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लेखक की ज्यामिति

 

लेखक की अपनी दुनिया होती है और उसी में वह तरह-तरह की कार्रवाई या पैंतरेंबाजी करता है। ज्यादातर लेखक अपना पेट किसी को नहीं दिखाते, न ही अपनी वास्तविकता या पक्षधरता उजागर करते हैं। उनकी ‘छुपम-छुपाई’ अनवरत चलती रहती है। आजकल वे जुगाड़ने और ज्यादा से ज्यादा कबाड़ने में भिड़े रहते हैं। मान-मर्यादाएँ गयीं तेल लेने। बहुत कम हैं जिनमें आस्था और विश्वास का वास होता है। बाक़ी तो ज्यादा से ज्यादा पाने की ख्वाहिश में जुटे रहते हैं। कितनी किताबें, लेख इत्यादि कहाँ-कहाँ से छपाने हैं।

निरन्तर प्रयास होता है कि उनका  साहित्य झरता रहे। वे सरकार से समर्थन मूल्य की कामना करते हैं। ऐसे अनगिनत लोग नैतिकता को एक क्षण में ठिकाने लगा देने में नहीं हिचकते। उनमें से बस कुछ ही समय, समाज और राजनीति में कायदे से होते हैं। तटस्थता और फ्रीनेस उनका अमोघ अस्त्र है। लेखक की दुनिया की संबद्धता जनता से है, किसी सत्ता वत्ता से नहीं। कुछ तो केवल अपनी प्रशंसा में आपको औंधे मिलेंगे। वे अपने व्यक्तित्व की समूची तोड़भाँज विकास के अन्यान्य रूपों में फायदे देखकर करते हैं। आश्चर्य है कि जिस तरह सत्ता की मार्केटिंग खूबसूरत झूठ बोलने में लगी है, कुछ उसी तरह की कीमियागिरी लेखक ने भी अपनी गठरी में बाँध रखी है। लेखन कोई माल नहीं है। वह हमारे जीवन की सर्वोच्च ऊर्जा का केंद्र बिंदु है।

 लेखक को कोई ज़ोर नहीं देता कि तुम लेखक बनो। लेखक बनना उसका अपना चुनाव है, अपनी आंतरिक परिधि है। मुझे अचानक तोलस्तोय का एक नये लेखक के लिए कथन याद आ रहा है- “हमारे लिए सर्वप्रथम मूल्यवान होती है लेखक की कल्पना शक्ति। लेखक ही किसी युग के सजीव चित्र का पुनर्निर्माण करता है और उसे अर्थपूर्ण बनाता है और यह सब करता है उन टुकड़े टुकड़े दस्तावेजों से जो अतीत से हम तक पहुंची हैं।”(लेखन कला और रचना कौशल पृष्ठ-268)

जो लोग सोच रहे हैं कि लेखक बनना आसान है, वे गफ़लत के शिकार हैं। लेखन की विधिवत और व्यवस्थित तरीके से तैयारी करनी पड़ती है। केवल ज्ञान का ही विकास नहीं हुआ बल्कि तमाम महत्वपूर्ण तकनीकों का भी विकास हुआ है। समय के ज्वलंत सवालों के साथ बदमाशियों, छल-कपट, प्रवंचनाओं की भी उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है, इसलिए हमें लिखने-पढ़ने की तैयारी करनी पड़ती है। पाकिस्तानी शायर अफजाल अहमद की एक कविता है- ‘शायरी मैंने इजाद की’।

उसकी कुछ पंक्तियाँ हैं- “मुहब्बत ने दिल ईजाद किया/दिल ने खेमा और कश्तियां बनाईं/और दूर दराज मकामात तय किए/दिल में चुभे हुए कांटे की डोर थामने के लिए/नीलामी ईजाद की/और ज़बर ने आख़िरी बोली ईजाद की/मैंने सारी शायरी बेचकर आग खरीदी/और ज़बर का हाथ जला दिया।” कहना यह है कि जिन्दगी तरह-तरह के इम्तिहान लेती है। जिन्दगी आग भी होती है और पानी भी। लेखक को रोना नहीं लड़ना होता है। भीतर तरह-तरह के बवंडर होते हैं, इसलिए बेचैनी भी दिन-रात होती है। मुसीबतों से जैसे- आदमी जूझता है, उसी तरह लेखक भी जूझता है। जो जूझने से भागा और डर गया उसे कोई नहीं बचा सकता। लेखक को हमेशा ख़तरों से लड़ना पड़ता है।

लेखक यथार्थ से मुंह चुराकर भाग नहीं सकता। जिसे ये सब अनुभव नहीं हो रहा होता, वो और सबकुछ तो हो सकता है परन्तु लेखक क़तई नहीं। लेखक को समय के आर-पार समूची वास्तविकताओं से दो-चार होना पड़ता है। मुक्तिबोध ने कहा था- “हमारा लेखक अपनी भौतिक, सांसारिक उन्नति के लिए दंद-फंद करता रहे या स्वयं अपनी दिशा में प्रगति के लिए वह कोशिश करे! अगर उसने पहली बात छोड़कर दूसरी बात की, तो उसके पीछे कुत्ते लग जाते हैं, भूख के, दयनीयता के, अपमान के, अभाव के, रोग के यहाँ तक कि मृत्यु के।” (एक साहित्यिक की डायरी, पृष्ठ 81)

बातों को बहुत विचारोत्तेजक बनाना है तो फिर प्रश्न खड़ा होता है कि लेखक की जिम्मेदारी किसके प्रति है। सामान्य से सामान्य आदमी और नागरिक के प्रति, उसके समग्र विकास के लिए। लेखक कौन है और क्यों लिख रहा है? ये सवाल भी निरन्तर खड़े हैं, उसका दीन-ईमान होता है, उसकी जवाबदेही होती है। लेखक अपनी वास्तविकता को नहीं समझना चाहता, अपनी तैयारी नहीं करता। वह अध्यापक की तरह यह मानने लगता है कि वह सब कुछ जानता है। अपवाद छोड़ दें तो पहले लेखक को यह मानना पड़ेगा कि वह समाज का ही एक टुकड़ा है। लेखक सबको पहचानने की ख्वाहिश रखता है लेकिन अपने आपको नहीं पहचान पाता? यह एक द्वैत है।

लेखक संकटों में है लेकिन इन संकटों की वह अनदेखी करता है। लेखक की समूची विकास यात्रा समाज के भीतर ही होती है। वह आकाश से उतरकर आया हुआ कोई विशिष्ट प्राणी नहीं है। गहरे शून्य में धूनी रमाकर साहित्य सम्भव नहीं होता। लौकिकता ही आधुनिक समय के लेखक की मूल ‘शपथ या ‘प्रतिज्ञा’ है। लोक से अलग होकर कोई और दुनिया लेखक की हो सकती है क्या? लेखक के भीतर अब कई तरह के झूठ पल रहे हैं या डेरा डाले हुए हैं। व्यक्तिगत ईमानदारी सिरे से गायब है। हमारे इस अघोरी समय में लेखकों की नैतिकता का बेहद क्षरण हुआ है। किताबों की रायल्टी और उसके महत्व के कई पाठ रखे गए हैं। लेकिन क्या लेखक अपने इर्द-गिर्द के समय समाज और वास्तविकता को न देखकर हवा हवाई बातें करने में मशगूल है? इस पप्रश्न का उत्तर आवश्यक है।

यह एक भारी भ्रम या भयानक झूठ है कि लेखक क्रांति करता है। अगर वह निष्ठावान और जनजीवन से जुड़ा लेखक है और जिन्दगी की वास्तविकताओं, जटिलताओं, सूक्ष्मताओं से सम्बद्ध है तो क्रांति की परिस्थितियाँ पैदा कर सकता है। लेखक का जीवन संघर्षमय होता है या हो सकता है लेकिन अभी भी कुछ खाए-अघाये लेखक हैं और विभिन्न उपकरणों से सुसज्जित होकर साहित्य संस्कृति की माला जपते हैं। वे सब लेखक की संज्ञा तभी पूरा कर पाएँगे जब समय, समाज और देश-दुनिया के प्रति अपनी ठोस जिम्मेदारी निभाएँगे। लेखक के प्रति समाज देश की जिम्मेदारी भी ज़रूर है। चमक-दमक की एक नई दुनिया निर्मित हो रही है।

सच्चा लेखक वही हो सकता है जो अपने समय, समाज के प्रति, देश के नागरिकों के साथ जो घट रहा है उसका संज्ञान रखता हो। कभी एक लेखक ने कहा था कि मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है। हमें जानना चाहिए कि साहित्य की भी राजनीति होती है लेकिन वह प्रतिबद्ध राजनीति से एकदम अलग-थलग है। साहित्यकार किसी भी सूरत में सत्ता का भोंपू नहीं हो सकता। समय, समाज और राष्ट्र में जो हो रहा है या घट रहा है, उसका कायदे से प्रतिरोध नहीं हो रहा है। लेखक भी तरह-तरह के बहकावे में हैं और तरह-तरह का ज्ञान बघारते हैं; उन्होंने आत्मालोचन करना बंद कर दिया है। लेखकों की आवाज़ धीरे-धीरे उठना बंद हो गई है। वे गफ़लत में हैं। वे आत्मसंघर्ष की परिधि से बाहर निकल पड़े हैं। उनमें श्रेष्ठता का हाँका पड़ा है। वे केवल अपने वर्चस्व में डूब उतरा रहें हैं। मुझे हरिशंकर परसाई का एक व्यंग्य याद आ रहा है। लिटरेचर ने मारा तुम्हें। अन्त में महात्मा गांधी का वाक्य याद दिला रहा हूँ- “डर को कभी छूना नहीं, सच को छोड़ना नहीं, प्रेम को भूलना नहीं।

लेखक की दुनिया अत्यंत विकसित और सम्पन्न हुई है। सत्ता और राजनीतिक वाचालता की तरह यहाँ भी तरह-तरह के रुझान और अहंकार सरपट दौड़ रहे हैं, उसी अनुपात में भ्रम की मार्केटिंग भी जारी है। मेरी समझ में लेखन बेहद गंभीर और दायित्वपूर्ण काम है। लेखक का रास्ता पेचीदा हुआ है निरन्तर। बाज़ार, सत्ता और इलेक्ट्रानिक संसाधनों ने जितना आसान किया है, उससे कहीं ज्यादा उलझा भी दिया है। लेखक निरापद नहीं हो सकता, उसे हर पल सावधान रहना पड़ता है और प्रलोभनों के जाल तोड़ने पड़ते हैं। मुझे अंदेशा है कि राजनीति जिस तरह दकियानूस और फर्जी हुई है, पत्रकारिता या मीडिया जिस तरह अविश्वसनीय हुए हैं, उसी तरह कहीं साहित्यकार अपनी वास्तविकता और शुचिता न खो दें। लेखन की दुनिया में भी चाटुकारिता की प्रवृत्ति का विकास होना मुझे विचलित करता है। लेखक का रिश्ता जनजीवन से कट रहा है। वह प्रशंसा के टावरों में झूल रहा है। ज्ञान और संवेदना के इलाकों को अनदेखा करना उसे अपाहिज़ बना रहा है।

मेरा मन बड़ा शंकालु है। वह ससुरा समय तो देखताब ही है, उसके आर-पार भी देखना चाहता है। कभी-कभी अतीत में भी घुमक्कड़ी करने लगता है। बाहर हँसता है और भीतर ही भीतर रोता, कलपता है। हाँ, जिन्दगी के प्रति समाज के संघर्षों पर उसकी अटूट निष्ठा है। इसी आस्था, विश्वास और निष्ठा ने मुझे गढ़ा है। परसाई ने सच ही कहा है- “लेखक का शंकालु मन है। शंका न हो तो लेखक कैसा? मगर वे भी लेखक हैं जिनके मन में न शंका उठती है न सवाल।” (अपनी अपनी बीमारी) मैं घनघोर परिवारी आदमी हूँ। परिवार मुझे बहुत साहस और अपनापन देता है। यह परिवार निजी से लेकर समूचे संसार तक फैला है जिसमें प्रकृति, पशु-पक्षी और हमारे जीवन की तमाम विविधताएँ स्थान पाती हैं और साँस लेती हैं। हमारे पूर्वज लेखक, उनका सोचा समझा, लिखा पढ़ा हमें निरन्तर नये-नये रास्ते सुझाता है। कबीर कान में कहते हैं- “हम न मरब मरि है संसारा।” डर किस बात का? पूर्वजों की थाती है और अपने बड़े परिवार का हौसला। अपने व्यक्तित्व का विघटन किए बिना दुनिया को कैसे अपने में जी सकते हैं। यहीं से मनुष्यता के विराट दर्शन सुलभ हो सकते हैं। और आख़िर यहीं से तो एक लेखक की भी यात्रा शुरू होती है और उसकी त्रिज्या भी बनती और विकसित होती है

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