संस्मरण

चौथेपन पायउं प्रिय ‘काया’…

 

(कबहुँ नाहिं व्यापी अस माया)

 

मेरी प्रिय काइया को घर में देखते ही बेटे के सभी मित्र व जहू तट पर घूमते हुए तमाम युवापीढ़ी के लोग उत्सुक होकर नाम पूछते हैं…। इस लोकप्रियता का पहला सबब है – इसकी प्रजाति – जर्मन शेफ़र्ड। तभी यह भी पता लगा कि आजकल कुत्तों में जर्मन शेफ़र्ड का चलन (फ़ैशन) है। तट पर घूमता हर तीसरा कुत्ता जर्मन शेफ़र्ड होता है – जैसे 18 सालों पहले, जब लैब्रे प्रजाति का हमारा बीजो था, तो हर तीसरा कुत्ता लैब्रे मिलता था। अब समझ में आया कि कपड़ों-जूतों…आदि अन्य सामानों की तरह कुत्तों के भी फ़ैशन होते हैं और नयी पीढ़ी को उसका पता होता है, क्योंकि फ़ैशन चलते ही उन्हीं से हैं…सो, होते भी उन्हीं के लिए हैं…। ख़ैर,

पूछने वालों को मैं नाम बताता हूँ – ‘काइया’, तो सुनते ही सब के सब ‘हेलो काया’ कहने लगते हैं…। भाषिक वृत्ति में इस संक्षिप्त रूप का कोई सूत्र मुझे नहीं दिखता…ज़्यादा से ज़्यादा ‘कइया’ हो सकता है – एक दीर्घ का लोप मुख-सुख के लिए। पूर्वांचल के मूल हिन्दी-भाषी अनपढ़ लोग ‘कइया’ कहते भी हैं, जो ‘कैया’ भी हो सकता है, पर ‘काया’…!! इस तरह असली नाम ‘काइया’ पुकारने वाले मुझ जैसे कम ही लोग हैं। नाम भी बेटे (युवापीढ़ी) ने ही रखा है। मुझे यह शब्द पता न था। गूगल दादा से पूछा, तो उन्होंने काइया का अर्थ बताया – एक नयी शुरुआत। और इस इतनी बड़ी सार्थकता को ‘काया’ (देह) में सिमटा देना…धन्य है नई पीढ़ी!!

लेकिन बिना एक दूसरे से मिले व कहे-सुने ही इस पीढ़ी के सभी के मुख से ‘काइया’ का ‘काया’ होना सिद्ध करता है कि समूची पीढ़ी के स्वर-यंत्र व भावतंत्र बेतरह मेल खाते हैं…। शायद यह इस कालखण्ड की मानसिकता व चेतनता का आद्य रूप (आर्के टाइप) है, जिसकी सचाई-सफ़ाई भी मुझे लुभा जाती है…।

कभी बचपन में घर में पड़ी ज्योतिष की किताबें उलटते-पुलटते हुए पढ़ने में आया था कि विशिष्ट दिन-नक्षत्र-चरण व घड़ी-पल…आदि के अनुसार एवं ख़ास तरह की प्रेरित मानसिकता व दैहिक शुद्धता के आचरण का अनुसरण करते हुए पति-पत्नी यदि रति-क्रिया में तल्लीन हों, तो मनचाही योग्य संतान की प्राप्ति हो सकती है।

और अब पता चला है कि विशिष्ट प्रजाति व क़िस्म के नर-मादा के वीर्यों को मिलाके, फिर  कुछ रसायनों की युति के साथ निर्दिष्ट वैज्ञानिक प्रक्रियाओं से निष्पन्न किया जाये, तो किसी भी विशिष्ट नस्ल में बहुत हद तक मनचाहे आकार-प्रकार, रूप-रंग़, वृत्ति-प्रकृति वाले श्वान-शिशु पैदा किये जा सकते हैं…।

काइया का प्रजनन ऐसे ही हुआ है – तीस हज़ार की क़ीमत पर। पिछले बीस सालों के द्वंद्वों-बहसों से होते हुए पालतू प्राणी ख़रीद के लाना घर में अब चल पड़ा है। मैंने इसे मन-मस्तिष्क से तो नहीं, लेकिन मूलतः प्रेम, एवं कुछ बढ़ी उम्र के व्यावहारिक तक़ाज़े वश – याने ‘कुछ मजबूरन, कुछ मस्लहतन’ मान लिया है।

तो इसी प्रक्रिया के तहत 1 जुलाई, 2020  के दिन जन्मी इस प्राणी को 15-20 दिनों का होने के बाद जब घर ले आया गया, तो पुन: 21 दिनों तक एकांतवास में रही – दूसरी मंज़िल पर स्थित बेटे के घर में। हमें देखने को भी न मिली। उसकी गहन देख-रेख में बताये गये एहतिहातों व खुराकों से संवलित होती रही…। उसी दौरान ‘काइया’ नामकरण भी हुआ। और जब तल मंज़िल पर अवतरित होने (उतरने) की घड़ी आयी – घोषणा हुई, तो 21 दिनों की आकुल प्रतीक्षा ने हम सबको ही अति उत्सुक कर रखा था, लेकिन अपनी अन्नपूर्णा (रसोइयाँ) उषा को तो ऐसा व्यग्र व उल्लसित कर दिया था कि उसने दरवाज़े पर काइया की आरती उतारने का उपक्रम कर डाला और बड़े प्रमुदित मने हल्दी-कुंकुम से टीका भी…। फिर तो उसके इस उच्छल उछाह ने मुझे भी फ़ोटो लेने के लिए सहसा तैयार कर दिया। फ़ोटोज़ देखते हुए दिखा कि स्वागत-मूर्त्ति काइया को तो आरती-कुंकुम का कुछ भान था नहीं – वह तो ‘अश्रुमय कोमल कहाँ तू आ गयी परदेसिनी री!! के कुतूहल भाव में चकबका रही थी, लेकिन उस उपक्रम की परिहास-मिश्रित ख़ुशी काइया के चहरे से प्रतिबिम्बित (रेफ़्लक्ट) होती हुई बेटे के अधरों पर स्मित व आखों में हल्की तृप्ति बनकर नुमायाँ हो रही थी…।  

काइया के आने का पता हमारे साथ पिछले छह साल से रह रही चीकू त्रिपाठी को भी बिना देखे-सुने ही अपनी सहज घ्राण-शक्ति से चल गया था कि कोई उसका सजातीय दूसरा प्राणी भी घर में आ गया है। और अपनी मूकता में उसकी उत्सुकता पहले भी छिपती न थी…अब तो घर में ही मौजूद होने पर दरस-परस की सहज इच्छा बनकर या फिर ‘बाभन-कुत्ता-नाऊ, जाति देखि गुर्राऊ’ की नियति से बनी नीयत ही बनकर तरह-तरह की दैहिक गतिविधियों के साथ अफाट रूप से हरचंद व्यक्त होने लगी थी…। लेकिन एक तो काइया पिंजरे में बंद थी, दूसरे हम सबकी निगरानी भी चौकस थी, परंतु तनिक भी भेलख पाते ही कई बार बिल्कुल पास तक फटक आती थी…। लिहाज़ा ‘दरस’ अवश्य हुए, परंतु ‘परस’ व बोलबाज़ी या ‘सजातीय-संवाद’ की तड़प तो उस दौरान अधूरी ही रही…और काइया को तो चीकू का भान ही न हुआ।

उधर पिंजरे में बंद काइया की स्थिति-गति के लिए अपने लोक की प्रचलित शब्दावली में कहूँ, तो ‘पूत के पाँव पालने में’ ही दिख रहे थे और अपनी हिन्दी की शब्दावली में कहना हो, तो ‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ सिद्ध हो रहे थे…। एक भी मिनट उस पिंजरे में स्थिर न रहती और निकल भागने का मौक़ा खोजने की अविराम कोशिश करती। और कोशिश में मिलती असफलता की कशिश भी कुढ़न बनकर चहरे पर अंकित हो उठती…। उन्हीं दिनों एक बार मैंने एक बड़ी चद्दर का चंदोवा तानके उसे थोड़ी फैली जगह में रख दिया था, तो प्रसन्न मन किसी बिजली के खिलौने की तरह लगातार गोल-गोल घूमती रही…। उस दौरान हर रूप में उसका विचरना काफ़ी मनभावन होता था।

पिंजरे से बाहर निकलने में उसे जल्द ही सफलता दिलायी उसकी बाढ़ (विकास) की गति ने, जिसके लिए पुन: ‘सत्यनारायण व्रत-कथा’ की कन्या के बढ़ने की शब्दावली याद आ रही है – ‘दिने-दिने सा ववृधे शुक्ल पक्षे यथा शशी’। और शुक्ल पक्ष के चंद्रमा के माफ़िक़ ही ‘कायिया’ की काया ने भी बमुश्किल 15 दिनों में ही पिंजरे में समाने से इनकार कर दिया। फिर तो उसे बाहर निकालना ही पड़ा – याने काइया का भूमि पर अवतरण हुआ…। तब पूरे परिवार को और भी तगड़ी चौकसी में लग जाना पड़ा…कि कहीं चीकू से टकरा न जाये या कहीं कुछ खा-पी न ले। खाने-पीने की सख़्त डाक्टरी हिदायत में आजीवन के लिए बिचारी को अपने ख़ास ‘डॉग फ़ूड’ के सिवा कुछ भी खाना नहीं है। हमारा गंवई मन उसकी इस वंचना (डिप्राइव होने) से बने दुर्भाग्य पर तड़प कर रह जाता है। वरना हम तो ज़िंदगी भर प्राय: देसी कुत्ते पालते और घर में जो भी रहता-बनता, सबका ज़ायक़ा उन्हें भी हिस्से भर मिलता।

यह बात दूसरी है कि इन विशिष्ट नस्ल वालों के लिए यह सचमुच बेहद हानिकारक होता है। इसका कटु अनुभव अपने प्रिय ‘संत बीजो’ (लैब्रे) के साथ हमें हो चुका है और उसी से सीख लेकर चीकू को भी ‘फ़ूड’ तक सीमित कर दिया गया है, लेकिन वह सबकूछ का स्वाद ले चुकी है। सो, उसके लिए मन तड़पता नहीं। इसके चलते शुरू में तो प्रिय काइया को हर खाद्य के प्रति अपनी उत्सुक-आर्त्त चाहत व न पाने की छटपटाहट सहनी पड़ी और उससे अधिक हमें अपनी बेबसी की पीड़ा…। उस दौरान उसे समझाया जाता – ‘नो, दिस इज नॉट योर फ़ूड, दिस इज ह्यूमन फ़ूड’ – गोया मनुष्य का नाचीज़ खाना उसके लिए त्याज्य है। लेकिन धीरे-धीरे उसका मन मोहठ (मोटा होके मान) गया। अब तो घर में कुछ भी आये-बने, खाया जाये, वह निरपेक्ष व शांत बनी रहती है। मनुष्यों की अनंत लोभी वृत्ति के समक्ष पशुओं की यह संतोषी वृत्ति भी मुझे गहरे छू जाती है…। कल्पनाजी की पूजा के बाद ठाकुरजी के प्रसाद में चरणामृत स्वरूप सिर्फ़ एक कप दूध उसे मिलता है, जिसके लिए घंटी की आवाज़ सुनते ही वह तीर की तरह पूजा-घर के सामने पहुँच जाती है। इसे देखकर मुझे मनोविज्ञान में ‘लर्निंग बाइ कंडीशनिंग’ के प्रयोगवेत्ता पॉवलव के उस कुत्ते की याद आती है, जो घंटी बजने की संगति पर दूध पाने का ऐसा अभ्यस्त हो गया था कि घंटी के बाद दूध मिलने में देर होने पर लार टपकाने लगता…। लेकिन काइया को लार टपकाना नहीं पड़ता – दूध रखके ही घंटी बजायी जाती है। 

रही बात चीकू-काइया के साथ रहने की, तो कोई आपसी टकराहट तब तो हमने न होने दी, लेकिन काइया के कुछ समर्थ होने पर दोनो की गुर्राहट-ललकार अटाल्य होने लगी। यूँ समझाना-डाँटना बेअसर होने लगा, तो कई बार चीकू को लेकर मैं व काइया को लेकर बेटा आमने-सामने बैठते। दोनो को पास-पास करके पकड़े-पकड़े समझाते…। बेटा कहता – ‘नो काइया, नो चीकू – डोंट फ़ाइट। बिहेव प्रॉपरली – बोथ ओफ़ यू आर फ़्रेंड्स…’ ‘ऐटसेटरा-ऐटसेटरा…’। मैं कहता – ‘चीकू बेटा, काइया तुम्हारी छोटी बहन है। उसके साथ लड़ो मत। प्रेम से रहो, खेलो दोनो साथ-साथ’… आदि-आदि। बीच में बैठ के कल्पनाजी समझातीं – ‘चीकू बेन, जोओ – आ छे काइया…अने काइया दिकरा, आ छे चीकू…’ फिर दोनो को बारी-बारी से उँगली का इशारा करते हुए कहतीं – ‘चीकू-काइया, काइया-चीकू…बन्ने सारा छो। शांति थी रहो – एक बीजाथी लड़वानू नहीं, आँ… दोस्तार जेवा रहो’…वग़ैरा-वग़ैरा। तात्पर्य यह कि हमारे पालतुओं को तीन भाषाएँ तो समझनी ही पड़ती हैं और वे समझते भी हैं। बस, घर में काम करने आने वालों के साथ सम्पर्क भाषा हिन्दी होती है। वैसे महादेवीजी के अनुसार ‘भाषा नहीं समझते पशु, वे आवाज़ समझते हैं’ – नरेश सक्सेना के ‘शिशु’ की तरह – ‘शिशु लोरी के शब्द नहीं, संगीत समझता है/ बाद में सीखेगा भाषा/ अभी वह अर्थ समझता है/ समझता है सबकी भाषा’…। याने बोलने की गति-लहजे, स्थिति व हाव-भाव…आदि के मुताबिक़ सारे पशु मंतव्य पकड़ लेते हैं। ख़ैर,  

इतने सब समझाने-बुझाने के उपक्रमों, कोशिशों के वावजूद चीकू-काइया की लड़ाइयाँ हुईं। और कारण रहे भावात्मक, न कि भौतिक। जैसे खाने को लेकर लड़ाई न हो पायी – हालाँकि दोनो के खाद्य उनकी नस्ल व उम्र के अनुसार अलग-अलग हैं और प्राणि-मात्र की प्रकृति के अनुसार दोनो के आकर्षण अपने नहीं, एक दूसरे के खाद्य के प्रति प्राय: दुर्निवार हैं और मौक़ा पाने पर एक दूसरे का खा भी जाते हैं। लेकिन दोनो लड़े तब, जब मेरे या बेटे के बाहर से आने पर दोनो तुरत मिलना चाहते और दोनो ही दूसरे को नहीं मिलने देना चाहते…। इसी प्रतिद्वंद्विता में दो-तीन भिड़ंते हुईं। काइया तो जल्दी ही भारी व जबर हो ही गयी थी और उसकी नस्ल भी ओजस्वी है। सो, चीकू थोड़ा-मोड़ा घायल भी हुई। छुड़ाने में एक बार मैं भी घायल हुआ और एहतिहातन सुई (इंजेक्शन) भी लेनी पड़ी। चीकू डरी भी खूब और एक दौर ऐसा भी गुजरा कि चीकू दिन-दिन भर कमरे से बाहर ही न आती…। लेकिन सुबह के साथ आने-जाने और जहू तट पर आदतन साथ खेलने-दौड़ने से धीरे-धीरे इतनी दोस्ती हो गयी है कि अब लड़ाई नहीं होती। अब हमारे बाहर से आने पर चीकू इंतज़ार कर लेती है कि काइया के साथ भेंट-अंकवार हो जाये, तो वह मिले…। और तब काइया भी बाधा नहीं डालती। याने चीकू विनम्र हो गयी है और काइया समझदार। दोनो आमने-सामने बैठ के रह लेते हैं, अपना-अपना खा लेते हैं। एक दूसरे की उपस्थिति में कोई किसी के खाने की ओर नहीं जाता। इस तरह प्रेम न सही, एक दूसरे के सहकार में साथ रह लेने की स्थिति बन गयी है, जिसे सुखद भी कह सकते हैं।

काइया की ऊपर बतायी प्रजनन-प्रक्रिया के चलते पहले से लगभग सब पता था कि बढ़कर वह कितनी बड़ी होगी, आकार-प्रकार क्या होगा, रंग़-रूप कैसा होगा और चाल-चलन याने वृत्ति-चरित्र कैसा होगा…। और कहना होगा कि प्रिय काइया में यह सब वैसा ही देख-पा-भोग के हम प्रमुदित-प्रफुल्लित हैं। अपनी पुरानी धारणाओ-मान्यताओं के टूटने का ग़म न रहा…। रंग़ तो भूरे-काले का मिश्रण ही जर्मन शेफ़र्ड की पहचान है, जिसमें मुँह-नाक से लेकर आँख तक गाढ़ा काला और पीठ हल्के काले रंग की एवं बायें-दाये की बग़ल का हिस्सा लिए हुए पेट का पूरा हिस्सा भूरा। चारो पैरों के पंजों के ऊपर का भूरापन ख़ास सोहता है। लम्बी-मोटी पूँछ भी आधी-आधी काली-भूरी। मुलायम बालों से ढँका पूरा बदन। कान प्राय: खड़े रहते हैं, लेकिन सबसे अधिक आकर्षक हैं आँखें – मध्यम आकार की, पर बोलती हुई…अंदर तक भेदती हुई…।

इस प्रजाति की गरदन से लेकर कमर तक के आकार की मूल बनावट शेर का अहसास दिलाती है। गरदन शेर जैसी ही – सारे अँगोब से अपेक्षाकृत मोटी। उस पर बाल जरा घने व कुछ बड़े…। फिर बनावट में पीछे की तरफ कमर तक थोड़ी सी ढलान-सा एवं गरदन के मुक़ाबले पतला भी तथा इस तरफ़ के बाल भी गरदन के बालों से ज़रा छोटे। इसी हल्केपन के कारण बचपन में वह चलती, तो पीछे के पाँव थोड़ा-सा रुककर उठने का अहसास देते। मुझे शंका होती कि यह दौड़ेगी कैसे!! लेकिन जब ज़रा बड़ी हुई, लेके सुबह जुहू घूमने जाने लगा, तो हर कुत्ते की तरफ़ बिना सोचे-समझे बेतहासा दौड़ती…।

यहीं कह दूँ कि अपनी काइया की मूल वृत्ति यही है – भावुक आवेश वाली, जिसमें करना (ऐक्शन) पहले होता है – सोचना-समझना बाद में। जबकि चीकू है कि सोचती ज्यादा है – बल्कि सोचती इतना है कि बुद्धिजीवियों की तरह कर बहुत कम पाती है। लेकिन काइया का जीवन इसी ‘करो या मरो’ की प्रकृति से संचालित है। यही उसकी मासूमियत भी है और यही उसकी शरारत भी है, जो मुझे बड़ी प्यारी लगती है। बहरहाल,

जहू तट पर खेलते हुए अन्य कुत्तों को काइया दौड़ाये या उनसे भागे…दोनो हालात में जीत इसी की होते देख इत्मीनान हो गया कि दौड़ने में उस बनावट का कोई असर नहीं है और अब तो रुक कर पाँव उठाना दिखता भी नहीं। ऐसी जो काइया है, वह कभी एक मिनट भी ठहरती न थी तट पर – बस, यहाँ से वहाँ भागना, हर आने-जाने वाले को सूंघना…याने अपने अलावा सबकुछ की खबर ले लेना ही उसकी प्राथमिकता – बल्कि अपरिहार्यता। लेकिन रोज़-रोज़ मेरे साथ चलते-चलते, बार-बार मेरा मना करना सुनते-सुनते कब वह अपना सब छोड़कर मेरी अनुगामिनी बन गयी –  इसका पता न उसे लगा, न मुझे!! लेकिन इसका अधिकांश श्रेय इसकी उत्तम कोटि के नस्ली संस्कारों व जातीय वृत्तियों को जाता है, जिससे बिना किसी प्रशिक्षण के आपोआप यह सम्भव हो सका। इतनी जल्दी वह इतनी सही हो गयी है कि ज़रा-सा बुला देने पर सारा भागना छोड़कर ऐसे लौट पड़ती है कि मानुष-बच्चा भी क्या लौटेगा। और इसी तरह रोज़ आते-जाते यूँ कदम से कदम मिलाकर चलने लगी है कि सीता के लिए कहने वाले बाबा ही मुझे याद आते हैं – ‘मोहिं मग चलत न होइहहिं हारी, छिनु-छिनु चरन सरोज निहारी’ और मेरे तो चरण क्या ‘ऐसे बेहाल बेवाइन सों’ वाले खुरदरे पाँव हैं। लेकिन काइया के पाँव साल पूरा होते-होते इतने सुघर (सु-गढ़ – वेल शेप्ड) व इतने भरे-पूरे (भारी नही, मज़बूत) हुए कि इन्हें देखकर मुझे अपने गाँव के पहलवान बाबू (नामी रामकिशुन सिंह) का अपने पोते के लिए कहा वाक्य याद आता है – ‘इसके मुद्धे तो, बेटवा न, गामा पहलवान जैसे हैं – एकदम मुझ पर पड़ा है…’। बेतहासा भागने की वृत्ति घर में भी वैसी ही है और यह संतुलन भी क़ाबिलेगौर है। 

काइया में घंटी बजाने पर दूध पा लेने की जो फुर्ती (प्रॉम्प्टटनेस) है, वही कट्टर तत्परता खुद से निर्धारित अपने सारे कामों – याने फ़र्ज़ों को अंजाम देने में भी है…और यही काइया नाम्ना प्राणी की सबसे बड़ी पहचान है – उसकी नस्ली विशेषता है। कहीं भी कुछ ज़रा भी खटके या आहट ही आये, वह पल भर में वहाँ पहुँच जाती है। फिर यह खटका चाहे जितनी बार हो – हर दो-पाँच मिनट पर होता रहे, वह उतने ही तुरंता वहाँ पहुँचती है और भौंक-भौंक के आसमान सर पे उठा लेती है। दौड़ने-भागने के साथ भौंकना भी उसकी प्रकृति का सरनाम आयाम है। इतना भौंकती है कि मुझे उसके स्वर-यंत्रों के फ़ट जाने का अंदेशा होने लगता है, लेकिन जन्म के पहले से ही उसकी इस वृत्ति का भी पता था, बल्कि बेहद शांत चीकू के समक्ष एक भौंकने-भांकने वाले पालतू की दरकार भी थी। अब आलम यह है कि उसे बोलने से रोकने में हमारे स्वर-यंत्र दुख जाते हैं – पर उस पर कोई असर नहीं पड़ता…, क्योंकि अपने जातीय स्वभाव से न वह डिग सकती, न कोई उसे डिगा सकता – याने उसके फ़र्ज़ को अंजाम देने से उसे कोई रोक नहीं सकता। इस तरह सच्चे अर्थों में इसे कट्टर (कट जाये, पर टले न) कह सकते हैं। और हमारा घर ऐसा गलगंजी भी है कि दिन भर में सैकड़ों बार यह रमना बजता है… लेकिन उसे आलस्य-ऊब नहीं आती – थकान का तो नाम ही नहीं जानती।  

लेकिन बेटे को लगता है कि दिन भर दौड़ने वाली काइया को सुबह नहीं घुमाना चाहिए। कमसिन-उम्र की बच्ची थक जाती है। लेकिन यह सच नहीं, काइया के प्रति उसकी अतिशय अनुरक्ति (एक्सेस ओब्सेशन) है। क्योंकि शांत समयों में वह भरपूर नींद ले लेती है। रातों को चीकू इससे ज्यादा सक्रिय रहती है। यह चेतनता काइया में उम्र के साथ धीरे-धीरे आयेगी। धीरे-धीर वह दुनियादारी में पिजेगी भी और परिवेश को अनुभवों से समझेगी…। तब उसकी बेतहासा वाली सक्रियता समझ से संतुलित होगी – ऐसी मुझे उम्मीद ही नहीं, मेरा ऐसा अनुभव भी है, जो काइया के संदर्भ में भी जहू पर उसके संतुलन से समर्थित भी हो चुका है।

एक ख़ास बात यह भी कि जैसे डोबरमैन की नस्ल वाले श्वान घर में एक ही को अपना स्वामी (मास्टर) मानते हैं और किसी दूसरे को कुछ बदते ही नहीं, वैसा जर्मन शेफ़र्ड काइया का बिलकुल नहीं है। उसने अपने स्वामियों (मास्टर्स) की श्रेणियाँ बना रखी हैं। उसमें नम्बर एक पर ज़ाहिर है कि बेटा है – आख़िर वही लाया, शुरू में रखा, अब भी रातों को उसी के पास रहती है। लेकिन वह नहीं रहा, तो मैं उसके लिए स्वामी नम्बर दो होता हूँ – घुमाता हूँ, खेलता हूँ, लाड़ लड़ाता हूँ, जिससे अकुल के न रहने पर दुखी नहीं रहती; पर उसका अभाव महसूस (उसे मिस) ज़रूर करती है। और हम दोनो की ग़ैरहज़िरी में कल्पनाजी – मास्टर नं तीन होती हैं, जो भौतिक रूप से तो उसके लिए कुछ नहीं करतीं, लेकिन बिना छूये, बिना ख़ास कुछ किये भी अपने हाव-भाव-नज़रों के संवेदन और व्यावहारिक प्रबंधन से उसकी पूरी सँभाल करती-कराती हैं, जिसे काइया समझती है – ‘समुझहिं खग खग ही (हृदय) कै भाषा’!!

गरज यह कि इसी इच्छानुसार क्रम में काइया हमारे पास होती है…। रहने के व्योरे यूँ – कि मानो अकुल घर में नहीं है, तो मेरे आसपास रहेगी – दो कदम से अधिक दूरी बनने नहीं देती। मै उठके दो कदम चला नहीं कि उठ के पीछे चल देती है। किताब लेने उठा, तो मना करने पर भी पीछे-पीछे वहाँ आ जायेगी। नहाने गये, तो दरवाज़े पर बैठी रहेगी। इस बीच कुछ खरकने-खटकने पर वहाँ हो आयेगी, पर उसके ध्यान के केंद्र में रहेगा मेरा होना…। यह बिलकुल वैसा ही है – जैसा बाबा ने परिभाषित किया है कि बच्चा कहीं आग या साँप आदि न पकड़ ले, के मद्दे नज़र मां घर का सारा काम करते हुए भी हर क्षण उसकी रखवाली करती रहती है – ‘गह सिसु बच्छ अनल-अहि धाई, तहँ राखइ जननी अरगाई’… शायद इसी को मातृत्त्व कहते हैं। काइया की वफ़ादारी की अजीब फ़ितरत है कि छत पर गये, तो दरवाज़ा खुलते ही झपट के पहले वह आगे जायेगी…वापस आते हुए मेरे बाहर निकलने के बाद ही खुद निकलेगी। मतलब कि हमारी सुरक्षा के लिए ऐसी तैनाती कि कभी ऊबके डाँट भी देते हैं, पर उसे अपनी एकनिष्ठ  (वन प्वाइंट) कर्तव्य-निष्ठा से तनिक भी च्युत नहीं कर पाते…।    

हमारी अनुपस्थिति में तीनो सेवकों (उषा-चंदन-राजेश) के रहते भी लावारिस जैसी अनमनी पड़ी रहती है, लेकिन कोई तूफ़ान नहीं मचाती – नंगई-धिंगई नहीं करती – अपने दुःख को, अपनी तड़प को अपने में समाये-समोये रहती है…। उसकी यह नस्ली वृत्ति भी लुभा लेती है। लेकिन हमारे आने पर इतना भौंकती है – गोया हमको डाँटती है, लड़ती है। दौड़ के पास आती है और कूदके दूर भाग जाती है – गोया ज़ोरदार उलाहना देती है कि उसे छोड़कर हम क्यों व कहाँ चले गये थे…! फिर कुछ देर हमसे थोड़ी दूर पर ठभुराए (मुँह चढ़ाये) हुए बैठी रहती है…। ये सब उसके विरोध-प्रदर्शन (प्रोटेस्ट) के रूप हैं।

बस, आश्चर्य मुझे इस बात का होता है कि उसे कौन बताता है या वह कैसे जान जाती है कि ये घर के लोग हैं – स्वामी हैं। क्योंकि उसकी सारी देखभाल (खिलाना-पिलाना, नहलाना-धुलाना) तो चंदन करता है। पर उसके पीछे न भागती, न उसके कहीं चले जाने पर कोई क्षोभ व्यक्त करती। यह भी नस्ली ख़ासियत से बनी अंतर्प्रज्ञा (इंट्यूशन) का ही कमाल है। इसी प्रकार हमारी रखवाली या सुरक्षा की भावना ऐसी कि घर में रहते तीनों पर नज़र रहती है। अलग कमरों में हों, तो हर ५ मिनट पे एक दूसरे को देख आती है, वरना एक के ठीक पीछे बैठी रहती है। और इस कर्त्तव्यनिष्ठा में उसे अपने सुख-आराम की बिलकुल पड़ी नहीं रहती…।

अपनी दुर्दांत वफ़ादारी की तरह ही खेलने की भी दीवानी है काइया। उसके छुटपन में बेटे ने घर में बॉल घिसटाना सिखाया। फिर ज़रा चलायमान होने पर बॉल लेके मैं छत पे जाता। बाग़वानी करते रहने के बीच बॉल दूसरे सिरे पर फेंक देता, तो दौड़ के उठा लाती और अब यह खेल ऐसा उसके सर चढ़ गया है कि घर में बैठे रहने पर भी तलब जगती है, तो बॉल लेके आती है। सामने खड़ी हो जाती है। न लो उसके मुँह में से, तो गोद में रख देती है। फिर तरह-तरह से उठने की मनुहार व आग्रह करती है। जैसे रखवाली करने के लिए भागने से आप उसे रोक नहीं सकते, उसी तरह खेलना भी टाल नहीं सकते – उठा ही देती है। धीर-धीरे छत पे फुटबॉल खेलना सीख गयी है – ज़ाहिर है कि सिर्फ़ रोक सकती है। लेकिन पानी की बड़ी टाँकी के बाद बाक़ी बची 15-20 फ़िट चौड़ी जगह में पाँव से बॉल मारके आप उसे छका नहीं सकते – रोक ही लेती है – मुँह-पाँव दोनो से रोकना सीख गयी है। और अपने पाँव बॉल पर मारने के लिए उगा (उठा) के रोक लें, तो बॉल पकड़ने के प्रति केंद्रित उसका संधान ऐसा वेगवान होता है कि दौड़ के पाँव तक आ जाती है…। लेकिन आज्ञाकारिता का आलम भी ऐसा कि थोड़ा खेल के रुकना चाहो, तो आराम से मान भी जाती है…।   

उसके साथ सुबह घूमने व खेलने -बल्कि यूँ कहें कि रहने- में मुझे एक भावात्मक सुख मिलता है। स्वास्थ्य के साथ एक और ऊर्जा मिलती है – जीवनदायिनी-सी…। वह हमेशा साथ रहती है, जिससे सुरक्षा ही नही, हिफ़ाज़त व परितोष (फुलफ़िलमेंट) का ऐसा अहसास होता है, जो इस जीवन में अब तक दर्जन भर पालतुओं के साथ रहा, पर न हुआ। यह कहकर मैं उन सबकी वफ़ादारी या उनके-अपने आपसी प्रेम को कम नहीं कर रहा हूँ। पर सचमुच स्थिति वही है कि ‘सब सुत मोहिं प्रिय प्रान की नाईं, राम देत नहिं बनै गोसाईं’ – याने लक्ष्मण-भारत-शत्रुघ्न भी उतने ही प्रिय, लेकिन राम कुछ ख़ास हैं – उन्हें तो देते नहीं बन रहा…!! और इस प्रियता का कारण भी वहीं मौजूद है – ‘चौथेपन पायउँ  सुत चारी’ याने चौथेपन के पहले पाते, तो बाबा के दशरथ को बच्चों से अलग होने में इतनी व्यग्रता न होती…। तो मेरे भी सारे प्रिय पालतू पहले आये…, लेकिन ‘चौथेपन पायउँ प्रिय काया’ और इसीलिए शायद इससे पहले ‘कबहुँ नाहिं व्यापी अस माया’। इससे पहले किसी पालतू के साथ चलते हुए इस तरह अनिष्ट की आशंका (अति स्नेह: पाप शंकी) नहीं हुई – जैसी काइया के साथ होती है। यह इसी अनन्यानुरक्ति (एक्सक्लूसिव ऑब्सेशन) का नतीजा ही होगा…।    

यूँ शास्त्र-समर्थित चौथेपन में तकनीकी तौर पर मेरे अभी पाँच साल शेष हैं और काइया तो महज़ डेढ़ साल की हुई है। लेकिन सब कुछ ऐसे ही ठीक-ठाक रहा, तो उम्मीदन चौथापन सच हो जायेगा। मानव प्रजाति की उम्र का तो कोई मानक है नहीं – ‘शतं जीवेत्’ मुहावरा भर रह गया है। वरना तो हमारी उम्र भी हमारे लोभों-स्वार्थों व ईमान-धरम की तरह घटती-बढ़ती है, लेकिन काइया तो अपनी प्रजाति के अनुरूप छक के जी रही है और उसी के मुताबिक़ 12-14 साल की उम्र में चली जायेगी…। मै अपनी दोनो बड़ी बहनों के लिए मनाता हूँ और शायद वे भी मनाती हैं (मनाता, तो कल्पनाजी के लिए भी हूँ, पर वो नहीं मानतीं) कि मेरे रहते वो चली जायें। और इसी क्रम में खुद को तैयार कर रहा हूँ व मना भी रहा हूँ काइया के लिए भी…। लेकिन नियति के आगे किसकी चलती है…??

फिर भी हम तो ‘…अपनी दुवाओं का असर देखेंगे…!!

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सत्यदेव त्रिपाठी

लेखक प्रसिद्ध कला समीक्षक एवं काशी विद्यापीठ के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं। सम्पर्क +919422077006, satyadevtripathi@gmail.com
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