मूल्यांकन

‘11से 13 के बीच’

 

नबीला के हमसफ़र बनने की, विभा रानी की  ‘बहादुर कहानी’

स्त्रीमन की परत-दर-परत खोलने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है विभा रानी का कहानी संग्रह द=देह, दरद और दिल। लेकिन इस संग्रह की एक कहानी कुछ अलग है, नबीला की कहानी! क्योंकि नबीला ‘अलग’ है, कहने वाले कहते रहे कि बुर्का पहनकर अपने को अलग-थलग दिखाने का काम कर रही हो, बुर्का न डालोगी तो उनकी औरतों जैसे लगोगी’ हालाँकि नबीला का प्रश्न भी तो वाजिब है कि क्यों लगूं उनकी औरतों जैसे? अपनी औरतों जैसी क्यों नहीं? नबीला का स्त्रीमन स्त्री-अधिकारों से एक कदम आगे की यानी मानवीयता की बात करता है उसे लगता है जिस मुल्क में वह रह रही है, जो उसका मुल्क है, उसकी पहचान है, अब क्योंकि उनकी पहचान को रेखांकित कर ‘अलग’ कर दिया जा रहा है और देश की सीमा से उन्हें निकालने का जो ‘पराक्रमी उपक्रम’ किया जा रहा है उसने सारी कौम को ही कहीं अपराधी अनुभव करवाया जा रहा है।

विभा रानी के अनुसार ‘नबीला यानी एक कामियाब मुसाफिर, नबीला एक टीचर, नबीला एक मेहनती इंसान, नबीला एक औरत, बुर्के वाली औरत! बुर्का जात तो बता ही देता है’ कथानक में संवादों की मज़बूत कड़ी पिरोती, आरम्भ से ही कहानी अपने मज़बूत इरादों से आगे बढ़ती है तो आप भी संवादों के सफर में शामिल होना चाहतें है और इस सफर में नबीला यानी ‘कामियाब मुसाफिर’ बनने की जद्दोजहद शुरू करते हैं। नबीला की, चिंता और बेचैनी यदि समझ गये, तो समझिये नबीला का सफर वास्तव में कामयाब हो गया।

वर्तमान साम्प्रदायिक रंग में रंगे सामाजिक-राजनैतिक परिवेश में अपने ‘रंग-विशेष’ को बचाने की ‘बहादुर कहानी’ ‘11से 13 के बीच’। समाज में जो घट रहा होता है वही साहित्यकार को प्रेरणा देता है संवेदनशील प्राणी होने के नाते बदलती हवा से वह भी बेचैन होता है। प्रतिकूल माहौल से टकराना आसान तो नहीं रहा होगा विभा रानी के लिए भी, क्योंकि विपरीत दिशा में जाने में संघर्ष कहीं दुरूह होता है। साहित्य के प्रति सामाजिक प्रतिबद्धता निभाते हुए यह कहानी, नबीला और उसकी कौमपर आरोपित संकीर्ण साम्प्रदायिक बंधन तथा राजनैतिक चक्रव्यूह से उत्पन्न बेबस माहौलका कच्चा चिट्ठा बेबाकी से सामने रख देती है।

विभा रानी

लेखिका चाहती है कि हम भी नबीला के सफ़र में हमसफर बनें और एक बार जब आप शामिल होतें हैं तो, अंत तक बल्कि कहानी खत्म होने के बाद भी उसके हमसफर बने रहना चाहते हैं, जब तक कि उसे उसकी मंजिल न मिल जाए, इसी संवेदना को सम्प्रेषित करना विभा रानी का मूल उद्देश्य भी है। जिस रेल से नबीला सफर कर रही है, भारत या विश्व का प्रतीक बन जाता है, जहाँ आज का हर मुसलमान अपने अस्तित्व को बचाने में लगा हुआ है, आपके भीतर कौतुहल बना रहता है कि अब क्या होने वाला है, कोई मॉब लिंचिंग तो नहीं होने वाली? धीरे-धीरे समझ आता है कि नबीला की मानसिक मॉबलिंचिंग हो रही है।

यद्यपि जाति के नाम पर भारतीय समाज सदियों बटा हुआ ही है, लेकिन धर्म के नाम पर, 47 में जो बंटवारा हुआ, 13 दिसम्बर 11 सितम्बर 15 मार्च आदि तारीखों के बाद और भी गहराता गया। इस गहराई को नापने की कोशिश में नबीला की ऊर्जा को सोखती जा रही है अब्बू आपके जमाने की बात और थी रोटी बेटी का साथ ना होते हुए भी दिलों में खाई व खंदक नहीं खुले हुए थे…’ विभा रानी भारतीय समाज की मानसिकता को कितनी सरलता से विश्लेषित कर जातीं हैं ‘थे मेरी बच्ची खाने की प्लेट, पानी के गिलास को आग में जलाकर पाक किया जाता था, छोटी जाति के लोगों के साथ भी वे वैसा ही व्यवहार करते थे कितना बड़ा ही ह्यूमनिलेशन होता था’

उनके लेखन की विशेषता है कि समाजशास्त्री की भान्ति वे स्थितियों को जटिल नहीं अपितु सहजता से व्याख्यायित करतीं हैं, ताने जो मुसलामानों को सुनने ही पडतें हैं किइस्लाम…इस्लाम करके एक देश तो ले लिया तुम लोगों ने! अब यहाँ पर भी हक जमाते हो उधर भी खीर इधर भी हलवा वाह, भाई वाह!…साले सब खाएंगे इंडिया का गाएंगे पाकिस्तान का… जाने अनजाने नबीला को यह सब सुनना पड़ता है’ नबीला इसके लिए और किसी को नहीं बल्कि अपने अब्बू के अब्बू यानी दादा को ही दोष देते हुए कहती है ‘अब्बू के अब्बू यानी दादा (पाकिस्तान) चले गये होते तो आज नबीला को यह सब ना सुनना पड़ता। 6 दिसम्बर के दंगे की दोषी वह करार ना दी गयी होती! 15 मार्च के बम फूटने का इल्जाम उस पर न मढ़ा गया होता। 11 दिसम्बर 13 दिसम्बर नंबरों का सिलसिला थमता नहीं’

नबीला बेचैन तो है पर उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा, हर चुनौती का सामना करने की प्रेरणा भी देता है। मुस्लिम होने की पहचान उनके आइकंस यानी टोपी और बुर्के आदि के कारण वे प्रताड़ना झेल रहे हैं, अपनी पहचान बनाए रखने के लिए पल-पल संघर्ष करना पड़ता है। बुर्का पहनने से तुम तुम्हारी जात, औकात, मजहब सब मालूम पड़ जाते हैंबुर्क न डालोगी तो उनकी औरतों जैसी लगोगी

क्या नबीला का प्रश्न बहुत वाजिब नहीं कि वह दूसरों जैसी क्यों दिखे जबकि उसका अपना वजूद है फिर अपनी पहचान को क्यों छिपाए वह, जब भारत के नामचीन लोगों की बेटियां बुर्के में आईं तो उन्हें बैकवर्ड कहा गया नबीला के माध्यम से लेखिका बहुत सरलता से समझाना चाहती है कि बुर्का भी सर पर पल्लू डाले रहने या घूंघट काढ़े रहने की आदत पड़ी रहती है ना कुछ कुछ वैसे ही है पर लेकिन देश की ‘फिजा कितनी तेजी से बदल रही है खुद को मुसलमान बताने में हिचक आती है, …तब राह चलते नफरत के बगुले नहीं फूटते थे, देखते ही लफ्ज़ों के बलगम नहीं फेंके जाते थे …स्कूल, सड़क, बस, लोकल ट्रेन- जैसे सबकी निगाहें घूरती निगाहों का निशाना है… दिन-रात तीखी नजरों के सामने से एक बार का गोली- बंदूक बेहतर है’

नबीला का अस्तित्व राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक पूर्वाग्रहों से उत्पन्न दोहरी मानसिकता से संघर्ष कर रहा है। विचारों के दोगलेपन की शिकार उसकी चेतना, व्यक्तित्व और अस्मिता खुद को स्थापित करने में संघर्षरत है। चंद भटके हुए लोगों की सज़ा पूरी कौम को भुगतनी पड़ रही है, रही-सही कसर सत्ता पर बैठे राजनीतिज्ञों ने कर डाली और प्रश्न करती है नबीला आमजन इन सब में कैसे शामिल करार दिए गये’ ‘फर्क कहाँ से आ गया, कैसे आ गया, किधर से आ गयाबुर्का मुसलमानपने की पहचान है मरने के डर से अपनी चीज नहीं अपनी रवायतें ही छोड़ दूं?

विडंबनाओं के बीच से उभरे प्रश्न हमें बेचैन कर देंगे, यदि पूरी ईमानदारी से हम उसके साथी यानी हमसफ़र बनेंगे तो। ‘धर्म की सत्ता’ या सत्ता का धर्म से गठजोड़ इसमें अल्पसंख्यकों के साथ किस प्रकार का व्यवहार हो रहा है, ‘अलग’ होने की पीड़ा, अपमान, असुरक्षा-बोध रेल के डिब्बे में स्पष्ट नजर आ जाता है। कथा में रंगमंचीय विशेषताओं से युक्त दृश्य विधान अलगाववादी स्थितियों के निर्माणाधीन प्रक्रिया को बखूबी बयान करता है। प्रश्न उठता है, क्या यह वास्तव में भी ‘धर्म’ की लड़ाई है या ‘सत्ता के वर्चस्व’ की! धर्म का राजनीतिकरण या धर्मिक उन्माद से उत्पन्न राजनीति, भुगतना आम आदमी को ही पड़ता है।

अब्बू समझातें हैं यह सब सियासत दानों के पिल्ले हैं जो भूंकते रहते हैं। पॉलिटिक्स नहीं अब्बू साजिश हर जगह है। क्या मैंने और आपने कराए थे दंगे? क्या हमने और आपने फोड़े थे बम? क्या हम ने गिराया वर्ल्ड ट्रेड सेंटर? संसद पर हम ने हमला किया? जब हमने कुछ किया ही नहीं तो बेवजह यह इल्जाम क्यों हम पर? सिर्फ इसलिए कि हम… मुसलमान हैं? पैदा होना क्या इंसान के अपने चॉइस में है?इन प्रश्नों के लिए हम सभी जिम्मेदार है अत: इनके उत्तर के लिए हमें ही समाधान खोजने होंगें।

नबीला, जिसके अब्बू और परिवार तरक्कीपसंद रहा तभी तो 47 के बटवारे के बाद कट्टरता को छोड़ दादाजी ने भारत में ही रहना पसंद किया होगा। नबीला कान्वेंट स्कूल में पढ़ी प्रतिभावान छात्रा हर क्षेत्र में अग्रणी लेकिन हवा जिस तेज़ी से बदली, उसने दरवाजें खिड़कियाँ बंद कर खुद को भीतर ही समेट लिया। उसे समझाया ही गया था कि ‘जब हकीकत इस सख्त खुद्दारी जमीन से टकराव की जब उनके ईंट, पत्थर और किर्चें झेलोगी तब पता…अब तोहरा समंदर गोपी चंदर बोल मेरी मछली कितना पानी एड़ी तक घुटने तक नाक तक नबीला उजबुजाती है’

परिवेश से जूझती नबीला आईएसए की परीक्षा में बैठने तक से इनकार कर देती है क्योंकि फिरोज भाई ने लिखित परीक्षा तो पास कर ली लेकिन साक्षात्कार में उनसे उलटे-सीधे प्रश्न किये गये सभी ने समझाया कि ज़रूरी नहीं जो फ़िरोज़ के साथ हुआ तेरे साथ हो तब वो तल्खी से जवाब देती है वह दिन गये अब्बू जब हममें से किसी को यहाँ का प्रेसिडेंट बना दिया जाता था अब तो स्कूल का प्रिंसिपल भी नहीं बनाया जाता था’

फिज़ा की बदलती ‘गर्म हवा’ में जाने कितनी प्रतिभाएं झुलस गयी नबीला जैसी कई प्रतिभाओं का ह्रासोन्मुख हो रहा है इस पर कौन बात करता है? लेकिन विभा रानी ने बदी बहादुरी से इस कौम की नाज़ुक स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रश्न दागें हैं। संवेदनहीन होते समाज मेंबढ़ती संवादहीनता के बीच, कहानी संवाद के लिए भूमिका बनाने का प्रयास है। तभी वे लिख पाई नबीला ने जो मन में विचार लिया था, यह उसका वहम था या हकीकत कौन जाने?यहाँ भी क्या कम गलाजत झेल रही है…उंगली में फंसे कांटे की तरह खटकती है… नजर रखो इन पर वरना हिस्ट्री जियोग्राफी पढ़ाते पढ़ाते यह कुरान और कलमा पढ़ाने लगेंगी’

कहानी किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष का पक्ष नहीं रख रही बल्कि मानवीयता की पैरवी कर रही है जब आप परहर वक्त नज़र रखी जा रही हो तो आप सहज कैसे हो सकतें है, इस विवशता को विभा रानी ने भलीभांति पढ़ लिया, साहित्य में जिसे परकाया प्रवेश कहतें है वही उनकी रचना-धर्मिता की विशेषता है। सोशल मीडिया के युग में साहित्य की क्षणभंगुरता कहीं उसकी ताकत को कमजोर कर रही है ऐसे में यह कहानी सिर्फ़ समाचारों की तरह समय के साथ बह नहीं जायेगी बल्कि आने वाले समय में भी नबीला के संघर्ष को बयां करती रहेगी क्योंकि नबीला एक ऐसा चरित्र है जो आने वाले समय में समाज को ऊर्जा प्रदान करता रहेगा, हम उसके सफर को अनदेखा नहीं कर सकते, लोग मुसाफिर के रूप में उससे जुड़ते जायेंगे और नबीला की बैचैनी, उसके प्रश्न हमें भी बेचैन करेंगें जो मानवीय संवेदना, सौहार्द्र, प्रेम का माहौल निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, यही साहित्य की ताकत है।

कला, साहित्य और संस्कृति में वह ताकत है कि संवेदनशीलता के बीज अंकुरित कर सके। हम जितने संवेदनशील होंगे आपसी संवाद की संभावनाए उतनी ही बढ़ जाएगी। लेकिन संस्कृति साहित्य या शिक्षा भी राजनीतिक की मोहर के बिना आगे नहीं बढ़ पाती, सभी उसके पिछलग्गू बने हुए हैं, रेल में जो बाई नबीला के बुर्के को देख धार्मिक उन्माद से ‘बोली की गोली’ दागना शुरू करती है, वो किसी राजनैतिक सभा में भाग लेकर लौटी है जिसमें इनके कमजोर, अज्ञानी मन-मस्तिष्क में यह भरा गया कि ‘ये लोग हमारा दुश्मन है छोड़ने का नई इनलोगों को’ तब विभा रानी भारतीय ही नहीं वैश्विक राजनीति पर भी निर्भीकता से टिप्पणी करतीं है‘अब्बू हमारा मुल्क हिंदुस्तान इतना जाग गया है कि हर तरह के लोग अब अमेरिका और इराक की बातें करने लगे?

अगर ऐसा हो तो कितना अच्छा हो पढ़े-लिखे समझदार लोगों का यह मुल्क, हिंदुस्तान में सोशलिज्म का सपना पूरा हो’ लेकिन नबीला जानती हैं, कि इसी राजनीति के कारण उसे प्रिंसिपल कभी नहीं बनाया जा सकेगा इसी राजनितिक संकीर्णता के चलते उसने आईएस की परीक्षा में बैठना उचित नहीं जाना स्कूल में भी वो रोज इल्जामों को बर्दाश्त करती है, इल्ज़ाम और इल्जाम बेवजह। बिना कुछ किए धरे इल्ज़ामों का बोझ उठाते चले जाएं?…तालिबानों ने बुद्ध के इतने पुराने स्टेच्यू को डायनामाइट से उड़ा दिया …मन करता है चिल्ला-चिल्ला कर पूछे कि जब बाबरी मस्जिद उड़ाई गयी थी, तब तुम लोगों ने कोई आवाज क्यों नहीं निकाली?

लेकिन राजनीति के चक्रव्यूह में फँसा आम इंसान प्रश्न कर भी कैसे सकता है इसलिए वह बहुत नपा-तुला बोलती है, क्योंकि पूछने का मतलब है उनके मज़हब पर प्रश्न खड़ा करना इसे वो कैसे सहेंगे ‘लेकिन मुझसे उम्मीद करेंगे मैं यह सब सहती रहूं नबीला का मन तेजी से विद्रोह करता पर वह चुप रह जाती आज जबकि राजनीति साहित्यकार पर भी हावी हो रही है विभा रानी नबीला के माध्यम से दृढ़तापूर्वक प्रश्न पर प्रश्न खड़े किये जा रहीं हैं उत्तर के लिए कौन जिम्मेवार है?

ऐसे में समाज कैसे सशक्त होगा? राजनीति सत्ता के मोह में साहित्य और समाज की ताकत को कमजोर करने की साजिशे रचती है, एक ऐसे समाज का निर्माण करती है, जो उसकी सत्ता को चुनौती न दे सके, प्रश्न न करे, सत्ता से संवाद भी न करे। जब विभा रानी जैसे साहित्यकार प्रश्न करतें हैं तो वे समाज का दिशा-निर्देश कर जीवन ऊर्जा देतें है तो नबीला जैसे चरित्रों को ताकत मिलती है।

ट्रेन में वह कामकाजी बाई का सीट पर फैलकर बैठने का दृश्य अत्यंत प्रभावशाली और प्रतीकात्मक है ‘स्थूलकाय बदन को हिलाने डुलाने से उसके पीछे तीनों सीटों पर बैठी तीनों बारीक किस्म की औरतें उसके सामने दब सी गयी’ वह औरत सत्ताधीन धार्मिक वर्चस्व है जिसके आगे बाकी धर्म सम्प्रदाय कमजोर पड़ते जा रहें हैं। इसलिए ‘सब के सब चुप थे कुछ पढ़ी लिखी थी कुछ नौकरी वाले कुछ घरेलू कुछ कॉलेज में पढ़ने वाली छात्राएं कुछ वेशभूषा से पीड़ित मॉडर्न मगर सब चुप थी’

यहाँ तक कि किताब वाली महिला जो बौद्धिक समाज का प्रतीक है भले ही एक पल को लगता है वो नबीला को लेकर संवेदनशील है जब वो कहती है ‘लेकिन आप मेरे को यह बताओ कि यह औरत जाकर अमेरिका में बम फोड़ कर आई है…मेरी किताब में जो लिखा है उसे पढ़ लोगी तो ये सब घटिया बातें नहीं करोगी। समझी? लेकिन कहानी का अंत धर्म की खोखली नैतिकता की पोल खोल देता है। आप समझना न चाहे सो अलग बात है ‘किताब वाली औरत’ जो उन पढ़े-लिखे जमात की प्रतीक है जो दिखाने भर को नबीला साथ दिख रहीं हैं लेकिन मन में उनके भी उतनी ही ईर्ष्या, घृणा और दुश्मनी है जिसे विभा रानी ने सफ़ेद दूध-सा झाग वाला जहर’ कहा है।

संकीर्ण सांप्रदायिकता और धर्म सत्ता के वर्चस्ववादी रवैये के कारण आम इंसान की पहचान, उसकी प्रतिभा सिमट कर रह गयी, नबीला आईएएस नहीं बनने पाई, प्रिंसिपल बनने की भी उसे कोई उम्मींद नहीं क्योंकि तथाकथित बौद्धिक जमात समाज ज्ञान का प्रकाश नहीं पहुंचा पा रहे हैं। हताश नबीला अबू से प्रश्न करती है ‘क्या ऐसा नहीं हो सकता हर दिन मुबारक हो? हर महीना पाक? हो हर साल खुशियों से भरा हो? हर नंबर तकदीर का पिटारा लेकर आने वाला हो?

सभी प्रश्न तीर की तरह चुभते है, चुभने भी चाहिए जिन्हें नहीं चुभते उन्हें ही संवेदनशील बनाना लेखिका का उद्देश्य है। सफर अभी लम्बा है तभी तो, क्यों नहीं तय कर पा रही नबीला, तेरा 11 से 13 बीच का फासला? लगातार चलते रहने के बावजूद एक ही जगह पर क्यों अटकी हुई है नबीला? इतने सारे प्रश्नचिह्नों के साथ कहानी खत्म हो गयी, यह मानना भूल होगी बल्कि उनके उत्तर और समाधान खोजने की शुरुआत एक नए सफर से करनी होगी।

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लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com

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