कथा संवेद

कथा संवेद – 13

इस कहानी को आप कथाकार की आवाज में नीचे दिये गये वीडियो से सुन भी सकते हैं:

ग्रामीण संवेदनाओं की कहानियों के लिए ख्यात सोनी पाण्डेय का जन्म 12-07-1975 को मऊ नाथ भंजन (उत्तर प्रदेश) में हुआ। 2014 में पहली बार ब्लॉग पर प्रकाशित ‘प्रतिरोध’ शीर्षक कहानी से अपनी कथा यात्रा शुरू करनेवाली सोनी पाण्डेय के दो कहानी-संग्रह ‘बलमा जी का स्टूडियो’ तथा ‘तीन लहरें, एक कविता संग्रह ‘मन की खुलती गिरहें’ और एक आलोचना-पुस्तक ‘निराला का कथा साहित्य: कथ्य और शिल्प’ प्रकाशित हैं।

ठेठ गंवई और देशज ठाठ की कहानियाँ कहनेवाली सोनी पाण्डेय अपनी नई कहानी ‘मोहपाश’ में एक सर्वथा अलग अंदाज के साथ उपस्थित होती हैं। कथा और कविता के संयुक्त उपकरणों से रची गई यह कहानी अपनी भाषाई लयात्मकता और प्रतीकात्मक संरचना विधान के कारण सबसे पहले हमारा ध्यान खींचती है। निरन्तर अभ्यास से अर्जित भाषा के निजी और सहज मुहावरे के परिसर से बाहर निकल शिल्प और संरचना की सर्वथा अलग जमीन पर कहानी लिखना किसी भी लेखक के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरा काम है। सामान्यतया लोक के उपकरणों से यथार्थ का उत्खनन करने वाली सोनी ने ‘मोहपाश’ कहानी में उस रचनात्मक चुनौती का सफलतापूर्वक सामना किया है। चिड़िया और वृक्ष के संवादों के सहारे यह कहानी आधुनिक स्त्री के अंतर्द्वंद्व, ऊहापोह, स्वप्न और संकल्प को एक काव्यात्मक कथा रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करती है। कविता और कहानी के बीच निरन्तर आवाजाही के शिल्प में रची गई यह कहानी संवेदना के सूक्ष्मतम स्तरों पर जिस तरह यथार्थ के साथ लगातार अपना रिश्ता बनाये रखती है उसी में इसकी कलात्मक सफलता के बीज अंतर्निहित हैं। कला के लिए कला और प्रयोग के लिए प्रयोग के भ्रमजाल से मुक्त यह कहानी कला और यथार्थ के सघन अंतर्संबंधों का एक अर्थपूर्ण उदाहरण है।

राकेश बिहारी

मोहपाश

  • सोनी पाण्डेय

दृश्य-1

मैं सुन्दर नहीं हूँ..

उसने कहा-“मैं भौतिक रूप से सुन्दर नहीं, जानता हूँ, पर मन सुन्दर है।”

वह सामने खड़े विशाल वृक्ष को देखती है, काई से गहरे काही और काले रंग के मजबूत तने वाला वृक्ष, हरी पत्तियों के आवरण से ढका, अपनी एक-एक शाख पर सैकड़ों परिंदों को बसेरा दिए हुए। अभी-अभी बरखा थमी है, नन्हीं चिड़िया अपने परों के पानी को झटकते पेड़ के तने पर चोच मार रही है। वह विशाल वृक्ष नन्हीं चिड़िया के चोच की मार मुस्कुराकर सह रहा है, हाँ सह रहा है। दर्द की हल्की लकीर सिहर कर गुजरी है मेरे कानों से। पत्ते सरसराहट के साथ सिसके थे। नन्हीं चिड़िया का प्रेम है चोच प्रहार, वह नाराज़ है वृक्ष से। वह रूठ कर फुदकती इस डाल से उस डाल पर बैठती है। चीं sssचीं चूं चूं sssकरती ना जाने क्या-क्या कह डालना चाहती है। वह थोड़ी झगड़ालू भी है, उसके दिल के पास जाकर कभी-कभी ठक्क से चोच मारती है। वह उसे रोकता क्यों नहीं, चिड़िया इर्ष्यालु है, वह क्या-क्या चाहती है। प्रेम में हर चिड़ियाँ इर्ष्यालु हो जातीं हैं, उनका प्रेम विशाल वृक्ष से है। वहाँ कौन सा सौन्दर्य है? न बेला फूल की सुगन्ध, न सावन के झूले, न फागुन की मादकता फिर चिड़िया इतनी मदमाती क्यों कर क्या-क्या गाती रहती है भला?

यहाँ कहने को सुन्दर कुछ नहीं है, विशाल वृक्ष के नीचे जमे पानी में सड़ते गिरे पत्तों को चाटते कीड़े, रेंगते केंचुए और कभी-कभार सर्र से सरसरा कर निकलते विषधर। इन दिनों इधर से कोई नहीं निकलता। उसकी छांह से डरने लगे हैं लोग पर चिड़िया अज़ीब है, वह ठक्क प्रहार दरअसल उसका चुम्बन है पेड़ के सख़्त हृदय पर, वह पिघलता नहीं। स्वीकारता तो बिल्कुल नहीं कि उसने प्रेम में विशाल वृक्ष हो जाना चुना।

वह खड़ा है एक गन्दी मलीन बस्ती में, कींचड़ पानी से सने, अधनंगे बच्चे सड़क के बीच ठहरे पानी में छप्पक छप्प खेल रहे हैं। वह नाराज़ है, इतनी ज़ल्दी कैसे उखड़ गयीं ईटें सड़क की?

कब बनीं?

किसने बनवाया?

उसके सैकड़ों सख़्त सवाल सुन सभी हाँफ रहे हैं। प्रधान तो बार- बार घिघियाते हुए साहब! साहब! बोल कर चुप हो जाता है।

यहाँ सब असुन्दर है फिर इतना सुन्दर क्या है जो मोहता है। वह बच्चों के बीच खड़ा है। बच्चे सहसा किसी सभ्य पुरुष को देखकर सहम जाते हैं। एक गोलमटोल बच्चे को जिसका रंग गहरा सांवला है माँ ने काजल की मोटी लकीर खींच उसकी आँखों को भर दिया है। छोटी बटन सी आँखें चमक रहीं हैं। ज्यों बादलों के बीच चाँद। वह सहसा हँस पड़ता है, खिलखिलाकर… उसके मोतियों की पंक्ति से दाँत चमचमा रहे हैं। माथे पर माँ ने काज़ल से अर्धचंद्र बना कर गोल टीका लगा दिया है। उसे बचाना है दुनिया भर की नज़र से…ये माएँ भी विशाल वृक्ष हैं, ढ़क देती हैं शिशु को आँचल के छत्रक से। वृक्ष जानता है माँओं के अबोले बोल, तुम्हारा नाम क्या है?

बच्चा हँस रहा है।

.तोहार नाम का ह?

बाबू…बच्चा नाम बताकर हँस रहा है।

बाबू! बतावा बड़ होके का बनबा?वृक्ष पूछ रहा है..

बच्चे के लिए यह कठिन सवाल है। उसकी बस्ती में बनने के विकल्प ही कहाँ हैं? पीढियाँ मरखप गयीं मजूरी करते। वह सोचता है और हँसते हुए बताता है..इंतपेत्तर (इंस्पेक्टर)

अब वृक्ष भी हँस रहा है…यह हँसी कितनी सुन्दर है, बच्चे का बनने का स्वप्न कितना सुन्दर है। अब सारे बच्चे समवेत स्वर में बता रहे हैं कि उन्हें इंस्पेक्टर बनना है। बच्चे की कल्पना में सबसे बड़ा आदमी है इंस्पेक्टर, वह बदल सकता है उसकी बस्ती का नक्शा। ये बच्चे राजेश जोशी की कविता..बच्चे काम पर जा रहे हैं से आगे स्कूल की ओर हैं। बदल सकती है उनकी दुनिया। बदल रहा है यहाँ सब कुछ, वृक्ष ने सड़क एक हफ़्ते में दुरूस्त करवा दिया है। वृक्ष कवि है, उसने जीवंत कविता लिखी है। यहाँ सृष्टि का सबसे सुन्दर राग छेड़े चिड़िया चहक रही है, अभी ठक से मार कर चोंच उड़ी है फुर्र से, यहाँ मिलने की कोई चाहत नहीं। दोनों कुछ कहते नहीं। वृक्ष तो बिल्कुल नहीं बोलता, बस इतना भर कहा, मैं सुन्दर नहीं हूँ।

स्केच : सोनी पाण्डेय

दृश्य-2

नेपथ्य

वह हमेशा नेपथ्य में रहनाचाहता है, सामने उसे बस काम करते रहना है। वह देखता है तो एक टक देखता ही रहता है, शायद मन के स्लेट पर लिखी प्रेम की इबारत पढ़ लेना चाहता है। उसे अकबर इलाहाबादी का शेर याद आता है,

इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता …

उसने बौद्धिकता का लबादा ओढ़ रखा है, लोग कहते हैं कि वह भौतिकवादी है। उसे मनपसंद चीजें हासिल करने आता है। उसके हरम में दिव्य सुन्दरियों की आवाजाही है। उसके चारों तरफ सुन्दर स्त्रियों की भीड़ है और वह ना जाने किसे एक टक निहार रहा है। चिड़िया पूछना चाहती है वृक्ष से, तुम्हारा ध्यान कहाँ है?

प्रेम का चरमोत्कर्ष देह का मिलना भर नहीं उसके लिए, मन में गहरे तक समा जाना है। इतने गहरे तक कि निकाले से न निकले, ऐसी छाप कि मिटाने से न मिटे। वह नज़रेंं मिलने से पहले फेर लेता है। उसकी चहचहाहट सुनना तो चाहता है पर बोलता कुछ नहीं। वह उसे अपने सिर के ऊपर उस फुनगी पर बिठाना चाहता है जहाँ से वह आकाश नाप ले। चिड़िया ने आकाश को देखा भर है, उसकी उड़ान बहुत छोटी है, उसके डेंगे बहुत छोटे हैं, सपने तो उससे भी छोटे हैं। वह जहाँ पैदा हुई वहाँ कोई वृक्ष इतना उदार नहीं, वह पाँव की जूती कही गयी, उसकी शोभा वृक्ष के पैरों में है। क्षीरसागर में लक्ष्मी विष्णु के पैर दबा रही हैं, सदियों से यही होता चला आ रहा है। कोई चिड़िया ऊपर नहीं देख सकती और वह देख रही है। वह वृक्ष के मस्तक पर ठक्क प्रहार करती है और चीं चीं टेरती फुर्र से उड़ जाती है।

आज कुछ ऊँची उड़ान। वृक्ष तालियाँ बजाकर हौसलाअफजाई कर रहा है, उसके कान में तालियों की गूंज है और सामने विस्तृत आकाश, अचानक वह लौट आती है और उसकी मजबूत भुजाओं पर बैठ फुदकती मटकती कुछ बकबक कर रही है। वृक्ष सुनता है मुस्कुराते हुए। कुछ बोलता नहीं, सोचता है कि चिड़िया विस्तृत नभ की उड़ान छोड़ उसके बाहों के घेरे में क्यों लौटी?उसे जी भर उड़ना था।

वृक्ष कौन है? कोई पूछता है तो चिड़िया उलझ जाती है। नाम, जाति, गोत्र ?

वह तड़प जाती है। क्या लेना उसे इन चीजों से, उसे तो बस इतना पता है कि वह बोलना सीख गयी है, कोई है जो मौन रह उसे मुखरित कर रहा है। बस उसकी बातें सुन मुस्कुराता है। उसकी बातें….

चिड़िया ने उसकी छाल के भोजपत्र पर ख़त लिखा है, वह बांच रहा है…

स्केच : सोनी पाण्डेय

मुझसे बात करो…

मुझसे बात करो कि अन्धेरा मेरे सिर तक घिर आया है

बात करो कि यहाँ सब कुछ पिघलने के कगार पर है

दया ने ओढ़ ली है कठोर लोहे की परत

करूणा आत्मा के तलछट में जा बैठी है

प्रेम पूछता है हर भटके राही से पता…

पते लिखे पोस्टर उखड़ गये हैं दीवारों से

गाँव के बाहर का शिलालेख रात की बारिश में धुल गया

लोगों की स्मृति से मिट रहा है नाम-पता

एक गुमनामी की चादर तारी है

मुझसे बात करो कि मुझे चिट्ठियाँ भेजनी हैं तुम्हारे नाम

और सारे लेटर-बाक्स ज़मीदोज़ हो गये हैं

डाकिया अब नहीं देता किसी को चिट्ठी

मुझसे बात करो की सांझ घिर आई है मेरे मन तक…

उदास रातों में नहीं महकती है रात रानी

तारों की बारात नही सुनाती कोई कहानी

हरसिंगार खिल कर झर गये पिछले दिनों

कट गये पेड़ मेरे दरवाजे के

बाहर शोर है बेतहाशा

अन्दर जैसे जम रहा हो खून

मेरे पैर उठते नहीं इन दिनों

कोई मौसमी गीत सुनाई नहीं देता

बादल घिरतें है और धान की फसल रोप दी जाती है धरती की छाती में

अन्दर से हूकती हूँ जी भर

मुझसे बात करो कि जी घबराता है इस बारिश के मौसम में

मुझसे बात करो कि तुम्हारी बातें हीं बचा सकती है दुनिया को…

तुम्हारी बातों की उंगलियों को थामें

बढ़ी थी आदम की सभ्यता…

मुझसे बात करो कि अभी-अभी मौत छू कर गुजरी है मुझे

कल क्या पता बचे न बचे मेरीं बातें…

वह पढ़ते-पढ़ते भावुक हो उठा है, उसकी आँखों में चिड़िया नदी बन उमड़ आई है, उसने रोक लिया है पलकों के घेरे में। तुम्हें बेवजह बहने नहीं दूँगा, ठहरो! मैं सुन रहा हूँ तुम्हारी बातें। अब वह उसके मैसेंजर और वाट्सएप पर फुदक कर जा बैठती है। पुकारती है…सुनिए!

बोलो! जवाब आता है।

चिड़िया का चाँव-चाँव शुरू। ना जाने क्या-क्या अगड़म-बगड़म बोलती है। दोनों के बीच कविता संवाद का सेतु है। वह क्या बोलेगी सार्थक ? अभी-अभी तो बोलना सीखा है। वृक्ष सोचता है, क्यों कर वह लौटती है उसके पास, वह उड़ सकती है, उसे उड़ जाना चाहिए। फिर खुद ही कहता है कि ठीक ही तो कहा है शायर ने कि अक़्ल का बोझ इश्क से नहीं उठता। भोली चिड़िया जब तक वृक्ष के इश्क में डूबी रहेगी अक़्ल का आकाश उसके किस काम का। वह बचाए रखना चाहती है इश्क को हर हाल में और वृक्ष मौन धरे बस महसूसता है। यहाँ भोग नहीं है और लोग उसे सुविधा भोगी कहते हैं। वह पूरा आकाश छोड़े हुए है चिड़िया की उड़ान के लिए पर सामने नहीं आना चाहता। वह नेपथ्य का वह आदिम संगीत है जिसे सुनकर मनुष्यता ने अपनी विकास यात्रा तय की है। वह बज रहा है नेपथ्य में जीवन संगीत की तरह..चिड़िया गा रही है प्रेम गीत चीं चीं चांव चांव…।

दृश्य-3

प्रेम-पत्र

यह प्रेमपातियों की ऋतु है। चिड़िया बार-बार अनुनय करती है, वह कविता सुनना चाहती है उसके स्वर में। उसके स्वर उसकी आत्मा में मृदंग धुन की तरह बजते हैं। आज उसने अपनी प्रिय प्रेम कविता फेसबुक दीवार पर पोस्ट की है

तुम्हारा आखिरी प्रेम-पत्र

(1)

इस मौसम भी

गुलमोहर जरूर खिला होगा

मैं ही मुरझा रही हूँ

तुम्हें देखना था जी भर

आँचल में भर लेना था

मन की तहों में दबा कर रखना था

कि गुलमोहर मेरी याद में

तुम्हारा आखिरी प्रेम-पत्र है…

(2)

मेरी उदासियों को पढ़ सकते हो तो पढ़ लेना

इस तन्हाई में बस इतना भरम रखते हैं

गुलमोहर के झरने से पहले

खत्म हो जाएँगी सारी दूरियाँ

उसके लाल दहकते फूलों से लदी डालियाँ

बचाए हैं हरे पत्तों में थोड़ा सा मेरा बचपन

वहीं कहीं चिपकी है उसकी शाख पर

मेरे माथे की लाल बिन्दी

बाहर दहक रहा है मौसम

अन्दर भरा है महमह गुलमोहर का लाल रंग

इस लाली से बचेगी दुनिया

कि गुलमोहर मेरी याद में

तुम्हारा आखिरी प्रेम पत्र है…

(3)

तुम जा रहे हो!

जाओ!

मुझे याद मत करना

मत कुरेदना भूल कर मेरी किसी बात को

हमारे बीच केवल बातें थीं

सेतु …

बस इस सेतु को बचाए रखना

तुम जब भी पुकारोगे

मेरी बातें थाम लेंगी तुम्हारी उंगली …

देखना वहीं कहीं गदराया मिलेगा

दहकते लाल रंग में डूबा

खिलखिलाता गुलमोहर

बचपन की भोली मुस्कान लिए

बिना किसी यातना या छल के

गा रहा होगा वह गीत

जिसे तुम गुनगुनाते थे

हँस कर थाम लेगा तुम्हारा हाथ

जब भी थक कर गिरोगे

महसूसना उसके स्पर्श में

मेरे छुवन को…

मैंने धो-सूखा कर रख लिया है

सहेजकर मन की पिटारी में

क्यों कि गुलमोहर मेरी याद में

तुम्हारा आखिरी प्रेम-पत्र है…

(4)

सुनों!

मुझसे मत कहना कि तुम प्रेम में थे मेरे

गलती से भी मत कहना

कुछ बातें कहने के साथ ही

अपना अर्थ खो देती हैं

हमारे बीच कितना प्रेम था

सोचना और लिखना

कहना-सुनना

सम्भव नहीं मेरे लिए

मैंने आँचल के कोर में बाँध लिया

फागुन की गाँठ की तरह

तपती जेठ की दुपहरी में

जलती धरती की छाती पर

विरहन की हूक की तरह उठती तुम्हारी यादें

इन सन्नाटे भरे दिनों में

जब जीना दुभर हो रहा हो तन्हाई में

मैंने सीख लिया प्रेम करना खुद से

पकड़ कर तुम्हारी यादों की डोर

क्यों कि गुलमोहर मेरी याद में

तुम्हारा आखिरी प्रेम पत्र है….

(5)

थोड़ा नरम

थोड़ा गरम

थोड़ा खट्टा.. मीठा भी

तुम्हें देखते हुए

मुझे बचपन के चूरन याद आते हैं

खूब गिले-शिकवे

उलाहने

तुम समझे नहीं

मैंने बताया नहीं

जाओ यहीं छोड़कर

अपनी बातों की तासीर

जब तुमने कहाकि

मैं तुम्हारे दिल में रहती हूँ

बस इतना बहुत था

मैंने आँखे बन्द कर लीं

सहेज लिया सब कुछ

जाओ! …तुम खुश रहना और बाँटते रहना दुनिया में

मेरे हिस्से का प्रेम…

जब-जब खिलेंगे गर्म मौसम में

गुलमोहर के फूल

मैं तलाश लूँगी तुम्हारे प्रेम की लाली

धरती खुश हो लेती है जैसे

तमाम उलाहनों के बीच

गुलमोहर से मिलकर

मैं बचा कर रखूँगी रसोईं में

हल्दी के डिब्बे में थोड़ा सा पीलापन

हल्दी की थाप से सजी तुम्हारी गलियाँ

जब जोहती हैं बाट बसन्त की

सावन को पुकारतीं हैं किसी नवब्याता बेटी की तरह

मैं जेठ की लू भरी दोपहरी से पूछती हूँ तुम्हारा पता

ना जाने किस देश में है तुम्हारा ठौर

तुम जब भी लौटना

पूछ लेना गुलमोहर से मेरा पता

क्यों कि गुलमोहर मेरी याद में

तुम्हारा आखिरी प्रेम-पत्र है।

स्केच : सोनी पाण्डेय

चिड़िया बार-बार पढ़ती है, उसे लिखना है प्रेम-पत्र उसके नाम। वह आज अनमनी सी है, उसने आज एक बार भी वृक्ष से बात नहीं की। वह भी तो नहीं बोलता। शायद अपनी विशालता के गुमान में हो’शायद उसे चिड़िया से कोई लगाव ही न हो। वह खुलता भी तो नहीं, बिना खुले कुछ भी स्पष्ट नहीं होता।

उसके मन पर चोट लगी है, वह बेवजह रोती है। मन भर रो लेने के बाद लिखने बैठ जाती है। क्या लिखे? जो कहना है उसके लिए बस दो अक्षर का शब्द,  वह सदियों से इस दो अक्षर को लिखने में असमर्थ है। इन दो अक्षरों को सभ्यता की दीवार में चिनवा दिया गया है इस घोषणा के साथ कि यह पाप है। दुनिया भर के मारण-उच्चाटन मन्त्र सिद्ध कर ओझा-सोखा रोकते हैं चिड़ियों को इन दो अक्षरों को बाँचने से। बस दो अक्षर…

वह लिख नहीं पाती है, अन्दर से खून का सैलाब उमड़ने को है, अंतड़ियाँ जैसे फट जाने को आतुर। सिर पर जैसे बड़ा सा चट्टान गिरा हो। वह खून की उल्टी कर रही है। यह दो अक्षर कितने घातक हैं उसकी दुनिया में कि वह लिख नहीं पा रही है। उसे लगने लगा है कि वह अब कभी नहीं लिख पाएगी। उसकी साँसे धौंकनी की तरह चल रही हैं। वह हाँफते हुए बस एक ही टेर लगाए है, यहाँ कुछ भी सुन्दर नहीं है!

एक बड़ा भ्रम अपनी चमकिली छाया लिए बढ़ता है और चारों तरफ रौशनी की चकाचौंध, इस चकाचौंध में बहुत कुछ डूब रहा है, चिड़िया के रंगीन पर काटने को शिकारी अपने-अपने हथियार लिए बढ़ते हैं और वह फुदक कर वृक्ष के कन्धे पर बैठ जाती है, उसे घृणा करना चाहिए कि वृक्ष का प्रेम असंख्य चिड़ियों से है, पर वह घृणा नहीं कर पाती। वह खुद से कहती है कि उधों! मन न भये दस बीस…

वह मन से कहती है कि यह अति भावुकता का चरम प्रहार है और उसके उड़ान की सबसे बड़ी बाधा। उसे तोड़ देना चाहिए प्रेम के सारे सूत्र कि यह धागे ही उसके पैर की बेड़ियाँ हैं। वह ढूँढती है एकांत और उड़ती है पंख फैलाकर दूर बहुत दूर। जब थक जाती है आकर गंगा के किनारे रेत पर पंख बटोर बैठ जाती है, थोड़ी नम, थोड़ी भुरभुरी रेत के बीच-बीच में रेत के कुछ कण चाँदी के तिनको से चमक रहे हैं, हवा के हल्के झोंके संग मन्थर गति से बहती गंगा की लहरें दूर से आती सितार की धुन सी उसे सुनाई देती है। पीछे मोह पाश है और आगे उसके हिस्से का आसमान। उसे चुनना है दोनों में एक और वह बेचैन हो यहाँ-वहाँ भटक रही है।

चिड़िया ने कविता लिखी है अपनी फेसबुक दीवार पर…

उम्मीद…

मेरे पास सुन्दर कुछ नहीं था

और मैं सोचती थी हर चीज को सुन्दर बनाने की

मैं फूटे हुए मटके में मिट्टी भर कर एक पौधा लगाती

और इन्तजार करती उस ऋतु का

जब वह खिले फूलों से गमक उठता…

एक फटी चादर में पैबन्द लगाते मैं काढ़ देती आस-पास बेल-बूटे और उसे छू कर देखने वाले के चेहरे के मोहक भाव पर मुस्कुरा लेती….

प्लास्टर छोड़ चुकी दीवार पर टांग देती राधा-कृष्ण के महारास का चित्र,

ताकि जीवन में प्रेम बचा रहे आखिरी निवाले तक

मैं जानती थी ईश्वर कुछ नहीं दे सकता,

फिर भी कहती थी सबसे कि वह देगा एक न एक दिन छप्पर फाड़ कर

ताकि सबकी नज़रों में उम्मीद के जुगनू टिमटिमाते रहें

मेरे आस-पास सब कुछ बेरंग था पतझड़ के मौसम सा नीरस और उबाऊ

टूट कर शाख से गिरे पत्तों सा खड़खड़ाता जीवन कभी भी रौंदा जा सकता था किसी के पैरों तले

फिर भी मैं उम्मीद से भरी जोहती रही बाट बसन्त की

धोखे से भरी दुनिया में भले किसी ने नहीं थामी वक्त पर मेरी उंगली

मैं हर गिरते को लपक कर उठाती रही

कुछ हो न हो मेरे पास

भले लोग हँस लें मेरी फटेहाली पर

मैं जानती हूँ अपनी अमीरी इस लिए

रोज एक कविता लिख कर तकिए के नीचे दबा सो जाती हूँ

अगले दिन वह एक सपना बन लटक जाता है दरवाजे

पर।

———

वह सोचती है, पता नही वह पढ़ता भी है या नहीं, गलती से भी वह उसकी पोस्ट पर लाइक, कमेंट नहीं करता है। शायद डरता है। उसे दुनिया से डर है, उसे सत्ता से डर है, उसे धर्म से डर है। वह धर्म ध्वजाओं के सामने हाथ जोड़े राजा की प्रदक्षिणा करता है। उसकी यह सब क्रियाएँ मजबूरी हैं और चिड़िया धर्मध्वजा पर फुदक कर बैठी, मुक्ति गीत गाती गुनगुनाती उन्मुक्त उड़ान को आतुर। वह नहीं बोल पाएगा, उसे बचाना है अपनी विशालता में छिपा ऐश्वर्य। वह बचा ले जाएगा अपनी विशालता पर चिड़िया को उसने उन्मुक्त नभ दिखा दिया है। वहाँ सब कुछ बहुत सुन्दर है। आकाश बादलों के रथ पर बैठा उमड़ता चला आया है क्षितिज रेखा पर सूर्य के सिन्होरे से लाल रंग भरने धरती की माँग में। किरणों की किलकारी फूटने को है, पक्षियों ने मंगल गीत गाना शुरू कर दिया है। नदी ने लहरों से चौक चन्दन पूर नववधू भोर के स्वागत में पलकें बिछा दीं हैं। यहाँ सब बहुत सुन्दर है।

चिड़िया कविता लिख रही है। उसे धीरे-धीरे समझ आने लगा है कि उड़ान के लिए मोहपाश से मुक्ति बहुत जरुरी है। हम जब तक ऊन के गोले की तरह सपनों को सहेजे रहते हैं तब तक वह साकार नहीं होता, जिस दिन यथार्थ की सलाई पर कोशिशों के फन्दे डालने लगते हैं हमारे सपने गर्म मुलायम और सुन्दर हो मूर्त रूप लेने लगते हैं। चिड़िया बड़ी हो गयी है, उसके डैंगे भी थोड़े बड़े हो गये हैं, उड़ान भी ऊँची हो गयी है। वह पेड़ के कोतड़ से बाहर निकल अकेले निहारने लगी है जीवन के विभिन्न रंगों को, पहचानने लगी है श्वेत / श्याम।  एक दिन नाप लेगी अपना विस्तृत नभ। वृक्ष को भरोसा है। वृक्ष फैल रहा है, जड़-चेतन संग, फैल रहा है पर रहेगा मौन ही। मौन उसकी विराट विवशता है, वह बार-बार कहता है…मैं भौतिक रूप से सुन्दर नहीं हूँ पर मेरा मन बहुत सुन्दर है।

सम्पर्क : सोनी पाण्डेय, कृष्णा नगर मऊ रोड,सिधारी, आज़मगढ, उत्तर प्रदेश, पिन- 276001

मो. – 9415907958, ईमेल – pandeysoni.azh@gmail,com

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)

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