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मूल्यांकन

‘स्व’ से ‘स्वजन’,‘स्वजन’ से ‘सर्वजन’ की काव्य–यात्रा

 

मेरे विचार में किसी भी कवि अथवा कविता का यथार्थ केवल ‘स्व–पीड़ा’ मात्र नहीं है, जो कि प्रायः दलित कवियों की कविताओं के सम्बन्ध में लिखा (कहा) जाता है। वास्तव में कोई भी कविता “परपीड़ा से पूर–पूर हो” तथा औरों की पीड़ा से “थक–थक कर चूर” होकर रूपाकार ग्रहण करती है। “वियोगी होगा पहला कवि” से “आह से उपजा होगा गान” तक और उससे आगे “निकलकर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान” तक की काव्य–यात्रा में कवि विशिष्ट योग–संयोग–संश्‍लेषण (devotion–cohesion–synthesis) रचता है। यह योग–संयोग–संश्‍लेषण स्वानुभूति से उत्पन्न होने के बावजूद इसमें अंतर्बाह्य का सहज ही सुगठित समवाय (compact inherence) होता है।

यद्यपि श्याम सुंदर दास ने लिखा है, “केवल सौंदर्य से मुग्ध होकर अथवा आनंदपूर्ण एक झलक पाकर भी काव्य–रचना की जा सकती है, और की गयी है। वह सौंदर्य अथवा वह आनंद की झलक उस काव्य में आकर स्वयं लोकहित बन जाती है और काव्य के लिए यही मूल लोकहित है।” (साहित्यालोचन, श्यामसुंदरदास, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2008, पृ. 56) तथापि जनप्रतिनिधि कवि अपनी सर्वसमावेशी काव्याभिरचना में ‘स्व’ से ‘स्वजन’ और ‘स्वजन’ से ‘सर्वजन’ तक का समवायी रास्ता तय करता ही है। यह काव्य–यात्रा अनुभूतिजन्य नवीनता से भरपूर होने के साथ–साथ विशिष्ट और सर्वसमावेशी भी होती है। इसलिए किसी भी कवि का मूल्यांकन पूर्व–निर्धारित ढंग से एक चौखटे में बाँधकर नहीं किया जाना चाहिए। यह दीगर बात है कि खेमेबद्ध आलोचकीय परम्परा ने काव्यांकन (काव्य–विवेचन) में विशिष्ट विचारधारात्मक पैमानों को आधार बना कर कवि की सर्वसमावेशी काव्याभि रचना–यात्रा की संकुचित मूल्यांकन (लचरपन) परम्परा ही विकसित की है।

दामोदर मोरे जैसे अनेकानेक कवियों को केवल ‘दलित कवि’ के ‘टैग’ के साथ मूल्यांकित करना मेरे विचार में उनकी कविताओं के साथ अन्याय करने जैसा ही है। दामोदर मोरे ने काव्य–संकलन ‘सदियों के बहते ज़ख़्म’ में अपने काव्य–वक्तव्य में लिखा है, “इन्सान को जाति के ऐनक से देखने वाला यह देश है।” (सदियों के बहते ज़ख़्म, अखिल भारतीय साहित्य परिषद, मुम्बई, सं. 2001,पृ. 42) ऐसे में उनको ‘दलित कवि’ कहना और दलित चेतना एवं संवेदना तक सीमित कर पल्ला झाड़ लेने जैसा है। निश्‍चय ही दलित चेतना उनके काव्य का अभिन्न पहलू है।

दलित समाज के प्रति प्रतिबद्धता के बावजूद आपकी कविता में सामाजिक–राजनीतिक चेतना और संवेदनाका एक व्यापक पहलू है–‘सार्वत्रिक सामाजिक क्षय’(universal social decay) का चित्रांकन, मसलन– “सत्य का नकाब पहने/ सत्ता की गलियों में/ झूठ खुले आम घूम रहा है।” (वही,‘सॉक्रेटीस’ पृ. 58) ;“सस्ता हुआ है आदमी/ और जीवन हुआ है महंगा।” (वही, ‘पचास साल’, पृ. 88); “मुझे बर्दास्त नहीं होता/ राज सिंहासन पर/ गिद्ध का बैठ जाना।” (वही, ‘बर्दास्त नहीं होता’, पृ. 97) ; “शब्द ज़िंदगी का क़तरा है/ हुस्न का वह मुजरा है/ ज़िस्म बेच कर पेट का गुज़ारा है/ आर्ट गैलरी का वह नज़ारा है।” (वही, ‘आर्ट गैलरी’, पृ. 105) ; “साम्राज्यवाद की ईर्ष्याग्नि ने ही जलाया/ नागासकी और हिरोशिमा।” (वही, ‘तुम चाहे तो’, पृ. 106);“आओ लीडर आओ! वोट माँगने आये?” (पलकें सुलग रही हैं, अनुपम प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2000 ‘पैसा’ पृ. 45) ; “क्रांति शब्द च्युईंगम की तरह चुभला–चुभलाकर/ थूँकने योग्य बना दिये हैं/ और पैसों से ही बुझ रहे हैं/ क्रांति के सुलगते अंगारे” (वही, पृ. 50); “मायूस ज़िंदगी कविता में जीना/ अपनी लेखनी से उदास मन को विज्ञापित करना है/ अपनी ज़िन्दगी के टुकड़े कर अलग–अलग ढेर लगाना/ और उसे अपनी ही आँखों से देखना है” (वही, ‘विषाक्त ज़िन्दगी’, पृ. 60); “कैसे कहूँ इसे सुहागन चूड़ियाँ/ ये चूड़ियाँ नहीं, हैं बेड़ियाँ” (पिछला चक्का, सौरभ प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2007, ‘तू गूँगा’, ‘ पृ. 9);

“मेरी गुलामी का सुनहरा प्रतीक/ मंगलसूत्र/ फेंक दिया है मैंने” (वही, ‘डर का बंदर’, पृ. 27); “हमारे सुगठित, सुडौल, सुन्दर बदन पर/ तो तुम्हारी निगाहों के गिद्ध/ हमें नोचते रहते हैं/ हमारे वक्षस्थल पर बैठकर” (वही, ‘माँ नज़र आयेगी’, पृ. 30); “तू कहता आया –/ स्त्री और पुरुष/ दो सुन्दर चक्के हैं/ संसार रूपी रथ के…?”(वही, ‘पिछला चक्का’, पृ. 36); “बेवकूफ औरत भी कभी–कभी देती है –/ पुरुष का ही साथ” (वही, ‘थू तेरी संस्कृति पर’, पृ. 42); “भारतीय नारी अंधश्रद्धा में डूब रही/ यही बात मेरे मन में चुभ रही” (वही, ‘सावित्री से सावित्री तक’, पृ. 49) ;“भारत भूमि में/ पड़ा है –/ सहानुभूति, सम्वेदना का अकाल।” (नीले शब्दों की छाया में, सौरभ प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2007. ‘सत्ता के आँगन में’,पृ. 22)

ऐसी अनेकानेक कविताओं में ऐसे अनगिनत चित्र हैं, जो कवि को पूर्व–निर्धारित चौखटे से बाहर सर्वांगीण रूप में विवेचित करने के लिए बाध्य करते हैं। आपने अपनी प्रतिबद्धता को जाहिर शब्दों में अभिव्यक्त करते हुए लिखा भी है, “काव्य–दृष्टि काव्य–सृष्टि का रंग–रूप होती है। काव्य–दृष्टि जीवन–दृष्टि से जुड़ी हुई रहती है। जीवन–दृष्टि व्यक्तित्व से और व्यक्तित्व समाज और संस्कृति से जुड़ा हुआ रहता है।” (सदियों के बहते ज़ख़्म, पृ. 38) निश्‍चय ही उपरोक्त कविताओं में व्यापक जीवन–दृष्टि और सघन अनुभूति है।

जब किसी भी कवि की काव्य–दृष्टि ‘आह’ से उपजती है तो रचना में वह ‘आह’ सहज ही ‘गान’ बनकर अंतरित होती है। काव्य–विवेचकों ने कविता में जिस ‘शिवत्व’ (लोकहित या कल्याण) के विषय में गंभीर चर्चाएँ की हैं, वह किसी–न–किसी अर्थ में ‘आह’ में संगुफित है। मेरे विचार में किसी भी कवि की कविता का यही सत्य हो सकता है कि उसकी रचना का मूलाधार जैसा कि कवि दामोदर ने रेखांकित किया ‘जीवन–दृष्टि’ और ‘अनुभूति’ है। कवि ने अपने काव्य वक्तव्य में लिखा भी है कि “स्वानंद के लिए मैं कविता नहीं लिखता और न ही कविता करने के लिए मैं कभी बैठता हूँ। अपने अंदर की आभा की जब मैं तलाश करता हूँ, तो मुझे रोशनी दिखाई देती है। वही कविता बनकर उभर आती है।” (वही, पृ. 46) स्पष्ट है कि किसी भी कवि की सच्चाई जब ‘आह से उपजा होगा गान’ (शिवत्व–लोकहित) में अभिव्यक्त होती है तो उस रचना को केवल ‘स्वान्तसुखाय’ कहना तार्किक नहीं होगा। ‘कैसे कहूँ’ कविता में यही भावाभिव्यंजना दृष्टव्य है –“जो किसी के लिए बरसते नहीं/ उन्हें मैं बादल कैसे कहूँ…?/ जो किसी के लिए तरसते नहीं/ उन्हें मैं इन्सान कैसे कहूँ…?” (वही, पृ. 50)

यही तेवर, यही उदासी (melancholy) ‘कविता की खुशबू’ में भी विद्यमान है– “अन्याय सहती/ रहती हैं/ जिंदा लाशें जहाँ/ उसे मैं/ गाँव/ कैसे कहूँ…?” (वही, पृ. 59) कवि का लोक के साथ पारस्परिक तारतम्य ही है किवह कला को केवल कला तक सीमित न रखकर जीवन के व्यापक फलक तक विस्तार देता है। लोकचेता कवि लोकहितानुग्राही होने के साथ–साथ वह लोगों में परिवर्तनकामी चेतना भरने का सतत उपक्रम करता है। उपरोक्त कविता में अवसाद के क्षण (moment) का सम्बन्ध निश्‍चय ही लोक–चेतना में सुषुप्ति की अवस्था के फैलाव से है। कवि दामोदर ‘सदियों के बहते ज़ख़्म’ में लिखते हैं, “कविता डूबते हुए इंसान को ही बचाने की कोशिश नहीं करती वरन् डूबते हुए समाज को भी बचाने की एक सशक्त और सजग कोशिश होती है।” (वही, पृ. 48) ऐसे में कविता का लोकाभ्युदय वाला पक्ष निरंतर सुचिंतित रूप में प्रस्तुत हुआ है।

जब समाज प्रसुप्तावस्था को ही जीवनाधार मानने–समझने लगता है तो जन–प्रतिनिधि कवि के काव्य में अवसाद के क्षण अनायास ही चित्रित होते हैं। लोक–चेतना के निरंतर कमतर होते जाने से ही कवि दामोदर की अनेकानेक कविताओं में अंधकार, उदासी, बिखराव, एकाकीपन की बारंबारता (पुनरावृत्ति) दृष्टिगोचर होती है। कभी कवि को लगता है कि “पड़ा है अकाल/ संवेदना का/ इस भूमि पर/ सूख गया है/ इन्सानियत का झरना/ इस भूमि पर” (वही, ‘ये डरे हुए पेड़’, पृ. 96) तो कहीं वह अनुभव करता है कि थके–हारों में उत्तेजना भर देने वाला ‘क्रांति’ शब्द इतना घिसा–पिटा हो गया है कि कवि उसके लिए ‘च्युईंगम’ की उपमा देता है। ‘क्रांति’ की नीरसता में एक घनीभूत पीड़ा निश्‍चय ही दृष्टव्य है।

वास्तव में क्रांति से अभिविन्यस्त भाषण–प्रभाषणों की प्रभावोत्पादकता का घटते जाना किसी भी समाज के लिए चिंता का विषय है। कवि महसूस करता है कि लोगों को क्रांति की बातें हँसोड़पन की भावना से परिपूरित लगने लगी हैं। उसने अपना प्रभाव खो दिया है। समाज में पैसातंत्र, स्वार्थ और स्व–केन्द्रीयता के हावी होने से भी क्रांति के अंगारे बुझ जाते हैं। कवि कहता भी है–“क्रांति शब्द च्युईंगम की तरह चुभला–चुभलाकर/ थूँकने योग्य बना दिये हैं/ और पैसों से ही बुझ रहे हैं/ क्रांति के सुलगते अंगारे।” (वही, ‘पलकें सुलग रही हैं’, पृ. 50) इसलिए कवि में बगावत की भावना भी जाग्रत होती है –“अंधे/ तू मुझसे मत पूछ/ मैं/ क्यों बन गया बागी…” (सदियों के बहते ज़ख़्म, ‘बागी’, पृ. 100)

जब समाज में लोकहित की भावना अल्पतर होती जाती है और समाज में अशांति तथा विद्वेष उत्पन्न होने लगता है तो कवि लोगों को पशुत्व से बचने का पाठ भी पढ़ाता है। अपने भीतर झाँककर देखने की इसलिए भी वकालत करता है कि अपने भीतर पलते–बढ़ते पशुत्व का मूल कारण समय–समय पर आत्मनिरीक्षण और मूल्यांकन न करना है। आत्मनिरीक्षण–मूल्यांकन से सामाजिक सौहार्द–समरसता की भावना के बलवती होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

परन्तु मनुष्य ‘सामाजिक’ बनने की अपेक्षया व्याघातक असामाजिकता की ओर अग्रसर होता जाता है और यही व्याघात जब असामाजिक आवेग (unsocial impulse) में तब्दील हो जाता है तो समाज में अराजकता–अशांति–असुरक्षा–संवेदनशून्यता–हिंसा­बढ़ जाती है– “तुम आदमी ही मुझको जगा देते हो/ और अपने ही हाथों/ एक दूसरे की ज़िंदगी को/ आग लगा देते हो।” (वही, ‘पशु’, पृ. 102) इसीलिए कवि पूछता है अपने आपसे –“मैंने/ अपने से पूछा –/ मैं कहाँ हूँ…?/ मैं बोला –/ तू नहीं है तुझमें/ बिखरा है समाज में…।” (वही, ‘मैं’, पृ. 124)

कवि दामोदर ने नारी की मनोदशा और यथावस्थित पीड़ा को वाणी भी दी है और स्त्रियों को जाग्रत करने का प्रामाणिक कार्य किया है। कुछ विशिष्ट काव्यांशों का जायज़ा लिया जा सकता है –“कैसे कहूँ इसे सुहागन चूड़ियाँ/ ये चूड़ियाँ नहीं, हैं बेड़ियाँ” (पिछला चक्का, ‘तू गूँगा’, पृ. 9) ; “मेरी गुलामी का सुनहरा प्रतीक/ मंगलसूत्र/ फेंक दिया है मैंने” (वही, ‘डर का बंदर’, पृ. 27) ; “हमारे सुगठित, सुडौल, सुन्दर बदन पर/ तो तुम्हारी निगाहों के गिद्ध/ हमें नोचते रहते हैं/ हमारे वक्षस्थल पर बैठकर” (वही,‘माँ नज़र आयेगी’, पृ. 30) ; “तू कहता आया –/ स्त्री और पुरुष/ दो सुन्दर चक्के हैं/ संसार रूपी रथ के…?” (वही,‘पिछला चक्का’, पृ. 36) ; “बेवकूफ औरत भी कभी–कभी देती है –/ पुरुष का ही साथ” (वही,‘थू तेरी संस्कृति पर’, पृ. 42) ; “भारतीय नारी अंधश्रद्धा में डूब रही/ यही बात मेरे मन में चुभ रही”(वही, ‘सावित्री से सावित्री तक’, पृ. 49) ; “तुझे जरा–सी भी शरम नहीं आयी/ अपनी पत्नी को/ चप्पल का दर्जा देने में?” (वही,‘हे पुरुष’, पृ. 8); “हे पुरुष!/ तू कितना बड़ा दिलदार/ तूने स्त्रियों को रहने के लिये दिया/ एक सुन्दर घर/ जिसके चारों तरफ हैं अदृश्य दीवारें/ कारागृह की।” (वही,‘ऐ मेरे प्यारे–बैल’, पृ. 24)

जॉन स्टुअर्ट मिल ने लिखा है, “समाज द्वारा महिलाओं के लिए एक ही उद्देश्य निर्धारित किया गया है – विवाह। इसी प्रत्याशा से उनका लालन–पालन होता है।” (स्रियों की पराधीनता, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2002) इसी प्रवाह की कुछ अन्य कविताएँ हैं – “हे मर्द! तेरी निगाहों में नारी है एक मादा।/ वह है एक भोगवस्तु/ और वस्तुओं को कभी होती है क्या भावना?” (पिछला चक्का, ‘कौन है गुनाहगार’, पृ. 25); “हे पुरुष/ खड़ी होना चाहती हूँ मैं/ अपने बलबूते पर/ अपने पंखों से/ उड़ना चाहती हूँ/ अपने बल पर/ तू मेरा साथी है/ मेरा मालिक नहीं/ मैं तेरी साथी हूँ/ तेरी दासी नहीं।” (वही, ‘उड़ना चाहती हूँ’, पृ. 40)

ऐसे संदर्भों को यदिस्त्री–विमर्श के नज़रिए से देखा जाए तो सीमोन द बोउवार का लिखा सत्य प्रतीत होता है –“तमाम विरोधाभास पूर्ण संघर्षों के बावजूद पुरुष के शासन को मानने और उसकी महानता को स्वीकार करने के लिए स्त्री बाध्य है। अपनी स्वतंत्र मान्यताओं और विकल्पों के अभाव के कारण स्त्री पुरुष के सम्मुख समर्पण के लिए बाध्य है। वह पुरुष द्वारा स्थापित सत्यों और मान्यताओं को अस्वीकार कर सकती है, पर अपनी मान्यताओं और सत्यों के सहारे वह पुरुष की मान्यताओं का विरोध नहीं कर सकती। पुरुष–जगत में स्त्री प्रवेश नहीं कर सकती क्योंकि उसके अनुभव उसे ऐसे तर्क और ज्ञान नहीं सिखाते जिनके सहारे वह अग्रसर हो।” (स्त्री उपेक्षिता – सिमोन द बोउवार, अनु. डॉ. प्रभा खेतान, हिन्दी पाकेट बुक्स, दिल्ली, सं. 2002)

परन्तु इसे आश्‍चर्य ही कहा जा सकता है कि समतामूलक साम्यवादी समाज की कल्पना करने वाले समाजवादी चिंतन–दर्शन के बावजूद स्त्री की दशा जस की तस भी न बनी रह सकी बल्कि पहले की तुलना में उसकी स्थिति भोगवादी लिप्सा में घसीटती ही चली गयी। आधुनिक–उत्तर आधुनिक चिंतन के आलोक में स्त्री के उत्थान के लिए की गयी बातों के बावजूद ‘वह (स्त्री) है एक भोगवस्तु’ की भोगवादी दृष्टि ही बलवती हुई तथा ‘छिनाल’ (कितने बिस्तरों में कितनी बार) जैसी विकारों से युक्त प्रयुक्तियों से स्त्री के प्रति समतामूलक समाजवादी सपना दिखाने वालों की रुग्ण सोच से भारतीय समाज अवगत हो सका। दामोदर मोरे की एक कविता में ‘विकारयुक्त पशु’ का ज़िक्र यों ही नहीं हुआ है –“अपने विकारों के पशु/ अपने अंदर के घने जंगल में/ कैसे दौड़ रहे हैं…।” (सदियों के बहते ज़ख़्म, ‘सफर’, पृ. 72) May be an image of 1 person

ऐसे विरोधाभासी माहौल में कवि दामोदर ने स्त्री और पुरुष को एक–दूसरे का पूरक माना है जो कि किसी भी दृष्टि से युक्ति-युक्त जान पड़ता है। वास्तव भी यही है कि एक का दूसरे के बिना अस्तित्व ही शेष नहीं रह जाता–“स्त्री और पुरुष/ हैं दोनों प्रकृति की सुन्दर देन/ दोनों हैं एक ही डाली के फूल/ जिसे कहते आये हैं हम जीवन।” (वही, ‘तुलसीदास’,पृ. 15) ; “पुरुष है कुदरत की देन/ स्त्री है कुदरत की देन” (वही,‘असमानता का सुअर’, पृ. 23)किसी भी समाज में जब तक यह भावना जाग्रत नहीं हो जाती कि स्त्री–पुरुष एक–दूसरे के पूरक हैं, समाज–देश–दुनिया में स्त्री की स्थिति में परिवर्तन कदापि संभव नहीं।

उपरोक्त विचार–बिंदुओं से आगे कवि दामोदर की कविता में राजनीतिक कटाक्ष अत्यंत तीक्ष्ण और तीव्र बनकर उभरा और निखरा है। समाज–जीवन में राजनीतिक हस्तक्षेप से उपजी विकटावस्था का पर्दाफाश कवि ने अपनी अनेक कविताओं में किया है। “सत्य का नकाब पहने/ सत्ता की गलियों में/ झूठ खुले आम घूम रहा है।” (सदियों के बहते ज़ख़्म, ‘सॉक्रेटीस’ पृ. 58) सत्ता में ‘सत्य’ शब्द का आभास भले ही हो परन्तु वह सत्य से कोसों दूर जनता को ‘सताने’ से लेकर शोषण करने तक में कोई क़सर नहीं छोड़ती। राजतंत्र बोधक शब्द ‘सत्ता’ वर्तमान में राजनीति के लिए धडल्ले से प्रयुक्त हो रहा है। कारणों की सतही छानबीन भी की जाए तो प्रतीत होता है कि लोगों द्वारा चुनी गयी सरकारों का रवैया भी सत्ताधीशों की निरंकुशता से किसी भी मायने में कम नहीं।

कवि दामोदर की बहुजन समाज के प्रति प्रतिबद्धता को देखते हुए बाबा नागार्जुन की कविता ‘प्रतिबद्ध’ का सहज ही स्मरण हो आता है –“प्रतिबद्ध हूँ, संबद्ध हूँ, आबद्ध हूँ/ प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ –/ बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त –/ संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ…/ अविवेकी भीड़ की ‘भेड़या–धसान’ के खिलाफ़…/ अंध–बधिर ‘व्यक्तियों’ को सही राह बतलाने के लिए…/ अपने आप को भी ‘व्यामोह’ से बारंबार उबारने की खातिर…/ प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ!” (प्रतिनिधि कविताएँ, बाबा नागार्जुन, सं. नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2013, पृ. 15) परन्तु आज़ादी के बाद से बहुजन समाज के साथ लगातार हुए अन्याय को नारा बनाकर जब मायावती सरकार बनाने में सफल हुईं तो बहुजन समाज के प्रतिबद्ध कवि को मानो राहत–सी मिल गयी कि बहुजन समाज के दुर्दिन स्थायी रूप से ख़त्म हो गए हैं।

परन्तु दुर्भाग्य कि बहुजन समाज के नाम पर हुई राजनीति को टटोलने में कवि मात खा बैठता है। बाबा नागार्जुन की ही तरह मायावती पर कविता लिखकर इस राहत को शब्दबद्ध करने की कोशिश कवि दामोदर ने की है –“कल तक वे/ हमें सीढ़ी बनाकर/ सदियों से बैठते आये/ सत्ता के सुनहले/ सिंहासन पर।/ भीम की बेटी का/ यह करिश्मा तो देखो/ उन्हें सीढ़ी बनाकर सीढ़ी/ बैठ गयी है –/ सत्ता के सिंहासन पर।” (नीले शब्दों की छाया में, ‘भीम की बेटी’, पृ. 72) बाबा नागार्जुन ने मायावती पर ‘मायावती’ शीर्षक से ही कविता लिख डाली थी – “मायावती मायावती/ दलितेन्द्र की छायावती छायावती/ जय जय हे दलितेन्द्र/ प्रभु, आपकी चाल–ढाल से/ दहशत में है केन्द्र/ जय जय हे दलितेन्द्र/ आपसे दहशत खाए केन्द्र/ xxx सब रहते हैं दंग/ बज रहे दलितों के मृदंग/ जय जय हे दलितेन्द्र/ आपसे दहशत खाए केन्द्र/ xxx प्रभो, आपसे शंकित है केन्द्र/ जय जय हे दलितेन्द्र। “नागार्जुन ने कभी राजनीतिज्ञों के प्रभाव में उन पर कविताएँ लिखीं तो बहुतांश कविताओं में उपहास और सघन ऊहापोह भी है।

यह बात स्पष्ट है कि कवि अन्य किसी की भी तुलना में विशिष्ट होता है। दूरदर्शी और काल–चेता होता है। उसकी दृष्टि तीव्र–तीक्ष्ण और अनुभूति परिपक्व होती है। उसे सामान्य जनता की तरह जाति–धर्माधारित राजनीति करने वाले अटकलपच्चू राजनेताओं के चुनावी वादों से अभिभूत होकर उनका पक्षधर नहीं होना चाहिए। ब़हरहाल कविता में‘सत्ता’ और ‘सिंहासन’ पर अनायास ही नज़रें ठिठक जाती हैं। इन शब्दों में निरंकुशता का जो भाव है, उसे जानने–समझने की ज़रूरत है। सत्ता (राज) से किसी भी समाज–देश–दुनिया का हित नहीं हो सका है। ‘सत्ता’ और ‘सिंहासन’ में ‘राज’ करने का भाव है और हमने देखा–भोगा है कि राज करने वाले कभी लोकहित में कामकाज नहीं करते बल्कि उनका बरबस शोषण–उत्पीड़न ही करते हैं। सत्ता और सिंहासन के बरक्स सुविचारित और सर्वतोदक्ष शब्द हैं–‘शासन’ ‘सुशासन’।

दामोदर मोरे (बाएँ) और रमणिका गुप्ता (दायें)

समाज में समानता की कामना करने से पहले हमें सोचना–विचारना होगा कि एक–दूसरे का दमन कर शांति और समानता की स्थापना कदापि संभव नहीं हो सकती। सत्ता–सिंहासन के मार्ग से दमन–शोषण–षड़यंत्र–प्रतिशोध–प्रतिहिंसा ही उपजती है। इस बात से किसी को इन्कार नहीं होना चाहिए कि एक विशाल समुदायसदियों से दबा–कुचला गया परन्तु यदि उनका वह दर्द प्रतिशोध का रूप धारण कर ले तो इस भारत भूमि में कदापि समता, समरसता, सौहार्द और आनंद की सिद्धि नहीं हो सकेगी। दुनिया ने देखा है कि जाति–वर्ग–आधारित संरचना से अन्य जाति–वर्ग का दमन–शोषण होता आया है। मायावती का ‘सत्ताभोग’ सबने देखा और उसके विकास के पैमानों को भी देखा–समझा–परखा।

सबने देखा–जाना कि बहुजन समाज का कितना उद्धार हुआ! मायावती ने बहुजन समाज को जाति की ‘माया’ में फाँसकर अपने–आपको स्थापित करने में कोई क़सर नहीं छोड़ी परन्तु बहुजन समाज का विकास अवरोधित ही रहा। इसके प्रमाणस्वरूप वहाँ की जनता की वर्तमान स्थिति को देखा और समझा जा सकता है। जाति–धर्म के नाम पर लोगों को बहकाने वाले ऐसे राजनेताओं ने भारतवासियों को कभी एकजुट होने ही नहीं दिया। मेरे विचार में किसी भी कवि को राजनेताओं के सम्मोहन से बचना चाहिए।  उसे पुरस्कारों की राजनीति से भी बचना चाहिए और यदि पुरस्कार बटोर ही लिए हैं तो पुरस्कार लौटाने की राजनीति से भी बचना चाहिए। बाबा नागार्जुन को कांग्रेस से ऐसे ही सम्मोहन हो गया था, जिसको उन्होंने कालांतर में स्वीकारा भी और सुधारा भी।

दामोदर मोरे की कुछ कविताओं में तथा कुछेक कविताओं के कई अंशों में राजनीतिक चेतना का दर्शन होता है –“शहीदों के स्मारक ने/ तिरंगे से पूछा : स्वतंत्रता के पचास साल की/ उपलब्धियाँ क्या हैं…?/ स्थिर रह कर/ बोला तिरंगा…/ सस्ता हुआ है आदमी/ और जीवन हुआ है महँगा।” (सदियों के बहते ज़ख़्म, ‘पचास साल’, पृ. 88); “प्रिय आज़ादी आ… आ/ पंछी बनकर आ/ पवन बनकर आ/ दुखियों की दवा बनकर आ/ रोटी बनकर आ/ कपड़ा बनकर आ/ अंधे की काठी बनकर आ।” (वही, ‘मेरी प्यारी दुल्हन’, पृ. 90); “संविधान से मैंने कहा – धीरे–धीरे तेरे पन्ने/ फाड़े जा रहे हैं/ तो भी तू चुप…?” (नीले शब्दों की छाया में, ‘वे सब गूँगे हैं’, पृ. 28) ; “मैंने गौर से अपनी गलियों में देखा –/ छाया हुआ था –/सब तरफ/ आज़ादी का घना अँधेरा।” (वही, ‘आज़ादी का अँधेरा’, पृ. 34) ; “आते हैं पंच वार्षिक योजना के बादल/ आये तो गरजते, गड़गड़ाते हैं बादल/ बिना बरसे ही चले जाते हैं बेईमान बादल/ यह है – प्यासा, भूखा भारत।” (वही, ‘वे मलमुखी हैं’, पृ. 52)कवि दामोदर ‘आज़ादी’,‘स्वतंत्रता के पचास साल’, ‘पंचवर्षीय योजना’ इत्यादि के माध्यम से सरकारों पर आक्षेप, कटाक्ष तो करते ही हैं परन्तु कविताओं में कहीं–कहीं उपहास एवं तिरस्कार का ‘अंडरटोन’ व्याप्त है तो अनेक जगहों पर वह मुखर हुआ है। कवि जब कहता है कि “अर्थ में भी अर्थ महसूस नहीं होता” (पलकें सुलग रही हैं, ‘तुम्हारा साथ न होने पर!’, पृ. 42) तो इसके बहुत गहरे मायने हैं।

सर्वविदित है कि जाति–व्यवस्था को बनाए रखने और उसे वोट बैंक में तब्दील करने का खेल आज़ादी के बाद से निरंतर चलता रहा है। ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा लगता रहा लेकिन वह निरंतर बढ़ती ही रही। देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल ने देश पर सर्वाधिक ‘राज’ किया और परिवारवाद, भाई–भतीजावाद, भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा दिया और विकराल होती ग़रीबी–भूखमरी–बेरोज़गारी का कोई इलाज नहीं किया। ताज्जुब नहीं कि देशी–विदेशी फ़िल्मों में भारत की तस्वीरें मैले–कुचैले कपड़ों में भीखमंगे बच्चे–बूढ़े, बलात्कारी–दुराचारियों से भरी पड़ी हैं।

सुदीर्घ राजनीतिक सुखोपभोग में बहुजन समाज का साथ लेकर ‘हाथ’ वालों ने अपनी राजनीतिक आशा–आकांक्षाओं की भलीभाँति पूर्ति कर ली किन्तु देश–समाज के हितों तक पहुँचते–पहुँचते उनके हाथ प्रायः खाली ही रहे। संविधान की मर्यादाओं को ताक पर रखकर उसे फाड़ने तक की हिम्मत इन राजनीतिक पार्टियों के धुरंधर नेताओं को हासिल है। दो–राय नहीं कि कवि इस सामाजिक–राजनीतिक क्षय को देखकर ठगा–ठगा सा महसूस करता है। यद्यपि लोकहित में कविताओं का सृजन कर लोगों में चेतना भरने का सतत उपक्रम जारी रखने में ही अपने दायित्व की पूर्ति मानता है। वह देशहित–लोकहित में अपनी आस्था से च्युत नहीं होता, बल्कि अत्यंत आत्मीयता से इस दिशा में चिंतन–मंथन करते हुए अपनी सृजनधर्मिता का निर्वाह करता है।

सार्वत्रिक सामाजिक क्षय से बचने का एकमेव सूत्र एक–दूसरे से एकरूप, एकरंग, एकरस, एकाकारहो जाना है। ऐसा न होने की स्थिति में कवि को “अर्थ में भी अर्थ महसूस नहीं होता” (पलकें सुलग रही हैं, ‘तुम्हारा साथ न होने पर!’, पृ. 42) कवि दामोदर की कविता ‘डर का बन्दर’ यद्यपि दाम्पत्य जीवन का अंकन करती है लेकिन इसकी पंक्तियाँ “तू मेरा–मैं तेरी” (पिछला चक्का, पृ. 27)‘स्व’ से ‘सर्वस्व’ हो जाने की कामना को अभिव्यक्त करती है। उपर्युक्त पंक्तियों में अर्थ की कई छटाएँ हैं परन्तु शब्दों के अंतस में जो सम्बन्धों की अर्थहीनता है, वह तू–मैं के द्वैत में दिखाई ही देती है। हमारे समाज की मूल समस्या का रहस्य निश्‍चय ही इसी द्वैत में है। कवि द्वारा शब्द–चयन और उनमें नए सिरे से अर्थापदेश और अर्थापन की प्रक्रिया में अनेक शब्द कई अर्थछटाओं के साथ उपस्थित हुए हैं।

कवि दामोदर मोरे की कविताएँ पढ़ते हुए मुझे कथाकार अरुण प्रकाश का सहज ही स्मरण हो आया। मेरी कविताओं पर अपनी बेबाक टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था– “इसमें कोई दो–राय नहीं कि तुम अच्छा लिखते हो। मेरी मानो तो बहुत गज़ब लिखते हो लेकिन एक समस्या है! यह कि तुम्हारा कवि बहुत अधिक विवरण देता है और विवरण देने वाले कवि और उसकी कविता को लोग प्रायः नोटिस नहीं करते। यह भी कि अक्सर इसमें सपाटबयानी का ख़तरा होता है। कविता में जब भी किसी परिघटना की तफ़सील दो तो प्रायः प्रयत्न करो कि संकेतों–बिम्बों–प्रतीकों में वह व्यक्त हो अन्यथा वह कविता कहाँ रह जाती है, वह तो रपट बन जाती है, जो तुम्हारी कविता बनने से पहले टीवी चैनलों पर प्रदर्शित हो जाती है।

कविता में अर्थ की विभिन्न छटाएँ उत्पन्न करने की शक्ति संचित करो, दो पंक्तियों के बीच संगुफित उन अर्थों–अभिप्रायों को सह्रदयी एवं आलोचक स्वयं निपट लेगा। इससे अच्छा है कि तुम कहानियाँ और उपन्यास लिखो! यह तुम्हारी कविता का एक्स्टेन्शन होगा। विश्‍वास रखो बहुत अच्छा करोगे।” (प्रसंग 17–18, मई 2013, सं. शम्भु बादल, पृ. 23) तब से मैं कविता में कहानी की खोज करता हूँ। कवि दामोदर मोरे की कविताओं में मुझे कहानी के लिए ‘एक्स्टेन्शन’ दिखाई देते हैं। बहरहाल, कविता शब्दों में नहीं। कविता में शब्द नहीं। शमशेर ने ‘राग’ कविता में कहा है ना–‘शब्द… कहाँ हैं?’ वास्तव में कविता निःशब्द निस्तब्ध (noiseless) अपने रस से पाठकों को रसप्लावित करती है। यही कविता की शक्ति है। इसे रचना ही कवि की कवित्व–शक्ति है। कवि दामोदर मोरे की कविताओं में यह शक्ति अपनी संपूर्णता में उपस्थित है।

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03May
मूल्यांकन

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