कथा संवेद

कथा संवेद – 18

 

इस कहानी को आप कथाकार की आवाज में नीचे दिये गये वीडियो से सुन भी सकते हैं:

 

 

युवा कथाकार श्रद्धा थवाईत का जन्म 28 अप्रैल 1979 को जांजगीर, छत्तीसगढ़ में हुआ साहित्य अमृत के युवा साहित्य विशेषांक, दिसम्बर 2015, में प्रकाशित ‘हवा में फड़फड़ाती चिट्ठी’ शीर्षक कहानी से अपनी कथा यात्रा शुरु करने वाली श्रद्धा थवाईत का इसी नाम से एक कहानी-संग्रह प्रकाशित है।

ऊपर से किसी जंगल की सामान्य कथा का अहसास दिलाती कहानी ‘जंगल की पगडंडी’ में सड़क और पगडंडी के प्रतीकार्थ बहुपरतीय हैं। आकार में अपेक्षाकृत छोटी यह कहानी जहाँ एक तरफ मुख्यधारा बनाम हाशिये के दव्न्द्व को एक प्रतीक कथा के शिल्प में मूर्त करती है तो वहीं दूसरी तरफ किसी कुशल अमीन की तरह ग्राम्य जीवन की त्रासद नियतियों और शहरी चकाचौंध के मध्य स्थित फासले की पैमाईश भी करती है। दूसरों के प्रतिकूल अनुभवों को ही पथ प्रदर्शक मान कर सभ्यता के दोराहे पर रुका हुआ व्यक्ति दुविधाओं और असमंजस के जिस मुश्किल प्रदेश में जा फंसता है, उसकी छवियों की जो छायायें इस कहानी में अपना आकार ग्रहण करती हैं, वे पढ़ने से ज्यादा समझने और विश्लेषण से ज्यादा महसूस करने की चीज है। स्वप्न और यथार्थ के मध्य पसरे दलदल के बीच उग आये पत्थरों के समानांतर जंगल के गर्भ में छुपी हरियाली और रहस्य वीथियों का पता बताने वाली यह कहानी अपने पाठकों से एक संवेदनशील और सावधान पढ़त की मांग करती है।

राकेश बिहारी

 

जंगल की पगडंडी

श्रद्धा थवाईत

वह राह जंगल के बीच से गुजरती थी। राह के दोनों ओर पेड़ थे। इन पेड़ों में कुछ की उम्र शतक पार थी, तो कुछ की शतक तक पहुंचती। कुछ पेड़ अपनी स्वर्ण जयंती पूरी कर चुके थे। कुछ रजत जयंती मनाने की राह पर थे। कुछ तो निरे पौधे थे जिनमें वलयें भी नहीं बनी थी। कुछ नवजात ही थे- नर्म, नाजुक, रक्तिम। यह सब घास – फूस से मिलकर जंगल को घना बनाते थे। इतना घना कि चार हाथ दूर देख पाना भी मुश्किल हो। ज्यों जंगल भविष्य हो।

इस जंगल में तरह तरह के जानवर भी थे। कुछ शिकार करने वाले, तो कुछ शिकार होने वाले। यह जानवर जंगल को खतरनाक भी बनाते थे और रहने योग्य भी। यह जंगल मीलों दूर तक फैला था। जंगल के बीच की यह राह पेड़ों की छाया से, उनके पत्तों से, फूलों से, समय-समय पर टूटी टहनियों से, जानवरों के कदमों से ढंकी हुई थी। राह इनके निशान लिए चलती थी। जंगल के उठाव पर उठती थी, घाटियों में गिरती थी।

इस घने जंगल के बीच इस मुख्य राह से निकलकर एक पगडंडी अंदर को जाती थी। उस लड़के को यह पगडंडी अपनी ओर खींचती जैसे समंदर को चांद खींचता है। राह से गुजरते हुए लड़का इस पगडंडी का इंतजार करता। उसे आस भरी नजर से देखता जैसे चकोर चांद को देखता है। तब तक देखता, जब तक कि यह नजरों से ओझल ना हो जाती। कम से कम दिन में एक बार जरूर। अक्सर दिन में कई कई बार। उसे इस पगडंडी में अजीब तरह का रहस्यमय आकर्षण लगता। जैसे पिछले किसी जन्म में वह मजनूं यह लैला रही हो।

कुछ ही दूर चल कर पगडंडी मुड़ते हुए जंगल के घनेपन में खो जाती थी। अपने आसपास पगडंडी पर चलने वाला उसे कोई भी न दिखता। किन्हीं अनजान लोगों के चलने से यह पगडंडी बनी थी। किसी को पता नहीं था कि यह पगडंडी कहां ले जा सकती है।  राह कहां ले जाएगी यह पता था। यह चलने वाले पर था कि वह कितनी देर, कितनी दूर तक राह पर चलता रहेगा।

फोटो क्रडिट : राकेश बिहारी

यह जानते – समझते हुए भी उसने कई बार रुक कर इस पगडंडी पर अपने कदम बढ़ाने चाहे। इंच- इंच हरियाली जमीन से निपट अलग, धूसर माटी की रंगत लिए, पग भर की चौड़ाई धरे पगडंडी। जाने अजीब से डर ने, अनिश्चितता ने उसके कदम रोक लिए। हर बार लोगों की हिदायतें याद आई कि मुख्य राह ही सही है। कभी किसी पगडंडी में कदम रखने का सोचना भी मत। लोगों की शंकाएं बादलों सी घिर आई कि जाने उस पगडंडी में क्या है? पगडंडी में जाना राह भटक जाना होगा। यूं तो जंगल में और भी कई पगडंडियां थीं, पर वे उसे उस तरह सम्मोहित नहीं करती थी, जैसे यह। उसे लगता कि जब वह पगडंडी से गुजरेगा तो धरती उसके कदम चूमेगी। माटी उसके कदमों की छाप बन साथ चली आएगी। घास उसे गुदगुदाएगी। नन्हे पौधे उसके पांव से लिपट- लिपट जाएंगे। बड़े पौधे उसे सहलाएंगे। वृक्ष उस पर अपने फूल गिराएंगे, पत्तियां झड़ाएंगे।

वह अक्सर दोनों हाथ फैला कर, आंख बंद कर खुद पर गिरते फूलों की कल्पना करता। उसका रोम-रोम खुशियों से उसी तरह भर जाता जैसे जंगल वनस्पतियों से भरा था। अगले ही पल लोगों की हिदायतें कदमों में गिरहें डाल देती। पैरों में बेड़ियां पड़ जाती कि मुख्य राह ही कहीं पहुंचा सकेगी। वह पगडंडी को घूंट – घूंट पीता, पांव के आगे पांव रखता, उस जगह को पार कर जाता, जहां से पगडंडी निकलती थी। कभी-कभी ठहर भी जाता जब उसे लगता कि पगडंडी पर दूर कहीं एक चिड़िया उसे शिद्दत से पुकार रही है। उसका दिल चिड़िया की पुकार का जवाब भी उसी शिद्दत से देने लगता।

उम्र के उस दौर में जब जिंदगी के चूल्हे में विद्रोह की आंच सुलगती है; उसने अपने दोस्तों से, परिवार से इस खिंचाव को बांटा था। उसके एक दोस्त के परिचित उस पगडंडी पर कुछ समय ही पहले गए थे, पर वे आधी पगडंडी से ही वापस लौट आए। जब लौटे तो बेहद लस्त – पस्त थे। उन्होंने बताया कि पगडंडी में भूखे शेर चीते घूमते हैं। जहरीले सांप गुच्छों में मिलते हैं। कुछ खाने पीने को मुश्किल से ही मिल पाता है। वापस आने की चाह करो तो पगडंडी का भूत पकड़ लेता है। यह सब सुनकर उसके कदम के नीचे की धरती इतनी दलदली हो उठी कि इस पर आगे कदम उठाना नामुमकिन था।

उसे अपने उस दोस्त की भी हृदय तल से याद आती,  जिसने इस दोस्त की बातों को सिरे से नकारते हुए कहा था कि किसी एक के बुरे अनुभव का मतलब यह नहीं कि सबके अनुभव बुरे हों। शायद इसके बाद अच्छे अनुभव पगडंडी पर खड़े उनका इंतजार कर रहे हों और वे उन तक पहुंचने के पहले ही वापस लौट गए।

वह दोस्त हार मानने वालों में से नहीं था। उसने कहा कि हो सकता है ऐसा हो, लेकिन यह पगडंडी कहीं पहुंचाती भी तो नहीं; फिर यह भी हो सकता है कि पगडंडी के खत्म होने तक कुछ अच्छे अनुभव बस मिले और कुछ भी ना मिले।

दूसरा दोस्त भी धुन का पक्का था।

फोटो क्रडिट : राकेश बिहारी

” कहीं पहुंचना ही तो जरूरी नहीं यदि पगडंडी पसंद है तो उसके सफर में भी आनंद मिलेगा। संतुष्टि मिलेगी। क्या यह संतुष्टि जिंदगी के लिए पर्याप्त नहीं? समंदर का पानी पीने के लिए नहीं होता लेकिन बादल बनकर प्यास तो वही बुझाता है।”

 उसकी बातों में अनोखा विश्वास था। उसे एक दूसरी पगडंडी बहुत पसंद थी। एक दिन वह अपनी पसंदीदा पगडंडी पर आगे बढ़ गया। तब से लड़का अपने उस दोस्त से नहीं मिल पाया है। आज भी वह दोस्त उसकी यादों के सावन में बरसता रहता है। कहां होगा वह? क्या घने जंगल में खो गया होगा? कैसी रही होगी उसकी पगडंडी? सांप बिच्छू काट या शेर चीते खा तो नहीं गए होंगे उसे?

उस वक्त एक बार राह से गुजरते हुए पगडंडी से उठती धुन ने, दिल की धुन से मिल, विद्रोह की ऑंच को भड़का दिया था।  उस दिन उसके पांव राह पर रुक ही गए। ऑंच में चाह खौल उठी। उसने पगडंडी पर कदम बढ़ा भी दिए, लेकिन मुख्य राह के ओझल होने से पहले ही कुछ ही कदम चलकर वह रुक गया। उसे अपने दोस्त के परिचित के अनुभव याद आने लगे। ऑंच में पानी पड़ गया। कदम मनभर वजनी हो उठे।  खुद पर विश्वास का बल वजनी कदमों को भी उठा ले जाता है पर उसकी चाह शायद इतनी परिपक्व नहीं थी कि खुद पर  विश्वास फल उठे। उसे खुद से अधिक लोगों पर विश्वास था। पक्की चाह तृप्ति देती है लेकिन अधकचरी चाह अतृप्त ही नहीं रखती अपच भी करा  देती है।

इस वापसी के बाद उस पगडंडी का रहस्यमय आकर्षण धीरे-धीरे टीस में बदलने लगा। जो पगडंडी उसके रोम-रोम को खुशियों से भर देती थी; वही अब उसे सुइयां चुभोती। पगडंडी को घूंट – घूंट पीने वाला वह, अब उससे नजरें चुराने लगा। पगडंडी को देखे बिना राह पर चलने लगा पर अब भी उसे हरियाली पगडंडी प्यार से भरी लगती, वहीं राह में रोड़े लगते। वह पगडंडी में पत्ती की छुअन महसूस कर अपनी आंखें बंद करता कि किसी गड्ढे में उसके पांव ऐंठ जाते। कुछ ना कुछ उसके हाथों से छूट, कहीं खो जाता। बदले में कोई ग्लानि, पश्चाताप उसे मिल जाता।

 यूं चलते – रुकते हुए वह एक दोराहे पर जा पहुंचा। दोनों ही राहें काली चमचमाती राहें थीं।  दोनों में उनके अगले गंतव्य और उनकी दूरी लिखी थी। राहें अपनी मंजिल कभी नहीं बताती, वे सिर्फ पड़ाव बताती हैं। एक राह में ‘ नो टोल्स ‘ की तर्ज पर  ‘नो पगडंडी ‘ लिखा था। वह दूसरी राह पर बढ़ गया। वह पगडंडी छोड़ आया था, पर छोड़ नहीं पा रहा था। वह राह पर चल पड़ा, पगडंडी को सोचता हुआ। उस चमचमाती राह में हरियाली थी; पर कुछ ही दूर बाद हरियाली कम होने लगी। अब राह में गति अवरोधक थे। छोटे बड़े गड्ढे थे। किनारे रेत गिट्टी पड़ी होती। वह गड्ढे में दचका खा जाता, गति अवरोधक में उछल जाता या उसे पार करते हुए अटक जाता। रेत- गिट्टी में फंस जाता। उसे पगडंडी शिद्दत से याद आती रही।  गिरते – संभलते वह आगे बढ़ता रहा, पर धीरे-धीरे जमीन दलदली हो उठी।

फोटो क्रडिट : राकेश बिहारी

अब पांव तले धरती कांपती। कदम धंस – धंस जाते। तरह-तरह के कीड़े मकोड़े दलदली जमीन में थे। वे उससे लिपटना चाहते, उस पर चढ़ना चाहते। अब इन परिस्थितियों में आगे बढ़ना  संभव नहीं हो पा रहा था। उसने पीछे पलटना चाहा, पर राह तो कब की खत्म हो चुकी थी। वह इतनी लंबी दूरी पार कर चुका था कि वापसी भी संभव नहीं थी।

आगे दलदली विस्तार था। इस दलदल में सड़ती वनस्पतियां थी। जिन पर तरह-तरह की मक्खियां भिनक रही थीं। लाल- काली- नीली मक्खियां। वे आंखों में घुसी आतीं, मुंह में घुसी आतीं। कोई ना कोई कीड़ा काट लेता।

उसने परेशान हाल नजरें फिराईं। इस दलदल में कुछ- कुछ दूरी पर पड़े कई काले चमकते पत्थर थे। हर पत्थर पर एक या अधिक लस्त- पस्त लोग बैठे हुए थे। दलदल के कीड़े- मकोड़े, सांप – बिच्छू पत्थरों पर रेंगते ऊपर चढ़ रहे थे। जब वे किसी को काटते तो वह बिना आवाज किए दलदल में गिर जाता। कुछ ही पल में दलदल उसे लील लेता। उसका कोई नामोनिशान न बचता। वह तन और मन दोनों से थक कर रुका तो उस पर मक्खी, मच्छर, कीड़े झूम उठे। यहां दुनिया ठीक उसके दिमाग की तरह हो उठी। दिमाग जिसमें एक तरह की निराशा, अनेकों पश्चाताप, ग्लानि, वेदनाएं और बेतरह टीस झूमती थीं। इस दलदल में फंसे होने के एहसास ने उसकी शक्ति निचोड़ ली।

सामने एक पत्थर था जिसका काला रंग धूप में चमक रहा था। उस पर एक व्यक्ति बैठा हुए था। जिसका रंग दलदल के रंग से मिल रहा था। वह पत्थर दरअसल उसे रुकते देख उग आया था। यह  उसे रेगिस्तान में नखलिस्तान की तरह एकमात्र आस का बिंदु दिखा। वह किसी डोर से बंधी कठपुतली की तरह बैठ गया। यह सोचते हुए कि अब पूरी उम्र इसी पत्थर पर बैठ कर गुजारनी होगी। पत्थर पर बैठे व्यक्ति ने उसकी ओर देखा। उसकी नजरों में संक्रामक सूनापन था। जैसे कोई गहरी अंधेरी सुरंग हो। जिसमें कोई डूबता चला जाए। उस शख्स ने कुछ देर बाद निश्वास छोड़ते हुए उससे कहा,

” तुम भी किसी पगडंडी में जाना चाहते थे?”

” हां! क्या तुम भी?”

” हां! पर अलग जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। मेरा एक दोस्त एक पगडंडी पर गया था। वह दूर पहाड़ की चोटी पर रोशनी देख रहे हो। आज वह उस खुशनुमा जगह  पर है।”

 पहाड़ की वह जगह अनोखी रोशनी भरी, मनमोहक और हरितिमा से भरपूर थी। जहां से सुकून की खुशबू आ रही थी। उसे चोटी पर अपना वही दोस्त दिखाई पड़ा, जो अपने सपनों की पगडंडी पर चल पड़ा था। उसके दोस्त की तरह वहां बहुत से लोग इतने बड़े थे कि दूर से ही पहचान आते थे। कुछ वैसे ही बड़े थे जैसे वह था, लेकिन सब के चेहरे में खुशी सुकून और संतुष्टि की लहरें हिलोरें ले रही थी। उसने पत्थर पर बैठे अपने साथी की ओर देखा। वह विपरीत दिशा में देख रहा था।

” और इधर देखो एक और चमचमाती जगह। यदि हमने दोराहे की दूसरी राह चुनी होती तो आज हम इस पहाड़ी की चोटी पर होते। दोनों चोटी के बीच देखो एक सीधी राह उन्हें जोड़ती है।बहुत से लोग दोनों चोटी को छूते इस राह के राही हैं, और तुम यहां दलदल के अधर में अटके हो”

प्यास से पपड़ियाये होठों को सूखी जीभ से गीला करने की कोशिश करते उसने कहा,

“तुम तो बहुत कुछ जानते हो । बताओ ना कि क्या हमारे लिए भी कोई राह बाकी है।”

वह हॅंस पड़ा। उसकी हॅंसी दुख  भरे चेहरे में दुख की एक रेखा थी। यह रेखा भी तुरंत ही टूट के गिरी, दलदल में खो गई।

“ये दूर-दूर तक फैले पत्थर देख रहे हो। जिन पर कदम रखते यह दलदल में धंसते हैं। हिल उठते हैं। यही इस दलदली विस्तार में डूबते को तिनके का सहारा हैं। इन पर कूदते हुए तुम उस राह तक पहुंच सकते हो, पर दलदल शक्ति सोख लेता है। यदि तुम अपनी शक्ति इससे बचा कर रख सको, यदि तुम खुद पर इतना विश्वास रख सको, हिलते पत्थरों पर संतुलित छलांग मार सको, यदि असंतुलित होकर गिरने का जोखिम उठाने के लिए मन को मना सको, दलदल में गिर कर मृत्यु का सामना करने का साहस संजो सको तो उस राह तक जा सकते हो।

उस आदमी की बातें भूस्खलन में पहाड़ से गिरते पत्थरों की तरह उस पर गिरती रहीं।

वह देखता रहा, तौलता रहा कि मनोहर पगडंडी पर कदम बढ़ाने की सोचते ही कदम मन भर के हो जाते थे। क्या आज वह अनोखे कीड़े- मकोड़े, मक्खी-मच्छर, सांप बिच्छू से भरे इस दलदल को जोखिम उठा पार करने का मन बना सकेगा? क्या कोई चमत्कार दिखा सकेगा? तभी एक पत्थर पर बैठी जहरीली मक्खी पत्थर छोड़ कर उड़ी। भिनभिनाते हुए उसके सिर पर बैठ गई।

सम्पर्क shraddhathawait@gmail.com, 9424202798

.

samved

साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments
Back to top button
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x