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कथा संवेद

कथा-संवेद – 12

 

इस कहानी को आप कथाकार की आवाज में नीचे दिये गये वीडियो से सुन भी सकते हैं:

 

 

सूक्ष्म संवेदनाओं की कथाकार रश्मि शर्मा का जन्म 02.04.1974 को मेहसी, जिला मोतिहारी (बिहार) में हुआ। लगभग एक दशक से कविता की दुनिया में सक्रिय रश्मि शर्मा की कथायात्रा 24 जुलाई 2016 को प्रभात खबर में प्रकाशित ‘मन के कपाट’ शीर्षक कहानी से शुरू हुई। अबतक इनके तीन कविता-संग्रह ‘नदी को सोचने दो’, ‘मन हुआ पलाश’ और ‘वक्त की अलगनी पर’ प्रकाशित हैं।

भारत और दुनिया के साहित्येतिहास में मिथकों के पुनर्लेखन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। ‘निर्वसन’ के केंद्र में सीता द्वारा दशरथ के पिंडदान की कथा है। फल्गू नदी के किनारे घटित इस कथा में सीता और राम पौराणिक या पारलौकिक पात्रों की तरह नहीं, बल्कि सामान्य स्त्री-पुरुष की तरह परस्पर बर्ताव करते हैं। स्त्री-पुरुष के बीच घटित होनेवाली स्वाभाविक परिस्थितियों के रेशे से निर्मित यह कहानी मिथकीय कथा-परिधि का अतिक्रमण कर बहुत सहजता से समकालीन यथार्थ के धरातल पर अपना आकार ग्रहण करती है। मिथक की जादुई संरचना में स्मृति, भ्रम, संभावना और पूर्वदीप्ति के उपकरणों से प्रवेश करती यह कहानी आधुनिक लैंगिक विमर्श का एक व्यावहारिक और विश्वसनीय पाठ तो रचती ही है, हमेशा से कही-सुनी गई मिथकीय कथा के छूट गये या कि छोड़ दिये गये पक्षों को भी संभाव्य की तरह प्रस्तुत करती है। नदी, वनस्पति और मानवेतर प्राणियों की सजीव उपस्थिति के बीच इस कहानी के चरित्र जिस तरह अपने मौलिक और आदिम स्वरूप में आ खड़े होते हैं, उसी में इसके शीर्षक की सार्थकता सन्निहित है। एक ऐसे समय में जब मिथकों की पुनर्प्रस्तुति के बहाने यथास्थितिवाद का उत्सव मनाया जा रहा हो, इस कहानी में प्रश्न, प्रतिरोध और तार्किकता की प्रस्तावना आश्वस्तिकारक है।   

राकेश बिहारी

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नि‍र्वसन

(‘रघुनाथगाथा’ लिखनेवालों के नाम जिन्होंने सीता के मन की आवाज़ कभी नहीं सुनी।)

  • रश्मि शर्मा

 

सूर्य की किरणों के आ मिलने से, निरंजना की सफ़ेद धारा पर सोने की चमक चढ़ गयी थी। सूरज ठीक सिर के ऊपर आ चुका था, सीता ने आकाश की ओर देख समय का अंदाजा लगाया। किनारे की रेत गर्म हो चुकी थी, जिस पर चलना अब उनके लिए लगभग मुश्किल हो रहा था। उन्हें गहन अचरज हुआ कि कुछ घंटे पूर्व तक वह कैसे इन रेतों से खेल रही थीं। सूर्य के ताप और प्रतीक्षा की ऊब से उनका तन-मन झुलसा जा रहा था। यह गर्म रेत का प्रभाव था या प्रतीक्षा से उत्पन्न उद्विग्नता, वह बेचैन होकर इधर-उधर चलने लगीं। निरंजना के रेतीले तीर पर उग रहे उनके पदचिह्न कुछ दूर आगे तक जाते और फिर उन्हें काटते हुये पीछे की तरफ लौट आते। रेत की इस जलन ने जंगल के कंकड़ीले पथ की नुकीली स्मृतियों को नए सिरे से हरा कर दिया था। अचानक ही सीता को जनकपुर की पुष्प वाटिका की याद हो आई… नैहर की नेह-स्मृतियों ने उनकी आँखें नम कर दीं। 

चित्र : अनुप्रिया

 दस दिनों की लम्बी पदयात्रा के बाद कल शाम वे गया पहुंचे हैं। सीता ने मन ही मन अनुमान लगाया, एक दिन में आठ कोस यानी कोई अस्सी कोस दूर आ चुकी है वह अपनी ससुराल से। जनकपुर तो फिर चालीस कोस से भी कम की दूरी पर होगा यहाँ से… पर मैथिली के लिए तो अब जाने कितने हजार कोस दूर हो चुकी है मिथिला। उन्होंने सोचा, पिंडदान के बाद वह राम से कहेंगी कि उसे मिथिला ले चलें….पर अगले ही क्षण लगा, मिथिला किस मुंह के साथ जाएंगी वह। क्या बताएंगी अपनी सखियों को कि शादी के बाद उन्हें सुख कभी नसीब नहीं हुआ। सीता ने बरजा खुद को… आंचल की किनारी से आखेँ पोछी। जाने कहाँ रह गये राम … वनवास के बाद तो जैसे प्रतीक्षा की आदत सी-ही हो गयी है उन्हें। पर अभी तो पिंडदान का समय बीता जा रहा है…।      

सीता ने रेत के लम्बे फैलाव के उस हिस्से की प्रदक्षिणा तेज कर दी है। वे खुद बाज़ार तक जाकर देखना चाहती हैं कि कहाँ रह गये राम और लक्ष्मण। भला पिंड और पूजन की सामाग्री खरीद लाने में क्यों हो रहा है इतना विलम्ब? तरह-तरह की आशंकाओं से भरी सीता दूसरे ही पल इस सोच को झटक देती हैं। क्‍या पता, इधर से वह नि‍कलें और दूसरी दि‍शा से दोनों भाई यहाँ आ पहुंचे। फिर उन्हें न पाकर कितना परेशान हो जाएंगे दोनों। बार-बार वनवास के दिनों की स्मृतियाँ बिजली की तरह कौंधती हैं मस्तिष्क पर… तब तो वन में उन्हें मेरी सुरक्षा की हमेशा चिंता रहती थी। दोनों भाई कभी एक साथ नहीं गये उसे अकेली कुटिया में छोड़कर। कोई एक जाता और दूसरे भाई को लाख हिदायतें थमा जाता। आज भी बाज़ार लक्ष्मण ही गये थे। लेकिन विलम्ब होता देख बाद में राम को खुद भेजा था। राम ने थोड़ी ना-नुकुर भी की थी…पर खुद सीता ने ही उन्हें आश्वस्त किया था- ‘यह जंगल नहीं, बस थोड़ी ही दूर पर भरा-पूरा गाँव है…अब और विलम्ब हुआ तो पिंडदान का समय निकल जाएगा।‘ पर अब उस आश्वस्ति पर जाने किन संशयों ने डेरा डाल लिया है। पंचवटी के उस शापित दिन की स्मृतियाँ उनकी आँखों के आगे कुलांचे मार रही हैं… वहाँ उन्होंने लक्ष्मण को जबरन भेजा था, यहाँ राम को। भय और आशंकाओं की नौका में बैठी सीता खुद जैसे अपने हाथों को पतवार बना राम-लक्ष्मण तक पहुँच जाना चाहती हैं।

सुबह जब लक्ष्मण को राम ने बाज़ार भेजा था, सूरज के रंग में घुला केसरयुक्त सुनहलापन बहुत प्रीतिकर लग रहा था। अभी तो सूरज की तरफ आँखें भी नहीं ठहरतीं। हाँ, निरंजना की दूधिया जलराशि जरूर सीता को दूर से लुभाती है। राम ने जाते हुये कहीं और न जाने की हिदायत दी थी, नदी में उतरने से तो बिलकुल ही मना किया था। पर तब तीर पर फैली यह बालुकाराशि कितनी शीतल थी। पर अब तो यह इतनी गर्म हो चुकी है कि पूछो मत। जाने सूरज भी आज क्या खाकर आया है कि अपने ताप से अश्विन में बैशाख- ज्येष्ठ को भी पीछे छोड़ देना चाहता है। कोई पांच सौ गज की दूरी पर निरंजना और मोहिनी का संगम है। सीता को नदियों से एक अनकहा प्रेम है। सुबह से खुद को किसी तरह रोके रखा था, पर तपती रेत की बढ़ती जलन उनके संयम का अब और साथ नहीं देती और उनके कदम खुद ब खुद निरंजना और मोहिनी के संगम की तरफ बढ़ चलते हैं।

चित्र : अनुप्रिया

फल्गू के दूधिया जल में पाँव रखकर सीता एक लघु शिलाखंड पर बैठी हैं। सूरज अब भी आग उगलने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा पर नदी की सतह के स्पर्श ने उन्हें बड़ी राहत दी है। सुबह से हलक में एक घूंट पानी तक नहीं गया, प्यास से गला सूख रहा। सीता ने झुककर हाथ मुंह धोये, दोनों हथेलियों को जोड़ कर दोना बनाया और उसमें फल्गू का निर्मल जल भर लिया। पिपासा शांत करने के लिए सीता अपनी अंजुरी को अधरों तक लाती ही कि उनके भीतर जाने क्या हुआ और प्रकाश की-सी तेज गति से उन्होंने अपनी हथेलियों का वह दोना फल्गू की सतह पर खुला छोड़ दिया।

कब से सीता को अपलक निहारती फल्गू उनके इस व्यवहार से किंचित परेशान हुई थी।  फल्गू की सतह पर एक लघु हिलोर उठी। नदियों से सीता का पुराना लगाव है, उन्हें अपनी तरुणाई के वे दिन याद आ गये जब सखियों के साथ अक्सर वे कमला नदी के तट पर घंटों जलक्रीड़ा करती थीं। राम के साथ कई बार सरयू दर्शन का भी अवसर मिला, पर कमला और सरयू के स्पर्श में एक अंतर उन्हें हमेशा महसूस हुआ है। आज फल्गू की इस हिलोर में सीता ने वर्षों बाद अपने लिए कमला वाले ममत्व और बहनापे को महसूस किया। उसके स्नेहिल स्पर्श के जवाब में सहज छलछला आई सीता की आँखों में प्रश्न की एक हल्की सी लकीर कौंधी है- “आप मुझसे कुछ कहना चाहती हैं?”

“मैं आपको बहुत देर से देख रही हूँ…. घंटों से आप बेचैन चहलकदमी कर रही हैं… मैंने गौर किया कि आपने जलपान करने के लिए अपनी अंजुरि भी भर ली थी, लेकिन अगले ही पल आपने अंजुरी का जल पुनः मुझी में छोड़ दिया। अब तक जाने कितने लोगों ने मेरा जल पी कर अपनी प्यास बुझाई होगी। पर… ”

“हाँ, मुझे बहुत तेज प्यास लगी थी, पर ठीक पानी पीने के वक्त मुझे बचपन में अपनी माँ से सुनी बात याद हो आई… ‘जब तक पिंडदान का कार्य सम्पन्न नहीं हो जाये हमें अन्न जल ग्रहण नहीं करना चाहिए।’”

फल्गू की सतह पर एक और हिलकोर उठी… “पर पिंडदान तो पुरुष करते हैं….”

‘’आपने ठीक समझा, आज मेरे पति अपने पिता का पिंडदान करनेवाले हैं… मेरे पति और देवर पिंड और पूजन की सामग्री लाने बाजार तक गये हैं। उन्हें गये बहुत देर हुई। क्या बाज़ार यहाँ से बहुत दूर है?’’  प्रतीक्षा की ऊब से घिरी सीता ने बातचीत की उम्मीद में हौले से फल्गू की दूधिया सतह पर एक और प्रश्न छोड़ दिया था…

वैसे तो रोज जाने कितने लोग यहाँ आते हैं और पिंडदान कर चले जाते हैं। पर किसी अकेली स्त्री को इस तरह उदद्विग्न टहलते हुये फल्गू ने पहले गौर नहीं किया था। उसने सीता के प्रश्न को जिस तन्मयता से लपका है, उसमें उसकी बातचीत की इच्‍छा भी शामिल है… ‘’बहुत दूर तो नहीं, पर उतना पास भी नहीं है बाज़ार यहाँ से… आते ही होंगे वे लोग… तब तक चाहे तो आप यहीं बैठ सकती हैं।‘’ फल्गू ने बातचीत को कुछ आगे खिसकाया था- “आप कहाँ की रहनेवाली हैं?”   

फल्गू की इस आत्मीयता के लिए कृतज्ञता से भरी सीता के भीतर एक दुविधा-सी तिर आई। उन्‍होंने खुद से ही पूछा हो जैसे… कहाँ की है वह? मिथिला तो विवाह के साथ ही पराई हो गयी…अवधपुरी में स्नेह तो खूब मिला पर विवाह के बाद अब तक वहाँ जो उसके साथ होता रहा है उसे देख खुद को अयोध्या की कैसे कहे वह ! जब तक जंगल में रही, वन प्रांतर ही घर-द्वार लगते रहे, पर अब तो वह वन की भी नहीं रहीं। सीता ने सकुचाते हुये कहा – ”मैं मि‍थि‍लानरेश जनक की पुत्री और अयोध्‍या के राजा राम की पत्‍नी हूँ। अपने पति‍ और देवर लक्ष्‍मण के साथ हम तीर्थाटन पर हैं।”

राजा महाराजाओं का पिंडदान के लिए आना फल्गू के लिए कोई नई बात नहीं, पर उसके सुदीर्घ अनुभव में यह पहली बार हुआ है कि कोई राजा इस तरह बिना किसी लाव लश्कर के, एक आम आदमी की तरह आकर पूजन सामग्री की ख़रीदारी के लिए हाट-बाज़ार गया हो। फल्गू की कलकल धारा में सीता को हैरानी भरे प्रश्न की ध्वनि सुनाई पड़ती है…“अयोध्‍या के राजा स्‍वयं खरीदारी करने के लि‍ए हाट गये हैं! आपके अनुचर कहाँ हैं?” 

यात्रा पर निकलने के पूर्व कहे राम के शब्दों को दुहराते हुये सीता ने झुककर हौले से फल्गू की सतह को सहलाया है – “तीर्थ तो साक्षात ईश्वर का दरबार होते हैं…यहाँ क्या राजा और क्या रंक… तीर्थ पर तो सबको एक सामान्य नागरिक की तरह जाना चाहिए..।”

घर-परिवार से दूर अनजाने प्रदेश में एकाकी सीता को फल्गू के साथ इस बातचीत में बचपन के खेल जैसा आनन्द आने लगा है। जब कभी वो सखियों के इंतज़ार में अकेली होती अक्सर ही पिता की कुटिया के छाजन पर फैली पुष्पवल्लरियों से अपने मन की बातें बतियाया करती थीं। आज भी जैसे सीता ने खुद को उसी तरह दो हिस्सों में बांटकर वही खेल खेलना शुरू कर दिया है।

”इस तरह दूर एकटक क्‍या देख रही हैं सीता?” 

”तुम्‍हारे तट की सुंदरता देख रही हूँ सखी फल्‍गू! पुष्पाच्छादित वृक्षों से भरा यह प्रदेश कितना मनोरम है!” 

”क्‍या यह आपके सरयूतट से भी अधि‍क सुंदर है?”  

”सरयू का तट भी कम पवि‍त्र और नि‍र्मल नहीं, पर जाने क्यूँ तुम्हारे आसपास से बहनापे की एक खुशबू-सी आती है…”

”मैंने सुना है कि‍ आपने चौदह वर्ष का कठिन वनवास भोगा है और उसी दौरान दुष्‍ट रावण आपका अपहरण कर लंका ले गया था। क्या समुद्र से घिरे लंका में भी मुझ जैसी या आपके सरयू जैसी कोई नदी बहती है?” फल्‍गू तट की प्रशंसा करती सीता के दूसरे हिस्से में सहसा   लंका की यादें ताज़ा हो आईं।

रावण के अशोकवन के बहुत पास से बहती थी महाबली गंगा। पत्थरों से टकराकर निकलती उसकी आवाज़ का संगीत उन कठिन दिनों में कितना सुकून देता था उन्‍हें। लंका की वह सहेली उसे अक्सर याद आती है, पर कभी किसी से न कह सकी उसके बारे में। एक अकेली स्त्री, जिसका अपहरण हो गया हो, के मन को कभी सुकून भी मिल सकता है, जाने लोग क्या कहते यह जान-सुन कर…। लंका से आते हुये उन्‍होंने सोचा था कभी राम से बताएगी वह महाबली के सौंदर्य के बारे में। पर अग्नि परीक्षा के बाद उसने सुकून के उन पलों को मन के किसी तहखाने में बंद कर दिया था। महाबली गंगा के अनुपम सौंदर्य की यादों को बक्से में बंद लिहाफ की तरह निकाल कर फल्गू के तट पर धूप दिखाने को फैला दिया है सीता ने। बक्से में बंद स्मृतियों की लिहाफ की बोसीदा गंध हवा में फैलती जा रही है। तभी भीतर से एक आशंका होती है, कहीं इसी बीच राम-लक्ष्मण आ गये तो…? सीता ने महाबली गंगा की उन सुखद स्मृतियों को जल्दी से तहाकर अपने अंतर्मन के उसी तहखाने में रख दिया।

फल्गू किसी हमराज़ सहेली की तरह चुपचाप देखती है यह सब, पर एक भी शब्द नहीं बोलती…

चित्र : अनुप्रिया

सीता नहीं चाहतीं कि महाबली गंगा या लंका की याद की कोई रेखा भी शेष रह जाये उनके आसपास। माहौल की चुप्पी को धीरे से धकेलते हुये उन्होंने बातचीत को एक दूसरी दिशा देने की कोशिश की है…  

”अन्‍यथा न लो, तो एक बात पूछूं,” 

फल्‍गू अचकचाकर सीता की ओर देखती है –   

”फल्‍गु का अर्थ तो रि‍क्‍त होता है, परंतु तुम फलदायि‍नी नदी में कैसे परि‍र्वति‍त हो गयी? और तुम्‍हारा जल इतना दूधि‍या और शहद-सा मीठा कैसे है? इस पुण्यधरा पर तुम कहाँ से और कैसे उतर आई?” सीता ने फल्गू के आगे जैसे प्रश्नों की झड़ी-सी लगा दी है ।

 ”मेरा उद्गम छोटानागपुर पठार के उत्‍तरी भाग में है। मुझमें कई छोटी-छोटी सरि‍ताएं मि‍लती हैं, तब जाकर मुख्‍य धारा का नि‍र्माण होता है। इस मुख्‍यधारा को ‘लि‍लाजन’ या  ‘नि‍रंजना’ के नाम से भी पुकारा जाता है। यहाँ गया पहुंचकर मोहना नामक सहायक नदी से मेरा मि‍लन होता है और हमदोनों मि‍लकर ही फल्‍गु नदी कहलाती हैं। हमारे मि‍लन की दो मील लम्बी दोआब भूमि‍ ही ‘धर्मारण्‍य’ क्षेत्र है। इसलि‍ए मेरे तट पर पिंडदान का अर्थ होता है – सुफल प्राप्‍त करना।”  

अपना इति‍हास बताते हुए फल्गू की चमक और बढ़ गयी है। तनि‍क इठलाकर वह आगे कहती है-  ” मेरा जल इतना स्‍वच्‍छ है कि‍ पत्‍थरों से टकराकर दूधि‍या दि‍खाई पड़ता है। हाँ, शहद सा मीठा लगने का कारण यह है कि‍ ब्रह्मयोनि‍ पहाड़ी के पीछे घना जंगल है। वहाँ असंख्‍य मधुमक्‍खि‍यों के छत्‍ते हैं, जि‍नसे भारी मात्रा में शहद टपकता रहता है। यह मधुश्रवा नदी से होकर मुझमें समाहि‍त हो जाती है और मेरा दूधि‍या जल मीठा हो जाता है।”  कहते हुये खि‍लखि‍ला कर हंस पड़ी फल्गू।

सीता ने बड़े आवेग के साथ प्रश्न किया था, पर अब उनकी रुचि उसका उत्तर सुनने में नहीं। अनमने ढंग से फल्गू की हंसी में साथ देती सीता के चेहरे पर उनकी व्यग्रता साफ़ दिख रही है। अभी-अभी सीता की सहेली बनी फल्गू ने उनके भीतर चल रही बेचैनी को टटोलने की कोशिश की है… “सीता, आप मेरे साथ हंस तो रही हैं, लेकिन आपके चेहरे पर हंसी की खनक के बजाय बेचैनी की लकीरें दिख रही हैं। आप इतनी परेशान क्यों हैं?’  

सीता ने उत्तर में अपना पिछला प्रश्न ही फिर से दुहराया है। पर इस बार इसमें प्रश्न से ज्यादा चिंता का रंग घुला है- ”क्‍या हाट यहाँ से बहुत दूर है सखी..? राम और लक्ष्‍मण को गये कई घंटे बीत गये। पिंडदान का समय तो बीत ही रहा है, मुझे अब उनकी चिंता भी होने लगी है। कहीं कोई अनि‍ष्‍ट न घट गया हो…” सीता की आवाज़ कातर हुई जा रही है।

”प्रतिकूल मत सोचो सखी, पूजन और पिंड की सामग्री इकट्ठा करने में देर हुई होगी। तनिक और धीरज रखो, वे आने ही वाले होंगे…।”

सीता ने सोचना चाहा कि फल्गू ठीक कह रही है, पर जो धीरज रख ले वह मन ही क्या, वह तो ऐसी घड़ियों में प्रतिकूल ही सोचता है। सीता की बेचैनी जैसे और ज्यादा बढ़ गयी। वो नदी से बाहर निकल एक बार पुनः किनारे पर चहलकदमी करने लगीं। धूप की रोशनी से मिलकर पके शहद-सी होने लगी फल्गू की दूधिया रंगत, पास ही झाड़ियों में खिले केतकी के फूल, इन सबके होते हुये भी सीता को सुकून नहीं था। कुछ देर यूं ही चहलकदमी करने के बाद वे पास ही पड़े एक पत्थर पर बैठ गईं। पत्थर का एक बड़ा हिस्सा रेत में धंसा हुआ था।

पितातुल्य श्वसुर दशरथ की स्मृतियाँ सीता को लगातार भावुक किए जा रही थी। कितना स्नेह करते थे वे उनसे, अपने जीते जी कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी उन्होंने। जंगल जाते हुये उन्होंने सुमंत्र को साथ भेजा था ताकि वे समझा बुझाकर उन्हें अयोध्या वापस लौटा लाएँ। उन पिता के आखिरी दर्शन न कर पाने का दुख तो कभी मन से जानेवाला नहीं, पर आज उनके पिंडदान का मुहूर्त भी बीता जा रहा, यह सोचकर उसकी तकलीफ कई गुणा बढ़ गयी है। सीता ने फल्गू की तरफ अपनी पीठ कर ली। वो नहीं चाहती कि कोई उनकी आँखों के आँसू देखे।        

विगत की स्मृतियों में खोई हैं सीता कि तभी उन्होंने सामने से रेत के एक बड़े टुकड़े को अपनी तरफ आते देखा। देखते ही देखते रेत का वह बगूला एक बहुकोणीय चक्रवात की शक्ल में तब्दील होने लगा, जिसमें महाराज दशरथ की कई-कई वर्तुल छवियाँ आकार ग्रहण कर रही थीं। सीता ने सोचा दशरथ की ये आकृतियाँ स्मृतियों के अंधड़ में उपजे उसके भ्रम का परिणाम है। सीता ने आँचल की किनारी से अपने आँख साफ किए पर उनका यह प्रयास बेअसर था। दशरथ की वे छवियाँ और गाढ़ी हुई जा रही थीं। सीता को लगा जैसे दशरथ की आत्मा की प्रतिकृतियों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया है। सीता ने आँखें बंद किए और अंतस्तल की अंतिम गहराइयों से पितरों का आह्वान किया… नदी के ऊपर दूसरी तरफ से आते हुये दो हाथ उन्हें दिखाई पड़े। सीता ने उन हाथों को सर नवाकर प्रणाम कि‍या और आग्रहभरे स्वर में पूछा-  ”क्‍या मुझे ज्ञात हो सकता है कि‍ हमारे पि‍तरों में से ये किनके हाथ हैं? आप मुझे अपना परिचय देने की कृपा करें तो मैं आपका यथोचित सत्कार कर सकूँ।”

दसों दिशाओं से जैसे एक साथ आवाज गूंजी थी कि वे राजा दशरथ हैं और पिंडदान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दिग दिगंत से गूंजी इस आवाज़ के बाद सब कुछ सहसा सामान्य हो गया था। अभी-अभी आए अंधड़ से बाहर निकल सीता एक बार पुनः प्रतीक्षा के उसी बियाबान में हो आई थी। लेकिन अब वह खुद को उस तरह असहाय या लाचार नहीं महसूस कर रही थीं। उन्‍होंने सूरज की तरफ देखकर एक बार फिर समय का अनुमान लगाया। पिंडदान का मुहूर्त अब बीतने ही को था। कुछ मिनटों पहले दिखी दशरथ की चतुर्दिक प्रतिकृतियों का एहसास एक बार फिर से कौंधा था। अब और राम का इंतजार महाराज की आत्मा की अतृप्ति का कारण हो सकता था। निमिष भर की देर नहीं हुई और उनके भीतर निश्चय की एक मजबूत लकीर उग आई। जिस पिता का उन पर इतना स्नेह रहा है उनका पिंडदान वह क्यों नहीं कर सकती!        

सीता ने स्वयं पिंडदान का निर्णय तो ले लिया पर पिंड और पूजन सामग्री की अनुपलब्धता के अहसास ने एक बार पुनः उनके चेहरे पर चिंता की गहन लकीरें खींच दीं। आत्मनिर्णय के सुख से दीप्त क्षण भर पहले की आभा पलक झपकते ही क्लांत हो गयी थी- ” पिंड बनाने के लि‍ए न जौ का आटा है न ति‍ल। अब भला कैसे पिंडदान करूं? ” 

पशोपेश में पड़ गईं सीता। कुतप समय पार हुआ जाना चाहता था। व्‍यग्र व्यथित सीता ने मन ही मन गौरी को गुहराया… ‘आपने हमेशा मेरी मदद की है…आज भी आप ही कोई रास्ता सुझाएँ…।’ तभी उन्हें अपने पिता की याद हो आई। याद हो आया उनकी कुटिया के ठीक सामने कुछ दूरी पर स्थित उनका वह पूजाघर जहाँ हर सुबह राज पुरोहित शतानंद स्वयं पार्थिव शि‍वलिंग तैयार किया करते थे। मिट्टी में गाय का दूध, घी, गोबर, गुड़ और शहद मिलाकर पार्थिव लिंग तैयार करते राज पुरोहित तथा बेलपत्र, धतूरा और अकवन का पुष्प अर्पित कर नित्य पार्थिव पूजन करते पिता जनक की उस छवि के जेहन में उभरते ही जैसे सीता को अपनी समस्या का समाधान मिल गया… ‘यदि मिट्टी के शिव हो सकते हैं तो रेत का पिंड क्यों नहीं बन सकता?’

सीता ने चारों तरफ नज़रें दौड़ाई… दूर केतकी के फूल खि‍ले थे। वहीं पास की झाड़ि‍यों में उगे हरे पत्‍तों को एक गाय चर रही थी। कुछ दूरी पर एक वि‍शाल वटवृक्ष भी पास ही में था और नदी-तट पर दूर तक महीन रेत बि‍छी थी। कुछ कदम चलकर सीता वटवृक्ष तक आईं, देखा उसके चारों तरफ पक्का चबूतरा बना था। वटवृक्ष की डाली से कुछ पत्ते तोड़ उनका दोना बनाया और फुर्ती से उस दोने में फल्गू का जल भर लाई… वटवृक्ष के चबूतरे के एक हिस्से को आँचल से झाड़कर फल्गू के जल से पवित्र किया, अंजुरी भर-भर कर फल्गू की रेत ले आई तथा शहद घुले फल्गू के दूधिया जल और गाय के गोबर के साथ फल्गू की महीन रेत को गूँथकर पिंड तैयार करने लगी।

वटवृक्ष के हरे पत्तों से तैयार दोने में पिंड लिए फल्गू में खड़ी होकर जब सीता ने महाराज दशरथ का आह्वान किया उन्हें सामने की लहर में वही दोनों हाथ दिखाई दिये। सीता ने श्रद्धापूर्वक नम आँखों से पिंड का वह दोना उन्हें समर्पित कर दिया। सीता के कानों में सहसा ही जैसे महाराज दशरथ के स्वर गूँजे हों – ‘सीता, मैं तुम्हारे चढ़ावे से प्रसन्न और तृप्त हूँ। तुम्हारा तर्पण स्वीकार कर अब मैं जा रहा हूँ।’

राम के शक्की स्वभाव को सीता खूब जानती थीं। उनके भीतर एक नई आशंका ने सर उठाया, पिंडदान सम्पन्न होने की इस बात पर उन्हें कैसे भरोसा दिलाएगी वह। हाट से राम के लौटने तक वो रोक लेना चाहती थीं महाराज दशरथ को, पर कुछ क्षण पहले दिखी हाथों की उस आकृति का अब वहाँ कोई नामोनिशान तक नहीं थ। सामने सिर्फ फल्गू की जलराशि का फैलाव था, जिसमें दूर किसी नाव की सी-आकृति हौले-हौले डोल रही थी।

तर्पण से तृप्त महाराज दशरथ के अंतर्ध्यान होने के बाद जब सीता वटवृक्ष के समीप लौटीं सामने से राम, लक्ष्मण हाथ में पूजन सामग्री का थैला लिए तेज कदमों से आते दिखे…।

सीता उनसे लौटने में हुई देर का कारण और कुशल-क्षेम पूछतीं इसके पहले ही राम ने उन्हें थैला पकड़ाते हुये पिंड तैयार करने को कहा। सीता ने उत्साहपूर्वक उनसे पिता दशरथ की आत्मा के आगमन और पिंडदान की सारी घटना कह सुनाई।         

खीज, अधैर्य और अवि‍श्‍वास से भरे राम ने सीता की ओर देखते हुए कहा –

”पिंडदान का मुहूर्त बीता जा रहा है, सीता! यह परिहास का समय नहीं है। भला यह कैसे संभव है कि यथोचित सामग्री के बिना पिंडदान सम्पन्न हो जाये और पिता संतुष्ट भी हो लें? यदि तुमने पिंडदान के नाम पर कुछ ऐसा किया भी है तो उसका कोई अर्थ नहीं। क्या तुम इतना भी नहीं जानती कि पिंडदान का अधिकार सिर्फ ज्येष्ठ पुत्र को है?” राम की आवाज़ में अविश्वास और तल्खी दोनों के भाव मौजूद थे।

“आप मेरे कहे पर भरोसा नहीं करेंगे इसकी आशंका तो मुझे भी थी, पर अचानक ही आपके भीतर का पुरुष भी जाग जाएगा मैंने नहीं सोचा था। यदि आप महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र हैं तो मैं भी उनकी पुत्रवधू हूँ। उन्होंने हमेशा मुझे अपनी पुत्री का स्नेह दिया है, और मैंने आपसे वही कहा है जो सत्य है।    

” सत्‍य? जो कार्य ही असंभव है, उसके लि‍ए सत्‍य-असत्‍य पर क्‍या वि‍चार करना। और हाँ तुम पुत्री समान अवश्‍य हो, पुत्री नहीं। उस पर भी तर्पण का अधि‍कार तो सिर्फ पुत्र को ही दि‍या गया है, पुत्रवधू भला कैसे यह कर सकती है?” राम के आवाज़ की तल्खी में अब गुस्से का रंग भी आ घुला है। 

राम के कठोर शब्द सीता के हृदय को छलनी किए दे रहे हैं। विवाह के पश्चात जिस वैदेही ने राजा दशरथ में ही पिता जनक की छवि देखी, माता कौशल्या को ही जननी सुनैना का सम्मान दिया, नैहर जाने की कभी जिद तक नहीं की, उसे ही आज राम पुत्री नहीं, पुत्री समान होने का ताना दे रहे हैं। पिता दशरथ का पिंडदान समय से हो जाये, उनकी आत्मा तर्पण से तृप्त हो, यही तो चाहा था न उन्‍होंने। उनकी यह सदिच्छा पति के पौरुषी अहम के आड़े आ जाएगी, सीता ने कल्पना तक न की थी। यह सोचकर कि राम ने कभी उन पर विश्वास नहीं किया, सीता के भीतर भी जैसे गुस्सा फूट रहा है, पर खुद को किसी तरह नियंत्रित कर वह अपने सच का प्रमाण देना चाहतीं है।

 “ राम! मेरे पिंडदान को स्वयं पिता दशरथ ने स्वीकार किया है, उसके कई साक्षी हैं यहाँ, यदि आपको मुझपर भरोसा नहीं तो आप खुद उनसे ही पूछ लीजिये। मैं अभी बुलाती हूँ उन्हें…” ऐसा कहते हुये सीता ने आवाज़ दी- ”सखी फल्गू, आओ मैं तुम्‍हें अपने पति‍ और देवर से मि‍लवाती हूँ।‘’

फल्गू ने राम और लक्ष्‍मण का अभिवादन कर उनसे किंचित शि‍कायत करते हुए कहा-  ” आपलोगों ने सीता को बहुत प्रतीक्षा करवाई। देखिये तो तबसे धूप में बैठी-बैठी  कुम्‍हला गयी हैं मेरी सखी। हाट में इतनी देर कैसे हो गयी आपलोगों को?” फल्गू को सीता ने सखी कहकर संबोधि‍त कि‍या था, इसी नाते उसने अपनी वाणी में मनोवि‍नोद का रस घोल दिया था।

राम ने अपने चेहरे पर शुष्क सी तटस्थता ओढ़ ली थी जैसे कुछ सुना ही नहीं। फल्गू की दृष्‍टि‍ में शामिल अपने लिए एक अनकहे तंज़ के भाव को पढ़ती हुई सीता के लिए राम का यह व्यवहार अप्रत्याशित था। उन्हें शादी के समय अपनी सखियों के साथ की गयी उनकी ठिठोलियों की याद हो आई। सीता को आश्‍चर्य हुआ कि सूर्पणखा तक से परिहास करनेवाले राम ने उनकी सहेली की बातों का उत्तर देना तो दूर, उसके अभिवादन के जवाब में तनिक मुस्कुराए तक नहीं।

”हे फल्‍गू, सीता कह रही हैं कि हमारी अनुपस्थिति में मेरे पिता महाराज दशरथ की आत्मा के कहे अनुसार इसने उनका पिंडदान किया है। सच बताएं, क्या आपने ऐसा देखा है?

अपने विनोदपूर्ण प्रश्न के उत्तर में राम के इस अप्रत्याशित और रुक्षपूर्ण प्रश्न ने फल्गू को किंचित परेशान कर दिया। उसने सोचा जिसे अपनी जीवनसंगिनी की बात पर भरोसा नहीं, वह भला उसकी बात पर क्या भरोसा करेगा। उसे लगा पति-पत्नी के विवाद के बीच उसका न पड़ना ही बेहतर है।

”आपके जाने के बाद सीता बहुत देर तक मेरे साथ थी। उस बीच हमने खूब बातें भी की। लेकिन बाद में वह उठकर उस वटवृक्ष की तरफ चली गयी थी। वहाँ क्या हुआ मुझे मालूम नहीं।” फल्गू के उत्तर से स्तब्ध सीता एकटक उसकी तरफ देख रही थी और वह ऐसा कहते हुये लगातार सीता से निगाहें चुरा रही थी। सीता ने कल्पना भी नहीं की थी कि कुछ घंटे पूर्व जिससे उनका बहनापा हुआ है, वह इस तरह सच से मुकर जाएगी। लेकिन अब वह कर भी क्या सकती हैं। फल्गू के इस तरह मुकर जाने के बाद एक तरफ जहाँ सीता के चेहरे पर  बेबसी का रंग गहराने लगा था, वहीं राम के चेहरे पर कुछ देर पहले उग आई व्यंग्य की लकीरें और ज्यादा तीक्ष्ण हो आई थीं।

फल्‍गू से नि‍गाहें हटाकर सीता एक बार पुनः राम के सम्मुख थीं- ” मुझे नहीं पता कि ‍फल्गू की क्‍या वि‍वशता थी कि‍ उसने सत्‍य का साथ नहीं दि‍या, मगर मेरे पास अभी और भी गवाह हैं, मैं उन्हें बुलाती हूँ।” ऐसा कहते हुये सीता ने पास में चर रही गाय को पुकारा। उन्हें  वि‍श्‍वास था कि‍ गोमाता झूठ नहीं बोलेंगी।

राम ने उसी रूखाई से एक बार पुनः प्रश्न किया-  ”गो माता, क्‍या इस तट पर मेरे पि‍ता दशरथ आए थे? आपने उन्हें सीता से पिंड ग्रहण करते देखा है क्या?” 

”कुछ देर पहले सीता मेरे पास गोबर लेने आई थीं। उनके जाने के बाद मैं तो दूसरी तरफ मुंह करके घास चरने लगी थी। भला मैं कैसे बता सकती हूँ कि‍ मेरे पीठ पीछे क्‍या घट रहा है?” 

सीता दंग थीं। नदी और गाय दोनों हीं स्त्रियाँ हैं, पर किसी ने उनके पक्ष में गवाही नहीं दी। दुखी था सीता का मन लेकिन, वह इसका कारण समझ सकने में खुद को असमर्थ और लाचार पा रही थी। तंज़ और अविश्वास से भरे राम के चेहरे की तरफ उन्हें देखने का अभी साहस नहीं था। उन्होंने इस बार राम से बिना कुछ कहे पास ही लगी केतकी की झाड़ से अनुरोध कि‍या कि‍ वह राम को सच बता दे।

करीब खड़ा वटवृक्ष चुपचाप यह सब देख रहा था। उसे फल्‍गू नदी और गाय पर क्रोध आ रहा था कि‍ कैसे वो लोग आंखों देखी को अस्‍वीकार कर रहे हैं। सीता का म्लान मुख देखकर उसके मन में करूणा उत्‍पन्‍न हो रही थी। पर बिना बुलाए किसी के जीवन प्रसंग में दखल देना उसे उचित नहीं लगा।

“मेरे पास हर वक्त कोई न कोई फूल लेने के लिए खड़ा होता है, इसलिए नदी तट पर कौन क्या कर रहा है, इसकी तरफ मेरा ध्यान नहीं जाता। सीता को मैंने फूल दिये थे, यह तो मैं जरूर कहूँगी, पर उसके बाद उन्होंने कब क्या किया, यह बताने में मैं असमर्थ हूँ, मुझे क्षमा करें।” केतकी के शब्दों ने सीता को बुरी तरह व्यथित कर दिया था। एक के बाद एक तीन गवाहों के मुकर जाने के बाद वह खुद को हर तरफ से असहाय महसूस कर रही थीं और राम का क्रोध उसी अनुपात में बढ़ा जा रहा था। किसी तरह खुद को बटोरते हुये करूण निगाहों से अपने अंतिम साक्षी वटवृक्ष की तरफ देखतीं कि वह खुद ही बोल पड़ा-    

”सीता ने जो कहा वह पूरी तरह सच है राम! मेरे ही चबूतरे पर बैठ सीता ने फल्गू तट की रेत,पवित्र फल्गूजल और गाय के गोबर से पिंड तैयार कर आपके पिता का आह्वान करते हुये पिंडदान किया है, जिसे स्वयं महाराज दशरथ ने स्वीकार किया है। आपको अपनी संगिनी पर गर्व और भरोसा होना चाहिए।”  

”तुम्‍हारी बात पर कैसे वि‍श्‍वास कर लूं? खुद सीता के बुलाने पर आये तीन साक्षियों ने उसके  कथन को मि‍थ्‍या बताया है… और फिर तुम्हें तो स्वयं सीता ने भी साक्षी की तरह पेश नहीं किया।”

वटवृक्ष ने एक बार फिर अपने कहे को दुहराया था-

”मैं तो वही कह रहा हूँ जो अपनी आँखों से देखा है। आपको अपनी पत्‍नी की बात पर भरोसा करना चाहि‍ए।”   

राम ने उपेक्षा भाव से वटवृक्ष की तरफ अपनी पीठ की, सीता को आग्नेय नेत्रों से देखा और गुस्से में खुद ही पिंड तैयार करने लगे। कोई और दिन होता तो सीता बढ़कर उनके हाथ से सामान ले लेती, पर राम के अविश्वास से आहत वह सूनी नज़रों से उन्हें खुद ही बढ़कर पिंड तैयार करते देखती रहीं। अवमानना से भरी सीता बेतरह चुप थीं जैसे बोलना भूल गयी हों। उन्हें इस बात का भी कम दुःख न था कि इस पूरे प्रकरण में लक्ष्मण ने एक बार भी कुछ नहीं कहा जैसे मौन रहकर उनके प्रति राम के अविश्वास का समर्थन कर रहे हों। उन्होंने हर समय लक्ष्मण का साथ दिया है। कभी किसी कारण राम को उनके प्रति गुस्सा आया सीता हमेशा लक्ष्मण के आगे ढाल बनकर खड़ी रही हैं। ऐसे में कई बार उन्हें अकारण ही राम के क्रोध का सामना भी करना पड़ा है। उस लक्ष्मण की चुप्पी से सीता को गहरा सदमा लगा था।        

पिंड तैयारकर जब राम ने पिता का आह्वान किया। उनकी आवाज़ दसों दिशाओं से टकरा कर उन्हीं तक वापस आने लगी। आज तक अपनी आवाज़ को इस तरह बेअसर होते कभी नहीं देखा था राम ने। यह अप्रत्याशित था उनके लिए। जितनी ज़ोर से राम अपने पितरों का आह्वान करते उनकी जीभ उससे ज्यादा आवेग से सूख तालु से चिपक जाती थी। वे ठीक से मंत्रोच्चारण भी नहीं कर पा रहे थे। तभी डूबते हुये सूर्य की किरणों से जैसे आवाज आई -”तर्पण की तुम्‍हारी यह कोशिश व्यर्थ है राम! सीता का पिंडदान हम स्वीकार चुके हैं…” राम ने सोचा जरूर यह किसी मायावी राक्षस की आवाज़ है जो उन्हें हर हाल में विचलित करना चाहता है। अगले ही पल उन्होंने सोचा कहीं यह वटवृक्ष की कोई चाल तो नहीं। इसी बीच फल्गू की जलराशि में डूबते सूर्य की किरणों से जैसे फिर आवाज़ आई थी- “सीता का दिल दुखाकर तुमने अच्छा नहीं किया राम!” राम को जैसे कुछ नहीं सुनाई पड़ रहा या सुनकर भी उसे अनुसाना कर रहे हैं…

सूर्य की किरणों से आती आवाज़ से बेपरवाह राम के इस व्यवहार ने कुछ देर पहले काठ हो आई सीता को जैसे नई आग से भर दिया है। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा कि यह वही राम हैं जिनके शिव धनुष तोड़ सकने के लिए कभी उन्होंने मन ही मन गौरी से प्रार्थना की थी, जिनके पथ की छाया बन जिंदगी के चौदह युवा वर्ष जंगलों की खाक छानी थी। उन्हें लगा वह कोई झूठा स्वप्न था जिसमें उन्होंने राम की कल्पना कर ली थी। असली राम तो यह हैं, जिन्होंने कभी उस पर भरोसा नहीं किया। अपने अविश्वास के कारण पूरी दुनिया के सामने मेरी अग्निपरीक्षा ली…।

सीता को फल्गू, गाय और केतकी पर भी बेतरह गुस्सा आ रहा था। किस चालाकी से  झुठला दिया था उन्हें उन तीनों ने। उनका मन हुआ वह एक ही साथ इन सबको श्राप दे दें…. ‘सूख जाये फल्गू की धारा, जूठन के भरोसे ही जीवन चले गाय का, सुगंधरहित हो जाये केतकी…’ पर अगले ही पल उन्होंने सोचा जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो औरों को क्यों दोष देना। यदि राम ने उन पर भरोसा किया होता तो भला इन गवाहियों की नौबत ही क्यों आती?  

सीता ने सोचा वटवृक्ष को छोड़ पूरी दुनिया में कोई अपना नहीं उनका। वे वटवृक्ष से लिपटकर रोना चाहती थीं…पर अगले ही पल उन्हें लगा, सबके बीच खुद को अब और कमजोर नहीं दिखाना चाहिए। निमिष भर को यह खयाल भी आया कि हमेशा की तरह राम गुस्सा ठंडा होने के बाद खुद उसे मनाने आएंगे, अयोध्या चलने के लिए मनुहार करेंगे…पर अबकी वह उनकी मीठी बातों में नहीं आनेवाली। सीता ने खुद को फिर से मजबूत किया….जो भरोसा नहीं कर सकता उसके साथ क्यों रहना? सहसा उन्हें मिथिला की याद हो आई और  सोचा वे माँ के पास चली जाएंगी। पर इतने बरस बीत गये, उन्होंने भी तो कोई सुध नहीं ली आज तक। क्या सचमुच ऐसा कोई नहीं जिसके पास बैठकर वह अपने सुख-दुःख की पोटली खोल सकें। तभी सीता के कानों में लंका की सहेली महाबली गंगा की कलकल ध्वनि गूंजी… “खुद को कभी अकेली मत समझना सीता! जब भी किसी सहेली की जरूरत हो, निःसंकोच मेरे पास चली आना, मुझे हमेशा अपने साथ पाओगी।”

सीता उस वक्त महाबली गंगा के गले लग जाना चाहती थीं…

सीता की मनोदशा से बेखबर राम अब भी अपने पितरों का आह्वान कर रहे थे…।

रश्मि शर्मा

सूक्ष्म संवेदनाओं की कथाकार रश्मि शर्मा का जन्म 02.04.1974 को मेहसी, जिला मोतिहारी (बिहार) में हुआ। लगभग एक दशक से कविता की दुनिया में सक्रिय रश्मि शर्मा की कथायात्रा 24 जुलाई 2016 को प्रभात खबर में प्रकाशित ‘मन के कपाट’ शीर्षक कहानी से शुरू हुई। अबतक इनके तीन कविता-संग्रह ‘नदी को सोचने दो’, ‘मन हुआ पलाश’ और ‘वक्त की अलगनी पर’ प्रकाशित हैं। सम्पर्क- रमा नर्सिंग होम, मेन रोड, रांची, झारखंड 834 001
 +919204055686,  rashmiarashmi@gmail.com

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चित्रकार : अनुप्रिया

दृष्टिसंपन्न रेखांकनों से साहित्य और कला जगत में अपनी पहचान अर्जित कर चुकी अनुप्रिया का जन्म सुपौल, बिहार में हुआ। कविता और चित्रकला दोनों ही विधाओं में समान रूप से सक्रिय अनुप्रिया के दो कविता- संग्रह ‘कि कोई आने को है’ तथा ‘थोड़ा सा तो होना बचपन’ प्रकाशित हैं। हिन्दी की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में रेखाचित्र प्रकाशित। कई महत्वपूर्ण पत्रिकाओं तथा साहित्य अकादमी सहित कई प्रकाशकों की पुस्तकों के आवरण पर चित्र और रेखांकन प्रकाशित।

सम्पर्क:  +919871973888, anupriyayoga@gmail.com

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