.. मालुम है सभी अस्पतालों का यही हाल है.. चलो चलो मैं देखता हूँ। रखूँ?

उसने उन दोनो नंबरों पर बारी बारी फोन लगाया। पहले तो कुछ नहीं, फिर बिजी और फिर कोविड से बचने की चेतावनी। मन किया कि फोन पटक दे। फिर हलो हलो। उसने पहले प्रश्न पूछा- सिलिंडर की व्यवस्था हो सकती है क्या। इस तरह से पूछा कि सामने वाले को हालात गैर मामूली न लगे और फटाफट दाम न बढ़ जाय। सामने वाला बेवकूफ न था, उसने भी काउंटर किया- कब के लिये। वह विचलित हो गया- आज ही … अभी चाहिए भाई साहब। तो ऐसे बोलिये न। कोई चाँस नहीं आज से शाम तक कुछ नहीं हो सकता। दो चार जो अरेंज कर सके निकल गये हैं। कल की बात करिये कल की। अबवह मिन्नत पर उतर आया- कुछ भी हो भाई साहब, बस एक सिलिंडर की तो बात है.. अस्पताल वाले कह रहे हैं इमरजेंसी है, और आज ही। चुप्पी .. और फिर यह – दस हजार आप ट्रांसफर कर दो मैं देखता हूँ … इसी नंबर पर। उसने फोन रख दिया।

   पार्क की बेंच पर बैठकर इसने पैसे ट्रांसफर किये और सोचने लगा फेमिली में बता दिया जाय या अभी नहीं। उसने बहन को फोन लगाया। वही आगे न्युज ब्रेक करेगी। फोन पर कोरोना की डरावनी चेतावनी के बाद उधर से आवाज आई- कर लिये अपने मन की? उसने बहन को ज्यादा मौका नहीं दिया, हाँ सब कर लिये और अभी अस्पताल में हैं। कल सुबह से ही … इसी लिए फोन किया है। मतलब? इस मतलब में साफ साफ चौकने जैसा कुछ था। वह चुप रहा, लेकिन बहन नहीं- अस्पताल में… क्या हुआ … भैया? कोरोना हो गया है, मुझे नहीं उसे। अरे नहीं। बहन की आवाज में चैंकने के साथ सनसनाहट भर गई थी जैसे उसे बुलेट ने हिट किया हो पर होश बाकी हो। इस नीम होशी में वह मुझे और उसे का फर्क नहीं समझपाई- बस कोरोना सुन सकी थी- अरे क्या बोलते हो, बक। हलो, हलो। हाँ सच में गुड़िया मै तो ठीक हूँ वह पॉजिटिव हो गई, कल से अस्पताल में है, धीरे धीरे कंडीशन सीरियस हो रही है। मैं भी यहीं हूँ …. पापा मम्मी को बता देना … पैसे चाहिये होंगे सिलिंडर नहीं मिल रहा है।

चित्र : प्रवेश सोनी

भाई की खुद ओढ़ी हुई परेशानी, मम्मी पापा की वाजिब नाराजगी और बहन की रुलाई- अपना खयाल रखो भइया, बहुत बुरे हालात हैं …. टी.वी पे देख रहे हैं … अस्पताल के अंदर मत जाना …। बहुत नाराज हैं। ये लोग कुछ नहीं करेंगे जानती हूँ फिर अंत में, फफक कर रोने की आवाज! ये लेाग कुछ नहीं करेंगे।

उसी बेंच पर वह सो गया। और फिर आधे अधूरे सपने। दिन की नींद के सपनों की मध्यम गति। और उसमें उलझी एक प्रेम-कहानी। पुलिस वाले की खैनी मिश्रित ताली से उसकी तंद्रा टूटी और वह ऊँचे पहाड़ की चोटी से गहरी खाई में गिरने से बच गया। कैसी तबियत है आपके पेशेंट की? अभी वह नींद से बाहर नहीं हुआ था। अनमनस्क, अधलेटा बैठा रहा। सुना लेकिन कुछ बोला नही। लीजिए पानी पी लीजिए, बहुत सोये, दो घंटे के लगभग … लग रहा है सिलिंडर की व्यवस्था हो गई … उठिये उठिये।

  वह उठा और अस्पताल की ओर चल पड़ा। पैसे ट्रांसफर किये दो घंटे से ज्यादा हो गये थे और ड्राइवर से बात किये हुए तीन घंटे से भी अधिक – कहीं से कोई रिस्पांस नहीं। इस बार वह दिखाई नहीं पड़ी, पीछे से आई और बोली, सुनिये आपकी पेशेंट ने रिक्वेस्ट किया है कि मैं आप को कुछ खाने को दे दूँ- वह एक छोटा सा बिस्कुट का पैकेट उसकी ओर बढ़ाते हुए बोली। रूखी सी मुस्कान। उसे कुछ अजीब सा लगा, असहज भाव से उसने पैकेट थाम लिया। तो सुबह उसने उसी तरह का बिस्कुट का पैकेट उसके हाथ में देखा था। काम का बोझा! बेचारी सिस्टर्स।

 तबियत अब कैसी है? बेड का कुछ हुआ? उसने बिस्कुट का पैकेट पकड़े पकड़े पूछा।

 बिलकुल ठीक नहीं है। बेड का कोई चान्स नहीं। वी.आइ.पी. पेशेंट भी बाहर फ्लोर पर पड़े हैं।

 और ऑक्सीजन?

 खुद अरेंज करिये। आप देर करेंगे तो बहुत मुश्किल होगी। एट्टी से नीचे है।

 आप कुछ कर सकती हैं, मतलब किसी को जानती हों, अस्पताल का कोई आदमी, स्टाफ, जो पैसे लेकर  मदद कर दे। कुछ भी पैसे लेले।

 नो वे, नों चान्स। आपको ही करना पड़ेगा।

 कुछेक लोगों ने किया है। पता नहीं कैसे। वह चली गई।

शाम को ड्राइवर आया खाली हाथ। लेकिन आया तो। नहीं तो कौन आता है ऐसे में। बताया कि बहुत हाथ पाँव मारा लेकिन रिजल्ट सिफर। पैसे ट्राँसफर करवाकर वह बँदा भी साइलेंट मोड में चला गया था। रात में जब बेड के बारे में नर्स का फोन आया तो वह पार्क की बेंच पर बैठा ड्राइवर और पुलिस वाले से ऑक्सीजन सिलिंडर के लिये संभावना तलाश कर रहा था।

   हेलो, सुनिये, अभी तीन चार बाडीज हटने वाली हैं…. आप काउण्टर पर बात कर लीजिए। शायद वे लेाग लाख-डेढ़ लाख जमा करवायेंगे। जल्दी करिये। यहाँ अंदर ऑक्सीजन की प्राब्लम बनी हुई है…. पर बेड शायद मिल जाय, आप कोशिश कर लीजिए। बस, फोन कट।

उसने ड्राइवर को इशारा किया, सरपट अपने फ्लैट पर चलने को कहा। हनीमून वाला कैश,घर में रखी जूलरी, तनिष्क का शोरूम, वहाँ डेढ़ दो घंटे का कीमती समय और पैसांे का इंतजाम हो गया। वह उलटे पाँव भागा और पुलिस वाले के साथ अस्पताल के रिसेप्शन पर लाइन में लग गया। बैड लक भाई बैड लक। जब तक उसकी बारी आई पैसे जमा हो चुके थे, वार्ड से लाशें हट चुकी थीं और बेड की नीलामी हो चुकी थी। वह निराश और बेसुध। पुलिस वाले ने अपने स्तर से इधर उधर कोशिश की, कभी अंदर तो कभी काउंटर पर, कभी फार्मेंसी में, कभी किसी वार्ड ब्वाय से तो किसी जूनियर डाक्टर से। पर बेड था कि गूलर का फूल हो गया था। पैसे रूपये सोने चाँदी से भी महँगा। जान से भी कीमती।

उसने नर्स को फिर से ट्राई किया लेकिन फोन नहीं उठा। कोई इतना भी काम करता है क्या भाई! फिर उसने अपने तीन दिन पुराने पन्द्रह वर्षीय साले को फोन लगाया- उसे मालूम था वह पहले फोन को लेकर एकांत में जायेगा तब हलो भइया कहेगा। पूरे डेढ़ मिनट के बाद आवाज आई हलो भइया, कैसे हैं आप दोनों। शादी कर ली! वह बेसाख्ता हँस रहा था।

 हाँ छोटू सब हो गया, पर गड़बड़ खबर है। खबर तो हर तरफ गड़बड़ है, छोटू ने सुर में सुर मिलाया।

 नही नही सुन ध्यान से, इसको कोरोना हो गया है शादी के बाद से ही, अस्पताल में है।  आज दो दिन हो गये। सीरियस है। क्या बोले, कोरोना! छोटू गड़बड़ा गया था। हाँ बे सुन, कोरोना हो गया इसको। अभी बोलना नहीं घर में किसी को, मैं खुद डायरेक्ट बात करुँगा। चल फोन रखता हूँ।

 वह बेंच पर एक तरफ बैठा था। दूरी बनाकर दूसरे छोर पर पुलिस वाला। वह पौवे की छुटकी बोतल से नीट ही पी रहा था, बूँद बूँद। यही टाइम था जब उसके फोन की घंटी बजती थी और उसकी बीवी फोन पर होती थी। और स्पीकर आन।

रोटी खाई?

हाँ हाँ खाली, कब की अब पी रहा हूँ।

छोड़ दे पीना शरीफ आदमी छोड़ दे।

चुपकर, खाना पीना तो चलेगा ही नही तो मर जाऊँगा, एक तो तू भी पास नहीं है

अरे मैं नहीं तो लेडिस सिपाही तोहोगी न रात में तेरे साथ ड्युटी में…………

छोड़ छोड़ लेडिस सिपाही को उसका ब्वायफ्रेंड ले गया मोटर साइकिल पर बिठाकर। अभीएक धंटे में छोड़ जायेगा। फिर वो अस्पताल के अंदर ड्युटी करेगी, मै तो अकेला ही पार्कमें पड़ जाऊँगा।

 क्यों तू नहीं आ सकता एक घंटे के लिए घर?

 वह चुप रहा।

आ जा, हफ्ते भर से ड्युटी कर रहा है, अपनी सोच, नही तो मेरी सोच। आ जा रे बाबू। मार पड़े कोरोना को।

इससे आगे उनकी बात नहीं हो पाई बड़ा साहब आ गया था। मोटर साइकिल से। उसके पीछे लाठी लिये काँस्टेबल बैंठा था। दोनों ने पार्क का एक राउण्ड लिया, उसको कुुछ हिदायत दिया और निकल गये। पुलिस वाले ने एक भरपूर घूँट लिया और बहकने लगा- मास्क का अता पता नहीं था।

 भाई साहब मैं तो करोना फरोना नहीं मानता, बात कुछ और ही है इसमें।

क्या बात है? वह बिना रुचि लिए बोला।

अस्पतालों का पैसा बनाने को बहाना है, और कुछ नहीं। उसको छोड़िये, अब देखिये कितने दिनों से घर नहीं गया हूँ। अब बेचारी जनानी सोचती है इधर गुलछर्रे उड़ा रहा हूँ। लीजिए पीजिए आप भी लिजिए… कोई परहेज तो नही- अब जो होना है होगा, हो ही रहा है, रोज ही लोग जान से हाथ धो रहे हैं मैंने किसी को ठीक होकर जाते नहीं देखा। पीजिए पीजिए  उसने बोतल लेकर मुँह में लगा दिया। दो से तीन घूँट में खतम। लेकिन कारगर चीज थी। बेड और ऑक्सीजन से थोड़ी देर के लिए निजात दिला गई-

 -क्या कह रही थी आपकी जनानी … कि एक घंटे के लिए चले आओ। क्यों नहीं चले जाते? अरे भाई इतनी कड़ाई से साथ ड्युटी नहीं की जाती, घर में भी तो कोई ड्युटी है। जाइये अभी जाइये …. वह हाथ से रास्ता दिखाने लगा। बीवी अकेले और आप यहाँ पड़े हैं। बीवी किसी के साथ भाग जायेगी। पुलिस वाला होश में था। होशियार और समझदार और तजुर्बेकार भी। वह नवजवान की स्थिति भी समझ रहा था।

   -लेकिन आप तो सचमुच बुरे फँसे?

-हाँ भाई दो दिन पहले शादी किया, शादी क्या किये, बस अस्पताल में उलटे सिर गिरे। बेड और ऑक्सीजन का जंजाल!

  -यह तो साफ अन्याय है, शादी के बाद आनंद लेना था मतलब कि मजे करना था -और आप बिचारे यहाँ अकेले पत्थर की बेंच पर …! लाइये कुछ एक-दो बूँद बची है? बिल्कुल भी नहीं बची थी। पुलिस वाले नेजिस तरह से उसे कुरेदा और शराब की एक अदद घूँट ने जिस तरह अपना काम किया था कि उसे नींद घेरने लगी।

  वह सोते जागते सो ही गया, वहीं पत्थर की बेंच पर। फिर वही उलझी प्रेम-कहानी पारिवारिक बंदिशें, सरकारी खौफ, लुका-छिपी, भागा हुआ लड़का, भागी हुई लड़की, कोर्ट मैरिज, सुहागरात की तैयारी, महज तैयारी, सुहागन का अस्पताल ट्रिप, हनीमून बजट, बजट से ऑक्सीजन और बेड का इंतजाम, इंतजाम की नाकामयाबी। एक एक कर रील चलती रही। यह भी कि पुलिस वाले की बीवी अपने आदमी को सहवास के लिए आमंत्रण दे रही है। और वह इस नियामत से कैसे महरुम रह गया है।

ऑक्सीजन और जिंदगी का रिश्ता इतना गहरा था, इस बात पर तो कभी घ्यान ही नहीं गया था। बस पढ़ा भर था। यह बात अब विज्ञान की किताबों को चीर फाड़ कर बाहर निकल आई थी। ऑक्सीजन के साँचे पर साँसों का ताना बाना इस कदर कसा फँसा होता है यह तो किसी ने समझाया ही नहीं था। और फिर उसके लिए एक बेड की भी आवश्यकता होती है। लेकिन यह तो चौतरफा किल्लतों का गुनहगार मौसम था।

 अभी सोकर उठा ही था कि वही नर्स आ गई। सिविल में थी, अच्छी लग रही थी, लेकिन एक बारगी पहचान में नहीं आई। उसने अपनी साइकिल किनारे खड़ी की और वहीं से मुस्कुराई- यहींसोये क्या आप रात में? वह कुछ संभलता, समझता कि वह पास आ गई- बैठूँ? उसने बेतकल्लुफी से पूछा।

 जी, उसने एक तरफ हटते हुए कहा।

अभी क्वार्टर से कुछ सामान लेने जा रही थी, आपको देख रुक गई। दो घंटे का ऑफ मिला है। हँसने लगी।

 मेरी पेशेंट की रात कैसी बीती?

अच्छी नहीं, बिलकुल भी। इन्फेक्शन बढ़ गया है।

 बेड और ऑक्सीजन का कुछ हो सकता है? सच बताइये। आई कैन पे । वह बोला।

 उसने मुँह बनाया। ऐसे जैसे बेड और ऑक्सीजन सुनते सुनते कान पक गये हों।

पेशेंट आपकी कौन है?

मेरी कौन है! वह जैसे चैंका।

जी मेरा मतलब कौन है?

आप क्या सोचती हैं?

नहीं, मैं ऐसा सबसे नहीं पूछती। सच तो यह है कि पहली बार उत्सुक्ता हुई है। वह चुप रहा।

मेरा मतलब वाइफ हैं, सिस्टर हैं, फ्रेंड हैं या गर्लफ्रेंड? इस बीमारी में कोई भी किसी को लेकर आ रहा है। कोई जरूरी नहीं घर वाले हों, बस इसलिए पूछी। खैर छोड़िये, कल मैंने अपने मन से बिस्किट आपको दे दिया था, लगा भूखे होंगे।

 हूँ ……. उसने उसे घूरा। अच्छा!

जी वाइफ कह सकती हैं, वाइफ हैं मेरी।

कह सकती हैं, मतलब? नर्स की जिज्ञासा बढ़ी।

जवाब देने से पहले उसने तौल लिया कि बात करने में कोई बुराई नहीं, आगे मदद ही मिलेगी।

मतलब कि बस दो दिन पहले शादी हुई। कोर्ट मैरिज! वह चुप रही। वह भी।

वह नर्स नहीं थी। वह बेड और वेंटीलेटर की किल्लत से जूझने वाली सिस्टर नहीं थी। वह सिविल ड्रेस पहनकर एक आम लड़की में तब्दील हो रही थी।

कोरोना था तो मैरिज क्यों किया, रुक जाते।

रुकने का समय नहीं था। भागे फिर रहे थे तो यही एक रास्ता था। उस दिन कोई सिमटम नहीं थे। बस शादी की पहली रात में जब हम सोने की तैयारी कर रहे थे तो……………अचानक तबीयत बिगड़ी।

अरे!

 हाँ।

 घर वाले?

उसने रुखी हँसी बिखेरी। लड़की आगे नहीं बोली।

बहुत शुक्रिया, बहुत धन्यवाद, मेनी थैंक्स आपकी हमदर्दी के लिए, मेरी वाइफ का केयर करने के लिए, बिस्कुट के लिए।

यह सब वह बोला नहीं, पर वह हँसने लगी। नहीं ऐसी बात नहीं … दरअसल मुझे ऐसा ही कुछ लगा था कि आप एक लड़की के लिए फाइट कर रहे हैं।

ओह! और आप, कब से हैं इस अस्पताल में?

दो महीने से, आज ठीक दो महीने हो गये।

उससे पहले? उसने बात बढ़ाने के लिए बात आगे बढ़ाई।

पहली ज्वाइनिंग है। ट्रनिंग से सीधे यहाँ। शादी मेरी भी फँस गई। वह खिलखिला पड़ी।

फँस गई, यानी?

यानी आपकी तरह शादी हुई, कोर्ट मैरिज नहीं, शादी प्रापर हुई, उसके एक महीने के बाद ज्वाइंनिंग डेट थी, लेकिन तुरंत बुला लिया ’… ये दूसरी वाली वेव आ गई थी। ज्वाइन तो करना ही था सो आ गई दूसरे ही दिन। ‘दूसरे ही दिन‘ पर उसने जोर डाला।

 तब से? उसने बात फिर बढ़ाई।

तब से लगातार ड्युटी कर रही हूँ- साँस लेने की फुर्सत नही।

तो फोन से ही टच में रहती होगी?

हाँ घर दूर है तो कोई दूसरा रास्ता नहीं। शायद अगले माह छुट्टी मिले।

फिर दोनो चुप रहे। शादी फँस जाने की कॉमन चुप्पी!

चलती हूँ। आप अपने लेवेल से बेड और वेंटीलेटर के लिए लगे रहें। हम लोग अभी जूनियर हैं, हमारी कोई नहीं सुनता। फिर भी मैं पूरी कोशिश करुँगी। कि कल से कम से कम पेशेंट वार्ड में शिफ्ट हो जाय।

बहुत जद्दोजहद के बाद उस बंदे ने फोन उठाया- भाई साब क्या बताऊँ चाहो तो पैसे वापस कर दूँ। सिलिंडर की कोई कमी नहीं बस सरकारों की लड़ाई में हम बीच वाले पिस रहे हैं। साले दो पैसे कमाने नहीं दे रहे हैं। लेकिन कल तक कुछ जरुर हो जायेगा- बस आप भरोसा रखें।

और सारा भरोसा डाक्टरों पर था, सारा दारोमदार उन्ही पर था, पर वे भी तो इन्सान ही थे। लापरवाही उनके फितरत में भी थी। बीमारी बेखौफ उन्हें भी अपने चपेट में ले रही थी। पर वे लगे हुए थे, जूझ रहे थे। वह दो बजे से इंतजार कर रहा था कि डॉ. अरोरा से मुलाकात हो जाय। वह नान-बेड पेशेंट के इंचार्ज थे। वह लॉबी में दिखे तो वह दोड़ा- मेरी पेशेंट, डॉ. साहब, कैसी है वह? वे सबको एक ही जवाब दे देते थे- पेशेंट इज ओ.के. डोन्टवरी पेशेंट इज ओके। उसका अर्थ होता था धबराइये मत, बिलकुल न घबराइये, साँस चल रही है अभी भी।

यह उस समय की दस्तान है जब वे जो एक अदद हास्पिटल बेड के लिए दर-बदर भटके और अंततः मुँहमांगी कीमत देकर सफल रहे। लेकिन यहीं वे भी थे जो साँस के लिए झोला भर रुपये के साथ दरबदर भटके पर न आस मिली न साँस। एक श्रेणी उनकी भी थी जो बिना पैसे के ही भटकते रहे। उनका क्या।

 इन दोनों ने आधी सैलरी से भी इतना कुछ बचा लिया था कि हनीमून पर जा सकें। एक लाख से कुछ काम में ही चार दिन और तीन रात का पैकेज उन्होंने महीन भर पहले ही सहेज लिया था। मालदीव उस कीड़े से मुक्त था। लेकिन मालदीव की बारी नहीं आई। उन्हीं पैसों के साथ वह फिर से लाइन में लगा था। दस लोग एक साथ मरे थे तो जगह खाली हुई थी। इस बार एक लाख में उसे बेड मिल गया- लेकिन सिर्फ बेड। वेंटीलेटर की गांरटी नहीं थी- साँस को अपने भरोसे छोड़ दिया गया था।

  शाम को उसने उसके घर फोन किया। छोटू ने उठाया लेकिन उसकी माँ ने बात किया- क्यूँ फोन किया? अब क्या चाहिए?

वह तैयार था। उसने बिना रुके कहा- हमने शादी कर ली ….. कार्ट में। लेकिन उसी रात उसे कोरोना हो गया। हॉस्पिटल में है। सीरियस है। ऑक्सीजन नहीं मिल रही है।

 ऐसा नहीं लगा कि सुनकर माँ सन्न हो गई हो – अरे कोरोना! वह बोली कुछ नहीं। चुप्पी, फिर चुप्पी, एक और चुप्पी। वह कुछ सुनना चाहता था। लेकिन मोबाइल से छन छन कर टी.वी न्युज उस तक पहुँच रही थी। कोरोना की भयावह स्थिति का आँखो देखा हाल चल रहा था। बेड, वेंटीलेटर, शमशान, तरह तरह के आंकड़े उस घर से निकलकर उसके कानों में भर रहे थे। चुप्पी बरकरार थी। न्युज आती जा रही थी। लगातार। एंकर के इशारे पर संवाददाताओं की आवाजें और जगहें बदल रही थीं लेकिन खबर वही थी। फिर लगा कि किसी ने मोबाइल को छुआ। छुने की आवाज भी खबरों के साथ उसके कानों में पहुँची। मोबाइल  के साथ कुछ कुछ हो रहा था, शायद इस हाथ से उस हाथ में लिये जाने की कवायद हो रही थी। फिर एक तराशी हुई, शराफत से सराबोर, लकिन गैर-मुलायम सधी हुई मर्दानी आवाज उसके कानों में पड़ी- ठीक है, रखिये। फिर न करियेगा।

लेकिन उसने किया। उसी नर्स ने। सुबह मिलकर गई थी, उसके बाद यें फोन। हलो, हलो, बेड मिल गया। शिफ्ट करके मैं आ रही हूँ।आप वहीं पार्क में रहियेगा, उसी बेंच पर नहीं तो मुझे ढूढ़ने में दिक्कत होगी। आपकी पेशेंट का मेसेज है। आपको देना है। उसने पूछा कब तक आ रही हैं। जवाब में वह हँसी- बस आठ दस पेशेंट शिफ्ट करना है, पहले क्वार्टर जाऊँगी, चेंज करूँगी, आ जाऊँगी। वह फिर हँसी।

 वह बेंच पर बैठ इंतजार करने लगा। इक्के दुक्के तीमारदार ही वहाँ थे- बाकी शाम ढलते कहीं रात बिताने चले जाते थे। वह पुलिसवाला आज फुल बोतल लेकर आया था। पीना शुरु नहीं किया था लेकिन दिनभर की कमरतोड़ ड्युटी के बाद रात में कुछ आराम मिल जाने की प्रत्याशा ने असर दिखाना शुरु कर दिया था- भाई जी क्या हाल हैं आपकी जनानी के? हमारी तो घर में तड़प रही हैं…..बेड मिला क्या….। उसने बता दिया।

 चलिये जल्दी मिल गया…. नहीं तो आज जो दस बांडियाँ निकली हैं तीन को तो बेड भी नसीब नहीं हुआ था। दो जेनरल वार्ड से और बाकी पाँचआई सी यू से। दो अपने डाक्टर भी चल बसे… इसी अस्पताल के।

 वह सुनता रहा।

लीजिए आज आप पहले पीजिए। पीजिए पीजिए। दिन भर हलकान हुए होंगे। आज दिन में मैं शमशान घाट पर था। अब दिक्कत यह है कि बिचौलिये सब काम गड़बड़ कर रहे हैं…. भई हम सब मनुष्य हैं……. मरे हुए व्यक्ति का भी सम्मान होता है- पैसे की लालच में सब गड़बड़ हो रहा है- जिसको अच्छे से कबर खुदवाकर गाड़ना चाहिए उसको औने पौने जला दे रहे हैं और जिसको पूरे क्रिया कर्म से जलाना चाहिए उसको गाड़ दे रहे हैं।

 उसने दो घूँट ली और बोतल फिर से पुलिस वाले को लौटा दिया।

-कोई देखने वाला नहीं। परिवार वाले भी क्या करें- सबको जान प्यारी है। हाँ आज एक अच्छा परिवार आया-घर के लगभग सभी सदस्य अंतिम क्रिया में शामिल थे। मैंने बस थोड़ी सी मदद कर दी-न करता तो उनकी लंबी वेटिंग लग जाती। और अच्छी बख्शीश दिया उन्ने। शरीफ लोग थे भाई।

अच्छा, उसने बस इतना ही कहा।

आप भी हिम्मत वाले है सर जी ..लगे हुए हैं….. यमराज के हाथों से छुड़ाकर ले जायेंगे अपनी पत्नी को आप …. लगे रहिये। उसने दो चार घँूट लिये और बोतल बेंच के नीचे रख दिया- अबरात में।

और तभी उसका फोन बजा। शायद उसकी जनानी का था और वह हलो हलो कहते हुए उठ गया।

वह आई। पैदल ही, साइकिल से नहीं। फिर से सिविल ड्रेस में- टॉप और घुटनों से भी लंबा स्कर्ट।

गुड इवानिंग सर, उसने धीरे से कहा। शायद हँसी भी।

 सर! वह हँसा। धीरे से कि खाली वह सुन सकी।

बैंठूँ? कहकर वह दूरी बनाकर बैठ गई।

शिफटिंग हो गई?

 हाँ और उन्होने आपसे मिलना चाहा है।

क्या यह संभव है। मतलब कि मैं अंदर वार्ड में जा सकता हूँ?

मैं कोशिश करूँगी। आप दो बजे आइये।

वह चुप रहा। फिर उसने तबियत के बारे में पूछा, वेंटीलेटर और ऑक्सीजन के बारे में, दो डॉक्टर जो मरे थे उनके बारे में।

उसने सबके बारे में बताया। खासतौर से यह कि बिना ऑक्सीजन के पेशेंट मर रहे हें और क्राइसिस कितनी गंभीर है। लोग मोबाइल पर अपने मरने से पहले की विडियो बनाकर भेज रहे हैं, अपने अपनी ही मौत पर लाइव कमेंट्री दे रहे हैं। फिर उसने कहा मरने को कोई भी मर सकता है। मैं खुद मर सकती हूँ। दोनों डाक्टर कल तक जिंदा थे।उसने नर्स को एक बारगी देखा। उसका मास्क उतरा हुआ था।

वह अच्छी लग रही थी।

ठीक है, कल आप दो बजे आयेंगे, चलूँ मैं? ये लीजिये। खड़ी होते हुए उसने एक छोटा सा डिब्बा उसकी ओर बढ़ाया।

क्या है ये? उसने न हाथ बढ़ाया, न अपनी जगह से हिला।

 आपका डिनर। यहाँ कुछ नहीं मिलेगा। उसने डिब्बे को बेंच पर रख दिया।

और आप? उसने औपचारिकता की।

वह खिलखिलाई। अभी जाकर पकाऊँगी। आज मेरी बारी है। इसीलिए जल्दी छुट्टी मिल गई है। फिर नाइट ड्युटी है। वह अपना मास्क चढ़ाने लगी।

ओह! उसने लंबी साँस छोड़ी।

 हाँ! और सुनिये खाने के वक्त मास्क उतार लीजिएगा।

उसे समझने में एक पल लगा। हाँ जरुर, वह बेसाख्ता हँस पड़ा और धीरे धीरे मास्क को नीचे कर लिया।

उसने देखा, मुस्कुराई और बोली- ज्यादा मत डरिये। अगर सिर्फ दो लोग हों और एक ने मास्क पहना हुआ है, जैसे कि अभी मैं, तो दूसरे को खतरा नहीं होता। ठीक है बस आपको देखना चाहती थी।अब चढ़ा लीजिए, मैं चली। वह चली गई।

उसके जाने के बाद पुलिस वाले ने बताया कि घर से फोन था- उसके बड़े भाई अंबाला में कोरोना के भेंट चढ़ गये थे और भाभी हॉस्पितल में थीं। बच्चे घर पर अकेले थे। शुकर मनाइये कि भाभी को बेड मिल गया था। क्या वह अंबाला जायेगा? क्या फायदा, अब तो जो होना था हो गया, हाँ बच्चों की फिकर है। भाभी फिलहाल ठीक हैं, भाभी के घर वाले टच में हैं।

फिलहाल ठीक हैं से वह समझ गया कि पुलिसवाले की भाभी की साँस अभी भी चल रही होगी।

एक बात पूछूँ?

……………. जी?

मतलब …….. भाई के मरने पर भी नही जा रहे?

पुलिस वाला सोचने लगा– फिर मन ही मन बुदबुदाया- यहाँ भी तो लोग मर रहे हैं!

बडे़ संगदिल हो भाई….

जी जाना तो चाहता हूँ पर ऊपर अनुमति नही मिलेगी। करोना प्रोटोकॉल का सवाल है न!

वह चुप रहा! फिर हँसा – तुमलोग उतने बुरे नहीं होते भाई – हर हाल में काम करते हो।

पुलिस वाला जैसे चांैका। एक बात कहूँ? ध्यान से सुनियेगा भाई जी — और बुरा न मानियेगा। हम लोग सुअर हैं। जी वही गंदैला जानवर! हम समाज का गू खाते हैं, इसकी सफाई करते हैं, फिर भी लोग हमसे नफरत करते है।

आदमी चुप हो गया। उससे अब बोलते नहीं बन रहा था। वह चुप ही रहा।

फिर दोनों ने शराब पी। उसी बोतल से कई कई घूँट, एक बार वो तो एक ये। वह दो तो ये तीन। ये तीन तो वो चार। शराब खत्म हुई तो डिब्बे वाला डिनर – रोटी सब्जी और एक नोट- कल का डिनर भी मेरी ओर से! दोनो ने सब्जी रोटी आपस में बॉट ली।

सुबह से दोपहर तक वह पुलिसवाले के बताये कुछ ठिकानों पर ऑक्सीजन के लिए भटकता रहा। आसरा और आश्वासन, बस। दो बजे तक वह अस्पताल लौट आया। वह वहीं मिल गई- ठीक गेट पर- आप ही को देख रही थी….. तबियत बहुत बिगड़ गई थी- लगातार सी.पी.आर देती रही… अब जाकर ऑक्सीजन लेवेल नाइंटी है। बुला रही हैं आपको, बहुत नर्वस हैं।

वह जैसे बेहोश पड़ी थी। बहुत मुक्तसर सी बात हुई धीरे धीरे, रुक रुक कर।

मेरी तबियत अब बिलकुल ठीक नहीं है। दूर रहो। वह थोड़ा पीछे खिसक आया।

साँस में बहुत दिक्कत है, उठ भी नहीं सकती। थकावट है …..।

 वह चुप रहा।

ठीक हो जाऊँगी न…। उसने आँखे बंद कर लीं।

 वह बुदबुदाया- ठीक हो जाओगी। मैं हूँ।

नहीं ………। तुमने मुझसे शादी क्यों किया।

वह उस पर चुप रहा।

ये रखो …… उसने किसी तरह अपने तकिये के नीचे से रूमाल में छूपी रुपये की एक पतली सी गड्डी निकालकर उसकी ओर बढ़ाया- पकड़ो। पैसों की जरूरत है।

वह वैसे ही दूरी बनाये खड़ा रहा।

 लो प्लीज, उसने इसरार किया।

उसने ले लिया।

मेरे घर किसी को बताया?

 उसने कोई जवाब नहीं दिया।

 बोलो, उन्हें बताया?

 हाँ, वे जल्द ही तुम्हें देखने आयेंगे।

वह कुछ अचरज में पड़ गई- नहीं, कोई नहीं आयेगा।

अच्छा अपने घर किसी को बताया?

हाँ सबको मालुम है। तुम ज्यादा मत बोलो। मैं चलता हूँ।

 उसने मुस्कुराने की कोशिश की। फिर कोशिश करके बोली- घर चले जाओ, नहा लो।

शाम को वह फिर आई। वह वहीं मिला, बेंच पर तनहा। आते ही उसने बताया कि चूँकि उसने आज भी डिनर प्रॉमिस कर लिया था इसलिए उसने आज भी कुकिंग ड्युटी ले ली। दिन में उसने उसे व्हाइट में देखा था और अभी रेड और ब्लैक में देखकर उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो।

 क्या घूर रहे हैं, मैं वही नर्स तो हूँ।

अच्छा!

 बैठूँ?

 नहीं दूरी बनाकर खड़ी रहिये, उसने तपाक से कहा।

अरे। वह जैसे चैंकी। खड़ी रहूँ?

  मैं बैठती हूँ, कहकर वह बैठने को हुई। वह हँसते हुए खिसक गया। वह किनारे बैठ गई।

 आपके वर्दी वाले दोस्त कहाँ हैं?

 शराब लाने गये हैं।

  छी! आप पीते हैं

  वह चुप्पी साधे रहा।

  रात में यही सोते हैं?

  जी।

  ओह।

उसका फोन बजा। वार्ड में हूँ, बाद में करती हूँ। कहकर उसने फोन काट दिया। मेरे हस्बैंड थे। डेली शाम को फोन करते हैं ……. हमारी डिस्टेंस मैरेज है न, कहकर खिलखिला पड़ी।

वह चुप रहा।

चलूँ?

 मेरा डिनर?

ये रहा। उसने एक टिफिन बाक्स उसकी तरफ बढ़ाया- खाकर कल बताइयेगा- नॉनवेज ट्राई किया है।

थैक्स सिस्टर!

फिर दोनो हँस पड़े। ऐसे कि जैसे बहुत दिनों बाद हँसे हों।

हँसी रूकी तो वह बोली, सिर्फ थैक्स से ही काम चल जाता।

वह बोला, जी आगे से ध्यान रखूँगा

औरत ने हाथ आगे बढ़ाया, बाय, गुडनाइट।

आदमी ने उसकी हथेली को अपनी हथेली में लिया, कुछ देर लिये रहा, वह सन्न खड़ी रही, फिर बोला, बाय, वेरी गुडनाइट!

चित्र : प्रवेश सोनी

अगले दो तीन दिन वह न के बराबर आई। बस टिफिन बाक्स बढ़ाती और चली जाती। हॉस्पिटल में कभी कभार दिख जाती पर बात करने का मौका हासिल न होता। उसने बताया कई नर्सें एक साथ पॉजिटिव हो गई हैं इसलिए वर्कलोड बहुत बढ़ गया है। और यह भी कि उसकी पेशेंट की हालत भी गंभीर है, कुछ कहा नहीं जा सकता है।

आज उसे सीनियर डाक्टर ने बुलवाया- सर, वेरी वेरी लो चान्सेज ऑफ सरवाइवल। पूरा लंग्स इनफेक्टेड हो गया है। आज की रात शायद ही निकले।

एक अदद ऑक्सीजन का सिलिंडर!

उसने उस ड्राइवर को फोन लगाया- शायद वही कुछ करे। आखिरी उम्मीद, आखिरी आसरा। बड़ी दबी सी आवाज आई- अरे सरजी, मेरे को हो गई ………. वही बीमारी ……… मिसेज और बेटी को भी ….. कोई देखने वाला नहीं। घर में पड़े हैं हम लोग। बाबूजी हम अस्पताल नहीं जायेंगे। हम सभी को साँस लेने में दिक्कत हो रही है। मरना वहाँ भी है, मरना यहाँ भी है। बस समझ लो हम तीनों मर रहे हैं ….. धीरे धीरे …एक साथ।

उसने अपनी आँखे भींच लीं।

रात तो निकल गई लेकिन दोपहर दो बजे उसका मेसेज आया- सॉरी सर, शी इज नो मोर। बस पाँच मिनट पहले हुआ ….। थोड़ी देर बाद उसने डेड बॉडी का एक पिक भेजा- दोनो हाथ सीने पर थे, ऑखें अधखुली और मुँह काला पड़ गया था। फिर एक और मेसेज- उनकी पर्स, घड़ी, रिंग और चेन लेकर देर शाम मिलती हूँ। धीरज रखें।

  वह काफी देर से आई। वह बेंच पर नहीं बेंच के पीछे खड़े दरख्त से अपने शरीर को टिकाये अधलेटा सो रहा था। उसने वहीं खड़े खड़े उसे देखा, फिर इधर उधर नजरें दौड़ाई, ब्लैक आउट जैसा समा था, वह नीचे उतर गई। वह गहरी नींद में था, शराब की बोतल उसके बाजू में और अघखुला अधखाया चिप्स का पैकेट उसके सीने पर, जो उसकी गहरी सांसों के साथ ऊपर नीचे हो रहा था। वह चुपचाप खड़ी अगल बगल के दरखतों को देख रही थी, असमंजस में कि क्या करे। कैसे उसको जगाये, उसकी अमानत सौंपे और चली जाये। उसको आसमानी मदद मिली- उसके फोन की घंटी बजी और उसने बजने दिया।

हबी कॉलिंग……. दोबारा। उसने फोन वाला हाथ उसी दरख्त की तरफ फैला दिया और फोन को बजने दिया। वह कुनमुनाया, आँखे, उसे देखा, बोला कुछ नहीं, बस देखता रहा। वह खड़ी थी, बिना कुछ बोले, बिना कुछ किये। उसके एक हाथ में वही पर्स था जिसे वह पहचानता था। उसमें उसके वाइफ की घड़ी, अँगूठी और चेन थी।

चली गई वह? उसने उसी तरह लेटे लेटे पूछा।

चुप्पी। और चुप्पी। फिर घीरे से हाँ, आज डेढ़ बजे दिन में। उसने खड़े खड़े जवाब दिया।

कैसे, लास्ट में क्या कुछ हो गया था उसको?

ऑक्सीजन बहुत डाउन हो गयी थी………..।

क्या किसी ने कुछ भी नहीं किया उसको बचाने के लिये?

नहीं, कुछ भी नहीं किया जा सका। क्या करते!

वह चुप रहा कुछ देर। तुमने, तुमने भी नहीं?

वह बिना बोले खड़ी रही।

अच्छा बैठो, मेरे पास बैठ सकती हो ……. पर्स उसी का है?

हाँ इसमें उनका सामान है, देख लीजिए।

क्या मैं तुम्हारे सामने पी सकता हूँ?

वह चुप रही।

उसने बोतल से ही दो-तीन घूँट गट गट किया और बोतल को फिर से बाजू में रख दिया।

मेरा डिनर? इस बार बोलकर वह हँसा।

वह चुप रही।

अच्छा बैठो, बैठो तो, बहुत देर से खड़ी हो…….बैठो………।

वह वहीं उसके पैर के नजदीक बैठ गई।

कुछ बोली थी?

नहीं इशारे से पानी माँगी, मैं पानी लेकर लौटी तो जा चुकी थी।

वह शराब की बोतल खोलने लगा।

अब उसका फोन बजा। दलाल था।

दो दो लंबी रिंग…… लेकिन उसने नहीं उठाया। नर्स ने कहा बात कर लीजिए शायद जरुरी हो।

उसने कॉल बैक किया।

जी सर जी माफ करियो, देर हो गई, लेकिन इंतजाम हो गया पहुँच रहा हूँ …… दस मिन्ट में। बाकी पैसों का इंतजाम रखना।

मर गई वो!

क्या! मतलब! क्या कहा आपने?

वह चुप रहा।

भाई साहब मैं कह रहा हूँ सिलिंडर का इंतजाम हो गया आ रहा हूँ।

कोई जरूरत नहीं, नहीं चाहिए।

ओह। तो आपकी पेशेंट एक्सपायर हो गई?

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

एक बात कहूँ सरजी, वह फुसफुसाते हुए बोल रहा था। ये हॉस्पिटल वाले जल्दी जल्दी बेड खाली कराने के चक्कर में रहते हैं। जिंदा आदमी शमशान घाट भेज दे रहे हैं। मेरी मानो गैस ले लो और बोलो ऑक्सीजन चढ़ायें, देखिये ……

वह चुप ही रहा।

आप कुछ बोल नहीं रहे हैं, चार गुना पैसे देकर लाया हूँ, दिन भर की परेशानी अलग से। बस वादा कर दिया था इसलिए।

उसकी चुप्पी बरकरार रही।

अच्छा चलिए, तो आगे का काम मैं देख लूँगा। सब क्रियाकर्म अच्छे से करवा दूँगा, चंदन की लकड़ी घी …… सभी इंतजाम रहेगा। पंडित भी।

 हूँ……हूँ….

दस हजार और आप ट्रांसफर कर दीजिए, बेड न० वहाट्सऐप कर दीजिए। चैन से घर जाइये। लड़के सब कर देंगे।

उसको चढ़ी थी। बहुत कुछ बोलना चाहता था। बस उसने फोन काट दिया।

 गुस्सा ठंडा हुआ तो वह बोतल उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोला, पियोगी?

पागल हो गये हो?

 हाँ।

मैं नहीं पीती।

पीकर देखो, फिर अच्छी नींद आयेगी।

उसने झटके से उसके हाथ से बोतल लिया और एक तरफ को लुढ़का दिया।

अच्छा ये बताओ किसका फोन था जो तुम मेरे कान के पास बजा रही थी?

मेरे हस्बैंड का। रोज इसी वक्त आता है।

तो एक बार उससे मिल क्यो नहीं आती? उसने फिर शराब की बोतल उठा लिया।

छुट्टी का सवाल है। बताया था न, बस शादी के दूसरे दिन ज्वाइन करना पड़ा ……तब से फँसी हूँ।

अरे स्साला, दो महीने से खसम से कन्नी काट के यहाँ मरीजों को मार रही हो! हत्यारिन! वह सुरुर मे था।

उसने उसके पैर में जोर की चिकोटी काटी, क्या बोले?

हत्यारिन!

उसने और जोर से पिंच किया।

हत्यारिन, हत्यारिन, उसने पैर खींचते हुए कहा।

 पैर में नाखून गड़ रहे थे।

वह आगे बढ़ी उसके एकदम करीब पहुँच गई। उसका नख वार जारी रहा जब तक कि आदमी ने हार नहीं मान ली।

कुछ देर वह चुप लेटा रहा। वह भी उसी के नजदीक बैठी रही, हाथ उसके पैर पर धरे। एक बात पूछूँ?

उसने उसकी ओर गर्दन घुमाई।

दुःख तो हुआ होगा, वह चली गई।

जब सब तरफ दुःख हो तो मन दुःख नहीं मानता।

मेरा मतलब है वह मर गई तब भी?

मुझे तो सभी मरे लग रहे हैं, यहाँ तक कि तुम भी, डा० अरोरा और पुलिसवाला भी।

गट…..गट…….गट……….गट।

मत पियो।

ठीक है नहीं पीता, उसने बोतल फिर से रख दिया।

मैं जानती हूँ तुम्हें कितना दुःख हुआ होगा। पर यह मत करो।

दुख आसरे का मोहताज होता है। जब कोई आसरा न हो, कोई भरोसा न हो तो कोई दुःख नहीं, दुःख का आनंद नहीं।

मुझे पटा रहे हो? उसकी आवाज में शरारत थी।

तुम खुद पट रही हो। वह हँसा, वह भी हँसने लगी। हाथ का दबाव पैर पर बढ़ गया।

सचमुच भूखे हो, डिनर लेकर आऊँ क्या?

प्यासा हूँ। शराब दो। और तुम नजदीक आओ……।

भागो, तुम्हारे कपड़ों से बदबू आ रही है, नहाये नही हो हफ्ताों से…….

और तुम्हारे कपड़ो से फिनायल की गंघ आ रही है। तुम रोज नहाती हो तब भी। जाओ दूर हटो।

 ऊँ…… हूँ……. नहीं हटूँगी। हॉस्पिटल से कॉल। वह उठाती है। हेड नर्स किसी पेशेंट को दिये जाने वाले इंजेक्शन के बारे में कुछ पूछ रही थी। वह धीरे धीरे कुछ बताती है, साथ में गुस्साती भी है। हेड नर्स थी, कोई और होता तो डॉट देती।

तो हम अब क्या कर रहे हैं यहाँ बैठकर? उसने फोन की स्क्रीन लाइट को बंद किया। और उसकी तरफ देखने लगी।

जब सब तरफ दुःख हो तो मन थोड़े से सुख के लिए भटक जाता है। लॉकडाउन तोड़ रहे हैं ……और क्या। ….और करीब आओ।

वह चुप रही। उसका दूसरा हाथ भी उसके पैरों पर दबाव बनाने लगा।

चित्र : प्रवेश सोनी

बेड और वेंटीलेटर की अभूतपूर्व किल्लत के दो चश्मदीद गवाह पार्क के उस अंधेरे कोने में बैठ एक गुनाह के हमराह होने जा रहे थे। उनकी बेदारी धीरे धीरे नीम होने लगी, कुहासा घना होने लगा। पर अभी भी एक फीकी लौ थी जो उन्हें एकसार कर रही थी। यही लौ गुनाह थी, या गुस्सा थी या कि किसी से बदला लेने की जुर्रत! खुदा जाने। फँसी हुई शादी और रूकी हुई जिंदगी की पेंचें ढीली पड़ने लगीं थीं, गिरहें खुलने लगीं थीं और बंधन टूटकर छिटकने लगे थे। इस तरह एक औरत और एक आदमी की जिस्मानी सोहबत और हमबिस्तरी, मौके की नज़ाकत को देखते हुए,नाकाबिले यकीन थी। पर ये मुुमकिन हुआ।

वे थोड़ा और अंदर गये और एक जगह तलाशकर बैठ गये। उनके दरमियान अब सिर्फ वे थे। वे दोनों।

यहाँ? औरत ने कहा।

हाँ, आदमी ने मुक्तसर से सवाल का मुक्तसर सा जवाब दिया

क्वार्टर पर चल सकते हैं। चाभी मेरे पास है। बाकी सभी ड्युटी पर हंै। वहाँ बेड है, कूलर है। वह फुसफुसाई।

यहीं ठीक है। बिना बेड के। वह और करीब आ गया।

मेरी व्हाइट ड्रेस गंदी हो जायेगी, मुझे गड़ रहा है।

डोन्टवरी, मैं बेड बन जाता हूँ। वह हँसा। फिर लेट गया। वह कुनमुनाई ……. लेकिन फिर से संभलते संभालते, अपनी ड्रेस को खोलते बचाते उसके ऊपर किसी तरह एडजस्ट होने लगी।

और तभी औरत का फोन बजा- हबी कॉलिंग……..। वह हौले से फोन में फुसफुसाई- आइ.सी.यू में हूँ। फ्री होकर करती हूँ। रखो।

उसके भार को सहन किये वह सन्न लेटा रहा। फोन पर उसके उत्तर पर वह कुछ गड़बड़ा सा गया था, पर फिर खुद को वापिस लेकर आया। वह उसके शरीर पर अघलेटी मुद्रा में थी। हे लड़की तुम्हारी साँसें कितनी तेज चल रही हैं…… तुम्हारा सीना ऊपर नीचे हो रहा है, कितनी गति से! उफ ये उठाव, ये गिराव! क्या इरादा है तुम्हारा? जवाब में वह उस आदमी के पैर, पेट और सीने को आच्छादित करते हुए मुँह पर मुँह रखने को हुई कि आदमी को मज़ाक सूझा- मास्क नीचे कर लो। सारा ऑक्सीजन अपने सीने में छिपा ली हो तो पब्लिक को क्या मिले! मिस ऑक्सीजन!

उसने नहीं सुना। याकि उसने सुना! उसे नहीं पता था कि उसकी धड़कन इतनी ज्यादा क्यो बढ़ गई थी- फिर उसने महसूस किया किवह हाँफ रही है, कॉप रही है। उसने घीरे से बनावटी हँसी अख्तियार किया और उसके कानों में फुसफुसाई- मुझे हँफनी आ रही है………..ऑक्सीजन कम हो रही है……..मर रही हूँ कुछ करो। गंदे आदमी कुछ करो…….। फिर उसने गंदे आदमी के दाहिने कान को काट खाया। फिर गाल को। फिर नाक को। फिर दूसरे कान को। फिर दोनों होठों को एक साथ। फिर अलग अलग। फिर एक साथ। फिर अलग अलग। फिर …।

लेकिन आदमी की कामकृपणता परवह हैरान रह गई। फिर रूकी और दाँव बदला। अब नखवार! घायल सिंहनी के माफिक उसने हमला किया जब तक कि वह हताहत न हो गया। उसके मुँह से मद्धम सी ऊह निकली-धीरे से …… सिस्टर! वह नाराज हो गई- तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा क्या! और सिस्टर क्यों बोले! उसने आदमी के दोनो गालों पर चपतों की बौछार कर दी- फिर बोलो, फिर बोलो, और चटाचट मारती जाती थी!

आधे घंटे बाद वे फारिग होकर वहीं बैठ गये, वहीं जमीन पर, उसी पार्क में, उसी अंधेरे में। वह अपना मोबाइल ढूढ़ रही थी, फिर अपनी चप्पल, फिर अपना पर्स। मैं कुछ मदद करुँ……। ….उसने धीरे से पूछा। वह कुछ नहीं बोली, खुले बालों का जूड़ा बनाने लगी, इतनी जल्दी जल्दी जैसे गुस्से में हो! वह समझ रहा था। उसने अपना सामान समेट लिया था और अबवह जायेगी। वह उसको इस मूड में नहीं जाने देगा। उसे कुछ देर तो और रूकना चाहिए। तो कुछ बात करो, तभी तो रूकेगी, वरना अब रूकने के लिए था ही क्या।

तुमने मेरा नाम नहीं पूछा?

तुम्हारा नाम क्या है गंदे? उसका मूड खराब था क्या।

ऐसे में वह हँसी के मौके ढूढ़ ही लेता था।

उसने कहा, मेरा नाम बेड है। है कि नहीं? उसने उसकी आँखों में झाँका- इतने दिनों से फर्श पर सोती थी आज बेड मिल गया न!

बद्तमीज कहीं के। इडियट। रास्कल! और नानसेंस भी!

अच्छा मेरा नाम पूछो। अब लड़की को भी चढ़ा!

हाँ बताओ। जाते जाते नाम तो बता दो।

बताना क्या, ऑक्सीजन। मेरा नाम मिस ऑक्सीजन, तुम्हीं तो कहे थे।

फिर दोनों हँसे तो हँसते ही चले जाते थे- बेलौस…….. बेलाग…….बेखौफ हँसी। कर ले किसी को जो करना है। ये किसी से कुछ माँग तो नहीं रहे हैं। देगा कौन। किसी से कोई शिकवा तो नही कर रहे हैं। कैसी शिकवा, किससे शिकवा! बस एक अदद अपनी हँसी ही तो हँस रहे हैं।

अंधेरे में हँसी।

अकेले में हँसी।

मौत पर हँसी।

जिंदगी पर हँसी।

दो जनों की खुद पर हँसी।

फिर चलकर वे बेंच के पास पहुँच गये। वह जाने को थी। चलूँ? हाँ जाओ काफी रात हो गई है, बस कुछ कहना चाहता हूँ! उसने उसकी ओर देखा, बोलो, अब क्या? वह झिझका, लेकिन लड़की ने सुन लिया- सॉरी इस बात के लिए कि कुछ कर नहीं सका………। आई एम रियली सॉरी फार यु। बस इतना ही बोला और चुप हो गया। वह आँखों में आँखें डाले देखतीरही उसको, बिना पलक झपकाये। आदमी अभी भी कुछ झिझका, सहमा सा था उसके सामने। उसने धीरे से उसके दोनों हाथों को अपने हाथों में लियाः नेवर माइंड, आई कैन अंडरस्टैंड। फिर रुकी, फिर बोली, एंड डोंट थिंक एबाउट दैट एवर अगेन। चलती हूँ।

वह अभी भी उसका हाथ पकडे़ हुए था। उसने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया, मास्क पहनी और चली गई।

रात चढ़ आई थी। कुदरत अपने पूरे शबाब पर थी, जैसे अब, बस अब, मुस्कुरायेगी। पार्क में सोये दरख्तों को सहलाता हुआ एक झोका आया, ठंडा और खुशबूदार। ऊपर चाँद चमक रहा था, तारे टिमटिमा रहे थे, बादल के निशान नहीं। वह सफेद ड्रेस पहने चली जा रही थी। उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

कहानी अभी खत्म नहीं हुई।

वह वापस गया, शराब की बोतल लाया, जी खोलकर पिया और पुलिस वाले का इंतजार करने लगा। कुछ ही देर में वह अपनी जनानी से फोन पर लुका छुपी करता हुआ आ पहुँचा। अगले रविवार घर आने का वादा करके वह अपने चार दिन पुराने मित्र की तरफ मुखातिब हुआ- क्या हाल है आपकी पेशेंट का, ऑक्सीजन का कुछ हुआ? आज सुबह भी दसेक बॉडियाँ निकली हैं, सब भगवान भरोसे है, कौन सी बीमारी है भाई, कोहराम मचा रखा है इसने, हमको तो लगता है चीन सबकुछ करवा रहा है…….। अचानक उसकी नजर बोतल पर गई- अरे पूरी पी लिया?

वह शांत बैठा रहा। पुलिस वाले ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- आपका डिनर बाक्स आया? खाइये खाइये अकेले अकेले…….। वह कुछ नहीं बोला। पुलिस वाले ने उसे गौर से देखा, देखता रहा, फिर सशंकित होते हुए धीरे से पूछा- क्या हुआ, कुछ हुआ क्या? क्यों चुप चुप हैं?

कल सुबह उसकी बॉडी भी निकलेगी। उसकी लाश वहीं वार्ड में पड़ी है। बेड न० आठ। उसने शराब की बोतल को हाथों में नचाते हुए कहा।

मतलब? पुलिस वाले का हाथ उसके कंधे से एकदम से हट गया। वह चैंक गया था।

क्या हुआ, क्या कह रहे हैं भाई?

हाँ, आज दो बजे हुआ।

पुलिसवाला अब संभल चुका था। अपने को व्यवस्थित किया, फोन को जेब में रखा, फिर उसके बगल में बैठ गया-

मुझे लग रहा था भाई, मुझे लग रहा था बचेगी नहींआपकी पेशेंट, लेकिन आपने बहुत कोशिश किया………इससे अधिक क्या करते।

मैं कल नहीं आऊँगा, आप देख लेना……… ये लीजिए। उसने कुछ रूपये पुलिसवाले की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

उसने रूपये पर घ्यान नहीं दिया- क्यों आप क्यों नहीं रहेंगे।

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

तो आप नहीं आ रहे?

कहा तो।

क्यों भाई, डरते हैं? पुलिस वाले ने जैसे चुहल की। शायद मित्र को हल्का करने की कोशिश।

उसने बची खुची हुई बूँदें गले के अंदर उतारीं, बोतल को दूर फेंका और धीरे से कहा- हूँ।

इस कीडे़ से?

नहीं

तब?

वह चुप ही रहा। पुलिस वाले ने उसे कुरेदा- तब किससे?

आँखे दूर-दराज, मुँह में जीभ की बेचैन हरकत, होठों और दातों की कशमकश, गले में धुमड़ती थूक की घँूट और एक उच्छ्वास!

पुलिस वाला रुपये थामे बैठा रहा।

रख लो, तुम्हीं देख लियो भाई।

वह चला, फिर मुड़ा- उसकी आँखों में मैला खाने वाले जानवर की तस्वीर कौंध गई। उसने आँखे भींच कर उसपर से ध्यान हटाया- और सुनो मेरे भाई, जलाइयो न उसको, गाड़ दियो कब्रिस्तान में…। मोलवी को बुलवा लेना। और पैसे ले लो, पर ये काम कर देना। तुम्हारे ऊपर भरोसा है। उसने कुछ और रुपये निकाले।

पुलिस वाले ने हाथ के इशारे से उसे मना कर दिया-न न बहुत हैं, हो जायेगा भाई। फिर उसके दिमाग में कुछ चमका। कुछ रजिस्टर हुआ, और मुँह से बेसाख्ता निकला- अँय ऐसा! अरे! कब्रिस्तान………..मोलवी!

वह बिना लड़खड़ाये आगे बढ़ गया। पुलिसवाला देखता रहा- कभी पैसों को, कभी अंधेरे में गुम होते हुए साये को।

(उत्तरकथा: अफसाना कितना भी काल्पनिक हो उसमें सच्चाई अवश्य होती है। उसका संबंध प्रत्यक्ष/परोक्ष रुप में कदाचित वास्तविक चरित्रों से होता ही है। यह कथा भी अपवाद नहीं हैं। इसमें आये चरित्रों के नाम बदले नहीं गये है बल्कि पूरी तरह छिपा लिये गये हैं। पुलिस वाला अपने वादे का सच्चा निकला लेकिन मदिरा पीकर सोने और ड्यूटी में लापरवाही बरतने के आरोप में सस्पेंड हुआ। ड्राइवर ठीक होकर फिर से रोड पर है और वह किसी मरीज को अस्पताल तक छोड़ने के पैसे नहीं लेता। आदमी ने अपने बचे पैसों से ऑक्सीजन सिलिंडर की व्यवस्था कर जरूरतमंदों तक पहुँचाया। उस दिन रात में जाने के ठीक सोलहवें दिन उस नर्स की करोना से मौत हो गई।)

***

 मो. आरिफ

संपर्क: सेंट्रल पब्लिक स्कूल, ताजपुर रोड, समस्तीपुर (बिहार); मोबाइल – 9931927140 ईमेल –cpcsamastipur@gmail.com

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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