कहानी

जमीन बिक्री है क्या !

 

गंगा-कोसी के संगम के पास बसा कस्बा कुर्सेला। डायन कोसी के कटाव और प्रायः हरेक साल आने वाली बाढ़ से उन दिनों इस क्षेत्र की आबादी निरंतर भुखमरी और महामारी की चपेट में रहती। फिर भी लोग उसे ‘कोशका माय’ कहते। कोसी अंचल के अंतिम छोर पर बसे इस इलाके के लगभग एक दर्जन गाँवों में नब्बे प्रतिशत जनसंख्या पिछड़ी जातियों की है। उन दिनों उनमें से अधिकांश साधनहीन थे। उनके रोजगार का एकमात्र स्रोत कृषि मजदूरी थी। किन्तु कृषि मजदूर को काम मौसमी आधार पर ही मिल पाता था। मोटे तौर पर साल में चार महीना काम और आठ महीना बैठ-बेगार। फसल की निकौनी-कटनी के समय मजदूरिनों को भी काम मिल जाता था। हाँ, कुछ ऐसे मेहनतकश मजदूर जरूर होते थे जिन्हें सालों भर काम मिल जाता। ऐसे मौसमी रोजगार वाले लोगों, खासकर युवकों में अस्सी के दशक में रोजगार के लिए परदेश जाने का दौर शुरू हुआ था। सभी गाँवों से पहले इक्के-दुक्के  युवक पंजाब और हरियाणा कमाने निकले थे। जब साल भर कमाकर होली-दशहरा में घर लौटे तो उनका खर्च और जलवा देखकर अन्य साथी-संगी भी आकर्षित हुए। फिर बड़े पैमाने पर गाँवों से मजदूरों का पलायन होने लग गया। एक दशक बीतते-बीतते गाँवों में अठारह से पैंतीस साल के बीच के लोगों का तो जैसे विलोप ही हो गया। उनमें से कुछ सही सलामत लौटे, कुछ बीमार होकर वापस आये तो कुछ सदा-सदा के लिए गायब हो गये। लौटकर आने वालों ने जो किस्से सुनाये, उनके चलते दसेक वर्षों के बाद पलायन कम हुआ अथवा उसकी दिशा बदल गयी। पंजाब के बदले लोग दिल्ली, मुम्बई, सूरत, हैदराबाद, बंगलुरु आदि जाने लगे। 

       पलायन की इसी पृष्ठभूमि में नवाबगंज गाँव के तीन युवकों का किस्सा है यह। मांगन मंडल, चुल्हाई मुसहर और कालीचरण पासवान सन 2000 में पंजाब कमाने गये थे। कालीचरण एक साल काम करके लौटा था। मांगन और चुल्हाई के लिए काम का जुगाड़ करके फगुआ में घर आया और वापसी में साथ लेता गया। काली संगरूर के पास नरहन गाँव में किसान लखविंदर सिंह का मुलाजिम था। उसी गाँव के एक अन्य किसान तेगबहादुर खन्ना ने काली की कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी से प्रभावित होकर उसे और दो-चार साथियों को साथ लेते आने का आग्रह किया था। घर जाते समय उसने काली को भाड़ा और राहखर्च के लिए अच्छे-खासे पैसे भी दिये थे। गाँव आकर काली ने अपने काम और वहाँ के किसानों की तारीफों की हवा बाँधकर आधे दर्जन नवतुरिया जवानों को पटिया लिया था। सभी उसके साथ जाने को तैयार भी हो गये थे, किन्तु अधकचरी पढ़ाई कर क्रांतिकारी बने युवा बेरोजगार बजरंगी ने सब गुड़ गोबर कर दिया था। उसने एक-एक करके सबको भड़काने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी।

 

          “ई कलिया के फेर में मत पड़ो मरदे। ऊ तो कमीशन एजेंट बन गिया है। अंटी भर कड़कड़ नोट लेके आया है महाजन से। देखते हो न फुटानी। फगुआ में विलायती दारू का पारटी दिया था की नहीं! … जैसे माल-मवेशी का दलाल होता है न, अरे ‘पैकार’ जी! झुंड का झुंड हाँका लगाते ले जाता है पूरब मुलुक और कसाई के हाथों बेच देता है जब्बह करने को।” 

     काली के मोहपाश में बँधे लड़के अचम्भे से मुँह बाये बजरंगी की बातें सुनते। वह आगे कहता—“अरे हाँ, निछच्छ कसाई ही होते हैं पंजाब के गिरहथ। खुद दाल-रोटी में मक्खन चपोड़कर खाते हैं और यहाँ के बनिहारों को रूखा-सूखा खिलाकर अपने साथ दस-बारह घंटे खटवाते हैं। अब तुम्हरे साथे खुद मालिक खट रहा है तो सुस्ताओगे तुम? साला खैनी-सुरती खाने का भी फुरसत नहीं! किसी तरह जान उपटकर भागा हमरा दोस्त महेशपुर वाला मंगरुआ न हमको उहाँ का सारा खिस्सा-बिरतांत बताया है। कहता था की दिनभर में बिहारी बनिहारों को तीन बेर भर-भर गिलास चाह पिलाते हैं और अपने मट्ठा पीते हैं। चाह मिलने से भुच्च बिहारी बकलोलवा सब मस्त हो जाता है। फुच्च होकर बैल जैसा खटता रहता है। भाग मनाओ की उसको जल्दिये पता लग गिया की जमदूत सब चाह में हफीम घोरकर पिलाता है। निसा में मस्त होकर खटते-खटते मजदूर बीमार पड़ जाता है। जान बचाकर भाग सका तो समझो इस्सर किरपा। नहीं तो वहीं राम नाम सत्त। हमरे बात पर परतीत नै हो तो जरा गाँव-गिराँव में जाकर पता लगा लो की इधर के चार-पाँच बरस में केतना लोग पंजाब कमाने गये, उसमें केतना लोग निपत्ता हो गये?”

फुसलाये गये छः में से चार भड़क गये और साफ मना कर दिया, “देख काली भाय, नै जायेंगे परदेस। उहाँ बैल नियर खटकर मरने से बेस्तर है की घरे का नून-रोटी खायेंगे। और जब नहीं चलेगा तो बम्बय-गुजरात चले जायेंगे। पंजाब त माय किरिया नै जायेंगे!” 

   अंततः चुल्हाई और मांगन को साथ लेकर कालीचरण पंजाब लौटा था। उसके मालिक लखविंदर के घर से तेगबहादु खन्ना का घर सौ डेढ़ सौ कदम ही दूर था, जिसके यहाँ उसने दोनों को काम दिलाया था। लखविंदर और खन्ना दोस्त थे, उनके खेत भी आसपास ही थे। सो तीनों यारों के बारम्बार मिलने के दर्जनों बहाने थे। तीनों नियमित रूप से भोर में एक साथ दिसा-मैदान के लिए दूर खेतों तक टहलते-बतियाते निकल जाते। काम खत्म होने के बाद शाम में भी मिल-बैठते। हफ्ते में एकाध रोज सांझ होने पर गाँव के देसी दारू के ठेके पर बैठकी लग जाती, जिसमें इक्के-दुक्के स्थानीय मजदूर भी शामिल हो जाते थे। 

                 चैत माह के मध्य में तीनों आये थे। आसिन का महीना चल रहा था। पिछली शाम को गाँव में काफी हलचल थी और तरह-तरह के गप्प-किस्सों का बाजार गर्म था। संगरूर के एक सरकारी बैंक में भीषण डाका पड़ा था। आठ डकैतों ने कर्मियों और ग्राहकों को बंधक बनाकर सत्तर लाख रुपये लूट लिये थे। नोटों की गड्डियाँ दो एयर बैग में लेकर बैंक का शटर बाहर से बंद करके आराम से चम्पत हो गये थे। दिनदहाड़े हुई इस वारदात के आधे घंटे बाद पुलिस आयी थी। पूछताछ, फोटोग्राफी, फोरेंसिक खानापुरी आदि करने के उपरांत पुलिस टीम उस दिशा में प्रस्थान कर गयी थी जिधर डाकू तीन मोटरबाइकों से भागे थे। देर रात तक गाँव में इस डाकाकांड की चर्चा होती रही थी।

          सुबह मुँह अँधेरे तीनों यार फारिग होने पानी की बोतलें लिये गाँव के पूरब खेतों की ओर निकले थे। पौ फट रही थी। उषा की लालिमा बढ़ने के साथ दृश्यता बढ़ती जा रही थी। दूर-दूर तक फैले धान के खेतों का सुगापंखी रंग सम्मोहित कर रहा था। क्षितिज की लाली और धरती की हरियाली का घालमेल अद्भुत छटा बिखेर रहा था। लगता था मानों हरी रेशमी साड़ी पर किसी ने गेरू छींट दिया हो। धान की बालियाँ अभी नहीं फूटी थीं। पाँच-छः माह की गर्भिणी स्त्री की कमर की तरह पौधों के गब्भे गदरा गये थे। बाल रवि की पहली किरण फूटने के साथ प्रकृति के सौन्दर्य का नयनाभिराम नजारा प्रकट हुआ। धान की फुनगियों पर ठहरी ओस की बूँदें मोतियों की बेतरतीब माला जैसे अपने मोहपाश में जकड़ने लगी थीं। प्रकृति की इस मनोरम सुषमा को निहारते और बतियाते ये लोग गाँव से एक मील दूर निकल आये थे। खेतों के बीच की मेंड़ पर दूब ओस से भींगी हुई थी। फिसलन भरी राह पर उन्हें सधे पाँव चलना पड़ रहा था। तीनों दो कदम आगे-पीछे एक कतार में चल रहे थे। धान के गदराये खेत में एक दृश्य ने अचानक उन्हें चौंका दिया। हालाँकि इस प्रकार का दृश्य उनके लिए कोई नया नहीं था। कई बार उन्होंने गाँव से लेकर पंजाब तक ऐसे नज़ारे देखे थे। जैसे खड़ी फसल के बीच दो भैंसा या साँढ़ लड़ जाए अथवा नीलगाय या बनैले सूअर का झुंड दौड़ता हुआ गुजर जाए। ठीक वैसा ही बायीं ओर के खेत में दूर तक दिख रहा था। स्वतःस्फूर्त जिज्ञासा में बँधे तीनों यार मेंड़ छोड़कर उस दिशा में बढ़ चले जिधर धान के पौधों के धराशायी हो जाने से तीन-चार ताज़ा पगडंडियाँ बन गयी थीं। दो सौ डेग के बाद जो उन्होंने देखा तो देखते ही रह गये। फिर विस्फारित नेत्रों से एक-दूसरे को ताकने लगे। दो भरे-पूरे एयर बैग आजू-बाजू पड़े थे। कल दोपहर बाद से देर रात तक गाँव में चली चर्चाओं की पृष्ठभूमि में सारा माजरा समझ में आ गया। बैग का चेन खोलकर केवल सुनिश्चित होना था कि वे जो सोच रहे हैं, वही बात है या नहीं। तीनों यारों के चेहरों पर हर्ष मिश्रित रहस्यपूर्ण मुस्कान थी। कालीचरण ने आगे बढ़कर एक बैग का चेन खोला। ठीक जैसी कल्पना थी, वही प्रकट था। बैग में ठूँस-ठूँसकर हजार और पाँच सौ के नोटों की गड्डियाँ भरी थीं। शायद तीनों के मुँह से एक ही बार निकला–‘अरे बाप रे! इत्ता रुपैया!’ 

             मांगन बोला—“ई तो ऊहे सत्तर लाख वाला थैला है रे भाय! डकैतवा सब छुपाकर रखा है। बाद में, साईत आज रात में ले जाएगा।”

           इतना बड़ा अजगुत देखकर उन सबका हगवास सटक गया था। पानी की बोतल सँभालने का भी हवास नहीं था। कालीचरण ने दूसरे बैग का चेन नहीं खोला। तीनों कुछ देर तक बैठकर विचार करते रहे। कुछ निश्चय करके खड़े हुए। चारों ओर नजर घुमाकर मुआयना किया। खेत के आसपास कहीं कोई नजर नहीं आ रहा था। दो फर्लांग दूर उत्तर दिशा में स्टेट हाइवे पर इक्के-दुक्के वाहनों की आवाजाही जरूर थी। योजनाबद्ध ढंग से दोनों बैग उठाए मेंड़ पकड़कर वे दक्षिण की ओर चल दिये। बैग कन्धे से नहीं लटकाकर हाथों में ले लिये थे ताकि दूर से दिख न सकें। तकरीबन एक मील दूर एक खेत के बीचोंबीच एक झड़बेरी की झाड़ी थी। कन्हाई और मांगन रास्ते पर ही रुक गये। दोनों बैग लिये हुए कालीचरण बहुत सावधानी से कदम बढ़ाते झाड़ी की ओर गया ताकि धान के पौधे न गिरें, आवाजाही का कोई लक्षण न दिखे। झाड़ी छोटी मगर घनी थी। दोनों बैग झाड़ी के मध्य अच्छी तरह छिपाकर वह लौट आया। फिर तीनों चुपचाप सिर झुकाये उलटी दिशा में चल पड़े। इस क्रियाकलाप के बाद उनके पास पानी की केवल एक बोतल बच गयी थी। उन्हें याद नहीं रहा कि अन्य दो बोतलें कहाँ रह गयीं। दो-तीन फर्लांग अलग जाकर तीनों यारों ने टट्टी की और एक ही बोतल के पानी से पनछुआ किया। रास्ते भर मंत्रणा करते वे गाँव लौटे। जाते-आते डेढ़ घंटे से अधिक बीत गया था, इस कारण मालिकों ने जवाबतलब भी किया जिसे कुछ बहाने बनाकर उन्होंने टाल दिया। इस समय धान के खेतों में दवा छिड़कने का काम चल रहा था। आज कालीचरण काम पर नहीं गया। तेज सिरदर्द का बहाना बनाकर बिछावन पर पेटकुनिया दिये लेट गया।

              शाम में काम से लौटकर मांगन और चुल्हाई काली से मिलने आये। फिर तीनों एक साथ घूमने के बहाने गाँव से बाहर निकल गये। स्टेट हाइवे के किनारे निर्जन स्थान देखकर बैठे और फुसफुसाकर मंत्रणा करने लगे। योजना तय हो जाने पर तीनों अपने ठिकानों पर वापस आ गये। रात का भोजन करने के उपरांत एक-डेढ़ घंटे में गाँव में निस्तब्धता छा गयी। दोनों मलिकारों का परिवार भी गहरी नींद में सो गया। तीनों  यारों ने अपने-अपने कपड़े कैनवास के थैलों में समेटे, साथ में अपने खाली एयर बैग लटकाये बहुत सावधानी से दबे पाँव निकलकर पूर्वनिर्धारित स्थान की ओर निकल लिये। रास्ते में एकाध कुत्तों ने भौंककर जैसे प्रश्न पूछा कि ‘इतनी रात में कहाँ?’ किन्तु बिना टोकाटाकी के तीनों सरसराकर निकलते चले गये। बैग मिलने वाली जगह से सुरक्षित दूरी बनाते लम्बा चक्कर लगाकर वे एक घंटे बाद वहाँ पहुँचे जहाँ झाड़ी में नोटों से भरे बैग छिपाये थे। दोनों बैग झाड़ी से निकालकर खोला और अपने साथ लेकर आये तीनों खाली बैगों में नोटों की गड्डियाँ भर लीं। पाँच सौ की एक गड्डी खोलकर अंदाजन तीन हिस्सों में बाँट लिया। गड्डियों के ऊपर कुछ कपड़े डालकर बैग बंद कर दिये। खाली हुए पुराने दोनों बैगों को तोड़-मड़ोरकर झाड़ी के अन्दर ठूँस दिया। यह सब करते-कराते रात का एक बज चुका था। वहाँ से निकलकर वे स्टेट हाइवे पर आ गये और पैदल ही संगरूर की ओर चल पड़े। आगे या पीछे से कोई वाहन आते देखते तो सड़क से नीचे उतरकर गड्ढे में दुबक जाते। संगरूर के बस अड्डे पहुँचकर उन्हें दो घंटे इंतजार करना पड़ा। दिल्ली के लिए भोर पाँच बजे उन्हें बस मिल गयी। लगभग दस बजे दिल्ली पहुँचकर उन्होंने जमकर पेटपूजा की और फिर ऑटोरिक्शा लेकर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन आ गये। दोपहर दो बजे जेनेरल टिकट लेकर उन्होंने दिल्ली-गौहाटी ट्रेन पकड़ ली। दुर्गापूजा के लिए घर लौटने वालों की भीड़ से जेनेरल बोगी खचाखच भरी थी। टॉयलेट की गली में किसी तरह जगह बनाकर तीनों यार बैगों पर बैठ गये। आँखों-आँखों में ही उनकी रात कट गयी। अगले दिन तीसरे पहर वे नवगछिया स्टेशन पर उतरे, क्योंकि उस गाड़ी का कुर्सेला में ठहराव नहीं था।

              नवगछिया से कुर्सेला आने में उन्होंने जानबूझकर देरी की। रात भींगने पर चौक पहुँचे और एक टमटम रिजर्व करके गाँव आये। सड़क छोड़कर गाँव के बाहर बहियार की ओर निकल गये। नोटों से भरे बैग वे घर नहीं ले जाना चाहते थे। उन्हें कुछ दिनों के लिए निरापद ढंग से छिपाकर रखना जरूरी लग रहा था। पर छिपाएँ कहाँ? बहियार का चप्पा-चप्पा उनका देखा-सुना हुआ था। चारों ओर मक्के की पकी फसल लगी हुई थी। सभी खेत दो-चार दिनों में खाली हो जाने वाले थे। उतरबारी बहियार के ढाब से पटुआ के सड़ने की दुर्गन्ध आ रही थी। ढाब के किनारे किसानों ने जगह-जगह पटसन छुड़ाकर सनाठी के टाल लगा रखे थे। खचाखच तारों से भरे आसमान से आती मद्धम रोशनी में सफ़ेद सनाठियों के कतारबद्ध टाल चाँदी जैसे चमक रहे थे। सनाठी के टाल सूखने के लिए कम-से-कम  एक माह यों ही रहने वाले थे। ‘हाँ, यह ठीक है! यही ठीक रहेगा!’ इन टालों में बैग छिपाकर वे दो-तीन सप्ताह निश्चिन्त हो सकते थे। उन्होंने खोजकर सबसे बड़े टाल का चुनाव किया। कुछ विचार-विमर्श करके एक बैग से हजार रुपये की एक गड्डी निकाल ली। कालीचरण ने चौंतीस तथा मांगन और चुल्हाई ने तैंतीस-तैंतीस नोट बाँट लिये। सनाठी के गट्ठरों को हटाकर रास्ता बनाया और टाल के बीचोंबीच ऊपर-नीचे तीनों बैगों को जमाकर गट्ठरों को सावधानी से यथावत खड़ा कर दिया। चारों ओर घूमकर मुआयना किया। इत्मीनान हो जाने पर अपने-अपने घर चले गये। किन्तु, चलते-चलते कालीचरण ने चेताया—“देख भाय, माय किरिया खाओ की अपना चाल-ढाल सम्हार कर रहियो। बोल-बतियान में ऊँचा-नीचा एकदम नै होवे। ढेर उधियाना मत। ऊ बजरंगिया से तो खुबे चेत के बतियाना। स्साला लालबुझक्कड़ है। चूक हुआ त धन जैबे करेगा, जेहल-दामुल होगा सो फाव में। खाओ किरिया!  हाँ, एक बात और की घर आने का कौनो कारन पूछे त कहना की दुर्गापूजा मेला देखने आये हैं। सुकरतिया-छठ करके चले जाएँगे।” हाथ पर हाथ धरकर तीनों ने एक साथ कहा—“माय किरिया!”

                भोरेभोर दिशा-मैदान के लिए निकलकर तीनों ने बारी-बारी से उस जगह का बारीक़ निरीक्षण कर लिया था। जैसा कि अंदेशा था, गाँव में उनके साथ टोकाटाकी शुरू हो गयी थी। कोई कूट काटता—“की हो, पंजबिया मलिकार भगा दिया की?” कोई पूछता—“चोरी चमारी करके भागे हो का जी? एतना जल्दी काहे लौट आये?” तीनों का रटा-रटाया एक ही जवाब होता, “पूजा में आये हैं, छठ करके चले जाएँगे।”

साठ के दशक में सीलिंग एक्ट पास होने के बाद इस क्षेत्र के बड़े किसान औने-पौने दाम में जमीनें बेच रहे थे। इस कारण खरीदने वाले कम और बेचने वाले अधिक थे। किन्तु, अस्सी के दशक में स्थिति विपरीत हो गयी थी। अब इस इलाके में बड़े किसान जमीन कम बेच रहे थे। खरीदने वाले अधिक और बेचने वाले कम हो गये थे। व्यापार करने वाले, सरकारी नौकरी करने वाले और परदेश जाकर कमाने वाले नये खरीदार पैदा हो गये थे। इस कहानी के तीनों हीरो खेतिहर मजदूर परिवार में जनमे युवक थे। उन्होंने मजदूरों की मज़बूरी भोगी थी और जमीन वाले मलिकारों की ठाठ भी देखी थी। उनके सुखी होने के सपनों के केन्द्र में जमीन ही होती थी। साध थी कि ‘पैसे इकठ्ठा करूँ तो जमीन खरीदूँ’। यह साध इतनी प्रबल थी कि अपने दोनों साथियों को सतर्कता बरतने के लिए ‘माय किरिया’ खिलाने वाला कालीचरण खुद अपने ही ऊपर काबू नहीं रख सका। पंजाब से लौटने के तीन-चार दिन बाद ही गाँव में हल्ला मच गया कि ‘कलिया जमीन खोज रहा है खरीदने को।’ इसके बाद रोज नया-नया शगूफा। आज फलाने बाबू से जमीन बेचने की बात कर रहा था तो कल चिलाने बाबू को बेयाना देने की कोशिश कर रहा था। फिर मांगन के विषय में हवा उड़ी कि वह भी जमीन खरीदना चाहता है।

             बजरंगी को मसाला मिल गया। उसके सूचना-भंडार में दर्जनों उदहारण थे कि किस-किस गाँव या बाजार का कौन-कौन बंदा दिल्ली, बोम्बे, सूरत, भटिंडा से जेवरात और नगदी चुराकर भागा था और वहाँ की पुलिस पकड़कर ले गयी थी। सब आजतक निपत्ता हैं। जरूर इन तीनों ने भी पंजाब में बड़ा हाथ मारा होगा। तभी तो फगुआ के बाद गया और दशहरा के पहले ही अचानक लौट आया है। बजरंगी हाथ धोकर तीनों के पीछे पड़ गया। सामना होते ही पूछ बैठता—“क्या जी, केतना जमीन चाहिए? कित्ता रुपया लाये हो कमाकर?” उसने चुल्हाई से भी पूछा, किन्तु वह साफ़ नट गया—“बजरंगी भाय हमरे पास कहाँ है पैसा जो जमीन कीनेंगे?” मगर गाँव के बनिया बिक्कू साव ने तो जैसे अफवाहों पर मुहर ही लगा दी यह बात फैलाकर कि एक दिन चुल्हाई उसके पास “पाँच ठो कड़कड़िया हजरटकिया नोट लेकर आया था खुदरा कराने रे भाय!” एक सप्ताह के अन्दर गाँव का बच्चा-बच्चा जान और मान चुका था कि तीनों बड़ा काण्ड करके बहुत धन लेकर पंजाब से आये हैं। टोले के चौकीदार के मार्फ़त थानेदार गोपीनाथ राय को भी खबर मिल गयी। राय जी ने एक सिपाही भेजकर तीनों हसामियों को थाना तलब किया। सिपाही भी अनुभवी घाघ था। गाँव से थाना तक जिरह कर-करके तीनों के दिमाग का दही बना डाला। थाना पहुँचने तक तीनों का माथा भाँय-भाँय करने लगा था। राय जी बरामदे में कुर्सी टेबुल लगाये बैठे थे। सामने पड़ते ही गरजे—“का हो पंजबिया महाजन लोग, केतना जमीन खोज रहल बाड़।। ख़रीदे खातिर? मिलल की नाहिं? केतना रुपैया ले के आइल बाड़।।।हो पंजाब से?”

“नै सरकार, पाँच-दस कट्ठा के जुकुर दस-बीस हजार पेट काट के जमा किये हैं। कौनो गलत काम नहीं किये हैं मालिक। दाय-दुसमन सब उड़प्पा उड़ाके बदलाम कर रहा है हजूर।” कालीचरण ने साहस बटोरकर जवाब दिया।   

        “ढेर धुरबागिरी मत बतिआओ हरामी के जनों। मारेंगे चार सोंटा चूतड़ पर की होस ठेकाना लाग जाई। जे माल उड़ा के लइले बाड़…से ले आब…न त घर कुरकी करवा देहब स्साले सभन। लाओ ऊहाँ के नाम-पता जहँवा काम करता था। तुरंते फोन करके जनमकुंडली खोल देते हैं।”                         

          “हजूर किरिया खिलबा लीजिए महंथ बाबा के छू के। झूठ नहीं बोलते हैं मालिक।” मांगन ने मिमियाकर जवाब दिया था।

         “ठिक्के है। जाओ अभी सब। दो दिन के मोहलत देते हैं। परसूं आकर पूरा बिरतांत सुनाओ आउर माल हाजिर करो, पूरा। भाग स्साले!” 

         काँपते-कलपते तीनों घर लौटे थे। एक-दूसरे को ढाढ़स देते, अपनी बातों पर अटल रहने का संकल्प दुहराते। उस शाम डर भगाने के लिए कलाली आकर तीनों ने खूब पी ली थी। इधर बजरंगी और थानेदार, दोनों ने उनके पीछे पेशुआ खबरी लगा दिये थे, जो तीनों की हरेक गतिविधि पर नजर रखे हुए थे—हगनी-मुतनी तक की जानकारी जुटायी जा रही थी उनकी। उन्हें इस बात की भनक तक नहीं थी। अलबत्ता वे गुप्तचर की तरह पूछताछ करने वालों से खासा परहेज करने लगे थे। दशहरा के दिन गाँव के बच्चे-बूढ़े, औरत-मर्द सभी कुर्सेला का मेला देखने आये थे। सभी अपने-अपने कुनबे के साथ थे। चुल्हाई कुँवारा था। वह अपनी माँ को लेकर मेला आया था। साथ में उसका एकउमरिया चचेरा भाई भुजंगी भी था। दोनों लंगोटिया यार थे। भुजंगी तीन-चार दिनों से दारू पिलाने की जिद्द कर रहा था। आज दोनों ने मेला से लौटती में पीने का निश्चय किया था। अपनी माँओं को पड़ोसियों के साथ घर भेजकर दोनों चौक पर रुक गये। 

             रायबहादुर के हवाई अड्डा के पछियारी कोने पर मीरगंज रोड के किनारे सरकारी कलाली थी, जिसमें 50 और 70 नम्बर की देसी दारू मिलती थी। अमूमन रात के आठ बजे तक कलाली बंद हो जाती थी, पर मेले-ठेले में समय की पाबन्दी टूट जाती। चुल्हाई और भुजंगी रात आठ बजे कलाली पहुँचे। फूस के घर में आगे दुकान और उसके पीछे बिना फर्नीचर के एक बड़ी कोठरी थी; बैठकी के लिए एक कोने में कुछ चटाइयाँ गोल करके रखी रहती थीं। उस अंदरूनी हिस्से में दुकान की बिना ग्रिल की खिड़की थी। कोठरी के पिछले हिस्से में एक छोटा दरवाजा और उसके बाहर झलिया माय की चखने की दुकान थी। झलिया माय इलाके भर में अपने रंगीन अतीत को लेकर प्रसिद्ध थी। थी तो कहने को मोसमात, लेकिन फैशन में कोई कटौती नहीं थी। लगभग पचास की वयस, गदराया साँवला बदन, तीखे नैन-नक्श और सबसे ऊपर तीखी कटार-सी घायल करने वाली उसकी बोली। उससे मोलभाव या बहस करते ‘शौकीनों’ की पथरी सटक जाती थी। उसकी दुकान में घुंघनी, मौसमी सब्जियों के पकौड़े और मछली फ्राई का चखना एकदम रेडी रहता था। मनमाना दाम और मनपसंद स्वाद। दारू के कारण चखना बिकता और चखने के कारण दारू की बिक्री बढ़ जाती थी।

        चुल्हाई और भुजंगी जब मयखाना पहुँचे तब केवल तीन ग्राहक कोठरी में पहले से बैठे थे। अलग-अलग दो चटाइयाँ बिछी थीं। एक, अकेला बैठा मस्ती में कोई लोकधुन गुनगुना रहा था। उसके सामने बोतल, गिलास, चखना कुछ भी नहीं था। उसका कोटा पूरा हो गया था और एकदम से टुन्न होकर दूसरी दुनिया की सैर कर रहा था। दूसरी चटाई पर दो जने आमने-सामने बैठकर अभी दूसरी बोतल शुरू कर रहे थे। बीच में सखुआ के पत्तल पर चखना, बगल में दो भरे गिलास और आधी खाली बोतल खड़ी थी। भुजंगी ने कोने से एक चटाई लेकर उन तीनों से थोड़ा अलग फैला दी। तबतक चुल्हाई पीछे जाकर मछली फ्राई का चखना ले आया। फिर 50 नम्बर की एक बोतल और दो गिलास ले आया। झालदार चखने के साथ देसी दारू की कड़वाहट घोलकर दोनों इत्मीनान से पीने लगे। एक बोतल समाप्त करके दूसरी बोतल ली गयी। तीसरा गिलास खाली करके चौथा भरने तक दोनों पर नशा हावी हो गया था। भुजंगी को आज बहुत दिनों के बाद भरमन पीने का मौका मिला था। चौथे गिलास के बाद भी उसने तीसरी बोतल लेने का अनुरोध किया—“चुल्हो भाय, एक बोतल आरू लो न भाय! कमाकर आये हो। पैसा के कोनो कम्मी है किया?”

“पैसा के कम्मी त नै है मरदे, मतुर बहुते निसा चढ़ गिया है। घरो जाना है की नहीं? अब बस करो, नहीं त रस्ता में ढनमनाओगे।” चुल्हाई ने समझाने का जतन किया। पर भुजंगी हठ पर उतर आया था—“तोरा हमरे किरिया चुल्हो भाय! आज आरू पीये दो अघाकर।”     

       अंततः चुल्हाई दूसरी बोतल ले आया 70 मार्का। उसकी इतनी चेतना बची हुई थी कि इस बार अपेक्षाकृत हल्की दारू ली। फिर दोनों पीने लग गये। पाँचवाँ गिलास खत्म होने तक दोनों की बोली लड़खराने लगी थी। होश जवाब देने लगे थे। लटर-पटर आवाज में बातें होने लगीं। भुजंगी सवाल पर सवाल किये जाता और चुल्हाई बिना उकताए-झुंझलाए जवाब दिये जा रहा था। पता नहीं, दोनों क्या-क्या और कितना बतियाते रहे थे? पहले वाले तीनों पियाँक उठकर चले गये तब कलाल ने इन दोनों को हाँक लगायी—“चलो भाई, दुकान खाली करो! अधरतिया हो गया है। जाओ अपने घर। हमको भी फुरसत दो।”   

      दोनों एक-दूसरे को सहारा देकर उठे और डगमगाते क़दमों से पक्की सड़क पर चढ़ गये। मेला-ठेला का समय। संयोगवश उन्हीं के गाँव का एक टमटम मिल गया जिसपर टोले की ही दो सवारियाँ बैठी थीं। गिरते-पड़ते दोनों भाई टमटम पर सवार हो गये। पहले से बैठे दो लोगों ने आधे घंटे के रास्ते में इन दोनों से घनेरों सवाल पूछे थे और इन्होंने पता नहीं क्या-क्या जवाब दिये थे? 

           अगली सुबह चुल्हाई की नींद माँ के झकझोरने से खुली थी। तब सूरज ताड़ के पेड़ के ऊपर तक चढ़ आया था। आँगन के टटिया के बाहर काफी हबगब था। आँखें मलते बाहर निकला तो सन्न रह गया। चार राइफलधारी सिपाहियों के साथ कालीचरण और मांगन को तथा उनके पीछे दर्जनों लोगों की भीड़ देखकर उसका माथा घूम गया। एक सिपाही ने उसका गट्टा पकड़कर आगे खींचा और दोनों यारों के बीच खड़ा कर दिया—“चलो सभन, बड़ा बाबू बुलाये हैं!” काली और मांगन इसे खा जाने वाली नज़रों से घूर रहे थे। वे बोले कुछ भी नहीं, किन्तु उनके हावभाव से चुल्हाई को पूरा माजरा समझ में आ गया था। वह भींगी बिल्ली बना सहमा-सिकुड़ा उनके साथ चल रहा था। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया था। पैदल चलते रास्ते भर वह अपने दिमाग पर जोर डालकर कल रात की बातें याद करना चाह रहा था, पर उसे कुछ याद नहीं आ रहा था। 

             इस बार थानेदार के सामने तीनों को बिल्कुल अपराधियों के समान पेश किया गया। राय जी अपने चेम्बर में बैठे थे। मुंशी जी थानेदार के सामने वाली कुर्सी पर थे। दोनों में कुछ गुफ्तगू चल रही थी। सामने टेबुल पर लाल जिल्द वाली कुछ फाइलों के बगल में तीन हाथ लम्बा तेल पिलाया गिरहदार हरौतिया बाँस का भारी डंडा पड़ा था। लगभग दो दर्जन तमाशबीन भी साथ आये थे जिन्हें हाता के बाहर ही रोक दिया गया था। तीनों को धकियाकर सिपाहियों ने चेम्बर में घुसा दिया। हसामियों के अन्दर घुसने पर मुंशी जी बाहर चले गये। राय जी ने बारी-बारी से तीनों की ओर आँखें तरेरकर देखा, फिर कुटिल मुस्कान के साथ बोले—“का हो हरामी के पिल्ले सभन, अड़तालीस घंटे का समय दिये थे सो भुला गये। मगन हो गये फुटानी करने में। स्साले, छुछुंदर के माथा पर चमेली का तेल! जानते हो की नहीं, कुत्ता को घी नहीं पचता है! ‘धनबोखारी’ बरदास करना सब्भे के बस में नहीं नु होता है। अब सीधे मुँह बेयान करोगे की तेरहम बिद्या लगाना पड़ेगा?” कहकर उन्होंने टेबुल पर पड़े डंडे की ओर देखा। तीनों की घिग्घी बंध गयी थी।       

      “नै हजूर, माय-बाप। कुच्छो बात नहीं है। पता नै ई चुल्हैया किया-किया बोल गिया दारू के निसा में?” काली और मांगन जैसे कोरस में बोले।   

      “चोप्प स्साले! बोल फटाफट!” तमतमाकर खड़े हुए और डंडा उठाकर पहले काली, फिर मांगन और चुल्हाई की पीठ पर एक-एक दे मारा।                                                 “अगे माय गे…बाबू हो…! जान बकस दीजिए बाबू…!” तीनों गाय के समान डिकरने लगे। जमीन पर बैठकर काँपने लगे। कोई उपाय नहीं था। और डंडे खाने का ताब भी नहीं था। पूरी पोल-पट्टी खुल चुकी थी।         

        “बताते हैं सरकार!”   

         “बोल, कहवाँ डाका डाला? केत्ता माल बटोरा? कहवाँ रक्खा है? सारा होलिया बेयान करो मादर…!”                                                                                              “डाका नै डाले हैं मालिक। डकैती किया हुआ धन चुराकर भागे हैं संगरूर से… …!” काली पूरा ‘खिस्सा-बिरतांत’ बताये जा रहा था। राय जी के मुँह-नेत्र फैलते जा रहे थे। उन्होंने धमकी भरे कड़े स्वर में बस इतना कहा—“ठीक है। मुदा किसी से मत कहियो जे केतना रुपैय्या था। कहना की गिनबे नहीं किये थे। समझे की नहीं!” 

          तीनों को थाने की जीप में पिछली सीट पर बैठाया गया। केवल मुंशी और नवाबगंज के चौकीदार को साथ लेकर थानेदार बरामदगी के लिए मौके पर निकल गये। तमाशबीनों की भीड़ पीछे छूट गयी। गाड़ी सीधे कच्ची सड़क पकड़कर बहियार की ओर उड़ चली। चालक को मौके की नजाकत का अहसास था। कालीचरण ने ढाब के किनारे सनाठी के उस बड़े टाल की तरफ इशारा करके गाड़ी रुकवायी। यंत्रचालित-से तीनों ने सनाठियों के गट्ठर हटाकर तीनों बैग निकाले। बैगों को बीच वाली सीट पर रखकर राय जी वहीं बैठ गये। मुंशी जी को अगली सीट पर बैठने को कहा और बिजली की गति से गाड़ी वापस लौट गयी। इक्के-दुक्के लोग ही यह वाकया देख पाये। मुजरिमों को कैदी वाली कोठरी में ढकेलकर ताला लगा दिया गया। राय जी ने आदेश दिया—“मुंशी जी, हसामियों को खाना-पानी दिलवाइए। और हाँ ख़बरदार, चेंबर में केहू नहीं आवेगा। माल असबाब का मिलान किया जावेगा। जब हम बोलायेंगे तब पंचनामा और जब्ती का कार्रवाई करने आइयेगा। समझे!” तीनों बैग अन्दर रखवाकर उन्होंने चेम्बर का दरवाजा बंद कर लिया। लगभग एक घंटा बाद दरवाजा खुला, फिर मुंशी जी को स्टेशन डायरी लेकर बुलाया गया। नोटों की गड्डियाँ टेबुल पर सलीके से सजी थीं, हजार और पाँच सौ की अलग-अलग। खाली एयर बैग एक तरफ और कुछ कपड़े दूसरी तरफ फर्श पर पड़े थे। मुंशी जी डायरी खोल कुर्सी खींचकर सामने बैठ गये और राय जी की ओर देखने लगे। राय जी ने बोतल खोलकर कुछ घूँट पानी पीया, फिर खखारकर गला साफ़ किया और डिक्टेशन देने लगे—“लिखिए, माल बरामद—केनवास के तीन पुराने एयर बैग; दो काला, एक भूरा। तीन टीशर्ट; एक लाल, एक पीला और एक सफ़ेद। दो भूरा फुलपैंट और एक सफ़ेद पजामा। एक गेरुआ गमछा। नोटों की गड्डियाँ—पाँच सौ की एकतालीस, हजार की एगारह। बरामद कुल नगद साढ़े एकतीस लाख रुपये।”

        “केतना सर? साढ़े एकतीस!” मुंशी जी चौंके। “गाँव में त सत्तर लाख के हल्ला है?”  राय जी का मुँह तीता हो गया। “इस्स, जे बरामद हुआ है ओही नु लिखियेगा की हल्ला-गुल्ला लिख डालियेगा, मुंशी जी? आउर बाकी सब हसामियों से पूछताछ करके खानापूर्ति कर लीजिये डायरी में।”                                                                        वायरलेस बाबू को बुलाकर आदेश दिया—“संगरूर पुलिस को ट्रंक कॉल करके खबर दिया जाए की बैंक रोबरी का साढ़े एकतीस लाख रुपैय्या के साथ तीन मुजरिम कुर्सेला पुलिस के हिरासत में हैं।” 

         अगले दिन एक सेक्शन फ़ोर्स लेकर खुद थानेदार गोपीनाथ राय बरामद नगदी और सामानों के साथ तीनों मुजरिमों को जिला मुख्यालय कटिहार ले गये। मुजरिमों को जेल में और नगदी सहित सामानों को मालखाना में जमा किया। एसपी साहब से मिलने गये तो उन्होंने शाबाशी देते हुए मुस्कुराकर पूछ लिया—“गोपीनाथ केवल साढ़े इकतीस लाख? संगरूर पुलिस तो बोली सत्तर लाख की डकैती थी!”

         “ना हजूर, एतने बरामदगी है। झूठ बोलें त बेटा काम न आवे सर।” राय जी यह बोलते हुए अन्दर से सिहर गये थे।

         चार दिन बाद संगरूर से पुलिसदल कुर्सेला पहुँचा। मुजरिमों के घर और बरामदगी के स्थान का मुआयना किया। गवाहों के बयानात दर्ज किये। पुलिस डायरी की प्रतिलिपि ली और कटिहार रवाना हो गया। वहाँ कागजी औपचारिकताएँ पूरी करके नगदी के साथ बरामद सामान और मुजरिमों को लेकर वापस चला गया।

करीब ग्यारह साल के बाद तीन में से दो यार घर लौटे थे। उनका पूरा हुलिया बदल गया था। उन्होंने बताया कि पंजाब की पुलिस ने दो दिन उनकी भरपूर कुटाई की थी। फिर अदालत में पेशी के बाद उन्हें बारह बरस की सजा हुई थी। छः महीने के अन्दर ही खून की उल्टियाँ करते-करते कालीचरण मर गया था। ये दोनों अच्छे आचरण के कारण एक साल पहले जेल से छूट गये थे। और… तबतक इधर गाँव में चुल्हाई की माँ गुजर गयी थी, कालीचरण की जोरू अपने बेटे के साथ नैहर भागकर वहाँ अपने बचपन के सखा से चुमौना कर चुकी थी। मांगन की बहू अपनी बारह साल की बेटी के साथ अपनी बुढ़िया सास की सेवा कर रही थी

.

पवन कुमार सिंह

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं। सम्पर्क +919431250382, khdrpawanks@gmail.com
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
नीलकंठ पाठक
नीलकंठ पाठक
1 month ago

एक साथ कई समस्याओं की ओर इशारा करते हुए एकदम ठेठ भाषा में सटीक बातें कही आपने. समस्याओं को उठाते रहना और समाज को दर्पण दिखाते रहना लेखक का धर्म है, आपने उसका शत प्रतिशत निर्वाह किया है
बजरंगी भडका नहीं रहा है सही कह रहा है. उसकी
बातों ने मुझे मेरे गांव का शनिचरा याद दिला दिया था जो हट्ठा कट्ठा शरीर लेकर दिल्ली कमाने गया था और लौटा टी बी लेकर. अभी गाँव में बाप दादा का जमीन बेचकर दारू पी रहा है.
उम्मीदें बढती जा रहीहैं आपसे, बहुत बधाई नई कहानी के लिए.

Back to top button
1
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x